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Saturday, July 16, 2011

कामयाबी के लिए मौलिकता ज़रूरी

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम


अब सोनू निगम और ब्रिटनी स्पिअर्स की जोड़ी 'आई वान्ना गो' के रिमिक्स में देखने को मिलेगी. पार्श्व गायक, अभिनेता, रेडियो और टीवी कार्यक्रम प्रस्तोता, स्टेज आर्टिस्ट और संगीतकार सोनू निगम इसके पहले माइकल जेक्सन के भाई के साथ आइफा के आयोजन में प्रस्तुति दे चुके हैं. 38 साल के सोनू 35 साल से गाने गा रहे हैं. तीन साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता श्री अगम निगम के साथ एक मंच पर फ़िल्म 'हम किसी से कम नहीं' का मो. रफ़ी का गाना 'क्या हुआ तेरा वादा...' गया था और उसके बाद गायन से उनका रिश्ता अटूट हो गया. 35 साल के गायन में उन्होंने हिंदी के साथ ही अंग्रेज़ी,नेपाली, मराठी, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, बांग्ला, कन्नड़, भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी फिल्मों में भी गाने गाये हैं और दुनिया के लगभग सभी प्रमुख शहरों में स्टेज शो किये हैं. ब्याह-शादी के आयोजनों और होटलों में गायन से शुरुआत करनेवाले सोनू निगम को कामयाबी आसानी से नहीं मिली. सोनू निगम की सफलता के कुछ सूत्र :

कोई मजबूरी स्थायी नहीं
सोनू निगम के घर के हालात बुरे नहीं थे लेकिन आगे बढ़ने की जिद ने सोनू निगम से कई तरह के काम करवाए. सोनू निगम के पिता मंच के कलाकार थे और तीन साल की उम्र में ही उन्होंने पिता के साथ मंच पर आमद दर्ज करा ली थी. उनका लक्ष्य गायन के क्षेत्र में नाम कमाना था वे उनके स्कूल जाने और खेलने के दिन थे लेकिन उन्हें होटलों और शादी ब्याह में मंच की शोभा बढ़ाना पड़ रही थी. उनके पिता और वे जानते थे कि मज़बूरी का यह दौर ख़त्म होगा और हुआ भी. वे हर दिन कुछ न कुछ नया करने के लिए जुटे रहे और असफलताओं को पार करते हुए खुद का मुकाम बनने में कामयाब रहे. उनका संकल्प यही था कि कोई भी काम अगर मज़बूरी में किया जा रहा है या करना पड़ रहा है तो वह दौर कभी भी स्थायी नहीं हो सकता.

हर भूमिका में सर्वश्रेष्ठ
सोनू निगम ने हर तरह की भूमिकाओं को अपने सर्वश्रेष्ठ के साथ जीया है. बाल गायक के रूप में जब उन्होंने गायन स्पर्धाओं में जाना शुरू किया तब लगभग हर बार उन्हें ही पुरस्कार मिलता. स्पर्धा आयोजकों ने उन्हें बाल गायक कलाकार की सूची से ही बाहर कर दिया और उन्हें वयस्क गायकों की सूची में दाल दिया. वहां भी वे जीतते गए तो उन पर रोक लगाने के लिए उन्हें ही स्पर्धाओं का जज बनाया जाने लगा. जब वे अपने पिता के साथ मुंबई शिफ्ट हुए और फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम मिला तो उन्होंने पांच फिल्मों में भूमिकाएं की. जब उन्होंने टी सीरीज के लिए कवर वर्जन गाये तब वे भी बेहतरीन थे और पार्श्व गायन में 'संदेसे आते हैं', 'साथिया...', कल हो न हो'. 'पंछी नदिया..', 'सूरज हुआ मद्धम..'के लिए सर्वश्रेष्ठ पुरुष गायक का फ़िल्मफेयर अवार्ड मिल चुका है. राष्ट्रीय फ़िल्म अवार्ड, जी सिने, आईफा, स्टार स्क्रीन आदि अनेक देशी-विदेशी अवार्ड उनकी झोली में हैं. उन्होंने जो भी किया अपना सर्वश्रेष्ठ करने की कोशिश के साथ.

नकलची ना बनें

सोनू निगम के पिता मो. रफ़ी के भक्त होने की हद तक प्रशंसक थे. वे रफ़ी साहब के नग्मे खूब गाते थे. सोनू ने भी गायन की शुरुआत रफ़ी के नग्मे से ही की थी. हर जगह सोनू रफ़ी के नग्मे गाते. लोग उन्हें दूसरा रफ़ी कहने लगे. 31 जुलाई 1980 को रफ़ी साहब का इंतकाल हो गया और उस दौर में कवर वर्जन खूब चल पड़े थे, जो असली अलबम से काफी सस्ते और सर्वसुलभ थे. टी सीरीज के लिए सोनू ने दर्जनों कवर वर्जन प्रति अलबम पाँच पाँच हजार रुपये में रिकार्ड करवाए. आज पुरानी राहों से...,टूटे हुए ख्वाबों ने..., ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं..., सौ बार जनम लेंगे..., तकदीर का फ़साना...,भरी दुनिया में आखिर दिल...., मिली खाक में मोहब्बत..., रहा गर्दिशों में हरदम मेरे इश्क का सितारा...,अकेले हैं चले आओ..., आपके पहलू में आकर रो दिए...., जैसे दर्जनों गाने सोनू ने गाये जो हू ब हू रफ़ी का स्वर लगते थे. ऐसा लगता था कि अब सोनू का करीयर ख़त्म क्योंकि रफ़ी के डुप्लीकेट की मार्केट में कितनी दिन मांग रहती. सोनू इस स्थिति को समझ चुके थे और अपनी आवाज़ में पार्श्व गायन करने लगे थे.

अलग पहचान की ज़रुरत

सोनू निगम ने संगीत निर्देशिका उषा खन्ना के आशीर्वाद से अमर उत्पल के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'आजा मेरी जान' के लिए पहला गाना रिकार्ड कराया था. लेकिन फ़िल्म में यह गाना नहीं लिया गया. इसे फिर से बाला सुब्रमण्यम से गवाया गया. इस फ़िल्म में उनके पाँच गाने रिकार्ड कराये गए लेकिन एक गाना ही लिया गया. 1995 में टी सीरीज के गुलशन कुमार की फ़िल्म बेवफा सनम के एक गाने 'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का' ने उन्हें एक पहचान दिलवाई. 1 मई 1995 से ही टीवी पर 'सा रे गा मा' शो शुरू हुआ और वे इसके होस्ट थे. यह कार्यक्रम बेहद लोकप्रिय हुआ और अब तक इसके २०० से ज्यादा एपिसोड प्रसारित हो चुके हैं. 1997 में बॉर्डर फ़िल्म में संदेसे आते हैं गीत ने उन्हें डुप्लीकेट रफ़ी की छवि से अलग पहचान को मज़बूत किया.

सही तालीम, सही लक्ष्य अनिवार्य
सोनू केवल बारहवीं कक्षा तक ही स्कूल गए. स्नातक की डिग्री उन्होंने दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से पाई, लेकिन शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली है जिस कारण वे अपने गायन को परिपूर्णता देने में काफी हद तक सफल रहे हैं. सही तालीम के कारण ही वे अपने लिए सही भूमिका चुन सके. बाल कलाकार के रूप में बेताब, कामचोर, तकदीर, हम से है ज़माना, प्यारा दुश्मन, उस्तादी उस्ताद से जैसी फिल्मों में काम करने के बाद वे जानी दुश्मन, काश आप हमारे होते, लव इन नेपाल और मराठी फ़िल्म नवरा माझा नवसाचा में भी काम कर चुके हैं और शांतनु-निखिल के फैशन शो में रैम्प पर भी कदमताल कर चुके हैं, लेकिन वे जानते हैं कि उनका भविष्य एक्टिंग में नहीं, गायन में है. उन्होंने अपने गायन को पार्श्व गायन तक ही सीमित रखने के बजाय लाइव शो, टीवी कार्यक्रम, प्राइवेट अलबम और देश विदेश के कलाकारों के साथ मिलकर काम कर रहे है.

सेहत और सेवा
xसोनू निगम अपने शरीर और लुक्स का ध्यान रखनेवाले शख्स हैं. सेहत के लिए रोज योगासन भी करते हैं. वे ताइक्वान्डो के प्रशिक्षित खिलाड़ी हैं. शादीशुदा, एक बेटे के पिता सोनू अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान भी करते हैं.यह राशि वे उजागर नहीं करते लेकिन कैंसर, दृष्टिबाधित, लेप्रोसी, एड्स जैसी बीमारियों से लड़नेवाले संगठनों की मदद करते रहते हैं. वे आसराहीन बच्चों को अपने बूते पढ़ाते भी हैं. नकद दान के अलावा मुफ्त में शो भी करते हैं. वे कहते हैं कि कामयाबी तभी कामयाबी है, जब उसका फायदा सब को मिले.

प्रकाश हिन्दुस्तानी


हिन्दुस्तान 17 july 2011

Sunday, May 15, 2011

संकल्प ने बनाया आईएएस टॉपर

आईएएस टॉपर एस. दिव्यदर्शिनी को भरोसा था कि उनका चयन आईएएस के लिए हो जाएगा, लेकिन वे टॉप पर रहेंगी, इसकी कल्पना भी नहीं थी. एस. दिव्यदर्शिनी की इस महत्वपूर्ण सफलता के कुछ सूत्र :


रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम

संकल्प ने बनाया आईएएस टॉपर


चेन्नई की 24 साल की एस. दिव्यदर्शिनी यूपीएससी की प्रशासकीय नौकरी की परीक्षा में टॉप पर रहीं. इसके पहले भी वे इस परीक्षा में बैठीं थीं, पर नाकामयाब रहीं. मध्यमवर्गीय परिवार की दिव्यदर्शिनी इसके बाद भारतीय स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी अधिकारी के लिए चुनी गयीं लेकिन उन्होंने अपनी यूपीएससी परीक्षा की तैयारी भी जारी रखी. उन्हें भरोसा था कि उनका चयन आईएएस के लिए हो जाएगा, लेकिन वे टॉप पर रहेंगी, इसकी कल्पना भी नहीं थी. 2009 की परीक्षा देते वक्त वे अपनी लॉ की डिग्री के लिए भी पढ़ाई कर रही थीं. इस बार उन्होंने कोई भी मौका नहीं छोड़ा. चेन्नई में आईएएस के लिए उन्होंने कोचिंग क्लास जाना शुरू किया ताकि सही मार्गदर्शन मिल सके. एस. दिव्यदर्शिनी की इस महत्वपूर्ण सफलता के कुछ सूत्र :

कामयाबी का कोई शॉर्टकट नहीं

बड़े लक्ष्य को पाना हो तो कोई शॉर्टकट नहीं चलता. आर्ट्स में डिग्री लेने के बाद लॉ की डिग्री के लिए भी पढ़ाई के दौरान यूपीएससी की भी तैयारी करनेवाली दिव्यदर्शिनी मानती हैं कि जीवन में किसी भी क्षेत्र में कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है. नियमित पढाई हो या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी, केवल और केवल कड़ी मेहनत कामयाबी पाने की पहली सीढ़ी है. कामयाबी के लिए और भी कई बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है लेकिन कड़ी मेहनत के बिना वे सब बातें बेकार हो जाती हैं. शॉर्टकट के जरिये अगर कामयाब होने का सपना देख रहे हों तो उसे भूल जाइए.

उचित मार्गदर्शन प्राप्त करें
बिना मार्गदर्शन के भी कामयाबी मिल सकती है लेकिन इसमें आपका सफ़र लम्बा और दुश्वार हो सकता है. 2009 में पहली बार यूपीएससी की परीक्षा देने के बाद मुझे यही महसूस हुआ. हर परीक्षा का कोई ना कोई पैटर्न होता है. अगर आप को उसकी जानकारी हो तो वह मदद मिल जाती है. मैंने जब इस परीक्षा की कोचिंग लेना शुरू की तो कई लोगों ने यह भी कहा कि आप तो पहले ही यह परीक्षा दे चुकी हैं, कोचिंग की क्या ज़रुरत? लेकिन आज मैं यह स्वीकार करती हूँ कि अगर मैंने कोचिंग नहीं ली होती तो टॉप में आना तो दूर, शायद सफल ही नहीं हो पाती.

योजनाबद्ध होकर पढ़ाई करें
यदि आपको भी इस या ऐसी ही कोई परीक्षा में बैठना है तो कोचिंग जाना और कड़ी मेहनत करना ही काफी नहीं है. उससे बढ़कर आपको पूरी योजना बनकर पढ़ाई करनी चाहिए. इसके लिए आपको हर एक विषय में अध्ययन की रणनीति बनानी होगी. हर विषय के लिए अलग रणनीति होना चाहिए क्योंकि कुछ विषयों में आपकी ख़ास दिलचस्पी हो सकती है, कुछ में नहीं. लेकिन पढ़ाई तो आपको सभी की करना होगी. बोरियत भरे विषयों में भी दिलचस्पी लें. मेरा अनुभव यही है कि जैसे जैसे हम किसी विषय के बारे में जानने लगते हैं, हमारी दिलचस्पी उसमें बढ़ती जाती है.

हताशा से बचें

मुझे दसवीं में आये नंबरों से बड़ी निराशा हुई थी. मुझे रिजल्ट में विशेष योग्यता की आशा थी, लेकिन मैं 74 प्रतिशत ही ला सकी. निराशा के वक्त मेरे माता पिता ने बहुत प्रेरणा दी. मैंने अगले साल नए सिरे से पढ़ाई शुरू की और बारहवीं की परीक्षा में 86 प्रतिशत नंबर लाकर अपना खोया आत्मविश्वास फिर हासिल कर लिया. मैंने कॉलेज में आते ही प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का मन बना लिया था. मेरी दिलचस्पी मैनेजमेंट और कम्प्यूटर्स के बजाय कानून में ज्यादा थी. साथ ही यह स्कोअर्रिंग विषय भी है. यदि आप परफेक्ट हैं तो अच्छे नंबर पा सकते हैं. यूपीएससी में पहली नाकामी को मैंने यह सोचकर टाल दिया था कि मैंने कॉलेज में लॉ के साथ यह परीक्षा दी थी.

हर विषय पढ़ें
आपकी दिलचस्पी चाहे जिस में हो, पढ़ाई हर विषय की करते रहे. ध्यान रखिये कि केवल कॉलेज या प्रतियोगी परीक्षा के विषय पढ़ना ही काफी नहीं हैं. यह पढ़ाई आपको इंटरव्यू में तो मदद करेगी ही आपको एक बेहतर, मुकम्मल इंसान बनाने का रास्ता भी खोलेगी. आगे जाकर आप पाएंगे कि हर विषय की पढ़ाई से आपने जो भी सीखा है, वह बहुत ही काम का है और तब आपको खुशी होगी.

टाइम किलिंग मशीनों से सावधान

टीवी और फ़िल्में देखना, ड्राइविंग करना, चेटिंग करना, मोबाइल पर गप्पें लड़ाना किसे अच्छा नहीं लगता, लेकिन ये सभी टाइम किलिंग डिवाइसेस हैं. इनका उपयोग सावधानी से और ज़रुरत के हिसाब से ही करें. ये वक्त तो बर्बाद करती ही हैं, हमें अपने लक्ष्य से भी भटका सकती हैं. अगर आप स्मार्ट हैं तो इनका उपयोग अपने लक्ष्य को पाने में सहयोगी उपकरण के तौर पर कर सकते हैं, लेकिन यह आसान नहीं है. इन सब चीजों के लिए तो ज़िंदगी पड़ी है, वक्त के महत्त्व को समझें.

लक्ष्य के लिए समझौता नहीं
अपने लक्ष्य को पाने के लिए कभी भी समझौते न करें. जो लक्ष्य तय किया है उसे न केवल प्राप्त करें बल्कि पूरी तरह से सही रास्ते पर चलकर ही हासिल करें. यह बात बेहद किताबी लगती है, लेकिन कामयाबी का असली मज़ा तभी है जब कि उसे पाने के लिए आपने कोई समझौता नहीं किया हो. मैंने यूपीएससी में पहली बार नाकाम होने पर बैंक की नौकरी को हाँ कह दी और वहां काम भी शुरू कर दिया लेकिन मुझे लगता रहा कि मैं अपने लक्ष्य से भटक गयी हूँ. बैंक की नौकरी में शायद तनाव काम होंगे लेकिन मेरा लक्ष्य प्रशासकीय नौकरी ही था, और मैं यहीं खुश हूँ.

व्यवस्था को बदलो

मुझे देश में फैले भ्रष्टाचार से नफ़रत है और मैं उसे मिटाना चाहती हूँ. अब हर जगह भ्रष्टाचार की बार करने, गलियां देने और कुंठित होने के बजाय भ्रष्टाचार से लड़ने का सही तरीका मुझे यही लगता है कि मैं ऐसी पोजीशन में पहुँच जाऊं, जहाँ मैं भ्रष्टाचार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकूं. आईएएस अधिकारी के रूप में मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी जंग को महत्वपूर्ण मुकाम तक पहुंचा सकूंगी.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 15 मई 2011

Friday, May 06, 2011

हर सफ़र का अपना मज़ा है

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम




यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है.


सफलता के सूत्र / नारायण मूर्ति

हर सफ़र का अपना मज़ा है

तीस साल पहले 1981 में छह मित्रों और केवल दस हज़ार रुपये की पूंजी से एन आर नारायण मूर्ति ने जिस इन्फोसिस कंपनी की स्थापना की थी, उसका कारोबार बीते साल करीब 30 ,000 करोड़ रुपये था. उन्होंने एक ऐसी कंपनी की नींव डाली, जिसे दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में माना जाता है. 33 देशों में सवा लाख से भी ज्यादा लोग उनके साथ काम करते हैं. उनकी कंपनी को सर्वश्रेष्ठ नियोक्ता सहित अनेक सम्मान मिल चुके हैं. एक अरब डॉलर कारोबार का आंकड़ा छूनेवाली यह पहली साफ्टवेयर कंपनी रही है. नारायण मूर्ति की तारीफ अमेरिका के राष्ट्रपति सहित अनेक दिग्गज कर चुके हैं.देश - विदेश में अनेक सम्मान पा चुके नारायण मूर्ति पहले पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण से नवाजे जा चुके हैं. दुनियाभर के आई टी क्षेत्र में भारत की छवि चमकानेवाले नारायण मूर्ति की सफलता के कुछ सूत्र :

अनुभव से सीखने का महत्त्व
आप कोई भी बात कैसे सीखते हैं? अपने खुद के अनुभव से या किसी और से? आप कहाँ से और किस से सीखते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि आपने क्या सीखा और कैसे सीखा. अगर आप अपनी नाकामयाबी से सीखते हैं तो यह आसान है. सफलता से शिक्षा लेना आसान नहीं होता क्योंकि हमारी हर सफलता हमारे कई पुराने फैसलों के पुष्टि करती है. अगर आपमें नया सीखने की कला है, जल्दी से नए विचार अपना लेते हैं और उसे काम में अपना लेते हैं तभी सफल हो सकते हैं.

परिवर्तन को स्वीकारें
हमें सफल होने के लिए नए बदलावों को स्वीकार करने की आदत होनी चाहिए. मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढाई के बाद किसी हायड्रो पॉवर प्लांट में नौकरी की कल्पना की थी. पढाई के दौरान एक वक्ता के भाषण ने मेरी जिन्दगी बदल दी जिन्होंने कंप्यूटर और आई टी क्षेत्र को भविष्य बताया था. मैंने मैसूर में इंजीनियरिंग की पढाई की. फिर आईआईटी कानपुर में पीजी किया. आईआईएम अहमदाबाद में चीफ सिस्टम्स प्रोग्रामर के नौकरी की. पेरिस में नौकरी की और पुणे में इन्फोसिस की स्थापना की. बंगलुरु में कंपनी का कारोबार बढाया. जो जगह जहाँ मुफीद लगे, वहीं काम में जुट जाओ.

संकट की घड़ी को समझें
कभी कभी संकट सौभाग्य नज़र आता है. ऐसे में धीरज ना खोएं. आपकी कामयाबी इस बात में भी छुपी है कि ऐसा वक्त आने पर आप कैसे अपनी प्रतिक्रिया देते हैं? इन्फोसिस की स्थापना १९८१ में हम सात लोगों ने की थी और १९९० में मेरे सभी साथी चाहते थे कि हम यह कंपनी बेच दें क्योंकि ९ साल की मेहनत के हमें दस लाख डॉलर मिल रहे थे. यह मेरे लिए सौभाग्य नहीं, संकट था. मैं इस कंपनी का भविष्य जानता था. तब मैंने और केवल मैंने अपने साथियों को संभाला था और इन्फोसिस को बेचने से रोका था.

संसाधनों से बड़ा होता है जज्बा

इन्फोसिस के भी 5 साल पहले नारायण मूर्ति ने आई टी में देशी ग्राहकों को ध्यान में रखकर सॉफ्ट्रानिक्स नाम की कंपनी खोली थी, जो बंद कर देनी पड़ी. 2 जुलाई 1981 को इन्फोसिस रजिस्टर्ड हुई लेकिन उनके पास कंप्यूटर तो दूर, टेलीफोन तक नहीं था. उन दिनों टेलीफोन के लिए लम्बी लाइन लगती थी. कंपनी शुरू करने के एक साल बाद उन्हें टेलीफोन और दो साल बाद कंप्यूटर उपलब्ध हो सका था. जब इन्फोसिस अपना आईपीओ लेकर आई तब भी उसे बाज़ार में अच्छा रेस्पांस नहीं मिला था. पहला इश्यु केवल एक रुपये के प्रीमियम पर यानी ग्यारह रुपये प्रति शेयर जारी हुआ था. मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों के बाद १९९३ में इन्फोसिस का शेयर ८६ रुपये के प्रीमियम पर बिका.

किसी एक के भरोसे मत रहो

1995 में इन्फोसिस के सामने एक बड़ा संकट पैदा हो गया था जब एक ऐसी विदेशी कंपनी ने उनकी सेवाओं का मोलभाव एकदम कम करने का फैसला किया. वह ग्राहक इन्फोसिस का करीब 25 प्रतिशत बिजनेस देता था. उसकी शर्तें मानना कठिन था क्योंकि जिस कीमत पर वह सेवा चाहता था, वह बहुत ही कम थी और उस ग्राहक को खोने का सीधा मतलब था, अपना एक चौथाई बिजनेस खो देना. तभी तय किया गया कि बात चाहे टेक्नॉलॉजी की हो या अप्लीकेशन एरिया की, किसी भी देश की हो या एम्प्लाई की, कभी भी किसी एक बड़े ग्राहक पर निर्भर कभी भी मत रहो. आपका कामकाज इतना फैला हो कि कोई भी आप को आदेश ना दे सके.

आप केवल कस्टोडियन हैं
जो भी सम्पदा आपके पास है वह केवल आपकी देखरेख के लिए हैं. आप उसके अभिरक्षक हैं. वह भी अस्थायी तौर पर. बस. यह ना मानें कि वह सारी सम्पदा केवल आप और आप ही भोगेंगे. किसी भी सम्पदा का असली आनंद आप तभी उठा सकते हैं जब उसका उपभोग पूरा समाज करे.यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है.

कुर्सी से ना चिपके रहें

साठ साल के होते ही नारायण मूर्ति ने अपनी कंपनी के चेयरमैन का पद छोड़ दिया और नॉन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बन गए. आम तौर पर कर्मचारियों को तो साठ साल में रिटायर कर दिया जाता है लेकिन डायरेक्टर अपने पद पर डटे रहते हैं. नारायण मूर्ति ने सभी को यह सन्देश दिया कि अगर किसी भी कंपनी को लगातार आगे बढ़ाना है तो उसमें नए खून की निर्णायक भूमिका रहनी चाहिए. नए खून में ही नयी बातों को स्वीकार करने की हिम्मत होती है और नए आइडियाज़ अपनाने में युवाओं को कोई हिचक नहीं होती.

मंजिल से ज्यादा मज़ा सफ़र में
जीवन में कोई भी लक्ष्य पा लेने में बहुत मज़ा आता है. हमें संतोष मिलता है कि हमने यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया. लेकिन जीवन जीना हो तो उसका असली मज़ा सफ़र जारे रखने में है. कभी भी जीवन में संतुष्ट होकर ना बैठ जाएँ कि बस, बहुत हो चुका. जब आप एक मैच जीत जाते हैं तो अगले मैच की तैयारी शुरू कर देते हैं. कोई भी मैच जीतने की अपनी खुशी होती है और खेलने का अपना मज़ा है. सागर में चलते रहना और खेल में खेलते रहना बहुत मजेदार होता है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी


हिन्दुस्तान
8 मई 2011

Sunday, January 09, 2011


आतंक के खिलाफ खड़ा एक सिंह


भले ही उन्होंने अपने नाम के मध्य से 'सिंह' हटा लिया हो, लेकिन वे हैं सिंह ही, तभी तो गत 13 नवम्बर को यूएस में ह्यूस्टन एअरपोर्ट पर जब उन्हें तलाशी के लिए रोका गया तो उन्होंने सिंह की तरह हुंकार कर कहा -- कोई भी मेरी पगड़ी को छूने की जुर्रत मत करना. उनकी गर्जना का असर हुआ और अमेरिकी आव्रजन अधिकारी ठिठके. तभी उन्होंने आव्रजन के नए नियम उन अफसरान को बताये जो उन्हें नहीं मालूम थे. वरिष्ठ अफसरों से इसकी पुष्टि कराने तक उन्हें बीस- पच्चीस मिनिट वहां रुकना पड़ा, लेकिन बात का हल्ला इतना मचा कि अमेरिकी विदेश विभाग को उनसे माफी माँगनी पड़ी. जब ये घटना घटी तब वे संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि थे. अब उन्हें ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की आतंक निरोधक समिति का प्रमुख बनाया गया है. श्री पुरी का कहना है कि सुरक्षा परिषद् में आतंक विरोधी फैसलों का असर जल्दी ही सामने आने लगेगा.

कूटनीतिक फैसलों का असर आने में वक़्त लगता है. यों भी भारत 19 साल बाद सुरक्षा परिषद् में हाजिर हो पाया है और वहां 'राखी का इन्साफ' जैसा काम नहीं होता. हरप्रीत पुरी को भरोसा है कि इस वर्ष के अंत या अगले वर्ष की शुरूआत तक सुरक्षा परिषद् में आतंकवाद के खिलाफ कोई बड़ी कार्यवाही का आरम्भ हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश आतंकवाद के खिलाफ एक्शन प्लान पर काम शुरू कर सकते हैं. अल कायदा और तालिबान के खिलाफ कोई अभियान चलाया जा सकता है और आतंकियों की फंडिंग रोकने का कोशिश के साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में भारत को स्थायी सदस्यता भी मिल सकती है. श्री पुरी की प्रमुख भूमिकाओं में प्रमुख है सुरक्षा परिषद् को और भी मज़बूत बनाना और भारतीय उपमहाद्वीप में आतंक को रोकना. अभी तो परिषद् के तीन चौथाई एजेंडे पर अफ्रीकी देशों के मुद्दे ही भरे रहते हैं.

हरप्रीत पुरी 1974 की बैच के आईएफएस हैं. वे कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं. ब्राजील में भारतीय राजदूत रहते हुए उन्होंने दोनों देशों के संबंधों को बेहतर बनाया, जिसका नतीजा है कि भारत - ब्राजील कारोबार बढ़ा. वहां हो रहे राजनैतिक बदलावों के बाद भी उन्होंने संबंधों पर आंच नहीं आने दी और भारतीय हितों की रक्षा की. ब्राजील से रिश्तों की महत्ता इसलिए भी है कि वह हमारे परमाणु संसाधनों को जुटाने में मददगार है. कूटनीति में कोई भी स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, स्थायी होता है हमारे अपने देश का हित ! गत अप्रेल में ही उन्होंने निरूपम सेन की जगह यूएन में स्थाई भारतीय प्रतिनिधि का पद संभाला था. वे विदेश मंत्रालय में आर्थिक मामलों के सचिव भी रह चुके हैं.

हरप्रीत पुरी भी मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया की तरह अर्थशास्त्र के जानकार हैं और विश्व व्यापार संगठन के साथ हुए समझौतों में उन्होंने महती भूमिका निभाई थी. आप समझौते से असहमत हो सकते हैं लेकिन वैश्विक दबावों के सामने बेहतर से बेहतर कार्य की ही उम्मीद की जा सकती है. अब उनकी भूमिका आतंकवाद से निपटने की रणनीति बनने की है और वह रणनीति केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए होगी. वे एक कूटनीतिज्ञ हैं और जब राजनीतिक हदें ख़त्म होती हैं तक कूटनीति आगे बढ़ती है.
--प्रकाश हिन्दुस्तानी

दैनिक हिन्दुस्तान
08 जनवरी 2010