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Saturday, December 13, 2014

अपराधों की रोकथाम में 100 नंबर का योगदान

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (10 मई 2014)


इंदौर पुलिस के अधिकारियों ने रात्रिकालीन शिफ्ट करने वाले जवान गणपत सिंह को निलंबित कर दिया है। जांच के बाद यह काम किया गया। गणपत सिंह पर आरोप यह था कि उसने अपराधों की रोकथाम में मदद की थी। गणपत सिंह जैसे और भी पुलिसकर्मी हो तो इंदौर में अपराध पूरी तरह खत्म हो सकते है। 

पिछले हफ्ते की बात है। बायपास के पास 60 लाख रुपए की ऑडी में एक शख्स अपनी पत्नी के साथ जा रहा था। रात के करीब डेढ़ बजे थे और उन सज्जन की कार पंक्चर हो गई। उन सज्जन ने वहां से गुजर रहे दो पुलिसकर्मियों को रोकने के कोशिश की, लेकिन वे नहीं रुके, क्योंकि कोई अपराध नहीं हुआ था। थोड़ी देर बाद वहां से 7-8 युवकों का झुण्ड मोटरसाइकिल पर निकला। कार वाले दम्पत्ति को लगा कि उनके साथ लूट हो सकती है। उन्होंने 100 नंबर पर फोन लगाया। पहले तो रिकॉर्डेड संदेश बजा कि इंदौर पुलिस आपका स्वागत करती है, लेकिन जब समस्या बताई गई तब पुलिसवाले ने कहा कि हां, बताइए। 

‘‘मैं बायपास के पास से बोल रहा हूं। मेरी वाइफ मेरे साथ है और मेरी गाड़ी पंक्चर हो गई है।’’ ‘‘तो क्या आपकी गाड़ी में स्टेपनी नहीं है? 8-8, 10-10 लाख गाड़ी में घूमते हो और स्टेपनी नहीं रखते हो?’’ ‘‘स्टेपनी तो है, लेकिन यहां बहुत अंधेरा है और डर भी लग रहा है’’ ‘‘अच्छा, टार्च क्यों नहीं रखते तुम? क्या चाहते हो?’’ ‘‘यहीं चाहते है कि कोई आ जाए तो हम अपनी गाड़ी की स्टेपनी बदल लें’’ ‘‘अच्छा, मैं अभी भेजता हूं, हमारे एसपी को। वह आकर तुम्हारी गाड़ी की स्टेपनी बदल देंगे’’ ‘‘नहीं मेरा मतलब यह नहीं है, यहां हमारे साथ कुछ हो जाए तो...’’ ‘‘नहीं-नहीं, एसपी साहब आ रहे है, स्टेपनी बदल देंगे’’। ‘‘कृपया आप अपना नाम बता दीजिए साहब?’’ ‘‘मेरा नाम जानना है तो 10 रुपए का रेवेन्यू स्टेम्प खरीद लो और सूचना के अधिकार में अर्जी लगा दो पता चल जाएगा। आ जाते है न जाने कहां-कहां से।’’

इस तरह के वार्तालाप के बाद कार चालक महोदय को एहसास हुआ कि वे भारत के इंदौर नामक शहर में है। जहां पुलिस का काम अपराध होने के बाद उसका पंजीकरण करना होता है। बहरहाल वह सज्जन प्रभावशाली थे। उनके मोबाइल में ऑटो रिकॉर्डिंग की व्यवस्था थी। उन्होंने वह रिकॉर्डिंग कुछ पत्रकारों को भेजी जिन्होंने उसके आधार पर खबरें प्रकाशित कर दी। बाद में पुलिस के आला अधिकारियों ने जब रिकॉर्डिंग सुनी तो उन्हें लगा कि पुलिसकर्मी का जवाब न केवल असहयोगात्मक था बल्कि अभद्र और गैरजिम्मेदाराना भी। उसे निलंबित कर दिया गया। 

शिकायतकर्ता के मित्र कहते है कि उन्होंने कई गलतियां की। पहली तो यह कि पुलिस को फोन क्यों किया? क्या उनको यह नहीं पता था कि इंदौर पुलिस का रवैया वैâसा होता है? क्या उनको यह नहीं पता था कि आधी रात को पुलिस मुख्यालय में 100 नंबर के कॉल अटेंड करने वाला जागृत अवस्था और होश में रहता है? उन्होंने 100 नंबर फोन करके सहयोग की अपेक्षा ही क्यों की? वह यह कहते कि मेरे साथ लूट हो रही है, तब शायद पुलिस मामले को गंभीरता से लेती?

१०० नंबर एक ऐसा नंबर है जिसके बारे में गांव-गांव का बच्चा-बच्चा जानता है। अब कोई भी आदमी यहां फोन कर दें तो पुलिस का काम कितना बढ़ जाए। उस पुलिसकर्मी ने ठीक ही किया। अगर आपके पास कार है, तो स्टेपनी रखिए, टार्च भी रखिए। अगर आप का मकान है और आपको चोरी का डर है तो बंदूक रखिए और चौकीदार रखिए। अगर आपके घर में बहु-बेटियां है और उनकी सुरक्षा की चिंता आपको है तो उन्हें पर्दे में रखिए, घर के अंदर रखिए। एक जमाना था जब इंदौर में सराफा बाजार में पूरी रात रोनक रहती थी। अब पुलिस वाले ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे सराफा बंद कराने पहुंच जाते है। दुकान बंद, लोग बाग घरों में। पुलिस का काम आसान। अब अगर सिनेमाघर भी दस बजे बंद हो जाएं, रेले, बसें भी रात को चलना बंद हो जाए, तो पुलिस का काम कितना आसान हो जाएगा। जिसका माल, हिफाजत का जिम्मा उसी का। सीधा सा उसूल है। 
Copyright © प्रकाश हिन्दुस्तानी
वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (12 अप्रैल 2014)

चुनाव और मोहब्बत में सब जायज 

मोहब्बत और चुनाव सत्य है।  शादी तथा सरकार मिथ्या !

चुनाव और मोहब्बत में बहुत समानता है। दोनों के लिए वयस्क होना ज़रूरी है।  दोनों में कामयाबी पाना  आसान नहीं। दोनों में आदमी  संयोग से ही घुसता है।  दोनों में आदमी अपनी इच्छा से नहीं पड़ता, दोनों ही गले पड़नेवाली चीजें हैं; और गले पड़  जाए तो छूटती नहीं। दोनों में लोगों को नींद कहाँ आती है? दोनों में लोग तमाशाई होते हैं, मददगार नहीं। दोनों में सफलता स्थायी  नहीं होती। दोनों में पराजित होकर तो लोग दुखी होते ही हैं, जीतकर भी दुखी होते हैं। दोनों बहुत बड़ी जिम्मेदारी हैं। दोनों में अपने और पराये का भेद समझ में आ जाता है।  दोनों में चाँद तारे तोड़कर लाने की बात होती है  दोनों में वादों और दावों  का जोर होता है।  दोनों में वादाखिलाफी आम बात है। गर्ल फ्रेंड को भी फ़ोकट में मोबाइल चाहिए और वोटर को भी। चुनाव में हाथ की अंगुली पर पक्की स्याही लगाने का चलन है और सुहागन स्त्री की स्याही उसका सिन्दूर होता है जो मस्तक पर लगा रहता है। शादी के बिना मोहब्बत अधूरी और मतदान के बिना चुनाव। मोहब्बत के बाद शादी हो जाए तो घर में झगड़े होना कम्पलसरी होता है; वैसे ही चुनाव में सरकार बनानेवाली पार्टी के अंदर भी जूतमपैजार चलाती रहती है।  दोनों में डिप्लोमेसी चलती है और सबसे बड़ी बात --दोनों में हाँ का मतलब तो हाँ होता ही है; नहीं का मतलब भी हाँ होता है। 

जब प्रेमी कहता है - मैं तुम्हें यूं ही जीवन  भर प्रेम करूंगा तब उसका मतलब भी वैसा ही होता है जैसा चुनाव के घोषणा पत्र में लिखा होता है। किया तो किया, नहीं तो क्या कर लोगे? जब प्रेमी कहता है कि मैं तुम्हें ताउम्र  रानी बनाकर रखूंगा तो क्या उसका सचमुच यही मतलब होता है? जब  सरकार बनाने के लिए लाइन में लगी पार्टी कहती है कि है  कि हम  गरीबी हटाएंगे तो क्या उसका यही तात्पर्य होता है? जब कोई पार्टी कहती है कि आचार संहिता के कारण हम  घोषणा नहीं कर पा रहे हैं तो यह वैसा ही है जब लड़केवाले कहते हैं कि हमें दहेज़ में कुछ नहीं चाहिए। चाहते दोनों हैं, पर घोषणा नहीं करते।  यह 'नहीं' ही 'हाँ' होती है। 

चुनाव में उम्मीदवार जहाँ तहां से धन जुटाकर खर्च करता है. मोहब्बत में दीवाना सबके आगे कटोरा लिए खड़ा रहता है और मौका आने पर चोरी से भी बाज़ नहीं आता। चुनाव में कानाफूसी आम है, मोहब्बत में भी। चुनाव में जीत का सेहरा किसी के बजाए किसी और को बांध जाता है; मोहब्बत में यह आम बात है। चुनाव लोकतंत्र के लिए अहम् है और मोहब्बत जिंदगानी के लिए। 


मोहब्बत और चुनाव सत्य है।  शादी तथा सरकार मिथ्या !
Copyright © प्रकाश हिन्दुस्तानी
Copyright © प्रकाश हिन्दुस्तानी

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (5 अप्रैल 2014  को प्रकाशित)



ये चुनाव भी कोई चुनाव है लल्लू?

इंदौर में लोकसभा के लिए मतदान में तीन हफ्ते भी हैं, लेकिन अखबार और टीवी चैनल के अलावा कहीं माहौल ही नहीं है। एक वह जमाना था जब चुनाव के महीने-डेढ़ महीने पहले शोर-गुल शुरू हो जाता था। तांगे- ऑटो पर लाउड स्पीकर लग जाते थे, दिन-रात प्रचार चलता रहता था।  जीतेगा भाई जीतेगा...फलानेजी  संघर्ष करो, हम आपके साथ हैं... देश का नेता कैसा हो .... जैसा हो.... जैसे नारे जगह-जगह सुनने को मिलते थे।  बच्चे चुनाव प्रचार में ज्यादा धूम मचाते। तरह-तरह की टोपियां, बिल्ले, चुनाव चिह्न के कटआउट बंटते। घरों पर पार्टियों के झंडे लहराते दिखते। पार्टी कार्यकर्ताओं की इज्जत होती थी, उन्हें किंग मेकर समझा जाता था। पान की दुकानों और चाय की गुमटियों पर राजनैतिक ज्ञान की गंगा बहती रहती। काका जोगिन्दर सिंह (धरतीपकड़), कर्नाटक के एचपी रंगास्वामी, डॉ. सुबुद्धि की चर्चा हर जगह होती। इन महानुभावों ने कभी चुनाव नहीं जीता, उल्टे दर्जनों बार हर चुनाव में जमानत जब्त कराकर नाम कमाया था। जैसे इंदौर में सुमित्रा महाजन ने सात बार से हर बार चुनाव जीतकर रिकॉर्ड बनाया, वैसे ही डॉ. सुबुद्धि ने तो लगातार 23 बार लोकसभा व विधानसभा चुनाव लड़कर हर बार जमानत जब्त कराने का रेकॉर्ड बनाया। उनका चुनाव एजेंडा हर बार एक ही होता था- 60 साल से बड़े नेताओं के चुनाव लडऩे पर रोक और दो जगह से किसी भी उम्मीदवार के लडऩे पर प्रतिबंध।
   अब तो लग ही नहीं रहा कि आम चुनाव होने वाले हैं। चुनाव आयोग ने लाउड स्पीकरों पर प्रचार पहले ही बंद करा दिया था, अब तो हर गतिविधि पर उसकी निगाहें रहती हैं। टीवी देखो या और अखबार पढ़ो तभी लगता है कि चुनाव आने वाले हैं। होर्डिंग पर रोक, प्रचार पर रोक, रैलियों पर नियम, शराब बांटने पर रोक, वोटरों को घुमाने-फिराने पर रोक, अखबारों में विज्ञापनों पर रोक, पार्टी खिलाने पर कंट्रोल... अब क्या खाक मजा बचा चुनाव में? बची-खुची कसर इंदौर में बीजेपी की उम्मीदवार ने पूरी कर दी।  अब ये विरोधी पार्टी वाले उनको चुनाव में टक्कर देने की जगह बलि का बकरा तलाशेंगे तो वोटरों को क्या खाक मजा आएगा? सुमित्रा ताई की जीत तय मानी जा रही है और उधर इंदौर के सट्टा बाजारी मुंह लटकाए बैठे हैं। और तो और बेचारे कार्टूनिस्ट भी बोर हो गए हैं और पिछले चुनाव के कार्टून ही रिपीट कर रहे हैं। जब चुनाव में ही कुछ नया नहीं है तो नया कार्टून क्या बनाना? चुनाव आयोग का नारा है सारा काम छोड़ दो, सबसे पहले वोट दो। आपके वोट से सरकार बनती है। हां भाई बनती है, पर सरकार के लिए विरोधी पार्टी यानी विपक्ष का होना भी तो जरूरी है।  किसको जीतना है, ये तो तय है है फिर काहे को करें मारामारी? चुनाव आयोग ने कितना जनविरोधी काम किया है- मतदान रखवाया है 24 अप्रैल को, यानी गुरुवार को।  शनि या सोम को मतदान होता तो सलंग छुट्टी मिल जाती। 
--प्रकाश हिन्दुस्तानी ©2014
(5 अप्रैल 2014  को प्रकाशित)

ये मतवाले सलाहकार !

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (21 मई 2014)




कुछ दिन से ज्ञानचंद लोग बहुत बिज़ी हैं. चुनाव के आसपास उनका सीजन रहता है। वे ही सवाल खड़ा करते हैं और वे ही जवाब भी तैयार रखते हैं. जो पहले कहते थे कि एनडीए को बहुमत नहीं मिलेगा, अब कह रहे हैं--देखा ले आये न मोदी अपने  बूते पर भाजपा का बहुमत.
आजकल वे मोदी जी की चिंताओं को लेकर परेशान हैं. आज़ादी के बाद पैदा हुए सांसद ही मंत्री बनेंगे तो हमारी ताई का क्या होगा?  क्या वे स्पीकर के लिए मान  जायेंगी? पर वहां तो लालकृष्ण आडवाणी जी का नाम चल रहा है! अरे! सुषमा  स्वराज का नाम भी स्पीकर के वास्ते चल रहा है? ऐसा करना चाहिए कि पहले आडवाणी जी को स्पीकर बना देना चाहिए और बाद में प्रणब दा की जगह राष्ट्रपति !
अब ये ज्ञानचंद मोदी जी के टेंशन घर तक ले जा रहे हैं.  मोदी को मंत्रीमंडल में किस किस को लेना चाहिए और किस को नहीं. कुछ ज्ञानचंदों ने तो मंत्री बनाकर उनके विभागों का बंटवारा भी कर डाला.  जेटली वित्त मंत्रालय के लायक हैं या नहीं, राजनाथ को होम डिपार्टमेंट ठीक ही है। गडकरी को सडकों का अच्छा अनुभव है, भूतल परिवहन ठीक रहेगा. अमित शाह को यूपी में ही बिठाए रखना चाहिए, बन्दे में दम है.नहीं नहीं, शाह को तो होम मिनिस्टर बना दो
एक और ज्ञानचंद मंडली मोदी के विदेश मंत्रालय की कमान सभाले हुए है। पाकिस्तान के साथ यूं निपटना चाहिए। चीन को सुधारने का रास्ता ये है. ओबामा अबअफी मांगने आया समझो। जापान से तो मोदी जी के पुराने अच्छे सम्बन्ध हैं , पता है कि नहीं?
एक और ज्ञानचंद गंगा की सफाई पर चिंतित है। मोदी जी ने ज्यादा बोल दिया यार. गंगा साबरमती कैसे बन सकती है? गंगा की सफाई करने जायेंगे तो कानपुर के चमड़ा फैक्टरी वाले नाराज हो जायेंगे। वे कहेंगे कि मोदी ने  अल्पसंख्यकों को सताना शुरू कर दिया है। मोदी में  पोलिटिकल विल तो है पर वोट बैंक भी बड़ा मसाला है।
अब 26 को मोदी जी की शपथ हो जाएगी। मंत्री चुन लिए जाएंगे. ज्ञानचंद फिर नया टेंशन लेकर बिज़ी हो जायेंगे. अगली बार, फिर अगली अगली बार मोदी सरकार। बार बार मोदी सरकार।
Copyright © प्रकाश हिन्दुस्तानी

Friday, December 12, 2014


कार्निवाल के देश में गुरिल्ला राष्ट्रपति



Posted by Picasa



जवानी में उन्होंने गुरिल्ला लड़ाई लड़ी, पकड़ी गयीं और सेना के टॉर्चर को सहा. तीन साल जेल में रहीं, रिहा हुई तो पढ़ाई करने की कोशिश की. पीएचडी करना चाही, पर न कर सकीं. अर्थशास्त्र की पढ़ाई की,
पर पीजी की डिग्री भी नहीं ले सकीं. ग्रीक थियेटर और डांस का शौक था, अधूरा रह गया. राजनीति में सक्रिय रहीं. एनर्जी मिनिस्टर बनीं. अच्छा काम किया. पहली दफा राष्ट्रपति पद की दावेदार रहीं और संघर्ष के बाद जीत गयीं. जी हाँ, आपने सही सोचा -- ये हैं ब्राज़ील की डिल्मा रौसेफ़. बुल्गारिया के प्रवासी की बेटी. चौदह की आयु में पिता को खो दिया, सोलह की होते-होते मार्क्सिस्ट एक्टिविस्ट बनीं. बीस की उम्र में शादी कर डाली. माँ बन सकीं तीस में, और शादी चल नहीं सकी. ब्राज़ील में फौजी तानाशाही के खिलाफ संघर्ष में जवानी खर्च कर डाली. तरह-तरह के जुल्म सहें, संघर्ष किये, घर-परिवार दांव पर लगा दिया और अंत में राजनीति में शिखर को छू लिया. वे अब फुटबाल और कार्निवाल, अमेजान और साम्बा के देश ब्राज़ील की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में पहली जनवरी को शपथ लेंगी.

ब्राज़ील की राष्ट्रपति चुनी जानेवाली डिल्मा रौसेफ़ के बारे में उनके विरोधी कहते हैं कि तानाशाही के खिलाफ लड़नेवाली वे खुद तानाशाह जैसी हैं. --''वे बेहद लोकतांत्रिक हैं अगर आप उनसे सौ फीसदी सहमत रहें!'' यह कहा है उनके एक करीबी राजनैतिक सहयोगी ने. उनके मूड के बारे में कहा जाता है कि वे पल में तोला, पल में माशा हो जाती हैं. ''ऐसा लगता है कि वे हर हफ्ते अपने दिमाग की डिस्क की फार्मेटिंग करती है". तभी तो उन्होंने ब्राज़ील के अबोर्शन कानूनों का समर्थन किया, लेकिन कहा कि मैं 'प्रो-लाइफ' एक्टिविस्ट हूँ. उन्होंने 'गे मैरेज' का विरोध किया, लेकिन कहा कि वे समलैंगिक सिविल राइट्स की हिमायत करती हैं क्योंकि यह मानव अधिकारों से जुदा मामला है!

एकॉनमिस्ट के रूप में डिल्मा रौसेफ़ की चुनौतियां भी कम नहीं. अर्थ व्यवस्था मज़बूत करना है. जीडीपी ऊपर ले जाना है, गरीबी-अमीरी की खाई कम करना है, ब्राज़ील में भी बिजली की भारी कमी है, चीनी महंगी हैं, स्लम्स बढ़ गए हैं, शिक्षा-स्वास्थ्य-शांति की दरकार है. देशी-विदेशी क़र्ज़ का बोझ है, अपराध बहुत ज्यादा हैं. सरकार में अभी वे एकछत्र नेता नहीं हैं. पूरा चुनाव ही उन्होंने 'गरीब, कामगार और युवा' वोटरों को रिझाते हुए लड़ा और जीता है, अब वे उनकी ओर आस लगाये हैं.

डिल्मा रौसेफ़ का चुनाव लड़ना भी दिलचस्प रहा. उन्होंने युवा वोटरों को रिखाने के लिए सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स का जमकर उपयोग किया. रोजाना लाखों ट्विट्स उन के पक्ष में होते रहे. टेलीफोन पर वियतनाम वार पर फ़िल्म बनानेवाले अमेरिकी फिल्मकार ओलिवर स्टोन सहित अनेक देशों के पत्रकार, कलाकार, लेखक प्रचार में मदद करते रहे. ओलिवर स्टोन की टेप की गयी आवाज़ लोगों को डिल्मा रौसेफ़ के पक्ष में वोट डालने की अपील कर रही थी.

१४ दिसंबर १९४७ को जन्मी डिल्मा रौसेफ़ ने जीवन में कभी हार नहीं मानी. वे एक बेटी की माँ और बच्चे की नानी हैं. परिवार की चाहत में उन्हें दो बार शादी करना पड़ी. जीवन के उत्तरार्ध में उन्हें एक्सीलर लिम्फोमा नामक कैंसर से भी लड़ना पड़ा. कीमोथेरेपी के कारण उन्हें महीनों इलाज कराना पड़ा. जिस कारण उनके सर के बाल झड़ गए और वे विग के सहारे काम चलाती रहीं. हेयर रिप्लेसमेंट और कॉस्मो डेन्टेस्ट्री करानेवालीं डिल्मा रौसेफ़ का दिल फौलाद का है और यही उनकी खूबी है.
---प्रकाश हिन्दुस्तानी

(दैनिक हिन्दुस्तान, 07 नवंबर 2010 को प्रकाशित)

Tuesday, October 28, 2014

न्यूज़ चैनलों के प्रस्तावित नये नाम

'वीकेंड पोस्ट' में मेरा कॉलम (25 अक्तूबर 2014)


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जब सभी लोग सच जानते ही हैं तो फिर दिखावा किस बात का?
मेरी राय है कि भारतीय न्यूज़ चैनलों के नाम ऐसे होने चाहिए -- 
सच्चाई के करीब. 
  --अम्बानी न्यूज़   
  --अडाणी नाऊ 
  --बिड़ला टाइम 
  --लाइव लूट 
  --न्यूज़ एंटरटेनमेंट 
  --फेकू न्यूज़ 
  --चापलूस वर्ल्ड 
  --चरणस्पर्श टीवी 
  --नफे की दुनिया 
  --खाने तक 
   --चमचा इण्डिया 
  --ग्रेट 420 
   --लूट फोकस 
  --चोर एक्सप्रेस 
  --फ्रॉड ओके 
  --जोकर न्यूज़ 
  --भक्त चैनल 
  --फेक नेशन 
  --दलाल इण्डिया 
  --बिंदास चोर 
  --पॉलिटिकल प्लानेट 
  --टेंशन टीवी 
  --स्याह जगत 
  --खाना - पचाना 
  --वोट शॉप 18 

 --चोरी ओके 
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दो कारणों से न्यूज़ चैनलों के नाम बदलने की ज़रूरत है : 1. चैनलों के मालिक नियमित रूप से बदलने लगे हैं और 2. न्यूज़ चैनलों पर न्यूज़ के नाम पर जो तमाशा दिखाया जा रहा है, उस कारण भी नाम बदल दिए जाने चाहिए. अगर आप नियमित न्यूज़ चैनल देखते हों तो यह बताने और समझाने की कोई ज़रूरत नहीं है कि किस तरह की खबरों को कौन सा चैनल किस तरह से दिखाएगा. पुरानी फिल्मों में जैसे जगदीश राज और ए के हंगल इंस्पेक्टर के रोल में 'टाइप्ड' हो गये थे, वैसे ही हमारे पत्रकार और मीडिया के पंच लोग भी 'टाइप्ड' हो गये हैं, और उनके मुँह खोलने से पहले ही बताया जा सकता है कि किस मुद्दे पर कौन सा व्यक्ति क्या बोलेगा। ये मीडियाकर्मी सच्चाई से ज़्यादा अपनी वफ़ादारी को तरजीह देते हैं. एक दौर था जब प्रिंट मीडिया के एक हिस्से के लिए 'जूट प्रेस' शब्द का प्रयोग होता था क्योंकि उन अखबार समूह के मालिकों की जूट मिलें थीं और वे वहां से हुई कमाई को मीडिया के धंधे में लगा देते थे. अब ज्यादातर बड़े न्यूज़ चैनल चिट फण्ड कंपनियों द्वारा किये जा रहे हैं. इस तरह इसे 'चिट फण्ड मीडिया' कहा जा सकता है। ज्यादातर न्यूज़ चैनलों के नाम में 'इण्डिया', न्यूज़, टीवी, लोक, जन आदि शब्द जुड़े हैं और कई के नाम में 24, 7, 18 आदि। होना यह चाहिए था कि इण्डिया, लोक, जन, न्यूज़ सीधे सीधे पर चैनल होते जैसे -- अम्बानी टीवी, अडाणी टीवी, बिड़ला टीवी, भक्त चैनल आदि आदि और 24, 7, 18 आदि की जगह एक ही शब्द होना था 420 चैनल। मैं अपनी निजी योग्यता, अनुभव और दायित्व के आधार पर न्यूज़ चैनलों के कुछ नए नाम प्रस्तावित कर रहा हूँ. (जरूरी नहीं कि आप उससे सहमत हों ही.) --अम्बानी न्यूज़ --अडाणी नाऊ --बिड़ला टाइम --लाइव लूट --न्यूज़ एंटरटेनमेंट --फेकू न्यूज़ --चापलूस वर्ल्ड --चरणस्पर्श टीवी --नफे की दुनिया --खाने तक --चमचा इण्डिया --ग्रेट 420 --लूट फोकस --चोर एक्सप्रेस --फ्रॉड ओके --जोकर न्यूज़ --भक्त चैनल --फेक नेशन --दलाल इण्डिया --बिंदास चोर --पॉलिटिकल प्लानेट --टेंशन टीवी --स्याह जगत --खाना - पचाना --वोट शॉप 18 --चोरी ओके ........ अगर आप कोई नया न्यूज़ चैनल शुरू करने जा रहे हों तो इनमें से कोई भी नाम रजिस्टर करा सकते हैं. मेरा दावा है कि ये नाम सच्चाई करीब होने से जल्दी ही टीआरपी बटोरकर ले जाएंगे। Copyright © प्रकाश हिन्दुस्तानी

Tuesday, October 21, 2014

जिनको खड़ा नहीं होना चाहिए था ...... !

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (26 अप्रैल 2014)

जिनको खड़ा नहीं होना चाहिए था ...... !




इस चुनाव में बड़ी गड़बड़ी हो गई है. जिनको खड़ा नहीं होना चाहिए था, वे खड़े हो गए और जिनको घर बैठना था, वे दर दर वोट मांग रहे। यह हाल पूरे देश का है. अगर मेरे मनपसंद ये उम्मीदवार मैदान में होते तो चुनाव कितना दिलचस्प, रोमांटिक और ग्लैमरस हो जाता। अब आप ही बताइये--मैं ऐसी कौन सी गलत अपेक्षा रख रहा हूँ?

टोंक -सवाई माधोपुर से अजहरुद्दीन मैदान में क्यों हैं? संगीता बिजलानी क्यों नहीं? मथुरा से बसंती यानी हेमा क्यों चुनाव लड़ रही हैं-ऐशा या आहना क्यों नहीं? मुनमुन सेन क्यों  काली होने के लिए धूप में धूम रही हैं, जबकि उनकी दो दो जवान बेटियां यह काम अच्छी तरह कर सकती थीं। राइमा सेन आ जातीं, रिया सेन आ जातीं। राहुल गांधी मैदान संभाले हुए हैं; कल्पना कीजिये अगर उनकी बहन प्रियंका मैदान में होतीं तो माहौल कैसा होता! राखी सावंत चुनाव लड़ सकती हैं तो बेचारी सनी नियोनी ने क्या बिगाड़ा था? सनी को ज्यादा वोट मिल जाते, इसकी गारंटी महेश भट्ट ले सकते हैं।शत्रुघ्न सिन्हा लोकसभा के उम्मीदवार हैं, जो बीते 20 साल से अफवाह उड़वाते  रहते हैं कि बिहार के अगले मुख्यमंत्री वे ही होंगे। 20 साल में तो उनकी बेटी सोनाक्षी हीरोइन बन गई और तमाम बुड्ढे हीरो जैसे अक्षय कुमार, सलमान खान,अजय देवगन आदि की फिल्मों में टेका लगा रही हैं।बेचारे शत्रुघ्न को भी सहारा मिल जाता . अगर शत्रुघ्न की जगह सोनाक्षी का नाम उम्मीदवारी में होता तो मजा आ जाता। स्मृति ईरानी अब बहू से आंटी बन गई हैं, अगर टीवी कलाकार को ही लड़ना था तो सारा खान आ जातीं, प्रत्यूषा बनर्जी आ जातीं,करिश्मा तन्ना आ जातीं।  और कोई नहीं तो तारक मेहता वाली बबिताजी  यानी मुनमुन दत्ता आ जातीं, या फिर श्वेता साल्वे या मंदिरा बेदी क्या बुरी थीं? पर क्या कहें इन नेताओं को? इनमें कोई एस्थेटिक सेंस बचा है क्या? 

गुल पनाग को खड़ा कर डाला, बोले भूतपूर्व मिस इण्डिया है। तो फिर भूतपूर्व मिस वर्ल्ड ऐश्वर्या पर दांव लगाते. उसके तो सास - ससुर सब सांसद रह चुके हैं, बहू भी संसद में घूम आतीं। किसी का क्या चला जाता? यूं  भी सास से बनती नहीं है, बहस करना तो सीख ही गई होंगी।  सही रहता।  मनोज तिवारी, हेमंत बिरजे, कमाल खान कमाल, पिछली शताब्दी के हीरो विश्वजीत, किरण खेर, जावेद जाफरी,बप्पी लाहिड़ी, विनोद खन्ना आदि फुस्सी बमों की जगह एटम बमों, फुलझड़ियों, खिलते अनारों को मौका मिलता तो हमारा यह महान लोकतंत्र कहाँ जा पहुंचता? 

ये बात ठीक है कि  शाजिया इल्मी के पास मर्सीडीज़ गाड़ी है, पर टीवी  में तो एक से बढकर हीरोइन हैं।  किसी को भी दे    देते अंबिका आनंद या आभा सराफ़; श्वेता सिंह या सिक्ता देव; अफशा अंजुम या अवन्तिका सिंह; आरती पाठक या आफरीन क़िदवाई; अंजना कश्यप या शिरीन भान;बरखा दत्त या अलका सक्सेना; मिताली मुखर्जी या निधि राज़दान; निधि कुलपति या पाल्की उपाध्याय; रितुल  जोशी या ऋचा अनिरूद्ध; सुरभि भूटानी या अंकिता बेनर्जी; ऋतु वर्मा या आरफ़ा ख़ानम; ज्योतिका ग्रोवर या मोनीषा ओबेरॉय; सागरिका घोष या सोनिया वर्मा;सलमा सुल्तान या अविनाश कौर सरीन; सरला माहेश्वरी या वीना सहाय; कोई भी बेहतर ही होता। अगर किसी रेडियो  जॉकी  को भी मौका दे देते तो सोने  होता!

मेरी चिंता ग़लत  लोगों को टिकट को  है। लेकिन मैं  भी पक्का लोकतंत्रवादी हूँ। आशा छोड़नेवाला नहीं।  हूँ कि लोकसभा के  लोगों और लुगाइयों को ही मिलेंगे. आमीन !
Copyright © प्रकाश हिन्दुस्तानी

कहां मध्यप्रदेश, कहां हरियाणा?

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (05 जुलाई 2014)



हमारा मध्यप्रदेश उस बीपीएल परिवार की तरह है, जिसमें खाने के लाले पड़ते हैं, लेकिन शादी-ब्याह का जश्न बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। प्रदेश की हालत चाहे जो हो, सरकारी आयोजनों में करोड़ों रुपए खर्च करना सामान्य बात है। प्रतिव्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम होने के बावजूद मध्यप्रदेश में पेट्रोलियम पदार्थों पर सर्वाधिक टैक्स है। बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री जयंत मलैया इस पर कुछ नहीं कहते और बाद में जब पत्रकार पूछते हैं तब कहते हैं कि केन्द्र सरकार के बजट के बाद इस पर विचार होगा। शब्दों पर गौर करें 'इस पर विचार होगाÓ। उन्होंने यह नहीं कहा कि मध्यप्रदेश में पेट्रो पदार्थ सस्ते किए जाएंगे। विचार होगा और विचार तो किया ही जाता है, यह थोड़ी कहा कि बजट के बाद मध्यप्रदेश में भी गोवा जैसे टैक्स कम कर दिए जाएंगे। 

मध्यप्रदेश सरकार का सारा तामझाम प्रचार-प्रसार और आयोजनों में ही नजर आता है। आम आदमी तक सरकारी योजनाएं कितनी पहुंचती होंगी, इसका अंदाज भी हमारे नेताओं को शायद नहीं है। मध्यप्रदेश कल्याणकारी राज्य तो शायद नहीं बन पाया, लेकिन प्रचार बहुत हो रहा है। पिछले दिनों हरियाणा जाना हुआ, तो यह जानकर आश्चर्य हुआ कि अकेले हरियाणा में 250 से ज्यादा एमएनसी (मल्टी नेशनल कॉर्पोरेशन) हैं। हरियाणा में किसानों को 10 पैसे यूनिट में बिजली मिलती है। कोई किसान या मजदूर दुर्घटना में मर जाए तो उसके परिवार को 5 लाख रुपया मिलता है। शहरों की तरह गांवों में भी सफाई कर्मचारी नियुक्त हैं। मध्यप्रदेश से लगभग 3 गुना ज्यादा प्रतिव्यक्ति आय वहां पर है। पिछले 5 साल में 6 नई रेल लाइनें बिछना शुरू हुईं। एक रेलवे कोच फैक्टरी भी बन रही है। साइबर सिटी, मेडिसिटी, मॉल हरियाणा की पहचान बन गए हैं। पिछले पांच साल में नौगुना निवेश इस राज्य में बढ़ा। 2 साल में पंद्रह हजार करोड़ डॉलर का निवेश उद्योग धंधों में हुआ। देश में बनने वाले 50 प्रतिशत ट्रैक्टर, करीब 60 प्रतिशत कारें, 60 प्रतिशत दोपहिया वाहन, 50 प्रतिशत फ्रिज हरियाणा में बनते हैं। हरियाणा में महिलाओं का एक मेडिकल कॉलेज है। एज्युकेशन सिटी इस प्रदेश में है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हरियाणा में 96 प्रतिशत लोग पक्के घरों में रहते हैं, केवल 4 प्रतिशत लोग ही हैं, जिन्हें पक्के मकानों की छत उपलब्ध नहीं है। देश का सबसे ज्यादा बासमती चावल यही राज्य उत्पादित करता है और निर्यात करता है। प्रतिव्यक्ति दूध की उपलब्धता पौन लीटर है। दुधारू पशु की मौत हो जाए तो सरकार 50 हजार रुपए तक मुआवजा देती है। पिछले दिनों यहां एक दुधारू मुर्राह भैंस 25 लाख रुपए में बिकी थी। वहां सड़कों के किनारे गुजरो तो बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज और ऑडी कारें नजर आना सामान्य बात है। सड़क किनारे के ढाबों पर आप दाल-मखानी से लेकर पिज्जा-बर्गर तक खा सकते हैं। लोटो और एडीडास के जूते गुमटियों से खरीद सकते हैं। 

हरियाणा में वृद्धों को 1000 रुपए प्रतिमाह पेंशन मिलती है (मध्यप्रदेश में 300 रुपए देने का प्रावधान है)। अगर आप सेना में हैं और परमवीर चक्र जीतते हैं तो हरियाणा सरकार 2 करोड़ रुपए देती है। हरियाणा में भोजन का अधिकार सबसे पहले लागू किया गया है। हरियाणा में 20 लाख बच्चे 600 रुपए महीना पेंशन पाते हैं। खेलों में 'पदक लाओ, पद पाओÓ योजना लागू है। यानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपने कोई पदक जीता, तो सरकारी नौकरी पक्की। करीब 500 खिलाडिय़ों को इस योजना में नौकरी मिली हुई है। अजा-अजजा के लोगों को पानी मुफ्त में दिया जाता है और 200 लीटर की टंकी भी मुफ्त दी गई है। विधवा की बेटी की शादी पर सरकार 31000 रुपए की मदद करती है। किसानों के सारे कर्ज माफ हैं। किसानों की गिरफ्तारी नहीं हो सकती और न ही किसी किसान को हथकड़ी लग        सकती है। 

मध्यप्रदेश वाले अभी भी आदिवासी राज्य का ही रोना रोते हैं, जबकि बात नीयत की है। इतनी जमीन, इतने खनिज, इतने वन मध्यप्रदेश में हैं और हम उनका दोहन नहीं कर पा रहे हैं। विकास से ज्यादा विकास का दिखावा करना हमारा शगल है। कृषि प्रधान मध्यप्रदेश में हर जिले में कृषि विश्वविद्यालय क्यों नहीं खोले जाना चाहिए? जिले को छोड़ो, संभाग में ही खोल दो। यही हाल पशु चिकित्सा महाविद्यालय का है। हम अपने पशु धन का संवर्धन नहीं कर पा रहे हैं। मानव आबादी बढ़ती जा रही है और पशु धन घटता जा रहा है। कृषि में हमारी ग्रोथ इन्द्र देवता और नर्मदा मैया के भरोसे ज्यादा है। हमारे अपने बाहुबल और इच्छाशक्ति में कहीं कमजोरी है।
मध्यप्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश की बातें करने वाले जरा आस-पास के राज्यों में भी देख लें। गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान तो हमारे पड़ोसी हैं। वहां भी यही कानून है, जो हमारे प्रदेश में है। फिर ऐसा क्यों कि वहां विकास ज्यादा तेज हो रहा है? गोवा, हिमाचल, केरल, पंजाब जैसे राज्यों से भी मध्यप्रदेश बहुत कुछ सीख सकता है। बस, एक बार पुनरावलोकन जरूरी है। 
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वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (05 जुलाई 2014)

Saturday, September 13, 2014

सेलेब्रिटी लोगन का आइस बकेट का 'खेल' !

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (13 सितम्बर   2014)

आम अमेरिकी खुद को मस्त मौला और लोगों की मदद करनेवाला दिखाता है, लेकिन ऐसा है नहीं। भारतीयों ने उनके 'आइस बकेट चैलेन्ज' को 'राइस बकेट चैलेन्ज ' बनाकर इस फर्जी सेवा अभियान की हवा निकाल दी। ए. एल. एस. ( अम्योट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस ) नामक बीमारी के खिलाफ अभियान चलाने के नाम पर  'एएलएस  आइस बकेट' की धूम मच रही थी। पिछले साल तक 'कोल्ड वाटर बकेट' नाम  चल रहा था जिसका मकसद कैंसर रोगियों की मदद का था पर 30 जून 2014 से यह खेल मीडिया के प्रभाव में आकर आइस वाटर बकेट बन गया।  

खेल  का नियम यह था कि  कोई भी शख़्स खेल को खेलने ( अपने सर पर बर्फीले  पानी की बाल्टी उंडेलने) की चुनौती स्वीकार करेगा और उसका वीडियो रेकार्ड बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर कर किसी दूसरे को चुनौती देगा कि वह  ऐसा ही करे। चुनौती स्वीकारी तो 10 डॉलर और नहीं स्वीकारी तो 100 डॉलर के बराबर धनराशि अमेरिका के  एएलएस फाउंडेशन को दान देगा। बिल गेट्स, मार्क जकरबर्ग, माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला,  हॉलीवुड अभिनेता रॉबर्ट डाउनी जूनियर, टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच, लेडी गागा,  जस्टिन बीबर और फुटबॉलर रोनाल्डो जैसी हस्तियां जब यह कर चुकी तो हमारे यहाँ भी नक़ल होने लगी.  सनी लिओनी, सानिया मिर्ज़ा, महेश भूपति, रितेश देशमुख, युवराज सिंह, अक्षय कुमार, अभिषेक बच्चन, सिद्धार्थ मल्होत्रा, पुलकित सम्राट आदि  ने यह खेल खेला। जब दक्षिण भारत  के कुछ युवाओं को इसकी सचाई पता चली तब उन्होंने इसे 'राइस बकेट' नाम देकर चावल दान देना शुरू कर दिया।  'आइस बकेट' की हवा निकल गयी। 

'आइस बकेट चैलेन्ज' के नाम पर अब तक 100 मिलियन डॉलर (10 करोड़ डॉलर अथवा 600 करोड़ रुपए से अधिक) जमा हो चुके हैं. 

यह सारी धनराशि  एएलएस फाउंडेशन को मिली है।  लेकिन  सोच रहे  हैं कि इसका लाभ  एएलएस मरीजों को होनेवाला है, तो आप गलत हैं। अमेरिकी एनजीओ भी फैशन और दिखावे पर  खर्च ज्यादा करते हैं। इस पूरे धन का  चौथाई यानी 27 प्रतिशत ही बीमारी के लिए जाएगा, 73 प्रतिशत दूसरे मद में खर्च होंगे। 

31 जनवरी 2014 को समाप्त हुए वर्ष में एएलएस फाउंडेशन का  खर्च चौंकानेवाला है। इस संस्था ने  73 प्रतिशत धन गैर चिकित्सा  लगाया है। जितना धन इसने मरीजों के लिए खर्च किया लगभग उतना ही (21 प्रतिशत) प्रशासकीय और धन संग्रह के मद में उड़ा  दिया। कम्युनिटी सेवा के नाम पर 19 प्रतिशत और शिक्षा व जागृति के बहाने 32 प्रतिशत धन हवा कर दिया। इसके सीईओ को 2 करोड़ सालाना दिए जा रहे हैं और उसके  बाद के 10 अधिकारीयों को  75 लाख से 125 लाख रुपए मिल रहे हैं। इनके नीचे सैकड़ों कर्मचारी हैं, जिनमें से कई तो शायद ही कोई काम करते हों, लेकिन वेतन के नाम पर लाखों वसूल रहे हैं। पी आर, फाइनेंस, प्लानिंग, पब्लिसिटी, लीगल आदि विभाग हैं, जिनके दफ्तर का खर्च करोड़ों में है। 

भारत का हाल तो हमें पता ही है, लेकिन अमेरिका में भी हाल अच्छा  नहीं है। यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल ऐड और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने ऐसे भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एंटी फ्रॉड ऑनलाइन सेवा शुरू की है. इसकी ज़रुरत पड़ी होगी? भारत में ऐसे करीब 15 एनजीओ हैं जिन्हें 60 करोड़ से 230 करोड़ की मदद हर साल विदेश से मिलती है। इनमें ज्यादातर केरल, तमिलनाडु, सीमांध्र, पश्चिम  बंगाल और दिल्ली के हैं। ऐसा लगता है की सेवा के नाम पर मेवा खानेवाले पूरी दुनिया में बराबरी से फैले  हैं। 
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वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (13 सितम्बर   2014)

Tuesday, August 12, 2014

लूट के नए अड्डे

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (12 जुलाई 2014)





अब गुंडागर्दी के नए अड्डे बन गए हैं और उस गुंडागर्दी को 'कानूनीÓ रूप दे दिया गया है। पहले सिनेमाघरों की टिकट खिड़की के आसपास गुंडे होते थे, जो सिनेमा टिकट ब्लैक करते थे। मल्टीप्लेक्स के दौर में अब टिकट खिड़की के पास टिकट ब्लैक में नहीं बिकता, व्हाइट में ही लूट है। यह लूट ऑफिशियल हो गई है। पहले शुक्रवार को नई फिल्म लगते ही भीड़ लग जाती थी, कुछ ही लोग सारे टिकट खरीद लेते और फिर दस-बीस-पचास रुपए ज्यादा में टिकट बेच देते थे। पुलिस उनको पकड़ भी लेती थी, क्योंकि वह गैरकानूनी था। अब ज्यादा भीड़ वाले दिनों में सिनेमा- मल्टीप्लेक्स वालों की टिकट ब्लैक कानूनी हो गई है। शुक्र, शनि और रविवार को वे खुद ही दाम बढ़ा देते हैं। 

पहले भी टिकट ब्लैक में हर रोज थोड़े ही होते थे! छुट्टी के दिन या दीवाली-ईद पर ही ब्लैक ज्यादा होता था। जो काम गरीब-बेरोजगार करता था, तो गलत था, मल्टीप्लेक्स वाला सेठ करे तो सही कैसे हो गया? इंटरवल में पांच रुपए का पॉप कॉर्न पचास का, दस रुपए का समोसा पचास में बेचना लूट और गुंडागर्दी नहीं तो क्या है? बेचारा गरीब चायवाला तो एक ही भाव में सुबह-शाम चाय बेचता है। कभी यह नहीं कहता कि सुबह का वक्त है तो चाय डेढ़ गुनी महंगी मिलेगी, पीना हो तो पीयो। क्या सुबह की फिल्म और रात की फिल्म, संडे और मंडे की फिल्म अलग होती है? क्या संडे को मल्टीप्लेक्स कर्मचारी दोगुना वेतन पाता है? क्या संडे को उसे बिजली का बिल ज्यादा भरना पड़ता है?

आजकल रेलवे स्टेशनों और एयर पोर्ट पर भी वीआईपी पार्किंग के नाम पर अवैध वसूली होती है। पार्किंग में क्या आईपी और क्या वीआईपी? चार कदम पास गाड़ी लगा दी तो वीआईपी पार्किंग! क्या वीआईपी पार्किंग में मारुति खड़ी कर दो तो वह मर्सिडीज बन जाएगी? क्या नौटंकी है लूट के लिए? वीआईपी पार्किंग में गाड़ी लगी है तो धो दो उसे, चमका दो, पॉलिश कर दो! कुछ तो करो कि लगे वीआईपी पार्किंग में गाड़ी पार्क की है बंंदे ने! छंटाक भर तो क्या रत्ती भर वेल्यू एड नहीं की तो ज्यादा पैसे किस बात के? 'वीआईपी पार्किंगÓ का बोर्ड लगाने के?

आजकल विमान यात्रा के दौरान सौजन्य में पानी के अलावा कुछ नहीं मिलता। हर चीज खरीदो। रेल जैसा हिसाब हो गया है! फर्क ये है कि हर स्टेशन पर या अंदर लड़का 'चाय गरमÓ चिल्लाता है, और हवाई सुंदरी कहलाने वाली होस्टेस प्लास्टिक की मुस्कान के साथ कागज के कप में कट चाय के पचास रुपए झटक जाती है! 
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Saturday, March 08, 2014

औरतें अच्छी हैं, औरतें अच्छी हैं, औरतें अच्छी हैं !!!

(वीकेंड पोस्ट के  08 मार्च 2014   के अंक में  मेरा कॉलम)



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कुछ औरतें बहुत एक्टिव हैं उनके लिए  नारीवादी के  मायने हैं  -बात-बिना बात मर्दों को गालियां देना, मर्दों को कोसना, मर्दों को जलील करना और अगर कोई मर्द तीखी  प्रतिक्रिया  लिख दे तो महिला थाने जाकर रिपोर्ट लिखाने  की धमकी देना।  उन्हें लगता  है कि यही फेमिनिज्म  है और इससे उन्हें कोई ख़ास ओहदा मिलनेवाला है। ....................................................
सोशल मीडिया में कुछ औरतें बहुत एक्टिव हैं और उनमें  कुछ ऐसी  हैं जो खुद को  नारीवादी कहती हैं। उनके लिए  नारीवादी के  मायने हैं  -बात-बिना बात मर्दों को गालियां देना, मर्दों को कोसना, मर्दों को जलील करना और अगर कोई मर्द तीखी  प्रतिक्रिया  लिख दे तो महिला थाने जाकर रिपोर्ट लिखाने  की धमकी देना।  उन्हें लगता  है कि यही फेमिनिज्म  है और इससे उन्हें कोई ख़ास ओहदा मिलनेवाला है।  इनमें से कुछ औरतें  हैं और घर की भड़ास के अलावा नौकरी कि भड़ास भी उनके लेखन में आ जाती है।  फेमिनिस्ट होना आसान है,  कुछ करना नहीं पड़ता; सिवाय गाली देने के। वे लिखती हैं सारे मर्द ख़राब होते हैं, (उनके भाई-बाप को छोड़कर). उनके पति खराब हैं, प्रेमी बदजात हैं, नौकरी के पुरुष  सहयोगी लोलुपता से भरे  हैं, सड़क पर चलनेवाला हर मर्द घिनौना है, पुरुष लेखक लम्पट हैं, वगैरह वगैरह।  ये लिखती हैं औरतें ही हैं कि देश और दुनिया चल रही है  वरना कहर आ जाता। इनकी दुनिया 'मैं' से  होती है और 'मैं' पर ही ख़त्म हो जाती  है।  

क्या औरत और मर्द दोनों बराबर नहीं हैं? न औरतें कमतर हैं न मर्द।  दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं,  यह लिखने में वाहवाही नहीं मिलती। वाहवाही मिलती है नारीवादी होने से. 'बेटी है तो कल है' लिखने और बोलने में। ... और अगर गलती से बेटा है तो ? ये नारीवादी लिखती हैं कि औरतें केवल औरतों के ही संसर्ग में रहें, उन्हें गम गलत करने को कंधा ही तो चाहिए। बस, कन्धा ही?

ये औरतें क्यों भूल जाती हैं कि जाती हैं कि अगर महिलाएं घर संभालती हैं तो पुरुष भी तो खदानों-खेतों-खलिहानों में जुते  रहते हैं। समुद्री जहाज़ों में, कारगिल जैसी पहाड़ियों  में,  लोहा तपती भट्टियों में, खतरनाक रसायन उद्योगों में, एयर ट्रैफिक कंट्रोल  विभाग में, गहरे समंदर में मछलियां पकड़ने  में,  रेल  पटरियां  बिछाने जैसे दुरूह कार्य और भूमिगत सीवेज लाइनों की सफाई जैसे कार्यों में लगे हैं. ख़ास बात  यह है कि वे अकसर इसका जिक्र नहीं कर करते। 

ये कथित फेमिनिस्ट अपना ही रोना क्यों रोती रहती हैं? वे अपने प्रेमी या पति में अपनी माँ को क्यों तलाशने लगती हैं? उन्हें अपने कथित ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ कहने, सहयोगी पुरुष सहकर्मियों को मतलबी करार देने, बदतमीज़ी को आधुनिकता सिद्ध करने की हुक क्यों लगी रहती है?  कई घरों में बेटे और बेटी में भेदभाव  होगा। मैं ऐसे कई मित्रों को जानता  हूँ, बेटी को तवज्जो मिलती रही है, किसी  भाई ने कभी आपत्ति नहीं की।...कोई मुझसे बहस करता है तो मैं उसे देता हूँ और कहने लगता हूँ कि वाकई औरतें अच्छी हैं, औरतें अच्छी हैं, औरतें अच्छी हैं !!!

--प्रकाश हिन्दुस्तानी 
(वीकेंड पोस्ट के 08  मार्च 2014   के अंक में  मेरा कॉलम)

Saturday, February 22, 2014

(वीकेंड पोस्ट के 22 फ़रवरी 2014  के अंक में  मेरा कॉलम)


दिल्ली की मेट्रो और (आने वाली) हमारी !!

दिल्ली मेट्रोवाले में क्या ले जा सकते हैं दूध की टंकियांखिड़की से लटकाकर? क्या वहां महिलाओं के डिब्बे में पुरुष जा सकते हैं? क्या थूक सकते हैं मेट्रो के प्लेटफार्म पर? मेट्रो स्टेशनों पर क्या पोहे खा सकते हैं? क्या वहां झूठा दोना फेंक सकते हैं? पान की पीक थूक सकते हैं क्या? फिर काहे का कल्चर? सू-सू के तो पैसे मांगते हैं और बात करते हैं कल्चर की। अरे भाई, प्रकृति के खिलाफ क्या जाना, जहां चाहे वहां यह प्राकृतिक कार्य करने दो, जैसा हमारे इंदौर में होता है।




अभी दिल्ली की मेट्रो में हूं और बहुत बुरा लग रहा है। इन दिल्लीवालों को बिलकुल शऊर नहीं है। ऐसे चलाते हैं मेट्रो? मेट्रो चलाना हो तो आओ इंदौर। हम दिल्लीवालों को सिखाएंगे कि मेट्रो कैसे चलाई जाए। अब आप पूछेंगे कि जब इंदौर में मेट्रो है ही नहीं, तब ये मेट्रोवालों को सिखाएंगे क्या? यह वैसा ही है कि क्या बरात में केवल शादीशुदा लोग ही जाते हैं?  बरातों में जा जाकर ही बहुत से लोग कई बातें सीख जाते हैं। लाखों घरों में औरतें और मर्द आमलेट बनाते हैं तो इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि पहले अंडे दो, फिर आमलेट बनाओ? मुर्गी अंडे दे सकती है तो क्या वही आमलेट भी बना सकती है?

मेट्रोमैन श्री ई. श्रीधरन को 1995 में  दिल्ली मेट्रो कंपनी बनाकर काम सौंपा गया था। 2002 में उन्होंने मेट्रो शुरू कर दी। केवल सात साल में। 58 स्टेशन और 65 किलोमीटर की लाइन दाल दी। आज सात रूट पर 192 किलोमीटर का सफर मेट्रो से तय किया जा सकता है। जब इसके सभी चरण पूरे हो जाएंगे तब यह दुनिया की सबसे लंबी 413 किलोमीटर की हो जाएगी, लंदन की मेट्रो से भी बड़ी। पर बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर? माहौल ही नहीं बन पाया था मेट्रो का कि मेट्रो शुरू। ये भी कोई बात हुई? हमारे इंदौर में देखो 13 किलोमीटर का बीआरटीएस बनाने में क्या माहौल बनाया था! मेट्रो कर पाई थी क्या बीआरटी का मुकाबला? रोज-रोज खबरें आतीं, आज पुलिया बनाने का फैसला होगा, फिर पुलिया  के नक्शे पास होने की खबर, फिर पुलिया का शिलान्यास, फिर (पुलिया का) उद्घाटन! ऐसे ही साइकिल ट्रैक, फुटपाथ, सिग्नल्स, लेफ्ट टर्न, राइट टर्न आदि के बारे में खबरें छपीं। अतिक्रमण हटाने और 'धार्मिक स्थलोंÓ के शॉट होने की भी सौ-सवा सौ खबरें प्रकाशित हुईं। ये माहौल बना कि बीआरटी आ रही है। पता नहीं कितने सौ एक्सपर्ट पधारे और नॉर्वे-स्वीडन आदि देशों के पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन चुराकर हमें दिखाकर बता गए कि बस लेन ऐसी बनेगी। और दिल्ली में? पूरा का पूरा कनाट प्लेस खोद डाला और तीन-तीन मंजिल का स्टेशन बना मारा, न धूल उडऩे दी, न कोई बड़ा माहौल बनाया। आज दिल्ली के साथ इतने ज्यादा 'फस्र्टÓ जुड़े हैं कि अगर लिखने बैठो तो पूरा पन्ना  भर जाए। 

दिल्ली मेट्रोवाले विजन, मिशन और कल्चर की बातें करते हैं। जरा देखें तो हमारे इंदौर में आकर। दिल्ली मेट्रो में ले जा सकते हैं बकरी और कुत्ते? हमारी लोकल मीटरगेज देख लो। इसे बोलते हैं कल्चर - सभी प्राणी भाई-भाई हैं। आदमी ट्रेन में जाए और बेचारा कुत्ता, बकरी, मुर्गा अलग रास्ते से? ये क्या कल्चर हुआ भाई? क्या ले जा सकते हैं मेट्रो में दूध की टंकियां ट्रेन की खिड़की से लटकाकर? क्या वहां महिलाओं के डिब्बे में पुरुष जा सकते हैं? क्या थूक सकते हैं मेट्रो के प्लेटफार्म पर? मेट्रो स्टेशनों पर क्या पोहे खा सकते हैं? क्या वहां झूठा दोना फेंक सकते हैं? पान की पीक थूक सकते हैं क्या? फिर काहे का कल्चर? सू-सू के तो पैसे मांगते हैं और बात करते हैं कल्चर की। अरे भाई, प्रकृति के खिलाफ क्या जाना, जहां चाहे वहां यह प्राकृतिक कार्य करने दो, जैसा हमारे इंदौर में होता है।

इंदौर इज दी बेस्ट! आने तो दो यहां पर मेट्रो या मोनो ट्रेन। यहां आएगी और पूरा माहौल बनाकर आएगी। फिर जयपुर, बंगलुरु, हैदराबाद,  अहमदाबाद, पुणे, कानपुर, पटना, लखनऊ, सूरत, नागपुर, कोच्चि, कोजीखोड़े, कोयंबटूर, नागपुर आदि हमारी नकल करेंगे।  याद रखो, इंडिया पूरे वल्र्ड का ज्ञान गुरु है और इंदौर पूरे इंडिया का। 

-प्रकाश हिन्दुस्तानी

(वीकेंड पोस्ट के 22 फ़रवरी 2014  के अंक में  मेरा कॉलम)

Saturday, July 02, 2011

टेक्नॉलॉजी की मदद से छू ली मंजिल

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम




टेक्नॉलॉजी की मदद से छू ली मंजिल


रजनी गोपाल पेशे से चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट हैं. वे इन्फोसिस में सीनियर पद पर कार्य करती है. उन्हें वीणा वादन का भी शौक है और सोशल वर्क में भी उनकी दिलचस्पी है. शतरंज उनका प्रिय खेल है और कुकिंग भी पसंद है. फिट रहने के लिए वे नियमित योग करती है. वे हमेशा ही अच्छे नंबरों से पास होती रही है. आप पूछेंगे कि इसमें खास बात क्या है? जी हाँ, खास बात यह है कि रजनी गोपाल पूरी तरह से दृष्टि बाधित हैं और वे जो कुछ भी देखती हैं वह आँखों से नहीं, बल्कि मन की आँखों से. वे भारत की पहली महिला सी ए हैं जो दृष्टि बाधित हैं. टेक्नॉलॉजी उनकी थोड़ी सी मदद ज़रूर करती है लेकिन वे हौसलों से ही सब कुछ करती-देखती है. सी ए बनना वैसे भी आसान नहीं होता लेकिन दृष्टि बाधिता के बावजूद सी ए बनना और फिर इन्फोसिस जैसी कंपनी में महत्वपूर्ण पद संभालना कोई आसान बात नहीं. आज रजनी गोपाल हजारों लोगों के लिए आदर्श बन चुकी हैं. रजनी की सफलता के कुछ सूत्र :

विलक्षण हौसले की दास्तान


रजनी गोपाल जब नौ साल की थीं, तब स्कूल में उन्हें तेज़ बुखार आया. स्कूल के शिक्षकों ने उन्हें तुरंत घर पहुंचाया. परिवार के लोगों ने उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया. इलाज में कुछ लापरवाही रही और जब विशेषज्ञ डॉक्टर्स पहुंचे तो उन्होंने बताया कि नन्हीं रजनी को स्टीवन जोंसन सिंड्रोम नाम की बीमारी हो गयी है जो शरीर के किसी ना किसी अंग को बर्बाद करके ही जाती है. रजनी के शरीर की आँखों को इस भयावह बीमारी ने अपना निशाना बनाया और रजनी के जीवन में घोर अँधेरा करके ही यह बीमारी वापस लौटी. उनकी एक आंख की रोशनी पूरी तरह से जाती रही और दूसरी आँख से भी बहुत कम दृष्टि बची थी. कोई और होता तो जीवन भर इस बीमारी को कोसता रहता और लाचारी का जीवन जीने को अभिशप्त रहता. लेकिन रजनी को यह मंज़ूर नहीं था. उन्होंने कहा कि वे खुद अपनी कामयाबी की कहानी लिखेंगी और उन्होंने जो कुछ भी सोचा था वह कर डाला.

टेक्नॉलॉजी ने की मदद

जब रजनी अपनी पढाई करने बैठतीं, तब कई बार लोगों ने उनकी मदद की, लेकिन अनेक मर्तबा उनकी सहपाठी छात्राओं ने ही उन पर फब्तियां भी कसीं. उनसे ज़रा भी हतोत्साहित हुए बिना रजनी ने पढाई जारी रखी. बी. कॉम. के बाद उन्होंने सी ए बनने की ठानी. उन्हें पता चला कि चिकित्सा जगत की लापरवाही से उनकी दृष्टि का नुकसान हुआ है विज्ञान की मदद से उन्हें कुछ राहत मिल सकती है. उन्हें एक एनजीओ के कार्यकर्ताओं ने स्क्रीन रीडिंग साफ्टवेयर जे ए डब्ल्यू एस के बारे में बताया और फिर यही साफ्टवेयर उनकी पढाई का सबसे मददगार हिस्सा बन गया. उन्होंने अपना सारा स्टडी मटेरियल इकठ्ठा किया और उसे स्क्रीन रीडिंग साफ्टवेयर की मदद से पढ़ा और समझा. सारी पढाई उन्होंने इसी की मदद से की और अंतत: सी ए का अंतिम इम्तहान भी पास किया.

संगठन ने की मदद

इंस्टीट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इण्डिया (आईसीएआई )ने रजनी के लिए रोजगार उपलब्ध करने में बड़ी मदद की. सी ए की डिग्री लेने के बाद रजनी ने अपना बायो डाटा आईसीएआई के प्लेसमेंट सेल को भेज दिया और संगठन ने उसे गंभीरता से लेते हुए उन्हें पहला रोजगार इंडियन ग्रुप ऑफ़ होटल्स में मुहैया कराया. वे वहां पर कम्युनिटी को ऑर्डिनेटर बन गयीं. लेकिन इस काम में उनकी सी ए की डिग्री का ज्यादा योगदान नहीं था. कुछ ही दिनों में उन्हें नए जॉब का मौका मिला और उन्होंने उसे झपट लिया.

ज्ञान का विस्तार करते रहें

रजनी को अपने ज्ञान के विस्तार के कारण ही आज इन्फोसिस में महत्वपूर्ण जगह मिली है. वे वहां पर कंपनी के भारत और यू एस ए के जनरल अकाउंट्स की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है. वे यह काम अपने सहयोगियों के साथ मिलकर पूरा करती हैं. उन्हें अपने काम में कभी किसी कमी की शिकायत नहीं मिली है. सहयोगियों के बीच भी उनकी अच्छी साख है और वे अपने काम को एन्जॉय करती हैं. उन्हें कभी भी ये एहसास नहीं होता कि उन्हें कोई शारीरिक ब्याधि है. देश में एक और सी ए दिलीप लोयलका भी दृष्टि बाधित हैं, पर वे पुरुष है.

माहौल के अनुसार ढलें

रजनी गोपाल ने अपने जीवन में जो बात सीखी वह यह है कि हमें अपने आप में माहौल के मुताबिक ढलने की आदत भी डाल लेनी होनी चाहिए. हमें हर जगह एक जैसे सहयोगी और सकारात्मक माहौल मिले यह ज़रूरी नहीं. आप खुद कोशिश करके माहौल को थोड़ा तो बदल सकते हैं और थोड़ा खुद को बदलकर माहौल के अनुसार ढल सकते हैं. शुरू में जब वे बंगलुरु में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करती थीं, तब उन्हें थोड़ा असहज लगता था लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने आप को हालात के मुताबिक ढाल लिया.

समस्याओं का निदान खुद करें

रजनी के लिए शुरू में यह बात स्वीकार करनेलायक ही नहीं थी कि वे दृष्टि बाधित हैं. उन्हें इस दशा में बहुत असहज और बाध्यता लगती,लेकिन जल्दी ही वे इस से बाहर आ गयीं. उनके भाई ने जब उन्हें कहा कि खुद को दिमागी रूप से मज़बूत बनने के लिए योग का सहारा लेना उचित होगा तो उन्हें यह बात इन्सल्ट लगी. जल्दी ही उन्होंने अपने आप को संभाला और मानसिक रूप से मज़बूत बनाया. वे कहती हैं कि शुरू में तो मुझे यह लगाने लगा था कि मैं दृष्टि बाधित नहीं, बल्कि मानसिक रोगी हो गयी हूँ. आज मैं अपने परिजनों के सहयोग से मंजिल पाने में कामयाब हूँ.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान july 03,2011

Sunday, June 26, 2011

संघर्ष ही बनाता है सिकंदर

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आईएएस चुने गए सुखसोहित सिंह हजारों थैलेसीमिया पीड़ितों के संघर्ष और सफलता के प्रतीक बन गए है. पंचकुला के इस नौजवान ने अपनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट और प्रधानमंत्री कार्यालय तक लड़ी.

संघर्ष ही बनाता है सिकंदर

सुखसोहित सिंह आईएएस के लिए चुने गए, इसमें कोई नयी बात नहीं है. उनकी पोज़ीशन दूसरी सूची में 42 वीं ( पहली सूची जोड़ने पर 833 वीं) थी. वे हमेशा अव्वल आते रहे, इसमें भी कोई खास बात नहीं, लेकिन उन्होंने वह काम कर दिखाया है जो आजाद भारत में किसी ने नहीं किया. सुखसोहित सिंह ने अपने अधिकार के लिए हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और स्वास्थ्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक अपने हक़ की लड़ाई लड़ी और जीते. दरअसल वे थेलेसिमिया नामक आनुवंशिक रोग से पीड़ित हैं और उन्हें इस आधार पर नियुक्ति नहीं दी जा रही थी कि वे भी सरकार के लिए बोझ साबित हो सकते हैं. सुखसोहित सिंह ने साबित किया कि जिस बीमारी के आधार पर पर उन्हें उनकी योग्यता के मुताबिक रोजगार के अधिकार से वंचित किया जा रहा है, वह बीमारी मैनेज करने योग्य है और इसका उनकी कार्यक्षमता कम नहीं होगी और वे किसी पर भी बोझ तो हर्गिज़ नहीं ही होंगे. जल्द ही सुखसोहित सिंह की नियुक्ति उचित पद पर होगी और वे अपनी योग्यता के मुताबिक काम कर सकेंगे. 2008 में हुई यूपीएससी की चयन परीक्षा की मेरिट में जगह पाने वाले सुखसोहित सिंह की सफलता के कुछ मन्त्र :

थेलेसिमिया बाधक नहीं

सुखसोहित को बचपन में ही इस बीमारी का पता चल गया था लेकिन उन्होंने किसी को भी अपने लक्ष्य में बाधा नहीं बनने दिया. यहाँ तक कि थेलेसिमिया को भी. उन्हें पता था कि इस बीमारी में कई बच्चे जवानी की दहलीज तक ही नहीं पहुँच पाते. बेशक इसमें उनके परिवार का रोल महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन सारा संघर्ष तो सुखसोहित सिंह का ही है. सुखसोहित का मानना है कि बीमारी अदृश्य है लेकिन वह मेरे हौसले को तोड़ नहीं सकी. बीमार कोई भी, कभी भी हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आप पराजय को स्वीकार कर लें.

मंजिल का पीछा मत छोड़ो
जब तक मंजिल मिल ना जाए, उसका पीछा करते रहे. सुखसोहित को यूपीएससी चयनl परीक्षा में पहले दो बार सफलता नहीं मिल सकी, लेकिन उन्होंने निराश होकर भाग्य को कोसने की अपेक्षा मेहनत करने की राह चुनी. उन्होंने कामयाबी पाई लेकिन तीसरी बार. और जब रिज़ल्ट आया तब उनका नाम मेरिट लिस्ट में था. 'फेसबुक' पर अपने परिचय में सुखसोहित ने लिखा है कि अतीत के कैदखाने में वक़्त गंवाने से बेहतर है कि अपने महान भविष्य का शिल्पकार बनना. आप अतीत को नहीं बदल सकते, लेकिन शानदार भविष्य की संरचना कर सकते है.

मेहनत निवेश की तरह है

सुखसोहित पंचकुला के हैं और वहां के एक बुजुर्ग उनसे कहते रहते थे कि जो जवानी सोने में खोएगा, वह बुढ़ापे में रोयेगा. इसका अर्थ यही हुआ कि जवानी को सोने, घूमने -फिरने और बेकार के कामों में जाया ना करो, यही समय है जब आप अपने स्वर्णिम भविष्य बना सकते हैं. फेसबुक पर सुखसोहित ने लिखा है कि खुशी और कड़ी मेहनत एक तरह से भविष्य के लिए किया गया निवेश है. यह मेहनत कभी भी बेकार नहीं जाती. बस, आप आयेज बढ़ने के लिए एक पायदान पर चढ़ते हैं और फिर चढ़ते ही चले जाते हैं. सुखसोहित ने लगातार कई कई बरसों तक सोलह से अठारह घंटों तक पढ़ाई की है, और यह उनकी सफलता का आधार है.

जहाँ तक दिखाई दे, जाओ

एक पंजाबी कहावत है कि जहाँ तक दिखाई दे, वहाँ तक जाओ, वहाँ पहुँचने पर और आगे का रास्ता दिखाई देगा. आईएएस में चयन होने के बाद जब वे दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में अपने मेडिकल परीक्षण के लिए गये तब उन्हें नियमों के अनुसार अनफिट करार दिया गया, जबकि डॉक्टरों ने उनसे कहा था कि थेलेसेमिया कोई ऐसी बीमारी नहीं है जो उन्हें उनके काम में बाधा बनेगी. आई ए एस में ही चयनित एक दूसरे युवक एम. श्रीनिवासु को भी मेडिकल बोर्ड ने अनफिट कर दिया था क्योंकि श्रीनिवासू को डायबीटीज़ का रोग था. सुखसोहित से प्रेरणा लेकर उन्होंने भी अपील की कि उन्हें अनफिट करार देकर काम से वंचित न किया जाए. सबक यह है की अगर मंज़िल नज़र न आ रही हो तो भी रास्ता छोड़कर भागना उचित नहीं.

परीक्षा से मत हिचको

बीते 10 जून को सुखसोहित का पहला मेडिकल परीक्षण हुआ और फिर 17 जून को दूसरा. वे ससम्मान इस परीक्षण के लिए पहुँचे. उन्होंने अपनी बीमारी के बारे में कोई भी बात छुपाने की कोशिश नहीं की. उन्होंने यही कहा कि यह भी एक तरह की परीक्षा है और वे इसमें पास होकर रहेंगे. उन्होंने अपनी बात अधिकारियों को समझने की कोशिश की कि उनकी इस बीमारी से उनके एक आईएएस अधिकारी के रूप में काम करने पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा क्योंकि वे सिविल सेवा के लिए मानसिक और बौद्धिक रूप से पूरी तरह सक्षम हैं. जहाँ तक शारीरिक क्षमता का सवाल है उन्होंने एक एक्सपर्ट चिकित्सक का प्रमाण पत्र पेश किया कि उन्हें इसके लिए अपने शरीर में मौजूद खून में लौह कणों के असंतुलन के कारण नियमित रूप से ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न करना होगा.

बहुकोणीय प्रयास

कामयाबी के लिए बहुकोणीय प्रयास करने चाहिए क्योंकि इसमें कामयाबी की गुंजाइश ज़्यादा होती है और सफलता के पास पहुंचने की गति तेज़ हो जाते है. यूपीएससी क्रेक करनेवाले वे पहले युवा हैं जो थेलेसिमिया रोगी हैं. क़रीब 24 साल पहले उनके परिवार को इस बीमारी का पता चला और उन्होंने सुखसोहित का खास ध्यान रखा. अपने हक के इए उन्होंने न्यायालय का दरवाज़ा भी खटखटाया और मंत्री स्तर पर भी बातचीत की. केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी ने उनका मामला प्रधानमंत्री के पास पहुँचाया और 23 जून को प्रधानमंत्री ने उनकी राह आसान बना दी. सुख़सोहित सिंह आज थेलेसिमिया के हज़ारों रोगियों के लिए बन गये हैं, ऐसे मार्गदर्शक जिन्होंने न केवल अपनी राह खुद बनाई, बल्कि दूसरों को भी रास्ता दिखाया है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान june 26,2011

Saturday, June 11, 2011

जूझने के जज्बे ने दिलाई कामयाबी


रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम


ओप्रा विनफ्रे जानी मानी अभिनेत्री, फ़िल्म निर्माता और दानदाता हैं. ओप्रा विनफ्रे दुनिया की सबसे प्रभावशाली अश्वेत महिलाओं में गिनी जाती हैं. वे पहली अश्वेत महिला अरबपति हैं.

जूझने के जज्बे ने दिलाई कामयाबी

विश्वविख्यात ओप्रा विनफ्रे शो का फेयरवेल सीजन ख़त्म हो गया लेकिन कुछ देशों में रिपीट टेलीकास्ट चल रहा है. पच्चीस साल की शानदार पारी में 4561 एपिसोड का यह कार्यक्रम अमेरिकी टीवी के इतिहास का सबसे ऊँची रेटिंगवाला शो रहा है. 120 से ज्यादा देशों में दिखाए गए इस शो में दुनिया के सबसे नामी गिरामी लोगों ने शिरकत की. हर तरह के मसालों से भरपूर इस शो में सकारात्मक नजरिया, सेल्फ इम्प्रूवमेंट, दान, सहयोग, अध्यात्म आदि रहा है. वे जानी मानी अभिनेत्री, फ़िल्म निर्माता और दानदाता हैं. ओप्रा विनफ्रे दुनिया की सबसे प्रभावशाली अश्वेत महिलाओं में गिनी जाती हैं. वे पहली अश्वेत महिला अरबपति हैं. मोंतेसिटो, केलिफोर्निया में 42 एकड़ के एस्टेट में बने भव्य विला में रहती हैं. दुनिया के अनेक देशों में उनके भव्य महलनुमा मकान हैं. वे बेहद गरीबी में पलीं और बड़ी हुईं. अपनी प्रतिभा से उन्होंने अपनी जगह बनाई. ओप्रा विनफ्रे अगर भारत में होतीं तो निश्चित ही उन्हें कोई अवतार, देवी या महाशक्ति के रूप में याद किया जाता. टीवी होस्ट से ग्लोबल कल्चरल आयकोन बननेवाली ओप्रा विनफ्रे की सफलता के कुछ सूत्र :

हालात से मत डरो
ओप्रा विनफ्रे की माँ घरेलू नौकरानी थीं और जब वे केवल 13 साल की थीं, तब उनके साथ बलात्कार किया गया था इसलिए उनके जन्म के बाद परिवार और पिता का साया उन्हें नसीब नहीं हुआ. माँ ने उनकी नानी के पास उन्हें छोड़ दिया जो खुद बेहद मुफलिसी में थीं. कुछ साल फतेहाले में गुजरे और उन्हें गोद दे दिया गया ऐसे परिवार में जो बेहद क्रूर था. उनके साथ मारपीट और अभद्रता तो आम बात थी. जब वे तेरह साल की थीं, तब उनके साथ बलात्कार किया गया, चौदह की उम्र में वे बिनब्याही माँ बनीं, लेकिन बच्चा एक सप्ताह भी जीवित नहीं रह सका. वे नशे की शिकार हो गयीं और फिर इसका इलाज कराने उन्हें नशा मुक्ति केंद्र भेजा गया. ओप्रा विनफ्रे ने विकटतम दिनों का मुकाबला डटकर किया.

बुद्धि हमेशा उपयोग में लाओ
ओप्रा विनफ्रे का फार्मूला यह रहा कि विपरीत से विपरीत हालात में भी बुद्धि पर भरोसा करना मत छोड़ो. दुर्दिनों में दो साल उन्होंने अपनी पढ़ाई भी छोड़ी लेकिन फिर पढाई शुरू की. ब्रोडकास्ट कम्युनिकेशन की पढ़ाई करने के बाद उन्हें लोकल टीवी में पार्ट टाइम रिपोर्टर का काम मिला. इस बीच वे एक स्थानीय ब्यूटी कान्टेस्ट भी जीत चुकी थीं. तीन साल बाद उन्होंने अपना जॉब बदल दिया और एक बड़े प्लेटफार्म को आधार बनाया. उन्होंने अपने हर शो में अपनी बुद्धि का लोहा मनवाया. प्रस्तुति को हमेशा जीवंत बनाये रखा.

कोई पद छोटा नहीं होता
कोई भी काम छोटा नहीं होता. यह बात ओप्रा विनफ्रे ने साबित कर दी. उनका स्टाइल बड़े पद पर बैठे लोगों को रास नहीं आया. नयी कंपनी में साल भर भी नहीं हुआ था कि उन्हें नौकरी से हटाने के बजाय पदावनत करके टीवी ब्रोडकास्टर से टीवी शो प्रजेंटर बना दिया गया और वह भी दोपहर में महिलाओं के शो का. ओप्रा विनफ्रे ने महसूस किया कि यही काम उनके लिए सही काम है जब वे महिला दर्शकों को अपनी हाजिरजवाबी, अपनेपन, साफगोई और दिलचस्प शैली से प्रभावित कर सकती हैं. वे कहती हैं कि विफलता ईश्वर का वह वरदान है जो आपको इशारा करता है कि आप शायद गलत राह पर हैं.

रंग और शक्ल पर मत जाओ
ओप्रा विनफ्रे ने महिलाओं के उस कार्यक्रम को सात साल तक प्रस्तुत किया. इस बीच प्रबंधन में बैठे लोगों को उनकी अनेक बातों से शिकायतें हुईं. कहा गया कि आपके बाल ठीक से जमे नहीं होते, उनकी नाक ज्यादा ही लम्बी है और दो आँखों के बीच दूरी ज्यादा है. उनका वजन ज्यादा है आदि आदि. प्रबंधन ने उन्हें न्यूयोर्क भेजा ताकि उन्हें ठीक से बाल जमाना, सही ढंग से मेकअप करना आदि सिखाया जा सके. यह भी सलाह दी गयी कि वे सिर को मुंडा लें और विग पहनना शुरू कर दें.इस सब का नतीजा यह हुआ कि उन्होंने अपने आप पर ध्यान देना शुरू किया और खुद को ज्यादा प्रभावी टीवी शो के प्रस्तुतकर्ता के रूप में आगे लाने की सकारात्मक कोशिश की.

बेख़ौफ़ होकर सच बोलो
ओप्रा विनफ्रे शो की लोकप्रियता का एक कारण उनकी बेबाकी भी रही है. वे अपने प्रोग्राम के वीआइपी मेहमानों की लल्लो - चप्पो नहीं करतीं. कुछ माह पहले उनके शो में अतिथि के रूप में मशहूर फैशन डिजाइनर टोमी हिलफिगर आये थे. उनका परिचय देने के बाद ओप्रा ने उनसे पूछा -- क्या ये बात सच है कि आपने हाल ही में एक वर्णवादी और रंगभेदी बयान में कहा था कि मेरे बनाये कपड़े अफ्रीकी, एशियाई, अमेरिकी सभी खरीदते हैं लेकिन मैं चाहता हूँ कि मेरे कपड़े अश्वेत और एशियाई नहीं खरीदें. क्या ये बात सही है? टोमी हिलफिगर ने जवाब दिया --हाँ. ओप्रा ने उन्हें कहा तत्काल इस शो से बाहर जाइए. मैं सभी लोगों से गुजारिश करती हूँ कि टोमी हिलफिगर के डिजाइन किये वस्त्र कोई न खरीदे. इनकी आर्थिक हालत ऐसी बना दो कि ये कभी भी कभी भी बहुसंख्यक आबादी के बारे में ऐसा सोचने की जुर्रत न कर सके.

सभी को साथ लो
ओप्रा विनफ्रे फाउंडेशन बनकर करोड़ों डॉलर दान देनेवालीं ओप्रा का मानना है कि आपको जिन्दगी के हर मोड़ पर कुछ न कुछ जिम्मेदारी दी गयी है, उसे पूरा करो. उनकी मदद करो जो हकदार लेकिन मोहताज हैं. अपने काम को ताजी से आगे बढ़ाने के लिए अपने अधीनस्थों को अधिकार सौंपो. रोजमर्रा के जीवन में जो भी आपके साथ हों उनसे दिल से जुड़ो. आपके जीवन में जिसने भी योगदान दिया है, उसका आभार मानना न भूलो. आपको काम के बारे में जो भी प्रतिक्रिया मिले, उसे अवश्य सुनो और अगर सुधर की गुंजाइश हो तो उसे सुधारने में देरी मत करो.

जीवन का सबसे बड़ा रहस्य
ओप्रा का मानना है कि जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि रहस्य नाम की कोई चीज़ है ही नहीं. इसलिए बेखौफ होकर जो भी अच्छा लगे वही करो. आपका जो भी लक्ष्य हो, वह तभी मिल सकता है जब आप पूरा जोर लगाकर उसकी दिशा में काम करें. काम वही चुनें जो आपको पसंद हो. किसी भी सीमा में खुद को ना बांटे. और जो भी करें दिल लगाकर करें, पूरी शक्ति उस लक्ष्य को पाने में झौंक दें. अगर लक्ष्य को पाने में कोई भी शक हो रहा हो तो किसी और से नहीं, खुद अपने से ही पूछो -- जवाब भी वहीँ से मिलेगा. हर सुबह के पांच मिनिट केवल इस बात के लिए रखो कि आप अपने आप से बात कर सको. अगर आपके पास अपने लिए पांच मिनिट भी नहीं हैं तो आप को कामयाबी की आशा नहीं करनी चाहिए.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान june 12, 2011

Saturday, June 04, 2011

सलमान की विनम्रता और शरीरशौष्ठव

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम



सलमान खान आज भी करोड़ों युवक-युवतियों के चहेते हैं. लाखों लोग यह मानते
हैं कि किसी भी फ़िल्म में सलमान खान का होना ही उस फ़िल्म के मनोरंजक होने की गारंटी है. इस स्तम्भ में सलमान की अभिनय की समीक्षा नहीं की जा रही है, बल्कि एक कलाकार के व्यावसायिक रूप से कामयाब होने के फार्मूले पर चर्चा की जा रही है.

सलमान की विनम्रता और शरीर शौष्ठव
इंदौर में जन्मे अब्दुल रशीद सलीम सलमान खान उर्फ़ सल्लू महान नहीं, कामयाब हीरो हैं. हीरो के रूप में पहली ही फ़िल्म 'मैंने प्यार किया' (१९८९) ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी, और २२ साल बाद गत शुक्रवार को रिलीज़ 'रेडी' को भी अच्छी शुरूआत मिली. बीते साल उनकी 'दबंग' भी ब्लॉकबस्टर रही. २००९ में उनकी 'वांटेड' भी सुपर हिट थी. मैंने प्यार किया ने ६७ करोड़ का कारोबार किया था और दबंग ने १८७ करोड़ का. उम्र के ४६वे साल में भी वे अपने बूते फ़िल्म को सुपरहिट करने का माद्दा रखते हैं और उनकी अपनी निजी फैन फॉलोइंग तगड़ी है. अभी भी वे अपने दर्शकों को बॉडी दिखाते हैं और कई हीरो शरीर शौष्ठव से जलते है. वे १९८८ (बीवी हो तो ऐसी) से आज तक ८४ फिल्मों में छोटे बड़े रोल कर चुके है. इनमें दो तीन को छोड़कर सभी ने अच्छा कारोबार किया और कई तो सुपरहिट रही. सलमान खान ने टीवी पर दस का दम ( सीजन एक और दो) और बिग बॉस (सीजन चार) होस्ट किये, जिनके लिए उन्हें बड़ी धनराशि मिली और उए प्रोग्राम भी सुपर हिट रहे. सलमान खान आज भी करोड़ों युवक-युवतियों के चहेते हैं. लाखों लोग यह मानते हैं कि किसी भी फ़िल्म में सलमान खान का होना ही उस फ़िल्म के मनोरंजक होने की गारंटी है. इस स्तम्भ में सलमान की अभिनय की समीक्षा नहीं की जा रही है, बल्कि एक कलाकार के व्यावसायिक रूप से कामयाब होने के फार्मूले पर चर्चा की जा रही है. सलमान में भी कई कमजोरियां हैं, लेकिन उनकी खूबियाँ भी बहुतेरी हैं. उनकी व्यावसायिक कामयाबी के कुछ सूत्र :

विनम्रता
सलमान खान के नज़दीकी लोग जानते हैं कि सलमान खान निजी जिन्दगी में बेहद विनम्र और दरियादिल प्रवृत्ति के हैं. वे अपने घर पर आनेवाले सभी परिजनों से बेहद अपनेपन और विनम्रता से मिलते हैं. उनकी यह विनम्रता कई लोगों को अचम्भे में दाल देती है और कई लोग समझते हैं कि वे घर पर भी अभिनय करते हैं. आम बोलचाल में वे कभी किसी पर कटाक्ष नहीं करते और यही विनम्रता 'दस का दम' शो में उनकी कामयाबी का आधार भी बनी जहाँ वे सभी से प्यार से बतियाते नज़र आते थे. इसके अलावा वे आमतौर पर विवादों से बचाते हैं और ज़रा भी गलती होने पर उसे तत्काल सुधारने की कोशिश में जुट जाते हैं.

निश्चित दर्शक वर्ग पर लक्ष्य
'अजब प्रेम की गज़ब कहानी', 'इसी लाइफ में', 'ओम शांति ओम' और 'तीसमार खां' फिल्मों में उन्होंने अपना यानी सलमान खान का ही रोल किया. सलमान खान आम जनता के हीरो हैं और उन्ही के बीच उन जैसा लगाना चाहते हैं. उनकी खूबियों में उनका स्वाभाविक अभिनय महत्वपूर्ण कहा जाता है. अगर वे किसी लड़ाकू पात्र के रोल में हो तो सचमुच के लड़ाके लगते हैं और अगर किसी कमज़र्फ के रोल में हों तो वहां भी फिट लगते हैं. उन्होंने अपने आप को आम जनता से जोड़ रखा है और अपने एक खास दर्शक वर्ग के लिए मनोरंजन की कोशिश करते हैं.उन्होंने उसे अपनी यूएसपी बना लिया. कला फिल्मों में अभिनय करना उन्हें जमता नहीं और बहुत नए प्रयोग वे नहीं करते.

शरीर शौष्ठव पर ध्यान
हिंदी फिल्मों में दिलीप कुमार, देव आनंद,राज कपूर, शम्मी कपूर, संजीव कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन जैसे अनेक हीरो हुए हैं जिन्होंने अपने शरीर शौष्ठव पर कभी ध्यान नहीं दिया. सलमान का मानना है कि अगर हीरोइन के लिए शरीर का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है तो हीरो के लिए क्यों नहीं? अगर शरीर भी एक सम्पदा है, प्रॉपर्टी है तो फिर उसकी उपेक्षा कतई नहीं होनी चाहिए. आज देश के जिम्नेश्यम्स में सलमान की आदमकद तस्वीरें देखने को मिल जायेंगी. देश भर के हजारों नौजवान सलमान के जैसा बदन पाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. भले ही उन पर शरीर के प्रदर्शन का आरोप लगे, वे स्वास्थ्य चेतना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं. इसे 'अजब प्रेम की गजब कहानी' फ़िल्म में भी फ़िल्म का हीरो रणवीर कपूर सलमान की बॉडी की तस्वीर पर अपना चेहरा चस्पा करके हीरोइन कैटरीना कैफ को प्रभावित करना चाहता है. 'दस का दम' शो में आई एक महिला ने कहा था कि जब वह गर्भवती थी तब उसने अपने कमरे में सलमान का फोटो लगा रखा था क्योंकि वह चाहती थीं कि उसकी होनेवाली संतान सलमान खान जैसी आकर्षक हो.

प्रोफेशनल अप्रोच
सलमान अपने बूते पर फ़िल्म को सफलता तक ले आने की कूवत रखते हैं और इसके लिए कड़ी मेहनत करते हैं उनकी फिल्मों का सफलता का प्रतिशत दूसरे कलाकारों की अपेक्षा बेहतर है. फ़िल्म के सेट्स पर वे अनुशासित रहने की कोशिश करते हैं. निर्देशक को सहयोग करते हैं और नए कलाकारों को प्रोत्साहन देते हैं. 'लन्दन ड्रीम्स', 'युवराज' और 'वीर' जैसी वीरगति प्राप्त फ्लाप फिल्मों के बाद भी वे झट से उठ खड़े हुए और अपने निन्मता की मदद को आगे आये. फ़िल्मी असफलता से वे चित नहीं होते और अगले अभियान में कूद पड़ते हैं. फिल हिट हो या फ्लॉप, वे उसे खेल भवन से लेते हैं.

सामाजिक सरोकार
सलमान के करीबी मनाते हैं कि सलमान हमेशा सहयोगी व्यवहार करते है. वे चैरिटी के लिए भी काफी काम करते हैं. 'बीइंग ह्युमन' नामक एनजीओ के माध्यम से तो वे ज़रूरतमंदों की मदद करते ही हैं, निजी तौर पर भी सभी की मदद करते हैं. यह संस्था स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है. कैंसर, थेलेसीमिया, ल्यूकेमिया जैसे भीषण रोगों से लड़ रहे लोगों की मदद के लिए उनका संगठन जरूरतमंदों की मदद करता है. उनका संगठन एक लाख लोगों का नाम रजिस्टर करने में जुटा है जो वक़्त आने पर देश भर में कहीं भी रक्तदान कर सके.सलमान ने 'फिर मिलेंगे'(2004) फ़िल्म में उन्होंने एड्स पीड़ित युवक का रोल किया था जिसकी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी सराहना की थी.

सच्चे धर्मनिरपेक्ष
सलमान खान कभी भी कट्टरवादी नहीं रहे और इसीलिये वे खुद कट्टरवादियों के निशाने पर रहे. उनके पिता मुस्लिम हैं और माँ महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण. उनके घर में पूजा भी होती है, नमाज़ भी. एक बहन अलविरा की शादी अभिनेता अतुल अग्निहोत्री से हुई है. गणेशोत्सव में गणेश प्रतिमा स्थापना को लेकर उनके खिलाफ फतवा भी जारी हुआ था. उन्होंने हमेश ही अपने आप को खान कहने के बजाय भारतीय बताना पसंद किया. शिव सेना भी कई बार उनके खिलाफ मैदान में आई, लेकिन उन्होंने ऐसे मौकों पर विवाद से दूर रहन पसंद किया.

रचनात्मकता को महत्त्व
सलमान खान अपने निजी तनावों को दूर करने के लिए रचनात्मक तरीके अपनाते हैं. उन्हें बच्चों के साथ खेलने के अलावा पेंटिंग करने का भी शौक है. वे अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी भी लगा चुके हैं और पेंटिंग्स से होनेवाली आय को सेवा के कार्य में दान दे चुके हैं. उनके मित्र मनाते हैं कि वे ठीक ठाक पेंटिंग बना लेते हैं. कैटरीना कैफ ने पिछले दिनों बयान दिया था कि उन्हें अभी तक सलमान ने पेंटिंग का विषय नहीं बनाया और वे चाहती हैं कि सलमान उन की पेंटिंग्स बनायें.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 5 june 2011

Friday, May 06, 2011

हर सफ़र का अपना मज़ा है

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम




यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है.


सफलता के सूत्र / नारायण मूर्ति

हर सफ़र का अपना मज़ा है

तीस साल पहले 1981 में छह मित्रों और केवल दस हज़ार रुपये की पूंजी से एन आर नारायण मूर्ति ने जिस इन्फोसिस कंपनी की स्थापना की थी, उसका कारोबार बीते साल करीब 30 ,000 करोड़ रुपये था. उन्होंने एक ऐसी कंपनी की नींव डाली, जिसे दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में माना जाता है. 33 देशों में सवा लाख से भी ज्यादा लोग उनके साथ काम करते हैं. उनकी कंपनी को सर्वश्रेष्ठ नियोक्ता सहित अनेक सम्मान मिल चुके हैं. एक अरब डॉलर कारोबार का आंकड़ा छूनेवाली यह पहली साफ्टवेयर कंपनी रही है. नारायण मूर्ति की तारीफ अमेरिका के राष्ट्रपति सहित अनेक दिग्गज कर चुके हैं.देश - विदेश में अनेक सम्मान पा चुके नारायण मूर्ति पहले पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण से नवाजे जा चुके हैं. दुनियाभर के आई टी क्षेत्र में भारत की छवि चमकानेवाले नारायण मूर्ति की सफलता के कुछ सूत्र :

अनुभव से सीखने का महत्त्व
आप कोई भी बात कैसे सीखते हैं? अपने खुद के अनुभव से या किसी और से? आप कहाँ से और किस से सीखते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि आपने क्या सीखा और कैसे सीखा. अगर आप अपनी नाकामयाबी से सीखते हैं तो यह आसान है. सफलता से शिक्षा लेना आसान नहीं होता क्योंकि हमारी हर सफलता हमारे कई पुराने फैसलों के पुष्टि करती है. अगर आपमें नया सीखने की कला है, जल्दी से नए विचार अपना लेते हैं और उसे काम में अपना लेते हैं तभी सफल हो सकते हैं.

परिवर्तन को स्वीकारें
हमें सफल होने के लिए नए बदलावों को स्वीकार करने की आदत होनी चाहिए. मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढाई के बाद किसी हायड्रो पॉवर प्लांट में नौकरी की कल्पना की थी. पढाई के दौरान एक वक्ता के भाषण ने मेरी जिन्दगी बदल दी जिन्होंने कंप्यूटर और आई टी क्षेत्र को भविष्य बताया था. मैंने मैसूर में इंजीनियरिंग की पढाई की. फिर आईआईटी कानपुर में पीजी किया. आईआईएम अहमदाबाद में चीफ सिस्टम्स प्रोग्रामर के नौकरी की. पेरिस में नौकरी की और पुणे में इन्फोसिस की स्थापना की. बंगलुरु में कंपनी का कारोबार बढाया. जो जगह जहाँ मुफीद लगे, वहीं काम में जुट जाओ.

संकट की घड़ी को समझें
कभी कभी संकट सौभाग्य नज़र आता है. ऐसे में धीरज ना खोएं. आपकी कामयाबी इस बात में भी छुपी है कि ऐसा वक्त आने पर आप कैसे अपनी प्रतिक्रिया देते हैं? इन्फोसिस की स्थापना १९८१ में हम सात लोगों ने की थी और १९९० में मेरे सभी साथी चाहते थे कि हम यह कंपनी बेच दें क्योंकि ९ साल की मेहनत के हमें दस लाख डॉलर मिल रहे थे. यह मेरे लिए सौभाग्य नहीं, संकट था. मैं इस कंपनी का भविष्य जानता था. तब मैंने और केवल मैंने अपने साथियों को संभाला था और इन्फोसिस को बेचने से रोका था.

संसाधनों से बड़ा होता है जज्बा

इन्फोसिस के भी 5 साल पहले नारायण मूर्ति ने आई टी में देशी ग्राहकों को ध्यान में रखकर सॉफ्ट्रानिक्स नाम की कंपनी खोली थी, जो बंद कर देनी पड़ी. 2 जुलाई 1981 को इन्फोसिस रजिस्टर्ड हुई लेकिन उनके पास कंप्यूटर तो दूर, टेलीफोन तक नहीं था. उन दिनों टेलीफोन के लिए लम्बी लाइन लगती थी. कंपनी शुरू करने के एक साल बाद उन्हें टेलीफोन और दो साल बाद कंप्यूटर उपलब्ध हो सका था. जब इन्फोसिस अपना आईपीओ लेकर आई तब भी उसे बाज़ार में अच्छा रेस्पांस नहीं मिला था. पहला इश्यु केवल एक रुपये के प्रीमियम पर यानी ग्यारह रुपये प्रति शेयर जारी हुआ था. मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों के बाद १९९३ में इन्फोसिस का शेयर ८६ रुपये के प्रीमियम पर बिका.

किसी एक के भरोसे मत रहो

1995 में इन्फोसिस के सामने एक बड़ा संकट पैदा हो गया था जब एक ऐसी विदेशी कंपनी ने उनकी सेवाओं का मोलभाव एकदम कम करने का फैसला किया. वह ग्राहक इन्फोसिस का करीब 25 प्रतिशत बिजनेस देता था. उसकी शर्तें मानना कठिन था क्योंकि जिस कीमत पर वह सेवा चाहता था, वह बहुत ही कम थी और उस ग्राहक को खोने का सीधा मतलब था, अपना एक चौथाई बिजनेस खो देना. तभी तय किया गया कि बात चाहे टेक्नॉलॉजी की हो या अप्लीकेशन एरिया की, किसी भी देश की हो या एम्प्लाई की, कभी भी किसी एक बड़े ग्राहक पर निर्भर कभी भी मत रहो. आपका कामकाज इतना फैला हो कि कोई भी आप को आदेश ना दे सके.

आप केवल कस्टोडियन हैं
जो भी सम्पदा आपके पास है वह केवल आपकी देखरेख के लिए हैं. आप उसके अभिरक्षक हैं. वह भी अस्थायी तौर पर. बस. यह ना मानें कि वह सारी सम्पदा केवल आप और आप ही भोगेंगे. किसी भी सम्पदा का असली आनंद आप तभी उठा सकते हैं जब उसका उपभोग पूरा समाज करे.यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है.

कुर्सी से ना चिपके रहें

साठ साल के होते ही नारायण मूर्ति ने अपनी कंपनी के चेयरमैन का पद छोड़ दिया और नॉन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बन गए. आम तौर पर कर्मचारियों को तो साठ साल में रिटायर कर दिया जाता है लेकिन डायरेक्टर अपने पद पर डटे रहते हैं. नारायण मूर्ति ने सभी को यह सन्देश दिया कि अगर किसी भी कंपनी को लगातार आगे बढ़ाना है तो उसमें नए खून की निर्णायक भूमिका रहनी चाहिए. नए खून में ही नयी बातों को स्वीकार करने की हिम्मत होती है और नए आइडियाज़ अपनाने में युवाओं को कोई हिचक नहीं होती.

मंजिल से ज्यादा मज़ा सफ़र में
जीवन में कोई भी लक्ष्य पा लेने में बहुत मज़ा आता है. हमें संतोष मिलता है कि हमने यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया. लेकिन जीवन जीना हो तो उसका असली मज़ा सफ़र जारे रखने में है. कभी भी जीवन में संतुष्ट होकर ना बैठ जाएँ कि बस, बहुत हो चुका. जब आप एक मैच जीत जाते हैं तो अगले मैच की तैयारी शुरू कर देते हैं. कोई भी मैच जीतने की अपनी खुशी होती है और खेलने का अपना मज़ा है. सागर में चलते रहना और खेल में खेलते रहना बहुत मजेदार होता है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी


हिन्दुस्तान
8 मई 2011