Sunday, June 26, 2011

संघर्ष ही बनाता है सिकंदर

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम


आईएएस चुने गए सुखसोहित सिंह हजारों थैलेसीमिया पीड़ितों के संघर्ष और सफलता के प्रतीक बन गए है. पंचकुला के इस नौजवान ने अपनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट और प्रधानमंत्री कार्यालय तक लड़ी.

संघर्ष ही बनाता है सिकंदर

सुखसोहित सिंह आईएएस के लिए चुने गए, इसमें कोई नयी बात नहीं है. उनकी पोज़ीशन दूसरी सूची में 42 वीं ( पहली सूची जोड़ने पर 833 वीं) थी. वे हमेशा अव्वल आते रहे, इसमें भी कोई खास बात नहीं, लेकिन उन्होंने वह काम कर दिखाया है जो आजाद भारत में किसी ने नहीं किया. सुखसोहित सिंह ने अपने अधिकार के लिए हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और स्वास्थ्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक अपने हक़ की लड़ाई लड़ी और जीते. दरअसल वे थेलेसिमिया नामक आनुवंशिक रोग से पीड़ित हैं और उन्हें इस आधार पर नियुक्ति नहीं दी जा रही थी कि वे भी सरकार के लिए बोझ साबित हो सकते हैं. सुखसोहित सिंह ने साबित किया कि जिस बीमारी के आधार पर पर उन्हें उनकी योग्यता के मुताबिक रोजगार के अधिकार से वंचित किया जा रहा है, वह बीमारी मैनेज करने योग्य है और इसका उनकी कार्यक्षमता कम नहीं होगी और वे किसी पर भी बोझ तो हर्गिज़ नहीं ही होंगे. जल्द ही सुखसोहित सिंह की नियुक्ति उचित पद पर होगी और वे अपनी योग्यता के मुताबिक काम कर सकेंगे. 2008 में हुई यूपीएससी की चयन परीक्षा की मेरिट में जगह पाने वाले सुखसोहित सिंह की सफलता के कुछ मन्त्र :

थेलेसिमिया बाधक नहीं

सुखसोहित को बचपन में ही इस बीमारी का पता चल गया था लेकिन उन्होंने किसी को भी अपने लक्ष्य में बाधा नहीं बनने दिया. यहाँ तक कि थेलेसिमिया को भी. उन्हें पता था कि इस बीमारी में कई बच्चे जवानी की दहलीज तक ही नहीं पहुँच पाते. बेशक इसमें उनके परिवार का रोल महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन सारा संघर्ष तो सुखसोहित सिंह का ही है. सुखसोहित का मानना है कि बीमारी अदृश्य है लेकिन वह मेरे हौसले को तोड़ नहीं सकी. बीमार कोई भी, कभी भी हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आप पराजय को स्वीकार कर लें.

मंजिल का पीछा मत छोड़ो
जब तक मंजिल मिल ना जाए, उसका पीछा करते रहे. सुखसोहित को यूपीएससी चयनl परीक्षा में पहले दो बार सफलता नहीं मिल सकी, लेकिन उन्होंने निराश होकर भाग्य को कोसने की अपेक्षा मेहनत करने की राह चुनी. उन्होंने कामयाबी पाई लेकिन तीसरी बार. और जब रिज़ल्ट आया तब उनका नाम मेरिट लिस्ट में था. 'फेसबुक' पर अपने परिचय में सुखसोहित ने लिखा है कि अतीत के कैदखाने में वक़्त गंवाने से बेहतर है कि अपने महान भविष्य का शिल्पकार बनना. आप अतीत को नहीं बदल सकते, लेकिन शानदार भविष्य की संरचना कर सकते है.

मेहनत निवेश की तरह है

सुखसोहित पंचकुला के हैं और वहां के एक बुजुर्ग उनसे कहते रहते थे कि जो जवानी सोने में खोएगा, वह बुढ़ापे में रोयेगा. इसका अर्थ यही हुआ कि जवानी को सोने, घूमने -फिरने और बेकार के कामों में जाया ना करो, यही समय है जब आप अपने स्वर्णिम भविष्य बना सकते हैं. फेसबुक पर सुखसोहित ने लिखा है कि खुशी और कड़ी मेहनत एक तरह से भविष्य के लिए किया गया निवेश है. यह मेहनत कभी भी बेकार नहीं जाती. बस, आप आयेज बढ़ने के लिए एक पायदान पर चढ़ते हैं और फिर चढ़ते ही चले जाते हैं. सुखसोहित ने लगातार कई कई बरसों तक सोलह से अठारह घंटों तक पढ़ाई की है, और यह उनकी सफलता का आधार है.

जहाँ तक दिखाई दे, जाओ

एक पंजाबी कहावत है कि जहाँ तक दिखाई दे, वहाँ तक जाओ, वहाँ पहुँचने पर और आगे का रास्ता दिखाई देगा. आईएएस में चयन होने के बाद जब वे दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में अपने मेडिकल परीक्षण के लिए गये तब उन्हें नियमों के अनुसार अनफिट करार दिया गया, जबकि डॉक्टरों ने उनसे कहा था कि थेलेसेमिया कोई ऐसी बीमारी नहीं है जो उन्हें उनके काम में बाधा बनेगी. आई ए एस में ही चयनित एक दूसरे युवक एम. श्रीनिवासु को भी मेडिकल बोर्ड ने अनफिट कर दिया था क्योंकि श्रीनिवासू को डायबीटीज़ का रोग था. सुखसोहित से प्रेरणा लेकर उन्होंने भी अपील की कि उन्हें अनफिट करार देकर काम से वंचित न किया जाए. सबक यह है की अगर मंज़िल नज़र न आ रही हो तो भी रास्ता छोड़कर भागना उचित नहीं.

परीक्षा से मत हिचको

बीते 10 जून को सुखसोहित का पहला मेडिकल परीक्षण हुआ और फिर 17 जून को दूसरा. वे ससम्मान इस परीक्षण के लिए पहुँचे. उन्होंने अपनी बीमारी के बारे में कोई भी बात छुपाने की कोशिश नहीं की. उन्होंने यही कहा कि यह भी एक तरह की परीक्षा है और वे इसमें पास होकर रहेंगे. उन्होंने अपनी बात अधिकारियों को समझने की कोशिश की कि उनकी इस बीमारी से उनके एक आईएएस अधिकारी के रूप में काम करने पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा क्योंकि वे सिविल सेवा के लिए मानसिक और बौद्धिक रूप से पूरी तरह सक्षम हैं. जहाँ तक शारीरिक क्षमता का सवाल है उन्होंने एक एक्सपर्ट चिकित्सक का प्रमाण पत्र पेश किया कि उन्हें इसके लिए अपने शरीर में मौजूद खून में लौह कणों के असंतुलन के कारण नियमित रूप से ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न करना होगा.

बहुकोणीय प्रयास

कामयाबी के लिए बहुकोणीय प्रयास करने चाहिए क्योंकि इसमें कामयाबी की गुंजाइश ज़्यादा होती है और सफलता के पास पहुंचने की गति तेज़ हो जाते है. यूपीएससी क्रेक करनेवाले वे पहले युवा हैं जो थेलेसिमिया रोगी हैं. क़रीब 24 साल पहले उनके परिवार को इस बीमारी का पता चला और उन्होंने सुखसोहित का खास ध्यान रखा. अपने हक के इए उन्होंने न्यायालय का दरवाज़ा भी खटखटाया और मंत्री स्तर पर भी बातचीत की. केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी ने उनका मामला प्रधानमंत्री के पास पहुँचाया और 23 जून को प्रधानमंत्री ने उनकी राह आसान बना दी. सुख़सोहित सिंह आज थेलेसिमिया के हज़ारों रोगियों के लिए बन गये हैं, ऐसे मार्गदर्शक जिन्होंने न केवल अपनी राह खुद बनाई, बल्कि दूसरों को भी रास्ता दिखाया है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान june 26,2011

Thursday, June 23, 2011

>(उम्मीद भरे) स्टोरी आइडियाज़!


(उम्मीद भरे) स्टोरी आइडियाज़! 
तैयार हो जाइए साल भर ऐसे टीआरपी बटोरू (?) स्पेशल प्रोग्राम के लिए :

हे प्रभु, तूने बड़ी कृपा की. अमिताभ का ट्विट क्या पढ़ा, मानो मन की मुराद मिल गयी. बेचारा मीडिया अफवाहें फैला फैला कर थक गया था.
अब मिर्च मसाले का उपयोग हो सकेगा.
साल भर के कुछ स्टोरी आइडियाज़.. :

टीवी चैनल के संपादकों और रिपोर्टरों से अनुरोध है कि वे डायरी में इन्हें नोट कर लें और समय समय पर ऐसे हालात में इन आइडियाज का तुरंत इस्तेमाल कर लें...

....अभी तक क्या कर रहे थे अभिषेक...

...आखिर कैसे सफल हुए इतना गैप रखने में...

...किस हकीम की दवा से गर्भवती हुईं ऐश...

... क्या मन्नत और मनौतियों का फल है यह चहंचहांहट...

...डॉन क्यों हुआ खुश ?...

...क्या सामान्य होगा?...

...फीगर बचाने के लिए नार्मल की पक्षधर नहीं है ऐश...

...ऐश को क्या खाना चाहिए?...

...किस नर्सिंग होम में?..

...घर पर क्यों नहीं?...

...श्वेता कब नाचेगी?...

...इलाहाबाद से आयेंगे (जापे के) लड्डू?...

..अजिताभ ने बधाई क्यों नहीं दी?...

...और अमर सिंह नाचने लगे...

..सोनिया पिघलीं, दी बधाई...

...गुड्डी बनेगी दादी...

...अभिषेक ने की शूटिंग की छुट्टी...

...लम्बू ने खरीदे छोटू के कपड़े...

...ऐश का वजन (कितना) बढ़ा?...

...तैयार है जच्चा का कमरा...

...पहले भी उम्मीद थी लेकिन...

...क्या कहते हैं आम आदमी?...

...क्या बहुत देर कर दी?....

...देरी से मातृत्व के फायदे या नुकसान?....

...अगर करिश्मा से सगाई ना टूटती तो क्या होता?...

...दादा को चाहिए पोता या पोती?...

...बाबा विश्वनाथ की कृपा...

....ऐश की गोद भराई कहाँ होगी मुंबई में या इलाहाबाद में?

....क्या नाम होगा (गर्भस्थ) जूनियर बच्चन का?

...क्या नाम शुभ होगा शिशु का?

....जच्चा किधर सिर करके सोये तो बच्चे का भाग्य बनेगा?

...सिद्धि विनायक का फल, हनुमानजी का आशीर्वाद..

...साथ ही देखिएगा मालिशवाली बाई का खास इंटरव्यू...

...जच्चा का डाइट चार्ट...

...ड्राइवर करेगा रहस्योदघाटन..

...माली ने खोल दिया भेद

...प्लंबर के रूप में घुसा मीडियाकर्मी

...फलां नीम हकीम का दावा ....

यह भी हो सकता है कि ऐश की बॉडी लैंग्वेज के आधार पर कोई टीवी रिपोर्टर 'सुपर जूनियर बिग बी' का इंटरव्यू ही दिखाकर माने. आखिर हमारे टीवी चैनलों में भी कई रजनीकांत जो हैं.

दरअसल टीआरपी की होड़ में मूल मुद्दों से भटक गए हैं हम !!!

प्रकाश हिन्दुस्तानी
जून 22 , 2011

Saturday, June 18, 2011

कामयाबी इंतज़ार भी कराती है




रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम



2002 में भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल किये जाने के बाद भी अमित मिश्रा को खेलने के उतने अच्छे मौके नहीं मिले और बरसों तक टीम इण्डिया में उनका उपयोग केवल एक स्टेपनी की तरह ही किया गया. इस पूरी प्रक्रिया का उस खिलाड़ी पर क्या असर पड़ सकता है, यह शायद ही हमारे क्रिकेट प्रशासन ने सोचा हो, लेकिन अमित मिश्रा ने मौका आने पर अपनी काबीलियत साबित कर दी.

कामयाबी इंतज़ार भी कराती है


क्रिकेट को टीम का खेल माना जाता है, लेकिन सच्चाई यही है कि मैदान में हर खिलाड़ी एकाकीपन से जूझता रहता है. लेग ब्रेक बॉलर और दाहिने हाथ के लोअर ऑर्डर बेट्समैन अमित मिश्रा से ज्यादा अच्छी तरह इस बात को और कौन समझ सकता है? यह बात भी सच है कि क्रिकेट जेंटलमेंस गेम है और यहाँ की सभ्यता के पैमाने अलग ही हैं. 2002 में भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल किये जाने के बाद भी अमित मिश्रा को खेलने के उतने अच्छे मौके नहीं मिले और बरसों तक टीम इण्डिया में उनका उपयोग केवल एक स्टेपनी की तरह ही किया गया. इस पूरी प्रक्रिया का उस खिलाड़ी पर क्या असर पड़ सकता है, यह शायद ही हमारे क्रिकेट प्रशासन ने सोचा हो, लेकिन अमित मिश्रा ने मौका आने पर अपनी काबीलियत साबित कर दी. हाल ही में वेस्ट इंडीज़ से हुई वन दे सीरिज में भारत की तीन दो से जीत में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है.
24 नवम्बर 1982 को जन्मे अमित मिश्रा दिल्ली के हैं और क्रिकेट में उनका कोई गोडफादर नहीं रहा. उन्होंने जो कुछ भी अर्जित किया अपने खेल से. अनेक झंझावातों को पार करके उन्होंने अपनी मुकाम हासिल कार ही लिया. अमित मिश्रा की सफलता के कुछ सूत्र :

सही वक्त आने दें
अमित मिश्रा ने अंडर -19 में जिस तरह का क्रिकेट खेला था उससे भारतीय टीम में जगह पाने का रास्ता तो मिल गया था. 2000 -2001 में उन्हें फर्स्ट क्लास क्रिकेट में जगह मिली और वे 2002 में वेस्ट इंडीज़ के सामने खेलेनेवाली टीम इण्डिया में शामिल भी कर लिए गए थे लेकिन लेकिन उन्हें टीम इण्डिया में खेलने का मौका ही नहीं मिला. वे टीम में एक स्टेपनी की तरह साल भर तक रहे लेकिन मैदान में जौहर दिखाने के मौके से वंचित रहे. 2003 में उन्हें ढाका में टीवीएस कप में खेलने का मौका मिला और फिर वे मैदान के बाहर कर दिए गए. फिर दुबारा टीम इण्डिया के साथ खेलने का मौका उन्हें 2009 में ही मिल पाया जब दक्षिण अफ्रीका में आईसीसी चैम्पियंस ट्रोफी के लिए मैच हुए. इतने साल तक वे अपने खेल की तैयारियां करते रहे. खेल को और बेहतर बनाने की कोशिशों में लगे रहे.

निराशा से बचना ज़रूरी
अगर लम्बे समय तक किसी योग्य व्यक्ति को अवसर ना मिले तो इस बात का खतरा पैदा हो जाता है कि वह व्यक्ति किसी ना किसी तरह की निराशा या अवसाद का शिकार न हो जाए. अमित मिश्रा के साथ भी ऐसे मौके बहुत सी बार आये जब यह लगने लगा कि उन्हें कहीं बलि का बकरा या क्रिकेट की राजनीति का मोहरा तो नहीं बनाया जा रहा? निराशा के दौर में उनका मन क्रिकेट से संन्यास लेने का भी होने लगा था लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने आप को संभाला और और मैदान में डटे रहने का प्रयास करते रहे. अगर वे बीच के इन छह सालों में कभी भी संन्यास ले लेते तो फिर टीम इण्डिया में लौटने का तो सवाल ही नहीं था. घनघोर निराशा के दौर में भी वे मैदान में डटे रहे.

तकनीकी पक्ष को जानें
टीम इण्डिया से अलग होने के बाद अमित मिश्रा क्रिकेट गुरुओं और विशेषज्ञों से सलाह मशविरा करते रहे और अपने खेल की बारीकियों को उन विशेषज्ञों के नज़रिए से समझ कर सुधार करते रहे. विशेषज्ञ उन्हें बताते रहे कि उनकी आदर्श स्थिति क्या होनी चाहिए. उन्हें स्पिन करने के दौरान विविधता लानी चाहिए, सेकण्ड लाइन पर खेलना और कितना,कब स्पिन करना चाहिए, एक्स्ट्रा ओवर को कैसे कवर करना चाहिए आदि आदि बातों पर ध्यान देते और खेल को सुधारते रहे. उनके खेल का अपना स्टाइल रहा है लेकिन जब उन्हें लगा कि शायद वे कहीं कमज़ोर पद रहे हैं तो उन्होंने तत्काल उसमें सुधार का अभियान छेड़ दिया.

अवसर को मत चूको
टीम इण्डिया से किनारे किये जाने के बाद भी अमित मिश्रा अपने खेल में जुटे रहे. उन्होंने आईपीएल में डेल्ही डेयर डेविल्स और गत आईपीएल सीजन चार में डेक्कन चार्जर्स की तरफ से खेला. डेक्कन चार्जर्स की तरफ से उन्होंने कुल 19 ओवर लिए थे और फायनल में चार ओवर में 17 रन देकर पांच विकेट चटकाए. वे अपने आगाज़ के साथ ही एक झटके में पांच विकेट लेनेवाले छठे क्रिकेटर बन गए. आईपीएल को उन्होंने केवल शौक या मिलनेवाले करीब डेढ़ करोड़ रुपयों के लिए ही नहीं, अपनी प्रतिष्ठा की वापसी के लिए भी खेला था और वे अपने मकसद में कामयाब हो गए. यह शानदार पारी ही उनकी हाल ही की वेस्ट इंडीज सीरिज में जाने का माध्यम बनी.

प्रतीक्षा अपमान नहीं होता
अमित मिश्रा ने साबित कर दिया कि सही मौके के लिए प्रतीक्षा करने को नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए. एक दौर में उन्हें अनिल कुम्बले का विकल्प मानकर मौका दिया जा रहा था और उन्होंने इसका लाभ उठाया. अनिल कुम्बले के पूर्ण स्वस्थ होकर लौटने के बाद वे हरभजन सिंह के विकल्प बने. उन्होंने इस बात को समझा कि कोई भी मौका छोटा नहीं होता और अगर सही भूमिका के लिए इंतज़ार भी करना पड़े तो कर लेना ही ठीक होता है. क्या पता कल को उससे भी बेहतर कोई मौका आनेवाला हो?

राजनीति से दूर रहो
अमित मिश्रा ने कभी भी अपने साथ घटी घटनाओं को लेकर बयानबाजी नहीं की. क्रिकेट के पंडितों का कहना है कि अगर अमित जैसे खिलाड़ियों को आगे लाना हो तो टीम इण्डिया के कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए. अमित ने हर बार केवल अपने खेल के बूते यह विश्वास हासिल किया कि खेल में राजनीति नहीं आनी चाहिए. उन्होंने कभी मीडिया को बयान नहीं दिया और फिर भी कलात्मक स्पिन गेंदबाजी को उसका पुराना सम्मान लौटा दिया. अब वे यही कहते हैं कि मैं चयनकर्ताओं और सीनियर खिलाड़ियों का आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे यह मौका दिया.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान, 19 june 2011

Saturday, June 11, 2011

जूझने के जज्बे ने दिलाई कामयाबी


रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम


ओप्रा विनफ्रे जानी मानी अभिनेत्री, फ़िल्म निर्माता और दानदाता हैं. ओप्रा विनफ्रे दुनिया की सबसे प्रभावशाली अश्वेत महिलाओं में गिनी जाती हैं. वे पहली अश्वेत महिला अरबपति हैं.

जूझने के जज्बे ने दिलाई कामयाबी

विश्वविख्यात ओप्रा विनफ्रे शो का फेयरवेल सीजन ख़त्म हो गया लेकिन कुछ देशों में रिपीट टेलीकास्ट चल रहा है. पच्चीस साल की शानदार पारी में 4561 एपिसोड का यह कार्यक्रम अमेरिकी टीवी के इतिहास का सबसे ऊँची रेटिंगवाला शो रहा है. 120 से ज्यादा देशों में दिखाए गए इस शो में दुनिया के सबसे नामी गिरामी लोगों ने शिरकत की. हर तरह के मसालों से भरपूर इस शो में सकारात्मक नजरिया, सेल्फ इम्प्रूवमेंट, दान, सहयोग, अध्यात्म आदि रहा है. वे जानी मानी अभिनेत्री, फ़िल्म निर्माता और दानदाता हैं. ओप्रा विनफ्रे दुनिया की सबसे प्रभावशाली अश्वेत महिलाओं में गिनी जाती हैं. वे पहली अश्वेत महिला अरबपति हैं. मोंतेसिटो, केलिफोर्निया में 42 एकड़ के एस्टेट में बने भव्य विला में रहती हैं. दुनिया के अनेक देशों में उनके भव्य महलनुमा मकान हैं. वे बेहद गरीबी में पलीं और बड़ी हुईं. अपनी प्रतिभा से उन्होंने अपनी जगह बनाई. ओप्रा विनफ्रे अगर भारत में होतीं तो निश्चित ही उन्हें कोई अवतार, देवी या महाशक्ति के रूप में याद किया जाता. टीवी होस्ट से ग्लोबल कल्चरल आयकोन बननेवाली ओप्रा विनफ्रे की सफलता के कुछ सूत्र :

हालात से मत डरो
ओप्रा विनफ्रे की माँ घरेलू नौकरानी थीं और जब वे केवल 13 साल की थीं, तब उनके साथ बलात्कार किया गया था इसलिए उनके जन्म के बाद परिवार और पिता का साया उन्हें नसीब नहीं हुआ. माँ ने उनकी नानी के पास उन्हें छोड़ दिया जो खुद बेहद मुफलिसी में थीं. कुछ साल फतेहाले में गुजरे और उन्हें गोद दे दिया गया ऐसे परिवार में जो बेहद क्रूर था. उनके साथ मारपीट और अभद्रता तो आम बात थी. जब वे तेरह साल की थीं, तब उनके साथ बलात्कार किया गया, चौदह की उम्र में वे बिनब्याही माँ बनीं, लेकिन बच्चा एक सप्ताह भी जीवित नहीं रह सका. वे नशे की शिकार हो गयीं और फिर इसका इलाज कराने उन्हें नशा मुक्ति केंद्र भेजा गया. ओप्रा विनफ्रे ने विकटतम दिनों का मुकाबला डटकर किया.

बुद्धि हमेशा उपयोग में लाओ
ओप्रा विनफ्रे का फार्मूला यह रहा कि विपरीत से विपरीत हालात में भी बुद्धि पर भरोसा करना मत छोड़ो. दुर्दिनों में दो साल उन्होंने अपनी पढ़ाई भी छोड़ी लेकिन फिर पढाई शुरू की. ब्रोडकास्ट कम्युनिकेशन की पढ़ाई करने के बाद उन्हें लोकल टीवी में पार्ट टाइम रिपोर्टर का काम मिला. इस बीच वे एक स्थानीय ब्यूटी कान्टेस्ट भी जीत चुकी थीं. तीन साल बाद उन्होंने अपना जॉब बदल दिया और एक बड़े प्लेटफार्म को आधार बनाया. उन्होंने अपने हर शो में अपनी बुद्धि का लोहा मनवाया. प्रस्तुति को हमेशा जीवंत बनाये रखा.

कोई पद छोटा नहीं होता
कोई भी काम छोटा नहीं होता. यह बात ओप्रा विनफ्रे ने साबित कर दी. उनका स्टाइल बड़े पद पर बैठे लोगों को रास नहीं आया. नयी कंपनी में साल भर भी नहीं हुआ था कि उन्हें नौकरी से हटाने के बजाय पदावनत करके टीवी ब्रोडकास्टर से टीवी शो प्रजेंटर बना दिया गया और वह भी दोपहर में महिलाओं के शो का. ओप्रा विनफ्रे ने महसूस किया कि यही काम उनके लिए सही काम है जब वे महिला दर्शकों को अपनी हाजिरजवाबी, अपनेपन, साफगोई और दिलचस्प शैली से प्रभावित कर सकती हैं. वे कहती हैं कि विफलता ईश्वर का वह वरदान है जो आपको इशारा करता है कि आप शायद गलत राह पर हैं.

रंग और शक्ल पर मत जाओ
ओप्रा विनफ्रे ने महिलाओं के उस कार्यक्रम को सात साल तक प्रस्तुत किया. इस बीच प्रबंधन में बैठे लोगों को उनकी अनेक बातों से शिकायतें हुईं. कहा गया कि आपके बाल ठीक से जमे नहीं होते, उनकी नाक ज्यादा ही लम्बी है और दो आँखों के बीच दूरी ज्यादा है. उनका वजन ज्यादा है आदि आदि. प्रबंधन ने उन्हें न्यूयोर्क भेजा ताकि उन्हें ठीक से बाल जमाना, सही ढंग से मेकअप करना आदि सिखाया जा सके. यह भी सलाह दी गयी कि वे सिर को मुंडा लें और विग पहनना शुरू कर दें.इस सब का नतीजा यह हुआ कि उन्होंने अपने आप पर ध्यान देना शुरू किया और खुद को ज्यादा प्रभावी टीवी शो के प्रस्तुतकर्ता के रूप में आगे लाने की सकारात्मक कोशिश की.

बेख़ौफ़ होकर सच बोलो
ओप्रा विनफ्रे शो की लोकप्रियता का एक कारण उनकी बेबाकी भी रही है. वे अपने प्रोग्राम के वीआइपी मेहमानों की लल्लो - चप्पो नहीं करतीं. कुछ माह पहले उनके शो में अतिथि के रूप में मशहूर फैशन डिजाइनर टोमी हिलफिगर आये थे. उनका परिचय देने के बाद ओप्रा ने उनसे पूछा -- क्या ये बात सच है कि आपने हाल ही में एक वर्णवादी और रंगभेदी बयान में कहा था कि मेरे बनाये कपड़े अफ्रीकी, एशियाई, अमेरिकी सभी खरीदते हैं लेकिन मैं चाहता हूँ कि मेरे कपड़े अश्वेत और एशियाई नहीं खरीदें. क्या ये बात सही है? टोमी हिलफिगर ने जवाब दिया --हाँ. ओप्रा ने उन्हें कहा तत्काल इस शो से बाहर जाइए. मैं सभी लोगों से गुजारिश करती हूँ कि टोमी हिलफिगर के डिजाइन किये वस्त्र कोई न खरीदे. इनकी आर्थिक हालत ऐसी बना दो कि ये कभी भी कभी भी बहुसंख्यक आबादी के बारे में ऐसा सोचने की जुर्रत न कर सके.

सभी को साथ लो
ओप्रा विनफ्रे फाउंडेशन बनकर करोड़ों डॉलर दान देनेवालीं ओप्रा का मानना है कि आपको जिन्दगी के हर मोड़ पर कुछ न कुछ जिम्मेदारी दी गयी है, उसे पूरा करो. उनकी मदद करो जो हकदार लेकिन मोहताज हैं. अपने काम को ताजी से आगे बढ़ाने के लिए अपने अधीनस्थों को अधिकार सौंपो. रोजमर्रा के जीवन में जो भी आपके साथ हों उनसे दिल से जुड़ो. आपके जीवन में जिसने भी योगदान दिया है, उसका आभार मानना न भूलो. आपको काम के बारे में जो भी प्रतिक्रिया मिले, उसे अवश्य सुनो और अगर सुधर की गुंजाइश हो तो उसे सुधारने में देरी मत करो.

जीवन का सबसे बड़ा रहस्य
ओप्रा का मानना है कि जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि रहस्य नाम की कोई चीज़ है ही नहीं. इसलिए बेखौफ होकर जो भी अच्छा लगे वही करो. आपका जो भी लक्ष्य हो, वह तभी मिल सकता है जब आप पूरा जोर लगाकर उसकी दिशा में काम करें. काम वही चुनें जो आपको पसंद हो. किसी भी सीमा में खुद को ना बांटे. और जो भी करें दिल लगाकर करें, पूरी शक्ति उस लक्ष्य को पाने में झौंक दें. अगर लक्ष्य को पाने में कोई भी शक हो रहा हो तो किसी और से नहीं, खुद अपने से ही पूछो -- जवाब भी वहीँ से मिलेगा. हर सुबह के पांच मिनिट केवल इस बात के लिए रखो कि आप अपने आप से बात कर सको. अगर आपके पास अपने लिए पांच मिनिट भी नहीं हैं तो आप को कामयाबी की आशा नहीं करनी चाहिए.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान june 12, 2011

Saturday, June 04, 2011

सलमान की विनम्रता और शरीरशौष्ठव

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम



सलमान खान आज भी करोड़ों युवक-युवतियों के चहेते हैं. लाखों लोग यह मानते
हैं कि किसी भी फ़िल्म में सलमान खान का होना ही उस फ़िल्म के मनोरंजक होने की गारंटी है. इस स्तम्भ में सलमान की अभिनय की समीक्षा नहीं की जा रही है, बल्कि एक कलाकार के व्यावसायिक रूप से कामयाब होने के फार्मूले पर चर्चा की जा रही है.

सलमान की विनम्रता और शरीर शौष्ठव
इंदौर में जन्मे अब्दुल रशीद सलीम सलमान खान उर्फ़ सल्लू महान नहीं, कामयाब हीरो हैं. हीरो के रूप में पहली ही फ़िल्म 'मैंने प्यार किया' (१९८९) ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी, और २२ साल बाद गत शुक्रवार को रिलीज़ 'रेडी' को भी अच्छी शुरूआत मिली. बीते साल उनकी 'दबंग' भी ब्लॉकबस्टर रही. २००९ में उनकी 'वांटेड' भी सुपर हिट थी. मैंने प्यार किया ने ६७ करोड़ का कारोबार किया था और दबंग ने १८७ करोड़ का. उम्र के ४६वे साल में भी वे अपने बूते फ़िल्म को सुपरहिट करने का माद्दा रखते हैं और उनकी अपनी निजी फैन फॉलोइंग तगड़ी है. अभी भी वे अपने दर्शकों को बॉडी दिखाते हैं और कई हीरो शरीर शौष्ठव से जलते है. वे १९८८ (बीवी हो तो ऐसी) से आज तक ८४ फिल्मों में छोटे बड़े रोल कर चुके है. इनमें दो तीन को छोड़कर सभी ने अच्छा कारोबार किया और कई तो सुपरहिट रही. सलमान खान ने टीवी पर दस का दम ( सीजन एक और दो) और बिग बॉस (सीजन चार) होस्ट किये, जिनके लिए उन्हें बड़ी धनराशि मिली और उए प्रोग्राम भी सुपर हिट रहे. सलमान खान आज भी करोड़ों युवक-युवतियों के चहेते हैं. लाखों लोग यह मानते हैं कि किसी भी फ़िल्म में सलमान खान का होना ही उस फ़िल्म के मनोरंजक होने की गारंटी है. इस स्तम्भ में सलमान की अभिनय की समीक्षा नहीं की जा रही है, बल्कि एक कलाकार के व्यावसायिक रूप से कामयाब होने के फार्मूले पर चर्चा की जा रही है. सलमान में भी कई कमजोरियां हैं, लेकिन उनकी खूबियाँ भी बहुतेरी हैं. उनकी व्यावसायिक कामयाबी के कुछ सूत्र :

विनम्रता
सलमान खान के नज़दीकी लोग जानते हैं कि सलमान खान निजी जिन्दगी में बेहद विनम्र और दरियादिल प्रवृत्ति के हैं. वे अपने घर पर आनेवाले सभी परिजनों से बेहद अपनेपन और विनम्रता से मिलते हैं. उनकी यह विनम्रता कई लोगों को अचम्भे में दाल देती है और कई लोग समझते हैं कि वे घर पर भी अभिनय करते हैं. आम बोलचाल में वे कभी किसी पर कटाक्ष नहीं करते और यही विनम्रता 'दस का दम' शो में उनकी कामयाबी का आधार भी बनी जहाँ वे सभी से प्यार से बतियाते नज़र आते थे. इसके अलावा वे आमतौर पर विवादों से बचाते हैं और ज़रा भी गलती होने पर उसे तत्काल सुधारने की कोशिश में जुट जाते हैं.

निश्चित दर्शक वर्ग पर लक्ष्य
'अजब प्रेम की गज़ब कहानी', 'इसी लाइफ में', 'ओम शांति ओम' और 'तीसमार खां' फिल्मों में उन्होंने अपना यानी सलमान खान का ही रोल किया. सलमान खान आम जनता के हीरो हैं और उन्ही के बीच उन जैसा लगाना चाहते हैं. उनकी खूबियों में उनका स्वाभाविक अभिनय महत्वपूर्ण कहा जाता है. अगर वे किसी लड़ाकू पात्र के रोल में हो तो सचमुच के लड़ाके लगते हैं और अगर किसी कमज़र्फ के रोल में हों तो वहां भी फिट लगते हैं. उन्होंने अपने आप को आम जनता से जोड़ रखा है और अपने एक खास दर्शक वर्ग के लिए मनोरंजन की कोशिश करते हैं.उन्होंने उसे अपनी यूएसपी बना लिया. कला फिल्मों में अभिनय करना उन्हें जमता नहीं और बहुत नए प्रयोग वे नहीं करते.

शरीर शौष्ठव पर ध्यान
हिंदी फिल्मों में दिलीप कुमार, देव आनंद,राज कपूर, शम्मी कपूर, संजीव कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन जैसे अनेक हीरो हुए हैं जिन्होंने अपने शरीर शौष्ठव पर कभी ध्यान नहीं दिया. सलमान का मानना है कि अगर हीरोइन के लिए शरीर का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है तो हीरो के लिए क्यों नहीं? अगर शरीर भी एक सम्पदा है, प्रॉपर्टी है तो फिर उसकी उपेक्षा कतई नहीं होनी चाहिए. आज देश के जिम्नेश्यम्स में सलमान की आदमकद तस्वीरें देखने को मिल जायेंगी. देश भर के हजारों नौजवान सलमान के जैसा बदन पाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. भले ही उन पर शरीर के प्रदर्शन का आरोप लगे, वे स्वास्थ्य चेतना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं. इसे 'अजब प्रेम की गजब कहानी' फ़िल्म में भी फ़िल्म का हीरो रणवीर कपूर सलमान की बॉडी की तस्वीर पर अपना चेहरा चस्पा करके हीरोइन कैटरीना कैफ को प्रभावित करना चाहता है. 'दस का दम' शो में आई एक महिला ने कहा था कि जब वह गर्भवती थी तब उसने अपने कमरे में सलमान का फोटो लगा रखा था क्योंकि वह चाहती थीं कि उसकी होनेवाली संतान सलमान खान जैसी आकर्षक हो.

प्रोफेशनल अप्रोच
सलमान अपने बूते पर फ़िल्म को सफलता तक ले आने की कूवत रखते हैं और इसके लिए कड़ी मेहनत करते हैं उनकी फिल्मों का सफलता का प्रतिशत दूसरे कलाकारों की अपेक्षा बेहतर है. फ़िल्म के सेट्स पर वे अनुशासित रहने की कोशिश करते हैं. निर्देशक को सहयोग करते हैं और नए कलाकारों को प्रोत्साहन देते हैं. 'लन्दन ड्रीम्स', 'युवराज' और 'वीर' जैसी वीरगति प्राप्त फ्लाप फिल्मों के बाद भी वे झट से उठ खड़े हुए और अपने निन्मता की मदद को आगे आये. फ़िल्मी असफलता से वे चित नहीं होते और अगले अभियान में कूद पड़ते हैं. फिल हिट हो या फ्लॉप, वे उसे खेल भवन से लेते हैं.

सामाजिक सरोकार
सलमान के करीबी मनाते हैं कि सलमान हमेशा सहयोगी व्यवहार करते है. वे चैरिटी के लिए भी काफी काम करते हैं. 'बीइंग ह्युमन' नामक एनजीओ के माध्यम से तो वे ज़रूरतमंदों की मदद करते ही हैं, निजी तौर पर भी सभी की मदद करते हैं. यह संस्था स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है. कैंसर, थेलेसीमिया, ल्यूकेमिया जैसे भीषण रोगों से लड़ रहे लोगों की मदद के लिए उनका संगठन जरूरतमंदों की मदद करता है. उनका संगठन एक लाख लोगों का नाम रजिस्टर करने में जुटा है जो वक़्त आने पर देश भर में कहीं भी रक्तदान कर सके.सलमान ने 'फिर मिलेंगे'(2004) फ़िल्म में उन्होंने एड्स पीड़ित युवक का रोल किया था जिसकी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी सराहना की थी.

सच्चे धर्मनिरपेक्ष
सलमान खान कभी भी कट्टरवादी नहीं रहे और इसीलिये वे खुद कट्टरवादियों के निशाने पर रहे. उनके पिता मुस्लिम हैं और माँ महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण. उनके घर में पूजा भी होती है, नमाज़ भी. एक बहन अलविरा की शादी अभिनेता अतुल अग्निहोत्री से हुई है. गणेशोत्सव में गणेश प्रतिमा स्थापना को लेकर उनके खिलाफ फतवा भी जारी हुआ था. उन्होंने हमेश ही अपने आप को खान कहने के बजाय भारतीय बताना पसंद किया. शिव सेना भी कई बार उनके खिलाफ मैदान में आई, लेकिन उन्होंने ऐसे मौकों पर विवाद से दूर रहन पसंद किया.

रचनात्मकता को महत्त्व
सलमान खान अपने निजी तनावों को दूर करने के लिए रचनात्मक तरीके अपनाते हैं. उन्हें बच्चों के साथ खेलने के अलावा पेंटिंग करने का भी शौक है. वे अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी भी लगा चुके हैं और पेंटिंग्स से होनेवाली आय को सेवा के कार्य में दान दे चुके हैं. उनके मित्र मनाते हैं कि वे ठीक ठाक पेंटिंग बना लेते हैं. कैटरीना कैफ ने पिछले दिनों बयान दिया था कि उन्हें अभी तक सलमान ने पेंटिंग का विषय नहीं बनाया और वे चाहती हैं कि सलमान उन की पेंटिंग्स बनायें.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 5 june 2011

Sunday, May 29, 2011

लक्ष्य पर टिकी थी निगाहें

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम

सोलह साल के इम्मादी पृथ्वी तेज ने आईआईटी-जेईई में 4 लाख 68 हजार विद्यार्थियों में पहला स्थान पाया. यह पृथ्वी का पहला प्रयास था. पृथ्वी ने 1000 में से 970 अंकों का स्कोर अर्जित किया. अब पृथ्वी आईआईटी मुंबई में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में प्रवेश चाहता है. विदेश जाकर डॉलर कमाने के बजाए यूपीएससी की परीक्षा देकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना पृथ्वी का नया लक्ष्य है.

लक्ष्य पर टिकी थी निगाहें


केवल सोलह साल के इम्मादी पृथ्वी (तेलुगु उच्चारण पुरुध्वी) तेज ने आईआईटी-जेईई में 4 लाख 68 हजार विद्यार्थियों में पहला स्थान पाया. यह पृथ्वी का पहला प्रयास था. पृथ्वी ने 1000 में से 970 अंकों का स्कोर अर्जित किया. अब पृथ्वी आईआईटी मुंबई में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में प्रवेश चाहता है. विदेश जाकर डॉलर कमाने के बजाए यूपीएससी की परीक्षा देकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना पृथ्वी का नया लक्ष्य है. पृथ्वी आँध्रप्रदेश के तितुमाला का रहनेवाला है और विजयवाड़ा में श्री चैतन्य जूनियर कालेज का छात्र रहा है. पृथ्वी ने अपनी बुद्धि, मेहनत, योजनाबद्ध पढ़ाई और बगैर तनाव के वह मंजिल पा ली, जहाँ पहुंचना लाखों विद्यार्थियों का सपना होता है. पृथ्वी की इस बेमिसाल कामयाबी के कुछ सूत्र:

मज़बूत बुनियाद ज़रूरी

पृथ्वी के माता-पिता तिरुमाला में रहते हैं, जो एक छोटी सी जगह है और वहां आईआईटी में प्रवेश परीक्षा के लायक माहौल नहीं था. बेटे की पढ़ाई में रूचि देखते हुए उसके पिता ने उसे गुदिवाडा के विश्व भारती रेसिडेंसियल स्कूल में भारती करा दिया जहाँ उसने घर से दूर रहकर न केवल पढ़ाई की, बल्कि मैथ्स और साइंस के बुनियादी सिद्धांतों को कंठस्थ कर लिया. इन्हीं विषयों में गहरी समझ के कारण दसवीं की परीक्षा में उसे 96 प्रतिशत नंबर मिले और उसने आईआईटी-जेईई की तैयारी का लिए विजयवाड़ा में प्रवेश लिया. मूल विषयों की मज़बूत बुनियाद पृथ्वी की कामयाबी में महत्वपूर्ण रही.

लक्ष्य पर निगाहें
पृथ्वी की निगाहें छुटपन से ही आईआईटी पर थीं और उसे यह मालूम था कि वहां पहुँच पाना मज़ाक नहीं. उसके पिता इम्मादी नागेश्वर राव की तिरुमाला में ज्वेलरी की छोटी सी शॉप हैं और माँ रानी राव सामान्य गृहिणी हैं. पृथ्वी चाहता तो बचपन से ही ज्वेलरी शॉप का कामकाज संभालने का मन बना लेता, लेकिन उसका लक्ष्य शॉप नहीं थी. लक्ष्य को निगाह में रखते हुए स्कूलिंग के लिए पृथ्वी ने घर से दूर रहना मंजूर किया. निगाहे लक्ष्य पर, केवल लक्ष्य पर रखीं. छोटी-मोटी परेशानियों से विचलित हुए बिना पृथ्वी ने पढाई पर ध्यान दिया. परिवार का पूरा सपोर्ट तो था ही, पृथ्वी ने पूरी क्षमता लगा दी.

सही कोचिंग आवश्यक
पढ़ाई में बहुत अच्छा होने के बावजूद पृथ्वी को पता था कि बगैर सही कोचिंग के आईआईटी-जेईई क्रेक करना आसान नहीं. दसवीं के 96 प्रतिशत हासिल अंकों ने उसे हौसला दिलाया, लेकिन विजयवाड़ा में उसने जिस कोचिंग संस्थान में प्रवेश लिया वह इंजीनियरिंग का नहीं, मेडिकल में प्रवेश का अच्छा संस्थान माना जाता था. उस संस्थान के लिए भी यह चुनौती थी और उसके फैकल्टीज ने उस पर विशेष ध्यान दिया. पृथ्वी ने अपनी कामयाबी से साबित कर दिया कि जो सर्वश्रेष्ठ है वह किसी भी क्षेत्र में अपनी योग्यता साबित कर सकता है.

गाइडेंस पर पूरा अमल

पृथ्वी ने आईआईटी-जेईई के लिए अपने शिक्षको की सलाहों को हमेश ध्यान से सुना और उस पर अमल किया. अपनी कमजोरियों को जानने के लिए खुद नियमित रूप से अपने टेस्ट लिए. जो भी टेस्ट दिए वे इस गंभीरता से दिए मनो वही असली परीक्षा हो. सभी विषयों की तैयारी अच्छी तरह से की और यह भी ध्यान रखा कि उसकी अपनी दिलचस्पी और विशेष योग्यता किस में है और उसे किस सवाल का जवाब सबसे पहले देना है. दोस्तों के बजाए अपने टीचर्स से ही पढ़ाई के बारे में चर्चाएँ की और सभी विषयों के नोट्स परीक्षा के अनुसार ही बनाये.

सेल्फ स्टडी का सही तरीका
किसी भी परीक्षा में अव्वल आना हो तो टीचर्स केवल गाइड ही कर सकते हैं. पढ़ाई तो छात्र को खुद ही करनी होते है. पृथी ने अपनी पढाई का जो खाका बनाया था उस पर प्रतिदिन, प्रति सप्ताह और महीने भर के लक्ष्य निर्धारित थे. इसी तरह सेल्फ स्टडी के विषयवार लक्ष्य भी तय किये और उस पर अमल किया. हर विषय के हर प्रश्न को कई कई बार हाल किया. यह बार बार जांचा कि कहाँ कहाँ कोई कमी रह गयी है और उसे जल्दी दूर किया.

बगैर दबाव के पढ़ाई
पृथ्वी ने पढ़ाई और परीक्षा के दौरान दबाव के पढ़ने की कोशिश की. दबाव में नहीं आने का उसका फार्मूला यह रहा कि सारे बेसिक्स क्लियर कर पढ़ाई में जुटना चाहिए. पढ़ाई के दौरान दोस्तों, परिवारजनों और टीचर्स के दबाव में आये बिना पढ़ाई करना ही सफलता का रास्ता है. अगर आप दबाव में हैं तो पढ़ने में मन नहीं लग सकता और अगर दबाव झेलने की क्षमता नहीं हो तो परीक्षा में हड़बड़ी में गड़बड़ी हो सकती है.

टाइम मैनेजमेंट
परीक्षा की तैयारी ऐसे करें कि आपका टाइम मैनेजमेंट एकदम सटीक रहे. नींद पूरी हो और एक पल बर्बाद न हो. आपकी बॉडी क्लॉक इस तरह एडजस्ट हो जो आपको सपोर्ट करे. कई विद्यार्थी रात रात भर पढ़ते हैं और दिन में सोते हैं. जब दिन में परीक्षा का वक्त होता है तब उन्हें नींद आने लगती है. वक्त को बर्बाद किये बिना उसका सौ प्रतिशत सही इस्तेमाल करने की कला को समझना ज़रूरी है.

रिलेक्स होने की कला
पृथ्वी ने पढ़ाई के दौरान अपना क्रिकेट खेलना बंद नहीं किया. पढ़ाई और यहाँ तक कि परीक्षा के दौरान वह टीवी पर क्रिकेट देखने से नहीं चूका. हाँ, कुछ नयी फ़िल्में उसने परीक्षा के बाद देखने के इरादे से टाल दी थीं. पूरी पढ़ाई के दौरान उसने कभी भी आठ घंटे से कम की नींद नहीं ली. खेलते वक्त उसने यह ध्यान रखा कि कहीं वह थकान तो महसूस नहीं कर रहा. चौबीसों घंटे पढ़ाई करने की कोशिश उसने नहीं की क्योंकि वह जानता था कि यह संभव नहीं है.

अगला लक्ष्य भी निर्धारित

पृथ्वी ने आईआईटी मुंबई से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के डिग्री लेने के बाद का लक्ष्य भी निर्धारित कर लिया है. विदेश जाकर डॉलर कमाने के बजाए वह आईएएस बनकर अपने देश में ही लोगों की सेवा करना चाहता है. वह इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि आईआईटी केवल छात्रों के कारण महान संस्थान बने हैं, इन्हें महान बनाने में दूसरे फैक्टर भी हैं. वह मानता है कि हमारे कई नेता बहुत पढ़े लिखे हैं, कई तो आईआईटी और आईआईएम से निकले हैं और कई हार्वर्ड, केम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड में भी पढ़े हैं. अच्छा टेक्नोक्रेट बनकर वह देश के लिए काम करना चाहता है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 29 may 2011

Friday, May 20, 2011

ज़िद ने दिलाई यह मंज़िल




रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम

महज़ पाँच साल की उम्र में मान की ममता से मरहूम रजनीकांत इसरार भी करते तो किससे? सो अपनी नियति खुद ही तय करने की ज़िद पाल ली. उन्होंने कुली से लेकर कंडक्टर तक का कम शान से किया, क्योंकि उनकी निगाह में कोई भी काम छोटा नहीं है. पद्मभूषण और दर्जनों अवार्ड्स पा चुके सुपरस्टार रजनीकांत एशिया में जैकी चैन के बाद सबसे ज्यादा मेहनताना लेनेवाले स्टार हैं. फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें भारत के सब से प्रभावशाली भारतीयों में से एक माना है.

ज़िद ने दिलाई यह मंज़िल

जीते जी किंवदंती बन चुके सुपरस्टार रजनीकांत मराठी परिवार के हैं और तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और हिंदी में से कोई भी उनकी मातृभाषा नहीं है. ये सब भाषाएँ उन्होंने सीखी हैं. रजनीकांत ने पांच साल की उम्र में मां को खो दिया था. हालात ने उन्हें मज़दूरी को विवश किया था. उन्होंने कुलीगीरी से लेकर कंडक्टर तक की नौकरी की. रंगमंच पर एक्टिंग के शौक के कारण उन्हें कन्नड़ नाट्य निर्देशक पुनप्पा ने एक धार्मिक नाटक में दुर्योधन का रोल दे दिया और यही उनके लिए मील का पत्थर साबित हुआ. एक दोस्त ने उन्हें अपने खर्च से मद्रास फ़िल्म इंस्टीट्युट भेजा और दो साल तक उनका खर्च उठाया. लौटने पर उन्हें पहली फ़िल्म में छोटा सा नेगेटिव रोल मिला था, वह भी एक क्रूर पति का, फ़िल्म के हीरो कमल हसन थे. इसके बाद उन्होंने सात और फ़िल्में कीं. नौवीं फ़िल्म में उन्हें हीरो का रोल मिला और फिर उन्होंने पीछे नहीं देखा. पद्मभूषण और दर्जनों अवार्ड्स पा चुके सुपरस्टार रजनीकांत एशिया में जैकी चैन के बाद सबसे ज्यादा मेहनताना लेनेवाले स्टार हैं. फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें भारत के सब से प्रभावशाली भारतीयों में से एक माना है. रजनीकांत के सफलता के कुछ सूत्र :

असंभव कुछ भी नहीं
रजनीकांत ने निजी जीवन में और फ़िल्मी परदे पर जो कमाल किये हैं, वे बताते हैं कि इंसान के लिए असंभव कुछ भी नहीं है. हालात ये हैं कि संता बंता से भी ज्यादा जोक्स रजनीकांत को लेकर चल निकले हैं जो कमोबेश यही बात कहते हैं कि मेहनत और लगन से काम करो तो हर काम संभव है. रजनीकांत ने वयस्क होने के बाद कामकाज करते हुए कई भाषाएँ सीखीं, बिना किसी गॉडफ़ादर के सुपरस्टार का मुकाम पाया और यह सब अपनी मेहनत और पैशन के कारण. दृढ निश्चय हो तो साधनहीनता भी रुकावट नहीं बनती और न ही भाषा या क्षेत्र बाधा बनता है.

अपनी छाप छोड़ो
कोई भी काम करो, उस पर अपनी छाप ज़रूर छोड़ो. चाहे वह काम बस कंडक्टर का ही क्यों न हो. बस कंडक्टर के रूप में रजनीकांत खासे लोकप्रिय थे. कई यात्री इसी इंतज़ार में रहते कि वे उसी बस में जायेंगे, जिसमें रजनीकांत हों. रजनीकांत का टिकिट फाड़ने, पैसे गिनने और यात्रियों से बात करने का अंदाज़ ही निराला था. इसी स्टाइल ने उन्हें रंगमंच तक पहुँचाने में मदद की और वे सिनेमा की दुनिया में जा सके. सबक यह है कि कोई भी काम छोटा नहीं, बशर्ते आप उस पर अपनी छाप छोड़ें.

प्रोफेशनल रवैया रखो
आप जिस भी फील्ड में हों, अपने काम को प्रोफेशनल अंदाज़ में ही करें. व्यक्तिगत बातों को अपने व्यवसाय में हावी होने दें. इसी से आपकी गरिमा बनी रहती है. 62 वें वर्ष में चल रहे रजनीकांत से आधी उम्र की हीरोइनें उनके साथ काम कर रही हैं. आसिन, अनुष्का शर्मा, दीपिका जैसी हिरोइन उनके साथ काम कर रहीं हैं, लेकिन माधुरी दीक्षित ने उने साथ काम करने से मना कर दिया. बॉलीवुड में ऐसा किसीहीरो के साथ होता तो हंगामा हो जाता, लेकिन रजनीकांत ने कोई बयानबाजी नहीं की. अपनी हर फ़िल्म के डायरेक्टर, सिनेमाटोग्राफर, और पूरी टीम के साथ उनके सम्बन्ध बहुत प्रोफेशनल होते हैं. मीडिया में भी वे कभी लफ्फाजी नहीं करते.

बेहतर की जिद करो
आप जो भी कर रहो हो, उससे बेहतर और बड़ा करने की जिद अवश्य करो. यह जिद न होती तो रजनीकांत एक हीरो बनकर ही संतुष्ट हो जाते. हर फ़िल्म में उनका कद बड़ा होता गया है चाहे वह चाहे वो अंडरवर्ल्ड डॉन बिल्ला हो या मुरत्तु कलाई या फिर थिल्लू मुल्लू। इन फिल्मों में रजनी की स्टाइल ने उन्हें अलग पहचान दी। हिंदी में उनकी कई फ़िल्मों को मनचाही सफलता नहीं मिली, लेकिन वे हर फ़िल्म में कुछ न कुछ नया, भव्य और अनूठा करने की कोशिश करते हैं. दोहराव से बचने का यत्न करते हैं.

दान से निखरता है चरित्र
रजनीकांत के बारे में कहा जाता है कि हातिमताई की तरह दान देते हैं और किसी को इसकी खबर नहीं होने देते. लोग किसी भी काम में उनसे मदद लेने जाते हैं तो वे भरपूर मदद करते हैं पर इस शर्ट पर कि उसे प्रचारित नहीं किया जाए. अपने जन्मदिन पर उन्होंने कई साल तक हजारों लोगों को भोज दिए हैं, बिना उनकी सामाजिक हैसियत देखे. रजनीकांत को पता है कि वे अवाम के हीरो हैं और अवाम दिखावे से दूर स्वाभाविक लोगों को पसंद करती है. उन्हें लगता है कि कमाई को खर्च करने का सबसे अच्छा तरीका है उसे लोगों के साथ खर्च करना.

दिखावे से दूर रहें
रजनीकांत को अन्य हीरो की तरह शो ऑफ का शौक नहीं है. वे गंजे हैं और फिल्मों में तो विग पहनते हैं लेकिन रोजमर्रा में नहीं. वे इसे स्वीकार करते हैं कि फाइलों में विग पहनना ज़रूरी है. जहाँ तक शो ऑफ की बात है, वे कहते हैं कि मेरे जैसे फ़िल्मी हीरो के लिए शो ऑफ की सही जगह फ़िल्म का परदा ही है और वहीँ मैं अपना सारा ध्यान लगाता हूँ. रजनीकांत बड़बोलेपन से भी दूर हैं और आम तौर पर विवादों से दूर रहते हैं.

सामाजिक सरोकारों पर ध्यान
रजनीकांत ने फ़िल्मी दुनिया में रहते हुए भी सामाजिक सरोकारों की उपेक्षा नहीं होने दी. २००२ में जब कर्णाटक सरकार ने तमिल नाडू के लिए कावेरी नदी का पानी रोक लिया था तब वे दिन भर के धरने पर बैठे. जब पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने नदियों को जड़ने की घोषणा की तब उन्होंने इस काम में निजी तौर पर एक करोड़ रुपये के दान का ऐलान किया. वे हमेशा नेताओं से कहते रहे कि पानी जैसे मुद्दे पर राजनीति से बाज आयें और देश का हिट पहले देखें. श्रीलंका में तमिलों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ धरने पर बैठे.

परिवार भी महत्वपूर्ण
रजनीकांत एक पारिवारिक व्यक्ति हैं. अपने व्यवसाय की आपाधापी में भी वे परिवार से विमुख नहीं हुए. वे शादीशुदा दो बेटियों के पिता है और उनकी पत्नी एक स्कूल का संचालन करती हैं. परिवार के अलावा धर्म में भी उनकी आस्था है और वे सत्य साईं बाबा के भक्त रहे हैं. हर फ़िल्म के रिलीज होने के पहले वे परिवार सहित मंदिरों में जाते हैं. एक बेटी फ़िल्म व्यवसाय में ही है और दूसरी गृहिणी. रजनीकांत मनाते हैं कि परिवार और धर्म उन्हें भीतर से शक्ति देता है.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
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हिन्दुस्तान may 22, 2011

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रजनीकांत के कुछ लतीफ़े :



1. जब रजनीकांत स्कूल जाया करते थे तो स्कूल में बंक मारना टीचर का काम हुआ करता था।

2. रजनीकांत जब भी प्याज काटता है, प्याज से पानी की बूंदें निकलती हैं। साइंटिस्ट कहते हैं कि ये प्याज के आंसू होते हैं।

3. अगर आप सोचते हैं कि रजनीकांत का दिमाग कम्प्यूटर से तेज चलता है तो आप थोड़ा सा गलत हैं। रजनीकांत का दिमाग चाचा चौधरी से तेज चलता है।

4. एक बार रजनीकांत ने अपने उस बैंक एकाउंट का चेक काट दिया जिसमें संयोग से रुपये नहीं थे। नतीजा ये हुआ कि बैंक बाउंस हो गया।

5. रजनीकांत के कैलेंडर में 31 मार्च के बाद सीधे 2 अप्रैल की डेट आती है, क्योंकि कोई भी उसे अप्रैल फूल नहीं बना पाता।

6. रजनीकांत इतना तेज है कि वह पूरी दुनिया का एक चक्कर लगाकर अपनी पीठ पर पीछे से आकर खुद को मुक्का मार सकता है।

7. 'नो वन इज परफेक्ट', इस जुमले को रजनीकांत पर्सनल इंसल्ट के रूप में लेता है।

8. अद्भुत, अविश्वसनीय, बुद्धिमान, शक्तिशाली, महान जैसे कई शब्द 1949 में डिक्शनरी में जुड़े। इसी साल रजनीकांत का जन्म हुआ था।

9. दुनिया 2012 में समाप्त नहीं होगी क्योंकि रजनीकांत ने लाइफ टाइम वैलीडिटी वाला मोबाइल सिम खरीद लिया है।

10. रजनीकांत के कम्प्यूटर में रिसाइकिल बिन नहीं है। उसे रजनीकांत ने डिलीट कर दिया है।

11. पॉल द आक्टोपस ने फीफा वर्ल्ड कप में बिलकुल सटीक भविष्यवाणियां की थीं। उससे किसी ने पूछा कि रजनीकांत कब मरेगा? उसी दिन पॉल बाबा की मौत हो गई।

12. रजनीकांत यदि 200 साल पहले पैदा होता तो आज ब्रिटेनवासी अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहे होते।

13. रजनीकांत को बचपन में चिकेन पॉक्स नाम की बीमारी ने अपनी चपेट में लिया था। आज ये बीमारी दुनिया से गायब हो चुकी है।


14 .एक किसान ने अपने मक्के के खेत में कौवे उड़ने के लिए रजनीकांत की तस्वीर चिपका दी। नतीजा यह हुआ कि कौवे अगले ही दिन मक्की के वे दाने भी वापस ले आए, जो वे पिछले साल लेकर गए थे।

15. रजनीकांत की एक मात्र पर्सनल ई-मेल आईडी है "gmail@rajanikanth.com।"

16. जिस दिन रजनीकांत की रोबोट फिल्म रिलीज हुई थी, उस दिन टाइम्स आफ इंडिया को रजनीकांत ने 4 स्टार रेटिंग दी थी.


17. बिग बॉस सीजन 4 के दौरान एक दिन के लिए रजनीकांत बिग बॉस के घर गया था. नेक्स्ट डे बिग बॉस के घर में एकाउंसमेंट हुआ ‘रजनीकांत चाहते हैं कि बिग बॉस कन्फेशन रूम में आ जाएं’.

18. जब भी भगवान हैरान होते हैं तो ·हते हैं, ‘ओह मॉय रजनीकांत’.

19. रजनीकांत ·क्रिकेट भी अच्छा खेलता है. रणजी के एक मैच में अंतिम बाल पर जीत के लिए 10 रनों की जरुरत थी. रजनीकांत स्ट्राइक पर थे. बॉलर ने जब बॉल फेंकी, रजनीकांत ने बैट से उसे हवा में उछाल उसके दो टुकड़े कर दिये. एक टुकड़े को छक्के की ओर उछाला और दूसरे को बाउण्ड्री की ओर भेज दिया.


20. क्या आपको पता है कि गणपति जी के घर पर दस दिन के लिए रजनीकांत की प्रतिमा विराजित की जाती है?

Sunday, May 15, 2011

संकल्प ने बनाया आईएएस टॉपर

आईएएस टॉपर एस. दिव्यदर्शिनी को भरोसा था कि उनका चयन आईएएस के लिए हो जाएगा, लेकिन वे टॉप पर रहेंगी, इसकी कल्पना भी नहीं थी. एस. दिव्यदर्शिनी की इस महत्वपूर्ण सफलता के कुछ सूत्र :


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संकल्प ने बनाया आईएएस टॉपर


चेन्नई की 24 साल की एस. दिव्यदर्शिनी यूपीएससी की प्रशासकीय नौकरी की परीक्षा में टॉप पर रहीं. इसके पहले भी वे इस परीक्षा में बैठीं थीं, पर नाकामयाब रहीं. मध्यमवर्गीय परिवार की दिव्यदर्शिनी इसके बाद भारतीय स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी अधिकारी के लिए चुनी गयीं लेकिन उन्होंने अपनी यूपीएससी परीक्षा की तैयारी भी जारी रखी. उन्हें भरोसा था कि उनका चयन आईएएस के लिए हो जाएगा, लेकिन वे टॉप पर रहेंगी, इसकी कल्पना भी नहीं थी. 2009 की परीक्षा देते वक्त वे अपनी लॉ की डिग्री के लिए भी पढ़ाई कर रही थीं. इस बार उन्होंने कोई भी मौका नहीं छोड़ा. चेन्नई में आईएएस के लिए उन्होंने कोचिंग क्लास जाना शुरू किया ताकि सही मार्गदर्शन मिल सके. एस. दिव्यदर्शिनी की इस महत्वपूर्ण सफलता के कुछ सूत्र :

कामयाबी का कोई शॉर्टकट नहीं

बड़े लक्ष्य को पाना हो तो कोई शॉर्टकट नहीं चलता. आर्ट्स में डिग्री लेने के बाद लॉ की डिग्री के लिए भी पढ़ाई के दौरान यूपीएससी की भी तैयारी करनेवाली दिव्यदर्शिनी मानती हैं कि जीवन में किसी भी क्षेत्र में कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है. नियमित पढाई हो या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी, केवल और केवल कड़ी मेहनत कामयाबी पाने की पहली सीढ़ी है. कामयाबी के लिए और भी कई बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है लेकिन कड़ी मेहनत के बिना वे सब बातें बेकार हो जाती हैं. शॉर्टकट के जरिये अगर कामयाब होने का सपना देख रहे हों तो उसे भूल जाइए.

उचित मार्गदर्शन प्राप्त करें
बिना मार्गदर्शन के भी कामयाबी मिल सकती है लेकिन इसमें आपका सफ़र लम्बा और दुश्वार हो सकता है. 2009 में पहली बार यूपीएससी की परीक्षा देने के बाद मुझे यही महसूस हुआ. हर परीक्षा का कोई ना कोई पैटर्न होता है. अगर आप को उसकी जानकारी हो तो वह मदद मिल जाती है. मैंने जब इस परीक्षा की कोचिंग लेना शुरू की तो कई लोगों ने यह भी कहा कि आप तो पहले ही यह परीक्षा दे चुकी हैं, कोचिंग की क्या ज़रुरत? लेकिन आज मैं यह स्वीकार करती हूँ कि अगर मैंने कोचिंग नहीं ली होती तो टॉप में आना तो दूर, शायद सफल ही नहीं हो पाती.

योजनाबद्ध होकर पढ़ाई करें
यदि आपको भी इस या ऐसी ही कोई परीक्षा में बैठना है तो कोचिंग जाना और कड़ी मेहनत करना ही काफी नहीं है. उससे बढ़कर आपको पूरी योजना बनकर पढ़ाई करनी चाहिए. इसके लिए आपको हर एक विषय में अध्ययन की रणनीति बनानी होगी. हर विषय के लिए अलग रणनीति होना चाहिए क्योंकि कुछ विषयों में आपकी ख़ास दिलचस्पी हो सकती है, कुछ में नहीं. लेकिन पढ़ाई तो आपको सभी की करना होगी. बोरियत भरे विषयों में भी दिलचस्पी लें. मेरा अनुभव यही है कि जैसे जैसे हम किसी विषय के बारे में जानने लगते हैं, हमारी दिलचस्पी उसमें बढ़ती जाती है.

हताशा से बचें

मुझे दसवीं में आये नंबरों से बड़ी निराशा हुई थी. मुझे रिजल्ट में विशेष योग्यता की आशा थी, लेकिन मैं 74 प्रतिशत ही ला सकी. निराशा के वक्त मेरे माता पिता ने बहुत प्रेरणा दी. मैंने अगले साल नए सिरे से पढ़ाई शुरू की और बारहवीं की परीक्षा में 86 प्रतिशत नंबर लाकर अपना खोया आत्मविश्वास फिर हासिल कर लिया. मैंने कॉलेज में आते ही प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का मन बना लिया था. मेरी दिलचस्पी मैनेजमेंट और कम्प्यूटर्स के बजाय कानून में ज्यादा थी. साथ ही यह स्कोअर्रिंग विषय भी है. यदि आप परफेक्ट हैं तो अच्छे नंबर पा सकते हैं. यूपीएससी में पहली नाकामी को मैंने यह सोचकर टाल दिया था कि मैंने कॉलेज में लॉ के साथ यह परीक्षा दी थी.

हर विषय पढ़ें
आपकी दिलचस्पी चाहे जिस में हो, पढ़ाई हर विषय की करते रहे. ध्यान रखिये कि केवल कॉलेज या प्रतियोगी परीक्षा के विषय पढ़ना ही काफी नहीं हैं. यह पढ़ाई आपको इंटरव्यू में तो मदद करेगी ही आपको एक बेहतर, मुकम्मल इंसान बनाने का रास्ता भी खोलेगी. आगे जाकर आप पाएंगे कि हर विषय की पढ़ाई से आपने जो भी सीखा है, वह बहुत ही काम का है और तब आपको खुशी होगी.

टाइम किलिंग मशीनों से सावधान

टीवी और फ़िल्में देखना, ड्राइविंग करना, चेटिंग करना, मोबाइल पर गप्पें लड़ाना किसे अच्छा नहीं लगता, लेकिन ये सभी टाइम किलिंग डिवाइसेस हैं. इनका उपयोग सावधानी से और ज़रुरत के हिसाब से ही करें. ये वक्त तो बर्बाद करती ही हैं, हमें अपने लक्ष्य से भी भटका सकती हैं. अगर आप स्मार्ट हैं तो इनका उपयोग अपने लक्ष्य को पाने में सहयोगी उपकरण के तौर पर कर सकते हैं, लेकिन यह आसान नहीं है. इन सब चीजों के लिए तो ज़िंदगी पड़ी है, वक्त के महत्त्व को समझें.

लक्ष्य के लिए समझौता नहीं
अपने लक्ष्य को पाने के लिए कभी भी समझौते न करें. जो लक्ष्य तय किया है उसे न केवल प्राप्त करें बल्कि पूरी तरह से सही रास्ते पर चलकर ही हासिल करें. यह बात बेहद किताबी लगती है, लेकिन कामयाबी का असली मज़ा तभी है जब कि उसे पाने के लिए आपने कोई समझौता नहीं किया हो. मैंने यूपीएससी में पहली बार नाकाम होने पर बैंक की नौकरी को हाँ कह दी और वहां काम भी शुरू कर दिया लेकिन मुझे लगता रहा कि मैं अपने लक्ष्य से भटक गयी हूँ. बैंक की नौकरी में शायद तनाव काम होंगे लेकिन मेरा लक्ष्य प्रशासकीय नौकरी ही था, और मैं यहीं खुश हूँ.

व्यवस्था को बदलो

मुझे देश में फैले भ्रष्टाचार से नफ़रत है और मैं उसे मिटाना चाहती हूँ. अब हर जगह भ्रष्टाचार की बार करने, गलियां देने और कुंठित होने के बजाय भ्रष्टाचार से लड़ने का सही तरीका मुझे यही लगता है कि मैं ऐसी पोजीशन में पहुँच जाऊं, जहाँ मैं भ्रष्टाचार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकूं. आईएएस अधिकारी के रूप में मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी जंग को महत्वपूर्ण मुकाम तक पहुंचा सकूंगी.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 15 मई 2011

Friday, May 06, 2011

हर सफ़र का अपना मज़ा है

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम




यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है.


सफलता के सूत्र / नारायण मूर्ति

हर सफ़र का अपना मज़ा है

तीस साल पहले 1981 में छह मित्रों और केवल दस हज़ार रुपये की पूंजी से एन आर नारायण मूर्ति ने जिस इन्फोसिस कंपनी की स्थापना की थी, उसका कारोबार बीते साल करीब 30 ,000 करोड़ रुपये था. उन्होंने एक ऐसी कंपनी की नींव डाली, जिसे दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में माना जाता है. 33 देशों में सवा लाख से भी ज्यादा लोग उनके साथ काम करते हैं. उनकी कंपनी को सर्वश्रेष्ठ नियोक्ता सहित अनेक सम्मान मिल चुके हैं. एक अरब डॉलर कारोबार का आंकड़ा छूनेवाली यह पहली साफ्टवेयर कंपनी रही है. नारायण मूर्ति की तारीफ अमेरिका के राष्ट्रपति सहित अनेक दिग्गज कर चुके हैं.देश - विदेश में अनेक सम्मान पा चुके नारायण मूर्ति पहले पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण से नवाजे जा चुके हैं. दुनियाभर के आई टी क्षेत्र में भारत की छवि चमकानेवाले नारायण मूर्ति की सफलता के कुछ सूत्र :

अनुभव से सीखने का महत्त्व
आप कोई भी बात कैसे सीखते हैं? अपने खुद के अनुभव से या किसी और से? आप कहाँ से और किस से सीखते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि आपने क्या सीखा और कैसे सीखा. अगर आप अपनी नाकामयाबी से सीखते हैं तो यह आसान है. सफलता से शिक्षा लेना आसान नहीं होता क्योंकि हमारी हर सफलता हमारे कई पुराने फैसलों के पुष्टि करती है. अगर आपमें नया सीखने की कला है, जल्दी से नए विचार अपना लेते हैं और उसे काम में अपना लेते हैं तभी सफल हो सकते हैं.

परिवर्तन को स्वीकारें
हमें सफल होने के लिए नए बदलावों को स्वीकार करने की आदत होनी चाहिए. मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढाई के बाद किसी हायड्रो पॉवर प्लांट में नौकरी की कल्पना की थी. पढाई के दौरान एक वक्ता के भाषण ने मेरी जिन्दगी बदल दी जिन्होंने कंप्यूटर और आई टी क्षेत्र को भविष्य बताया था. मैंने मैसूर में इंजीनियरिंग की पढाई की. फिर आईआईटी कानपुर में पीजी किया. आईआईएम अहमदाबाद में चीफ सिस्टम्स प्रोग्रामर के नौकरी की. पेरिस में नौकरी की और पुणे में इन्फोसिस की स्थापना की. बंगलुरु में कंपनी का कारोबार बढाया. जो जगह जहाँ मुफीद लगे, वहीं काम में जुट जाओ.

संकट की घड़ी को समझें
कभी कभी संकट सौभाग्य नज़र आता है. ऐसे में धीरज ना खोएं. आपकी कामयाबी इस बात में भी छुपी है कि ऐसा वक्त आने पर आप कैसे अपनी प्रतिक्रिया देते हैं? इन्फोसिस की स्थापना १९८१ में हम सात लोगों ने की थी और १९९० में मेरे सभी साथी चाहते थे कि हम यह कंपनी बेच दें क्योंकि ९ साल की मेहनत के हमें दस लाख डॉलर मिल रहे थे. यह मेरे लिए सौभाग्य नहीं, संकट था. मैं इस कंपनी का भविष्य जानता था. तब मैंने और केवल मैंने अपने साथियों को संभाला था और इन्फोसिस को बेचने से रोका था.

संसाधनों से बड़ा होता है जज्बा

इन्फोसिस के भी 5 साल पहले नारायण मूर्ति ने आई टी में देशी ग्राहकों को ध्यान में रखकर सॉफ्ट्रानिक्स नाम की कंपनी खोली थी, जो बंद कर देनी पड़ी. 2 जुलाई 1981 को इन्फोसिस रजिस्टर्ड हुई लेकिन उनके पास कंप्यूटर तो दूर, टेलीफोन तक नहीं था. उन दिनों टेलीफोन के लिए लम्बी लाइन लगती थी. कंपनी शुरू करने के एक साल बाद उन्हें टेलीफोन और दो साल बाद कंप्यूटर उपलब्ध हो सका था. जब इन्फोसिस अपना आईपीओ लेकर आई तब भी उसे बाज़ार में अच्छा रेस्पांस नहीं मिला था. पहला इश्यु केवल एक रुपये के प्रीमियम पर यानी ग्यारह रुपये प्रति शेयर जारी हुआ था. मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों के बाद १९९३ में इन्फोसिस का शेयर ८६ रुपये के प्रीमियम पर बिका.

किसी एक के भरोसे मत रहो

1995 में इन्फोसिस के सामने एक बड़ा संकट पैदा हो गया था जब एक ऐसी विदेशी कंपनी ने उनकी सेवाओं का मोलभाव एकदम कम करने का फैसला किया. वह ग्राहक इन्फोसिस का करीब 25 प्रतिशत बिजनेस देता था. उसकी शर्तें मानना कठिन था क्योंकि जिस कीमत पर वह सेवा चाहता था, वह बहुत ही कम थी और उस ग्राहक को खोने का सीधा मतलब था, अपना एक चौथाई बिजनेस खो देना. तभी तय किया गया कि बात चाहे टेक्नॉलॉजी की हो या अप्लीकेशन एरिया की, किसी भी देश की हो या एम्प्लाई की, कभी भी किसी एक बड़े ग्राहक पर निर्भर कभी भी मत रहो. आपका कामकाज इतना फैला हो कि कोई भी आप को आदेश ना दे सके.

आप केवल कस्टोडियन हैं
जो भी सम्पदा आपके पास है वह केवल आपकी देखरेख के लिए हैं. आप उसके अभिरक्षक हैं. वह भी अस्थायी तौर पर. बस. यह ना मानें कि वह सारी सम्पदा केवल आप और आप ही भोगेंगे. किसी भी सम्पदा का असली आनंद आप तभी उठा सकते हैं जब उसका उपभोग पूरा समाज करे.यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है.

कुर्सी से ना चिपके रहें

साठ साल के होते ही नारायण मूर्ति ने अपनी कंपनी के चेयरमैन का पद छोड़ दिया और नॉन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बन गए. आम तौर पर कर्मचारियों को तो साठ साल में रिटायर कर दिया जाता है लेकिन डायरेक्टर अपने पद पर डटे रहते हैं. नारायण मूर्ति ने सभी को यह सन्देश दिया कि अगर किसी भी कंपनी को लगातार आगे बढ़ाना है तो उसमें नए खून की निर्णायक भूमिका रहनी चाहिए. नए खून में ही नयी बातों को स्वीकार करने की हिम्मत होती है और नए आइडियाज़ अपनाने में युवाओं को कोई हिचक नहीं होती.

मंजिल से ज्यादा मज़ा सफ़र में
जीवन में कोई भी लक्ष्य पा लेने में बहुत मज़ा आता है. हमें संतोष मिलता है कि हमने यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया. लेकिन जीवन जीना हो तो उसका असली मज़ा सफ़र जारे रखने में है. कभी भी जीवन में संतुष्ट होकर ना बैठ जाएँ कि बस, बहुत हो चुका. जब आप एक मैच जीत जाते हैं तो अगले मैच की तैयारी शुरू कर देते हैं. कोई भी मैच जीतने की अपनी खुशी होती है और खेलने का अपना मज़ा है. सागर में चलते रहना और खेल में खेलते रहना बहुत मजेदार होता है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी


हिन्दुस्तान
8 मई 2011

Friday, April 29, 2011

बेहतर प्रबंधन से बने बेमिसाल





फ़ोर्ब्स की अरबपतियों की सूची में रतन टाटा का नाम इसलिए नहीं आता कि टाटा की 28 प्रमुख कम्पनियाँ अलग-अलग स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हैं. फ्लेगशिप कंपनी टाटा सन्स में रतन टाटा का व्यक्तिगत शेयर 65 फीसदी बताया जाता है, लेकिन रतन टाटा की व्यक्तिगत संपत्ति को कंपनी अलग से नहीं दिखाती. कह सकते हैं कि रतन टाटा जितनी संपत्ति पर नियंत्रण रखते हैं वह फ़ोर्ब्स सूची में आने के लिए काफी है.



बेहतर प्रबंधन से बने बेमिसाल

रतन टाटा, ऐसे भारतीय उद्योगपति हैं जिनका दुनिया में बहुत सम्मान है. रतन टाटा के नेतृत्व में टाटा ग्रुप ने वेल्थ क्रियेशन में दुनिया की टॉप 50 बिजनेस ग्रुप में जगह बनाई है. टाटा ग्रुप पूरी दुनिया में 96 तरह के बिजनेस करता है. माना जाता है कि रतन टाटा की संपत्ति बिल गेट्स और वारेन बफेट से भी ज्यादा है लेकिन फिर भी फ़ोर्ब्स पत्रिका की अरबपतियों की सूची में रतन टाटा का नाम इसलिए नहीं आता कि टाटा की 28 प्रमुख कम्पनियाँ अलग-अलग स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हैं. फ्लेगशिप कंपनी टाटा सन्स में रतन टाटा का व्यक्तिगत शेयर 65 फीसदी बताया जाता है, लेकिन रतन टाटा की व्यक्तिगत संपत्ति को कंपनी अलग से नहीं दिखाती. कह सकते हैं कि रतन टाटा जितनी संपत्ति पर नियंत्रण रखते हैं वह फ़ोर्ब्स सूची में आने के लिए काफी है. भारत के बाहर ब्रिटेन, यूएसए, चीन, थाईलैंड, स्पेन, दक्षिण अफ्रीका, मोरक्को, नीदरलैंड, इटली सहित करीब 56 देशों में टाटा का साम्राज्य खड़ा है. स्टील, कोयला, संचार, बीमा, आईटी, ऑटोमोबाइल, केमिकल जैसे बुनियादी क्षेत्रों के अलावा टाटा का साम्राज्य होटल, शीतल और गर्म पेय, कास्मेटिक, नमक कंस्ट्रक्शन, कलपुर्जे, लेदर गुड्स, कपड़ा आदि तमाम क्षेत्रों में भी है. टाटा ने बीते दशक में 18 अरब डॉलर लगाकर कोरस, जगुआर, लैंड रोवर, टेटली, देवू, पियाजियो एयरो इंडस्ट्री, रिट्ज़ कार्लटन (बोस्टन) जैसी अनेक विश्व विख्यात कंपनियों पर आधिपत्य किया और दुनिया भर में धाक जमा दी. इसके बावजूद जो बात रतन टाटा में दूसरे अरबपतियों से अलग है वह है सामाजिक जवाबदेही. कार्पोरेट सोशल रेस्पंसीबिलिटी (सीएसआर) को टाटा ने नए मायने दिए हैं. तमाम आरोपों और आपत्तियों के बावजूद रतन टाटा ने दुनिया में ख़ास जगह बनाई है, क्या है उनकी खासियत और क्या रहे उनकी सफलता के कुछ सूत्र :

हर नाकामी से सीखो

1937 में जन्मे रतन टाटा ने कार्नेल और हार्वर्ड से आर्किटेक्चर और हार्वर्ड से मैनेजमेंट की में डिग्री लेने के बाद २५ साल की उम्र में फेमिली बिजनेस में कदम रखा. उन्होंने जमशेदपुर के स्टील प्लांट में हजारों मजदूरों के साथ शॉप फ्लोर पर भी काम लिया. उनका पहला बड़ा प्रोजेक्ट नेल्को (नेशनल रेडियो एंड इलेक्ट्रानिक्स) था, जो 40 फीसदी घाटे में थी और मार्केट शेयर केवल 2 फीसदी. रतन टाटा नेल्को नहीं चला पाए. उन्हें मुंबई की इम्प्रेस मिल्स का काम सौंपा गया, जो बंद करनी पड़ी. इंडिका कार परियोजना की लागत 500 करोड़ आंकी गयी थी जो 1700 करोड़ तक पहुँच गयी थी. रतन टाटा ने हर नाकामी से सबक लिया और यही उनके प्रबंधन में झलकता है.

नयी टेक्नॉलॉजी से दोस्ती करो

एकाधिकार जमाकर, सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार के बीज बोकर, फायनांस की फर्जी कम्पनियाँ बनाकर येन केन मुनाफा कमाना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए. नयी टेक्नॉलॉजी को तो केवल प्रोडक्शन में ही महत्त्व नहीं दिया गया, बल्कि नए प्रोडक्ट चुनने में भी रतन टाटा ने हाई टेक बिजनेस चुने. टाटा टेलीकाम, टाटा फायनांस, टाटा केल्ट्रॉन, टाटा हनीवेल, टाटा हाईटेक ड्रिलिंग, टाटा एलेक्सी, प्लंटेक जैसी कम्पनियाँ रतन टाटा की दें हैं. रतन टाटा ने टोम्को बंद कर दी और फार्मा, सीमेंट, कपड़ा, कोस्मेटिक के कारोबार से हाथ खींच लिए. इस सब का असर अच्छा हुआ और ग्रुप का कारोबार तेजी से बढ़ा.

हर सोच बड़ी हो

रतन टाटा का फार्मूला है कि हर सोच बड़ी रखो. छोटी सोच रखनेवाला 1200 करोड़ डॉलर के खर्च से कोरस स्टील कंपनी का अधिग्रहण नहीं कर सकता था. इसमें खतरे भी थे, लोगों ने कहा था कि टाटा ग्रुप बरबाद हो जाएगा, पर एक ही दिन में टाटा के शेयर ग्यारह प्रतिशत चढ़ गए. जब उन्होंने जगुआर और लैंड रोवर डील की, तब भी ऐसी ही बातें हुई थीं. जब उन्होंने न्यूयॉर्क में पीयरे व बोस्टन में रिट्ज़ कार्लटन होटल खरीदा और टेटली की डील की तब भी लोगों ने शक की निगाह से देखा था. बड़ी सोच के कारण ही टाटा ग्रुप वैश्विक हो सका है.

भारतीय उपभोक्ता का महत्त्व
रतन टाटा इस बात की अहमियत जानते हैं कि भारतीय उपभोक्ता भी बहुत महत्वपूर्ण है. आप 121 करोड़ लोगों को अनदेखा कैसे कर सकते हैं जो आप के ग्राहक होने की क्षमता रखते हैं. टाटा ने सोडियम युक्त नमक बेचना शुरू किया तो कई और कम्पनियाँ बाजार में आ कूदीं. टाटा अगर मुंबई में ताज, न्यूयॉर्क में पीयरे व बोस्टन में रिट्ज़ कार्लटन होटल चलाता है तो देश भर में जिंजर नामक दर्जनों बजट होटल भी. अगर वह करोड़ रूपये से भी महंगी जगुआर और लैंड रोवर बनता है तो दुनिया की सबसे सस्ती नेनो भी. घर में या घर से निकलते ही कोई न कोई टाटा प्रोडक्ट आपको दिख ही जाएगा.

विवादों में शक्ति मत गँवाओ

रतन टाटा जैसी शख्सियत विवादों में न हो यह संभव नहीं, उनकी पहली कोशिश विवाद को टालने की ही रहती है. अगर विवाद गले पद ही जाए तो उस से जल्द से जल्द बाहर निकलकर काम में जुट जाना ही अक्लमंदी है. चाहे 25 साल इम्प्रेस मिल्स में दत्ता सामंत की यूनियन की हड़ताल हो या सिंगूर में नेनो प्लांट की भूमि का मामला, हाल ही में नीरा रादिया टेप कांड में जिक्र आने के बाद रतन टाटा की छवि को धक्का लगा है लेकिन अपने कारोबार पर से उनका ध्यान हटा नहीं है. नेताओं से अपने संपर्कों को वे प्रचारित नहीं होने देते और मीडिया से दूरी रखते हैं.

मानव संसाधन को प्राथमिकता

टाटा समूह को दुनियाभर में अच्छा नियोक्ता माना जाता है. रतन टाटा का मानना है कि हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारे लोग ही हैं. जब देश में श्रम कानून बने भी नहीं थे, तब से टाटा समूह ने काम के घंटे, साप्ताहिक अवकाश आदि के नियम बनाये थे, उनमें से कई नियम आगे जाकर कानून बने. मुंबई में ताज होटल पर हुए आतंकी हमले के बाद रतन टाटा ने जिस तरह हर एक कर्मचारी की मदद की, चाहे वह एक दिन आनेवाला अस्थायी कर्मचारी ही क्यों ना हो, वह पूरे कार्पोरेट जगत के लिए आदर्श है. टाटा समूह के अस्पताल, शिक्षा और खेल संस्थान अपनी अलग पहचान रखते हैं.

क्वालिटी का पर्याय

रतन टाटा ने ब्रांड टाटा को क्वालिटी का पर्याय बनाने की जिद में पूरे ग्रुप को ही फिर से डिजाइन किया, इसके लिए कंपनियों के विलय और अधिग्रहण को हथियार बनाया गया. आगे की योजनाएं, ग्राहकों का रुझान, वित्तीय संरचना पर फोकस किया गया. ग्रुप में से भाई भतीजावाद को ख़त्म कर प्रतिभों को आगे लाया गया, निवेशकों को रिझाने में वे कामयाब रहे. अपनी प्रतिभा और मेहनत के बूते पर टाटा समूह के प्रमुख बीते १४ साल से उत्तराधिकारी तलाश रहे हैं और अब उनका भरोसा है कि दिसंबर २०१२ तक वे यह जिम्मेदारी किसी और को सौंप देंगे.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
1 मई 2011 को प्रकाशित

Friday, April 22, 2011

सचिन तेंदुलकर (38)




सचिन जुबान कम और बल्ला ज्यादा चलाने में यकीन करते हैं. सचिन किसी को भी शब्दों से जवाब नहीं देते, उनका हर जवाब बल्ला देता है सवाल चाहे उनकी फिटनेस पर हो या फ़ार्म पर, रिटायरमेंट पर हो या उम्र पर.



अनोखे सचिन की अनोखी बातें

सचिन तेंदुलकर महानतम क्रिकेटर हैं. उनकी किसी से भी तुलना उनका अपमान होगा. कहा जाता है कि उनके बनाये और तोड़े गए रेकार्ड्स पर कोई भी किताब सही नहीं होती क्योंकि जब तक किताब छपकर आती है, सचिन के नाम और भी नए रेकार्ड्स हो जाते हैं. अनेक पुरस्कारों और सम्मानों के अलावा उन्हें भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्मविभूषण' दिया जा चुका है पर लोग उन्हें 'भारत रत्न' से कम नहीं समझते. कोई भी दौलत, शोहरत, सम्मान और प्रशंसा उनके लिए मामूली है. कैटरीना कैफ उनकी फैन हैं और धोनी ने किसी क्रिकेटर का ऑटोग्रॉफ नहीं लिया लेकिन वे सचिन का ऑटोग्रॉफ संभालकर रखना चाहते हैं.

सचिन के पास अरबों की संपत्ति है लेकिन उनके पास एक-एक रुपये के वे 13 सिक्के भी हैं जो उन्होंने सबसे पहले जीते थे. उनके गुरु रमाकांत आचरेकर प्रैक्टिस के दौरान स्टंप पर एक रुपये का सिक्का रख देते थे, जो गेंदबाज सचिन का स्टंप उड़ा देता, सिक्का जीत जाता और अगर सचिन नाबाद रहते तो सिक्का सचिन जीत जाते. 24 अप्रैल 1973 को जन्मे सचिन 1987 में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में भारत जिम्बाब्वे मैच में बॉल बॉय थे. सुनील गावस्कर ने अपने अल्ट्रा लाइट पैड और दिलीप वेंगसरकर ने इंग्लिश विलो का अपना क्रिकेट बैट सचिन को गिफ्ट किये थे, जो आज भी उनके लिए अनमोल हैं. सचिन के पिता रमेश तेंदुलकर मराठी साहित्यकार थे और संगीतकार सचिन देव बर्मन के फैन, इसीलिये उन्होंने अपने बेटे का नाम सचिन रखा. मुंबई के बांद्रा पूर्व में सचिन का परिवार डॉ धर्मवीर भारती का पड़ोसी था और सचिन के बल्ले से टकराकर जब घरों की खिड़कियों के कांच टूटते तो सचिन के पिता उन्हें डांटने के बजाय इनाम देते. बड़े भाई अजीत ने सचिन के भाई, दोस्त, गाइड और क्रिकेट-अभिभावक की भूमिका निभाई और खुद क्रिकेट प्रेमी होते हुए भी अपनी पूरी जवानी छोटे भाई के लिए समर्पित कर दी. आज लोग सचिन को क्रिकेट का भगवान तक कहते हैं लेकिन सचिन की सफलता का यह सफ़र आसान नहीं रहा. मेहनती, अनुशासित और ईमानदार खिलाड़ी सचिन की महान कामयाबी के कुछ सूत्र :

एक्शन स्पीक्स लाउडर देन वर्ड्स
सचिन जुबान कम और बल्ला ज्यादा चलाने में यकीन करते हैं. हर महान खिलाड़ी की तरह उनके भी अनेक आलोचक हैं लेकिन सचिन किसी को भी शब्दों से जवाब नहीं देते, उनका हर जवाब बल्ला देता है सवाल चाहे उनकी फिटनेस पर हो या फ़ार्म पर, रिटायरमेंट पर हो या उम्र पर. खुद पर उठी हर अंगुली का जवाब वे गरजते बल्ले से देते हैं. हर आरोप का खंडन एक्शन से, हर सवाल का जवाब बेहतर से बेहतरीन होता परफार्मेंस. जब-जब आलोचकों को लगता था कि अब सचिन का खेल ख़त्म, तब-तब सचिन फीनिक्स की तरह उभरकर सामने आये हैं.

बिना अभ्यास के मत खेलो
जिन्दगी में क्रिकेट हो या कुछ और, अभ्यास ज़रूरी है. आपने कितनी भी सेंचुरी मारी हो, कितने भी रेकार्ड्स बनाये हों, हर मैच के पहले उस मैदान पर प्रैक्टिस ज़रूर ज़रूर करो, जहाँ अगला मैच खेला जाना है. सामने आते हुई हर गेंद वही और वैसी गेंद नहीं होगी, जैसी पिछली थी. ध्यान रहे कि हर परीक्षा आखिर परीक्षा ही है, हर प्रोजेक्ट नया प्रोजेक्ट ही है, हर कंज्यूमर नया ही कुछ चाहता है. बिना अभ्यास के मैदान में जाना खतरे से खाली नहीं. हर खतरे से संघर्ष की पूरी तैयारी रखो.

सही वक़्त पर रिस्क लो
हर जगह नयी रणनीति होना चाहिए. जो शाट टेस्ट मैच में रिस्क हो सकता है, वन डे में ज़रुरत और टी 20 में अनिवार्यता हो सकती है. हर पारी की शुरूआत सावधानी से करना चाहिए. बगैर रिस्क उठाये तो कुछ नहीं हो सकता. लेकिन रिस्क कब उठाना है, तय करो. मैदान में जाते ही खतरनाक गेंदों पर रिस्क मत लो. पहले मैदान पकड़ो, फिर बहादुरी दिखाओ. रिस्क तो लेनी ही है, पर पहले आसान सवालों के जवाब देना ठीक होता है. रिस्क कहाँ लेना है, हर खतरा सोच समझकर उठाना ही अक्लमंदी है.

टीम की तरह खेलो
हर मैच में खेलते तो खिलाड़ी हैं, लेकिन जीतती या हारती टीम है. हमेशा टीम भावना से खेलो. अपनी सेंचुरी से ज्यादा टीम की जीत ज़रूरी होती है. काम ऐसा करो कि आपकी मौजूदगी से टीम का हौसला बढ़े और जीत करीब आने लगे. याद रखो, एक टीम में कैप्टन एक ही हो सकता है, इसलिए कैप्टन को जीत में मदद करो. यह भी मत भूलो कि हर मैच मैदान में ही नहीं खेला जाता, वह ड्रेसिंग रूम में और मीडिया में भी खेला जाता है.

ईमानदार रहो
ईमानदारी कभी भी ना छोड़ो, चाहे सौवीं सेंचुरी से ही क्यों ना चूक रहे हों. 450 वें वनडे में 20 मार्च 2011 को सचिन चार गेंदों पर दो रन बना कर आउट हो गए. हजारों दर्शक, करोड़ों फैन्स उनकी सौवीं सेंचुरी का इंतज़ार कर रहे थे. सचिन वेस्ट इंडीज़ के फ़ास्ट बॉलर रवि रामपाल की शॉट पर खेलने से चूक गए थे और बॉल सचिन के बैट से किनारा करते हुए विकेटकीपर ड्वेन थॉमस के हाथों में जा चुकी थी लेकिन अम्पायर स्टीव डेविस ने उन्हें नॉट आउट करार दे दिया था लेकिन फिर भी सचिन एक पल भी गवांये बिना पैवेलियन लौटने लगे और खुद को कैच आउट होने दिया. .... हो सकता था सचिन सौवीं सेंचुरी बना लेते, लेकिन क्रिकेट प्रेमियों के दिल में जो जगह उन्होंने बनाई है, वह बहुत बड़ी बात है.

सही तरीके से खूब कमाओ
पैसा हमारी ज़रुरत है, खूब कमाओ, लेकिन सही तरीके से. सचिन ने वर्ल्डटेल से 1995 में 30 करोड़ और 2001 में 80 करोड़ के विज्ञापन करार किये थे. 2006 में साची एंड साची से यही करार 180 करोड़ में किया. उन्होंने टूथ पेस्ट से लेकर टायर तक का विज्ञापन किया लेकिन कभी भी शराब या तम्बाखू उत्पादों के सरोगेट (छद्म) विज्ञापन नहीं किये. कैंसर और एड्स जैसी बीमारियों के प्रति जागरूकता के विज्ञापन उन्होंने आगे बढ़कर किये. मुंबई और बंगलुरु में उनके तीन रेस्टोरेंट्स हैं और फ्यूचर ग्रुप के साथ वे हेल्थ प्रोडक्ट्स सेक्टर में आ रहे हैं.

दूसरों की मदद करो
सचिन हर साल 200 बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते रहे हैं और अब इनकी संख्या 400 करने जा रहे हैं. कैंसर पीड़ितों के लिए उनके अभियान में एक करोड़ रुपयों से भी ज्यादा धनराशि इकट्ठा की गयी. चंदा इकठ्ठा करने के लिए सचिन ने बच्चों को क्रिकेट की कोचिंग की और ट्विटर पर अभियान चलाया. उनकी चौदह साल की बेटी सारा की प्रेरणा और मदद इन सब कामों में रहती है.

जो सही लगे, वही करो
सचिन को निजी जीवन में भी जो सही लगता है वही करते हैं. एक मानद डॉक्टरेट की उपाधि उन्होंने विनम्रता से नामंजूर कर दी, लेकिन इंडियन एयर फ़ोर्स में मानद ग्रुप कैप्टन का प्रस्ताव मान लिया. 1995 में जब सचिन 22 साल के थे, तब उन्होंने अपने से उम्र में 6 साल बड़ी डॉ अंजलि मेहता से शादी की थी, कई लोगों को यह जोड़ी बेमेल लगी लेकिन सचिन ने किसी की परवाह नहीं की. उनके साथी खिलाड़ियों ने कई बार उन पर ताने भी कसे लेकिन सचिन ने उन्हें नज़रंदाज़ कर दिया. विनोद काम्बली और अज़हरुद्दीन के बयानों पर वे चुप रहे. क्लबों में जाकर हंगामा करना, डांस करना उन्हें कभी भी पसंद नहीं रहा.

परिवार पर ध्यान ज़रूरी
सचिन पारिवारिक व्यक्ति हैं. वर्ल्ड कप जीतने के बाद टीम के साथ जश्न मनाते वक़्त स्टेडियम में उनके साथ बेटी सारा और बेटा अर्जुन भी टीवी पर नज़र आ रहे थे. सेलेब्रिटी होने के कारण वे परिवार के साथ कहीं भी आराम से नहीं जा सकते इसलिए कभी-कभी वे देर रात अपने ड्राइविंग के शौक को पूरा करते हैं. अपनी बीवी के साथ एक बार वे विग लगाकर वरली के सत्यम थियेटर में फ़िल्म देखने भी जा चुके हैं, लेकिन फिर भी इंटरवल के बाद पहचान लिए गए और वापस लौटना पड़ा. परिवार या मेहमानों के लिए वे खुद ही चाय बनाना पसंद करते हैं और कभी-कभी उनके परिवार को उनके हाथों का बना बैंगन का भुरता भी खाना पड़ता है !

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 24 april 2011

Thursday, April 14, 2011

कामयाबी यों ही नहीं मिलती



सालाना निजी कमाई (वेतन और निवेश से)करीब 8 अरब डॉलर है यानी रोजाना दो करोड़ डॉलर से ज्यादा,हर मिनिट 16 हजार और हर सेकण्ड 250 डॉलर से भी ज्यादा! बिल गेट्स अपने तीन बच्चों के लिए सारी जायजाद छोड़कर नहीं जाना चाहते, उनका मानना है कि अगर मैं अपनी संपत्ति का एक प्रतिशत भी उनके लिए छोड़ दूं तो वह काफी होगा.



बिल गेट्स और उनके सफलता - सूत्र

बिल गेट्स दुनिया के सबसे अमीर लोगों में हैं. वे महादानी भी हैं. 28 अक्टूबर 1955 को उनका जन्म हुआ था लेकिन 32 साल पूरे होने के पहले ही 1987 में उनका नाम फ़ोर्ब्स की अरबपतियों की लिस्ट में आ गया और कई साल तक वे इस लिस्ट में नंबर वन पर भी रहे. 2007 में उन्होंने 40 अरब डॉलर (176 अरब रुपये) का दान दे दिया. वे माइक्रोसाफ्ट के चैयरमैन हैं, जिसका 2010 का कारोबार 63 अरब और मुनाफा करीब 19 अरब डॉलर का था. उनकी सालाना निजी कमाई (वेतन और निवेश से) करीब 8 अरब डॉलर है यानी रोजाना दो करोड़ डॉलर से ज्यादा, हर मिनिट 16 हजार और हर सेकण्ड 250 डॉलर से भी ज्यादा !

उच्च जीवन, उच्च विचार :

बिल गेट्स खाते-पीते घर के हैं. स्कूल में उन्होंने 1600 में से 1590 नंबर पाए थे, पढाई के दौरान ही कंप्यूटर प्रोग्राम बनाकर 4200 डॉलर कमाए और टीचर से कहा कि मैं 30 की उम्र में करोड़पति बनकर दिखाऊंगा, सो पहले ही दिखा दिया और 31 की उम्र में वे अरबपति बन गए. बिल गेट्स को दिखावे का शौक नहीं है, वे विलासितापूर्वक नहीं रहते, लेकिन वे व्यवस्थित, शानदार जीवन जीते हैं. डेढ़ एकड़ के उनके बंगले में सात बेडरूम, जिम, स्विमिंग पूल, थियेटर आदि हैं. पंद्रह साल पहले उसे करीब ६० लाख डॉलर में करीदा गया था. उन्होंने लियोनार्दो ला विन्ची के पत्रों / लेखों को तीन करोड़ डॉलर में खरीदा था. ब्रिज, टेनिस और गोल्फ के खिलाड़ी बिल गेट्स अपने तीन बच्चों के लिए सारी जायजाद छोड़कर नहीं जाना चाहते, क्योंकि उनका मानना है कि अगर मैं अपनी संपत्ति का एक प्रतिशत भी उनके लिए छोड़ दूं तो वह काफी होगा. उन्होंने दो चर्चित किताबें भी लिखीं हैं -- दी रोड अहेड और बिजनेस@ स्पीड ऑफ़ थोट्स.1994 में उन्होंने अपने काफी शेयर्स बेच दिए और एक ट्रस्ट बना दिया. 2000 में उन्होंने अपने तीन ट्रस्टों को एक कर दिया और पूरी पारदर्शिता से दुनिया भर के लोगों की मदद करने लगे. बिल गेट्स की कमाई, एकाधिकारी व्यावसायिक नीति और प्रतिस्पर्धा उन्हें बार बार विवादों में भी धकेलती रही है. 16 साल तक फ़ोर्ब्स की अरबपतियों की लिस्ट में नंबर वन रह चुके बिल गेट्स ने अपनी कामयाबी के सूत्र इस तरह बताते हैं:

दुनिया बदलो या घर बैठो :

क्या आपमें है कुछ कर गुजरने की तमन्ना? क्या आप के पास है कोई मक़सद, कोई विजन, कोई आइडिया, कोई इन्नोवेशन ? यदि कोई ऐसा लक्ष्य नहीं है तो घर बैठिये और अगर जवाब हाँ है तो अपनी योग्यता को आंकिये और अपने काम में जुट जाइए.

रास्ते खुद बनाओ :
आज जो भी रास्ते हैं वे हमेशा से नहीं थे. किसी ना किसी ने तो उन्हें बनाया ही है. नए रास्ते बनाने की कोशिश पर हो सकता लोग आपको सनकी कहें, पर आप डिगें नहीं. जब मैंने हर डेस्क और हर घर में कंप्यूटर होने की कल्पना की थी तब किसी को इस बात की कल्पना नहीं थी. मुझे भरोसा था कि कंप्यूटर हम सब की जिन्दगी को बदलकर रख देंगे.

उसूलों पर डटे रहो :
कभी भी अपने उसूलों से ना डिगो. याद रखो, सभी लोग केवल धन के लिए काम नहीं करते. मेरे साथ जितने भी लोगों ने काम शुरू किया था वे सब जानते थे कि वे धन कमाने के लिए नहीं, लोगों की जिन्दगी बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे हैं. हम टेक्नोलोजी की मदद से लोगों का जीवन आसान बनाना चाहते थे, और वह हमने कर दिखाया जो धन कमाने से ज्यादा बड़ा काम है. उनकी हमेशा मदद करो जो संसाधनों से वंचित हैं.

हमेशा आगे की सोचो :

दुनिया तेज़ी से बदल रही है, अगर आप आगे की नहीं सोच सकते तो पिछड़ जायेंगे. आपको संभलने का वक़्त ही नहीं मिल पायेगा. आप को खेल में आगे आने के लिए और यहाँ तक कि खेल में बने रहने के लिए भी आगे की बातें सोचना ज़रूरी है. इसके लिए कड़ी मेहनत के साथ ही नवाचार (इन्नोवेशन) ज़रूरी है. बाज़ार की ज़रूरते क्या क्या रहेंगी यह जानना आवश्यक है.
आपका सर्वश्रेष्ठ तभी, जब सही लोग हों :
कोई भी प्रतिभा तभी किसी कार्य को सही अंजाम तभी दे सकती है, जब उसे सही लोगों का साथ मिले. अगर आप में बहुत प्रतिभा है लेकिन सहकर्मी और नियोक्ता आपका साथ ना दें तो? उच्च लक्ष्य को लेकर सर्वश्रेष्ठ योग्यता से काम करनेवाले लोग ही कामयाबी पा सकते है. अगर मेरे साथ पॉल एलेन और स्टीव बाल्मेर जैसे प्रतिभाशाली और चमकदार मित्र और सहकर्मी नहीं होते जो मेरी कमियों को दूर कर देते थे तो आज मैं इस जगह नहीं पहुँच पाता.

सिस्टम बनाओ :
कोई भी काम करने के लिए एक सिस्टम ज़रूरी है जिससे कि सारे काम आसानी हो सके. यह सिस्टम माइक्रो या मेक्रो हो सकता है. जरूरी नहीं कि आप ही सिस्टम बनायें, आप कोई भी अच्छा सिस्टम अपना सकते हैं. सिस्टम के चक्र उर लीवर का लाभ आपको मिल जाएगा, लेकिन ये ध्यान रखिये कि कहीं यह सिस्टम अनुत्पादकता और निकम्मेपन को तो नहीं बढ़ा रहा? अक्सर लोग सिस्टम अपनाकर उसे भूल जाते हैं और वही सिस्टम घुन बनकर संस्था को बर्बाद कर देता है.

समस्या को समझो और टुकड़ों में हल करो :

किसी भी समस्या को दूर करने के लिए उसे बारीकी से समझना ज़रूरी है. हो सकता है कि वह समस्या एक झटके में दूर ना हो सके, ऐसे में उसे टुकड़ों में बांटकर हाल किया जा सकता है. इस तरीके से बड़ी से बड़ी और तात्कालिक समस्याओं से भी पार पाया जा सकता है.

नाकामी को भी मत भूलो :
अपनी हर कामयाबी का जश्न ज़रूर मनाओ, जिससे आपको अपनी कामयाबी पर नाज हो और आप हर कामयाबी को पाना चाहें, लेकिन कभी भी अपनी नाकामी को भी मत भूलो. अपनी नाकामी से सबक सीखो और उसे रिपीट मत होने दो.

अपने लोगों का ध्यान रखो :
याद रखो टेक्नोलॉजी केवल एक टूल है, काम लोग ही करते हैं, इसलिए अपने सभी सहकर्मियों का ध्यान रखना ज़रूरी है. उन्हें कुछ और अधिकार देकर आप और ज्यादा ज़िम्मेदार भी बना सकते हैं. आपका व्यवहार न केवल सहकर्मियों के साथ, बल्कि सभी के साथ अच्छा होना चाहिए, हो सकता है कि उन्हीं में से किसी के लिए आप को काम करना पड़ जाए.

संतोष और धन :

कॉलेज से बाहर आते ही अपने बहुत धन नहीं कमाया, कोई बात नहीं, आपकी जो इनकम होनी चाहिए थी, नहीं है? कोई बात नहीं.क्या आपने अपने काम के लिए कड़ी मेहनत की? क्या आपको उस मेहनत से संतोष प्राप्त हुआ? आपने कितना कमाया यह किसी और का चर्चा का मुद्दा क्यों हो अगर आप किसी के लिए बोझ नहीं हैं तो?
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 17 अप्रैल 2011

Friday, April 08, 2011

खिलाड़ियों का खिलाड़ी -- गैरी कर्स्टन




क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने का जितना श्रेय खिलाड़ियों को है, उतना ही 'पत्थरों को मील का पत्थर' बनानेवाले कोच गैरी कर्स्टन को भी है तभी तो वर्ल्ड कप जीतने के बाद खिलाड़ियों ने सचिन को तो कंधे पर उठाया ही था गैरी कर्स्टन को भी यह इज्ज़त बख्शी थी.


गरिमामय गुरु और कमाल के कोच -- गैरी कर्स्टन
क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने का जितना श्रेय खिलाड़ियों को है, उतना ही 'पत्थरों को मील का पत्थर' बनानेवाले कोच गैरी कर्स्टन को भी है तभी तो वर्ल्ड कप जीतने के बाद खिलाड़ियों ने सचिन को तो कंधे पर उठाया ही था गैरी कर्स्टन को भी यह इज्ज़त बख्शी थी. गैरी कर्स्टन अब अपने वतन दक्षिण अफ्रीका चले गए हैं और वहां अपनी बीवी-बच्चों के साथ वक़्त बिता रहे हैं. वर्ल्ड कप जिताने के बाद अब उनके पास एक से बढ़कर एक ऑफर्स आ रहे हैं, इनमें उनके अपने देश की टीम का कोच बनाने से लेकर सिडनी सिक्सर्स और सिडनी थंडर्स के नाम प्रमुख हैं. वर्ल्ड कप जिताने के लिए कोच ने केवल मैदान में ही मेहनत नहीं की, बल्कि ड्रेसिंग रूम और होटलों के कमरों तक को क्रिकेट का रण बना दिया. कोच के रूप में गैरी कर्स्टन ने खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को जगाया और खिलाड़ियों को 'थॉटफुल मैनर्स' में ड्रेसिंग रूम के विवादों से भी बचाया. उन्होंने सचिन को रोल मॉडल के रूप में आगे बढ़ाया और धोनी को श्रेष्ठतम कैप्टन के रूप में. गौतम गंभीर उन्हें चमत्कारिक प्रयोगों के लिए क्रेडिट देते हैं और भज्जी बल्लेबाजी में सुधार के लिए. पठान और रैना उन्हें अपने परिवार का वरिष्ठ मानते हैं. नेहरा और श्रीसंत अपने खेल में सुधार के लिए उनके प्रति आभार मान रहे हैं.

गैरी कर्स्टन ने टीम इण्डिया को सही समय पर अलविदा कहा है. कोई पर्वतारोही एवरेस्ट पर फतह कर ले तो उसके पास फतह करने को बचता ही क्या है? गैरी ने भारतीय टीम की जीत की डिजाइन बड़ी शिद्दत से बनाई और उस पर अमल कराया. वर्ल्ड कप के पहले उन्होंने सौ से ज्यादा पेज का एक ब्ल्यू प्रिंट तैयार किया था, जिसके मुताबिक़ खिलाड़ियों के ड्रेसिंग रूम में बॉक्सर मोहम्मद अली और साइकिलिस्ट आर्मस्ट्रॉंग की तस्वीरें लगाईं गयीं थी. खिलाड़ियों को सलाह थी कि वे अपने आप पर नियत्रण रखें और मीडिया से पूरी तरह दूर रहें. होटलों के कमरों से टीवी हटवा दिए जाते थे और अखबार पढ़ने को दिए ही नहीं जाते थे ताकि खेल समीक्षा से बचा जा सके. हर खिलाड़ी के लिए अलग अलग हालात में अलग भूमिका तैयार होती थी, जो दोहराई नहीं जाती. हर मैच की रणनीति अलग. अलग अलग देशों की टीम के अलग नाम थे जैसे बांग्ला देश की टीम डेंजरस फ्लोटर्स के नाम से, दक्षिण अफ्रीका टीम डेंजरस चोकर्स (खरनाक मगर चूकनेवाले), आयरलैंड टीम इजी मीट नाम से पुकारी जाती थी. इन नामों को दोहराने भर से टीम इण्डिया के अवचेतन मन में आ जाता था कि अब उन्हें किस तरह की टीम से मुकाबला करना है.

गैरी कर्स्टन ने अपने करीब तीन साल के कार्यकाल में सबका दिल जीत लिया. विदेशी होने के बावजूद टीम इण्डिया का प्यार पाना बहुत मायने रखता था. टीम के हर सदस्य ने उनकी विदाई के वक़्त कसीदे पढ़े. पूर्व टीम सदस्यों ने भी उन्हें बेमिसाल कोच कहा था. खिलाड़ी उन्हें अपना समझते थे, यह भावना पैदा करने में ही उनकी कामयाबी थी.

गैरी कर्स्टन ने अपने देश दक्षिण अफ्रीका के लिए 101 टेस्ट और 185 वन डे खेले हैं. सलामी बल्लेबाज़ के तौर पर उन्होंने कई यादगार पारियां खेली थीं. वे विश्वसनीय फिल्डर भी रहे. इंग्लैण्ड के खिलाफ एक टेस्ट में उन्होंने साढ़े 14 घंटे खेलते हुए 275 रन बनाए थे. 2004 में रिटायर होने के तीन साल बाद उन्होंने दो मित्रों के साथ केप टाउन में परफार्मेंस ज़ोन नामक कंपनी बनायी थी जो उनके भारत आने के बाद भी कामकाज करती रही. 23 नवम्बर 1967 को जन्मे गैरी कर्स्टन के दो बेटे हैं.
प्रकाश हिन्दुस्तानी


हिन्दुस्तान
10 april 2011

Saturday, April 02, 2011





महेंद्र सिंह धोनी खुद अपने अनुभव और विवेक से साहसिक फैसले लेते हैं और कामयाबी या नाकामी दोनों की ज़िम्मेदारी कबूलते हैं. पूरी टीम को साथ लेकर चलाना, टीम की हर कमी और खूबी से वाकिफ रहना, हर खिलाड़ी को आगे बढ़ाने का मौका देना, टीम में आपस में विश्वास को बनाये रखना, मौके और माहौल को देख रणनीति बनाना और उसे बदलना और इस सब से बढ़कर हार या जीत के बाद भी उससे अपने व्यक्तित्व को प्रभावित नहीं होने देना निश्चित ही एक अच्छे कप्तान की खूबी है.


कूल कप्तान और कार्पोरेट लीडर : महेंद्र सिंह धोनी

आईआईएम इंदौर के स्ट्रेटेजिक मैनेजमेंट के प्रोफ़ेसर प्रशांत कुलकर्णी की टीम की स्टडी बताती है कि महेंद्र सिंह धोनी में सफल कप्तान के साथ-साथ सफल कार्पोरेट लीडर के गुण भी हैं. टीम की हार-जीत तो लगी ही रहती है, लेकिन कामयाब लीडर उसे ज्यादा गरिमामय बना देता है. धोनी केवल अपने लिए नहीं, पूरी टीम इण्डिया के लिए खेलते हैं. पूर्व कप्तान कपिल देव का मानना है कि धोनी एक ग्रेट गेम्बलर हैं जो खेल के हर दांव को खेलने में माहिर हैं. धोनी की लीडरशिप में ही टीम इन्डिया टी-20 सिरमौर बनी. सीबी सीरिज, बोर्डर-गावसकर ट्राफी और आई पी एल 2010 में चेन्नई सुपर किंग की जीत हुई. हालात को सूंघने और बेबाक निर्णय लेने की उनकी कला जगजाहिर है.

धोनी ने मीडिया को कभी तवज्जो नहीं दी, फिर भी वे मीडिया के प्रिय सितारे हैं. धोने को दिखाते हैं तो टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ जाती है. पर लगता है कि उन्हें टीवी वालों से एलर्जी है. अपनी शादी के वक्त रिरियाने- गिड़गिड़ाने के बावजूद उन्होंने फूटेज नहीं लेने दी और बेचारे न्यूज चैनलवालों को धोनी की शादी के घोडीवाले से बात करके ही संतोष करना पड़ा था. टीम इण्डिया में धोनी से भी वरिष्ठ खिलाड़ी भी हैं और वे भी धोनी के फैसलों को गंभीरता से स्वीकार करते हैं. टीम इण्डिया को इस मुकाम तक लाने में धोनी का योगदान बहुत ज्यादा है. वे खुद अपने अनुभव और विवेक से साहसिक फैसले लेते हैं और कामयाबी या नाकामी दोनों की ज़िम्मेदारी कबूलते हैं. पूरी टीम को साथ लेकर चलाना, टीम की हर कमी और खूबी से वाकिफ रहना, हर खिलाड़ी को आगे बढ़ाने का मौका देना, टीम में आपस में विश्वास को बनाये रखना, मौके और माहौल को देख रणनीति बनाना और उसे बदलना और इस सब से बढ़कर हार या जीत के बाद भी उससे अपने व्यक्तित्व को प्रभावित नहीं होने देना निश्चित ही एक अच्छे कप्तान की खूबी है.

2005 के उस धोनी को याद कीजिये जिसने पाकिस्तान के खिलाफ वन डे में 148 और श्रीलंका के खिलाफ 183 रन बनाये थे और आईसीसी ओडीआई रेटिंग में नंबर वन बने थे. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने उनकी लहराती जुल्फों की तारीफ के थी, लेकिन उप कप्तान बनते ही उन्होंने अपनी जुल्फें कटवा दीं और खेलने का तौर तरीका भी बदला. जब उन्हें कप्तानी मिली तब उनके व्यवहार में एक अलग ही तब्दीली थी. वे धोनी से 'मि. केप्टन कूल' हो चुके थे. उनकी आक्रामकता उनके फैसलों में नज़र आने लगी, हाव भाव में नहीं. टी-20 में सिरमौर बनने के जश्न में युवी और श्रीसंत डांस कर रहे थे, लेकिन धोनी शांत थे. ट्राफी मिलते ही उन्होंने अपने युवा साथियों को सौपकर यह सन्देश दिया कि यह आप सबकी है. क्रिकेट के तथाकथित विशेषज्ञ धोनी से इसलिए दुखी रहने लगे कि धोनी अपने दिमाग का इस्तेमाल बाखूबी करने लगे हैं.

धोनी फिटनेस के लिए जिम के बजाय बेडमिन्टन और फ़ुटबाल खेलने में ज्यादा यकीन रखते हैं. वे छात्र जीवन में फ़ुटबाल टीम के गोलकीपर रहे हैं. उत्तराखंड के रहनेवाले धोनी के पिता नौकरी की खातिर रांची गए और वहीँ के हो गए. वे पिछले आईपीएल में सबसे महंगे खिलाड़ी थे. विज्ञापनों से कमाई के मामले में शाहरुख़ खान के बाद धोनी ही हैं, उनकी एक विज्ञापन की तीन साल की डील ही २१० करोड़ रूपए की है. महिलाओं में उनकी लोकप्रियता गज़ब की है और हाल यह है कि उनसे धोनी को बचाने के लिए अलग महिला बॉडीगार्ड्स की जरूरत पड़ती है!

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
03 अप्रैल 2011 को प्रकाशित

Friday, April 01, 2011

छवि राजावत, एमबीए, सरपंच बाई सा.









मॉडर्न ख्यालों की, टेक्नॉलॉजी-सेवी, अंग्रेज़ीदां, हॉर्स राइडर, एसयूवी ड्राइवर, शेक्सपीयर से लेकर होटल मैनेजमेंट तक पर बहस कर सकनेवाली छवि नरेगा की बैठकों में गाँव के हालात पर बोलती तो अच्छे अच्छों की बोलती बंद हो जाती.



छवि राजावत, एमबीए, सरपंच बाई सा.

नाम - छवि राजावत,
उम्र - 30 साल,
शिक्षा - एमबीए,
शौक - घुड़सवारी,
प्रिय पहनावा - जींस टी शर्ट,
पद - सरपंच ग्राम पंचायत सोडा, (राजस्थान),
ताजा उपलब्धि - संयुक्त राष्ट्र में बीते दिनों हुए इन्फार्मेशन पावर्टी वर्ल्ड कांफ्रेंस में भारत की नुमाइंदगी.
लक्ष्य - अपनी ग्राम पंचायत के सभी लोगों के लिए शुद्ध पेयजल, सड़क, बिजली शौचालय और रोजगार मुहैया करना.

छवि को देखकर कई लोगों को लगता है कि शायद वह बॉलीवुड की कोई हीरोइन हैं या फिर मॉडल. फरवरी 2010 में ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के पहले छवि ने लाखों के टेलीकॉम कंपनी के जॉब को छोड़ा और अपने गाँव आकर पर्चा भरा. सरपंच का पद महिला आरक्षण कोटे में आने के बाद दर्जनभर से ज्यादा महिलायें दावा कर रही थीं, लेकिन छवि के पर्चा भरते ही केवल दो दावेदार बचीं. छवि के चुनाव ने यह बात गलत साबित की कि पंचायत चुनाव में जाति या धर्म का कोई रोल होता है. छवि को जिताने के लिए लोगों ने जाति, धर्म, क्षेत्र, जेंडर और यहाँ तक कि रिश्तेदारी तक को भूलकर वोटिंग की. छवि ने कहा कि जो काम 63 साल में नहीं हुए, तीन साल में करके दिखाना है. शुरूआत हो गयी और विकास के परंपरागत तरीकों के साथ ही अनेक एनजीओ और कार्पोरेट्स भी छवि की मदद करने में जुट गए. विकास में तेजी भी आई. उन लोगों का मुंह बंद हो गया जो कहते थे कि सरपंच बनने से क्या होगा? मीडिया की यह धारणा भी बदल गयी कि राजस्थान में महिला सरपंच यानी घूँघटधारी अंगूठाछाप स्त्री ! मॉडर्न ख्यालों की, टेक्नॉलॉजी-सेवी, अंग्रेज़ीदां, हॉर्स राइडर, एसयूवी ड्राइवर, शेक्सपीयर से लेकर होटल मैनेजमेंट तक पर बहस कर सकनेवाली छवि नरेगा की बैठकों में गाँव के हालात पर बोलती तो अच्छे अच्छों की बोलती बंद हो जाती.

सरपंच पद संभालते ही छवि टीवी चैनलों के लिए भी आकर्षण बन गयीं. फेसबुक पर छवि के सैकड़ों प्रशंसकों ने उनके काम को सराहा. अनेक एनजीओ मदद की पहल करने लगे. कोई माँ उनसे बायोडाटा मांगने लगी कि मेरी बेटी आप पर निबंध लिखना चाहती है तो कोई उन्हें कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनने की जिद करता है, कोई मिलने का वक्त चाहता है तो कोई उन पर डाक्युमेंटरी बनने की तमन्ना रखता है. एक साल में ही छवि आइकॉन बन चुकी हैं. लोग कहते हैं कि आप को गाँव की औरतों के साथ घुलना मिलना पसंद कैसे आता है? इस पर छवि का जवाब होता है मैं भी इसी गाँव की बेटी हूँ, ये सब मेरी बचपन की सहेलियां हैं. मुझे पढ़ाई के लिए अच्छा मौका मिला गया, बस.

छवि फौजियों के खानदान की हैं. उनके पिता को छोड़ दादा, परदादा, चाचा, बाबा सब फ़ौज में रहे. दादा रघुवीर सिंह ब्रिगेडियर थे. रिटायर होकर सोडा गाँव आ गए और गाँव का नक्शा बदलने में जुटे. लगातार तीन बार सरपंच चुने गए. छवि के परदादा सेना में कर्नल थे और आजाद भारत में सोडा के पहले सरपंच बने थे. दादा की जिद पर छवि को नो एक्जाम,नो यूनीफार्म वाले ऋषि वैली स्कूल भेजा गया, फिर अजमेर के मेयो और फिर दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज. पुणे के बालाजी मैनेजमेंट संस्थान से एमबीए के बाद छवि जयपुर में अपनी माँ के पास (जिनका अपना होटल बिजनेस है) आयीं थीं कि सोडा के लोग बस में भरकर आ गए और उनसे सरपंच का चुनाव लड़ने की मांग करने लगे. गांववालों के आगे तो छवि को झुकना पड़ा लेकिन अपने काम और इरादों से छवि ने पूरी दुनिया को अपने आगे झुका दिया है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

नईदुनिया
10 अप्रैल 2011

Friday, March 25, 2011

तुरुप का पत्ता युवराज सिंह





तुरुप का पत्ता युवराज सिंह



युवराज की क्रिकेट से पहली कमाई 500 रुपये थी जो पंजाब क्रिकेट असोसिएशन ने उन्हें दिया था. आजकल कमाई के मामले में धोनी और सचिन के बाद युवराज ही हैं. 2009 में उनकी विज्ञापनों से आय करीब 25करोड़ थी



कहाँ तो युवराज सिंह पिछले साल इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास लेने की सोच रहे थे, जब उन्हें एशिया कप और आस्ट्रेलिया के खिलाफ
वनडे टीम से बाहर कर दिया गया था, वहां चयनकर्ताओं उन्हें तुरुप का पत्ता कह रहे हैं. कहा जा रहा है अगर युवराज और अन्य फार्म में रहे तो भारत वर्ल्ड कप जीत सकता है. अब निगाहें मोहाली में होनेवाले सेमी फायनल पर होगी जो पाकिस्तान के खिलाफ खेला जाना है. टीम को यहाँ तक लाने का श्रेय युवराज को है, जो क्वार्टर फायनल में 'मैन ऑफ़ दी मैच' थे.

एक लाईन में उनका परिचय है,ये वही युवराज सिंह हैं, जिन्होंने 10दिसंबर 2007 को टी-20 मैच में इंग्लैण्ड के खिलाफ स्टुअर्ड ब्राट के
एक ओवर में 6 छक्के मारकर इतिहास बनाया था. पहला सिक्सर टी-20 के इतिहास का सबसे लम्बा सिक्सर था, दूसरा स्क्वेयर, तीसरा लांग ऑफ, चौथा ओवर प्वाइंट, पांचवां मिडविकेट पर मिस हिट और छठा लांग.
युवराज सिंह यानी भारतीय क्रिकेट टीम के मध्यक्रम के बल्लेबाज़, लेफ्ट आर्म स्पिनर, टीम इण्डिया, एशिया इलेवन, किंग्स इलेवन पंजाब, पंजाब योर्कशायर आदि टीम के स्टार खिलाड़ी. जिन्होंने पहला गोल्ड मैडल स्केटिंग में जीता था, और उसे उनके पिता योगराज सिंह ने चलती कार से बाहर फैंक दिया था और कहा था कि तुम्हें तो क्रिकेट, सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट ही खेलना है. चंडीगढ़ में ऐशो आराम से रहनेवाले युवराज के पिता ने 14 साल के बेटे को मुंबई की क्रिकेट अकेडमी में भर्ती करा दिया. युवराज अंधेरी में रहते थे और भीड़भरी लोकल ट्रेन से रोज़ चर्चगेट आते और ओवल मैदान में प्रेक्टिस करते. बरसों उन्होंने मुंबई की लोकल ट्रेन में अपना किटबैग ढोया. पंजाब की अंडर 19 टीम के कप्तान के रूप में वे सबसे पहले लाइम लाईट में आये जब उन्होंने 358 रन बनाये थे. सन 2000 में उन्हें श्रीलंका के खिलाफ अंडर 19 टीम में मौका मिला और फिर नेशनल क्रिकेट अकेडमी में उनकी जगह पक्की हो गई. उसके बाद तो उन्होंने केवल इतिहास ही बनाया है. उनका बल्ला, गेंदबाजी और फुर्तीली फील्डिंग टीम को जिताने में कोई कसर नहीं छोड़ती.

युवराज की क्रिकेट से पहली कमाई 500 रुपये थी जो पंजाब क्रिकेट असोसिएशन ने उन्हें दिया था. आजकल कमाई के मामले में धोनी और सचिन के बाद युवराज ही हैं. 2009 में उनकी विज्ञापनों से आय करीब 25करोड़ थी जो 2010 में घटकर करीब 16 करोड़ हो गई थी. इनकम टैक्स के अलावा सर्विस टैक्स के रूप में भी करोड़ों रुपये चुकाते हैं. वर्ल्ड कप जीत गए तो टीम को 18 करोड़ रुपये इनाम में मिलेंगे यानी हर खिलाड़ी को एक करोड़ से भी ज्यादा. 1983 में वर्ल्ड कप जीतने पर टीम इण्डिया को केवल पंद्रह लाख के करीब मिले थे.

विवादों का युवराज से पुराना दोस्ताना है. कभी उन पर टैक्स कम देने का इलजाम लगता है तो कभी लन्दन का आब्जर्वर उन्हें टॉप टेन घमंडी लोगों में शुमार करता है. कभी अभिनेत्री अनुषा दांडेकर से उनका नाम जुड़ता है तो कभी किम शर्मा से, कभी वे दीपिका पादुकोण के साथ बर्थडे मनाते है तो कभी मिनीषा लाम्बा के साथ उनके लिप लाक की चर्चा होती है. कभी माडल शमिता सिन्हा, कभी साउथ की करिश्मा कोटक और कभी कन्नड़ हीरोइन जेनिफर कोतवाल से उनके संबंधों की खबरें आती हैं. वे कई के साथ दोस्ती मानते हैं और यह भी कहते हैं कि दीपिका पादुकोण ने मेरा दिल तोड़ दिया.

सचिन युवराज के प्रिय खिलाड़ी हैं और अपनी जिन्दगी में पहला आटोग्राफ उन्होंने सचिन का ही लिया था. उनका कहना है कि मैं वर्ल्ड कप जीतने के लिए कुछ भी कर सकता हूँ. मैं वर्ल्ड कप जीतकर सचिन के हाथों में देखना चाहता हूँ. यह मेरे लिए एक सपने जैसा है.
प्रकाश हिन्दुस्तानी


हिन्दुस्तान
27 march 2011