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Saturday, February 01, 2014
Monday, January 27, 2014
दोमुंहेपन का है यह दौर
वीकेंड पोस्ट के 25 जनवरी 2014 के अंक में मेरा कॉलम
ये दौर दोमुंहे होने का है। सच्चे आदमी को कोई स्वीकार ही नहीं कर पाता। ऐसा क्यों हो गया कि बगैर नक़ाब के आप को दूसरे लोग पसंद ही नहीं कर पाते। घर में बीवी से भी सच कह दो तो वह बुरा मान लेती है। बच्चे भी। इसके बावजूद कभी-कभी ऐसा लगता है कि दुनिया अचानक प्रेममय हो गयी है, तभी तो 'सॉरी' और थैंक्स' की तरह ही 'लव यू' जैसे शब्द भी कॉमन हो गए हैं। जैसे सॉरी बोलते वक़्त कई लोगों के चहरे पर आप साफ़ साफ़ पढ़ सकते हैं --''अबे साले, मैं शरीफ नज़र आना चाहता हूँ, इसलिए बोल रहा हूँ; वरना काहे का सॉरी-वारी?'' अथवा --''ले कह रहा हूँ सॉरी, अब भेजा मत खा '' . यही हाल 'थैंक्स' का है, लोग कंप्यूटर की तरह 'थैंक्स' बोल देते हैं। ''थैंक्स बोल दिया ना, अब क्या जान लेगा बे?'' या फिर थैंक्स बोलते ही हिसाब हो गया बराबर! वे कहाँ गए सॉरी या थैंक्स अपनी जुबान से नहीं बोलता था, लेकिन अपनी आँखों या मुस्कान से ये शब्द बोल देता था। आजकल जिसे देखो, 'लव यू' बोल रहा है। आम जनजीवन में भी और राजनीति में भी।
राजनीति में तो इसका चरम देखने को मिलता है। आज़ादी के बाद का वह दौर याद कीजिए -- कॉंग्रेस के एक नेता को अधिकांश नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में थे, पंडित जवाहरलाल नेहरू को नहीं। लेकिन गांधीजी चाहते थे, नेहरू प्रधानमंत्री बनें। गांधीजी ने कॉंग्रेस के नेताओं से बात करने के बजाए वल्लभ भाई पटेल को बुलाया और कहा --''सरदार, जवाहर को प्रधानमंत्री बन जाने दो क्योंकि अगर जवाहर प्रधानमंत्री नहीं बना तो उसका दिल टूट जाएगा। '' …और इस तरह नेहरू प्रधानमंत्री बन गए। अब आप ऐसी बात की कल्पना भी नहीं कर सकते। अब तो ग्राम पंचायत के चुनाव में पंच बनाने तक के मुद्दे पर तलवारें खिंच जाती हैं।
राजनीति में लोग अकसर नैतिकता और सिद्धांत की बात करते हैं, लेकिन थोड़े ही वक़्त में उनकी सच्चाई सामने आ जाती है। अब आप नरेन्द्र मोदी को ही ले लीजिए। नरेन्द्र मोदी कह रहे हम लालकृष्ण आडवाणी जी के सपने को साकार करेंगे। भाई, आडवाणी जी का पहला सपना तो प्रधानमंत्री बनना है और आप बीच में घुस गए 'पीएम इन वेटिंग' बनकर। 'पीएम इन वेटिंग' मुहावर ही गढ़ा गया था आडवाणी जी के लिए। अब अगर एनडीए को बहुमत मिल जाए तो क्या आप आडवाणी जी का सपना साकार होने देंगे ?
आप सड़क से गुजर रहे हों और कोई भिखारी कटोरा लेकर खड़ा हो और आप उस कटोरे में एक दो रुपये का सिक्का दाल दें। अब वह भिखारी यह कहता फिरे कि उसने आपसे कोई भीख नहीं मांगी थी, आपने ही उसके कटोरे में सिक्का डाल दिया था और फिर वह कहे कि आपको सिक्का डालने के लिए पछताना पड़ेगा। अब आप क्या महसूस करेंगे और क्या उस खिखरी से बदला लेने जायेंगे? इस बात को राजनीति में यों देखिये कि अब केजरीवाल कह रहे हैं कि हमने कॉंग्रेस से कोई सहयोग नहीं माँगा था। आपने दिल्ली के उप राज्यपाल को क्यों नहीं लिखकर दे दिया कि हमें कॉंग्रेस की मदद नहीं चाहिए। मुख्यमंत्री बनने के लिए रायशुमारी की नोटंकी करनेवाले केजरीवाल को क्या यह नहीं मालूम कि लोगों ने उनकी पार्टी को बहुमत नहीं दिया था और क्या लोगों का वोट रायशुमारी नहीं?
राहुल गांधी फरमा रहे हैं कि हमारी पार्टी संविधान के अनुसार चलती है और अगर यूपीए को बहुमत मिला तो सांसद मिलकर ही नेता का चुनाव करेंगे। कितने लोगों को इस बात पर यकीन होगा ? शायद किसी को भी नहीं। सीधे सीधे क्यों नहीं कह देते कि सम्भावना नहीं नज़र आ रही, इसलिए अभी यह कह रहे हैं, सम्भावना बहते ही गद्दी हड़प लेंगे।
भारतीय राजनीति में दोमुंहेपन का यह दौर चरम पर है। अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियां अवसरवादी हैं और चिकने लोटे की तरह वे कभी यूपीए तो कभी एनडीए की तरफ हो जाती हैं। लोकसभा चुनाव में शायद इस बार सबसे घटिया नेताओं से हमारा सामना होगा।
--प्रकाश हिन्दुस्तानी
(वीकेंड पोस्ट के 25 जनवरी 2014 के अंक में मेरा कॉलम)
Monday, January 20, 2014
ऐसे बन जाइए आप भी प्रगतिशील !
वीकेंड पोस्ट के 18 जनवरी 2014 के अंक में मेरा कॉलम
(जनहित में जारी )
आज बाजार में एक अनोखा पार्लर देखा। प्रोग्रेसिव पार्लर, लिखा था -हमारे यहां आपको प्रोग्रेसिव यानी प्रगतिशील बनाया जाता है। प्रगतिशील कहलाने के सर्टिफिकेट मिलते हैं। ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती और कुछ लोग बन जाते हैं प्रगतिशील। जैसे ब्यूटी पार्लर में जाकर स्त्रियां हसीन और पुरुष जवांमर्द होने का भ्रम पाल लेते हैं, वैसे ही ये प्रगतिशील लोग पत्रकारिता में, राजनीति में, धर्म में घुस गए हैं और न केवल अपना पार्लर चला रहे हैं, बल्कि उनसे असहमत लोगों के खिलाफ फतवा भी जारी कर देते हैं। नैतिकता का ठेका इन्हीं के पास है।
इन पार्लरवालों के पास तरह-तरह के क्रीम, लोशन, तेल, पावडर और न जाने कैसी जड़ी बूटियां हैं कि पूछो मत। मैंने अपने भेदिये से कुछ फार्मूले पता किए हैं। जनहित में यहां उजागर कर रहा हूं।
- प्रगतिशील कहलाने की पहली सीढ़ी है बीड़ी। 'बीड़ी जलइले जिगर से पिया, जिगर में बड़ी आग हैÓ जैसा कालजयी गाना यों ही नहीं बना। आप धूम्रपान करते हो या नहीं, बीड़ी पीना शुरू कर दीजिए। बीड़ी किसी भी इनसान को तत्काल प्रभाव से प्रोग्रेसिव बना देती है। दिल्ली में, जेएनयू में यह आजमाया हुआ फार्मूला है। अनेक बड़े लोग भी बीड़ी पीते हैं, जैसे जी-टीवी के सुभाष चंद्राजी।
- अगर आप समलैंगिकता के विरोधी भी हों, तो भी इसके समर्थन में बयान दीजिए। इसे व्यक्तिगत आजादी से जोडि़ए। गे सेक्स को प्रगतिशीलता का प्रतीक और पैमाना कहिए। इसके पक्ष में कुतर्क कीजिए। दुनियाभर के कानूनों का जिक्र कर डालिए। गे सेक्स के विरोध में बोलने वालों को धर्मांध, दकियानूस, पिछड़ा घोषित कीजिए।
- हमेशा बहुसंख्यक वर्ग को गालियां दीजिए, कोसिए। हिन्दू, बहुसंख्यक होने के कारण गालियां खाने के स्वाभाविक हकदार हैं ही। उन्हें हमेशा गाली ही दें, पुरुषों को भी जल्लाद-धूर्त-शोषक कहें, भले आप पुरुष हों। याद रखें आपको प्रगतिशील कहलाना है तो इसके लिए हिंदुओं को हमेशा कोसना अनिवार्य है। औरतों की तरफदारी में मर्दों को गाली देना पवित्र माना गया है।
- हमेशा भारतीय सभ्यता और संस्कृति की बखिया उधेड़ते रहें। भारत से खराब देश विश्व में कोई नहीं। सवर्णों ने, ब्राह्मणों ने कितने भी बलिदान दिए हों, उन्हें तो शोषक ही कहना पड़ेगा। याद रखिए कि अतीत में इस वर्ग का कोई भी ऐसा आदमी समाजसेवक नहीं हुआ, शोषक ही हुआ, उसने कोई त्याग नहीं किया। विप्र समाज का अपमान कीजिए। धर्म की हर बात को घटिया कहना जरूरी है प्रगतिशील कहने के लिए।
- एसएमएस सर्वे को हमेशा सही करार दीजिए, बाकी सभी को खाप पंचायत कहिए। टीवी न्यूज चैनल पंचायत की तारीफ कीजिए। अलग-अलग समाजों के संगठन का विरोध यह कहकर कीजिए कि ये लोग समाज को बांट रहे हैं।
- एनिमल वेलफेयर पर भाषण दीजिए और गौवंश की हत्या को विकास का आवश्यक अंग कहिए। सूअर के मांस भक्षण को धर्म से जोडि़ए। रावण की जयजयकार कीजिए। असुरों के सुर से सुर मिलाइए। बुजुर्गों की अनसुनी करते रहिए, अनुभवी को पिछड़ा और युवा को हमेशा महान।
- होली पर पानी बचाने की बात कीजिए, दीपावली पर बिना शोर के त्योहार मनाने का दावा कीजिए। नए साल के स्वागत का जश्न फूहड़ तरीके से, अश्लील नाच- गानों के साथ, शराब पीकर, मुर्गा खाकर मनाइए। पवित्र नवरात्र को व्यभिचार पर्व कहेंगे तो ज्यादा प्रगतिशील बन जाएंगे।
- अगर आप महिला हैं तो लिव इन रिलेशन में रहिए, शादी हो गई हो तो एकाध तलाक प्रगतिशील बना देगा। अगर आप पुरुष हैं तो छुट्टे सांड की तरह रहिए। आजाद, बेखौफ और अराजक। जिम्मेदारी से दूर। बातों के सूरमा! लेकिन अगर आप पुरुष या महिला दोनों नहीं हैं, तब तो आप सच्चे प्रगतिशील हुए। तभी तो एक 'टीवी खाप शोÓ में एक महिला ने कहा था --'जब मुझे पता चला कि मेरा बेटा (?) वैसा है तो मुझे उस पर गर्व हुआ।Ó
धन्य हैं ये प्रगतिशील लोग।
-- प्रकाश हिन्दुस्तानी
(वीकेंड पोस्ट के 18 जनवरी 2014 के अंक में मेरा कॉलम)
Saturday, January 11, 2014
भ्रष्टाचार प्रकोष्ठ के नेता का इंटरव्यू
वीकेंड पोस्ट के11 जनवरी 2014 के अंक में मेरा कॉलम
( महान पार्टी के नेता के इंटरव्यू का ट्रांसस्क्रिप्ट )
मैं : सर, मैं भ्रष्टाचार लाइव चैनल से हूँ। आपके कुछ बाइट्स चाहिए।
नेता : वो तो ठीक है, पर ये कौन सा चैनल है ?
मैं : भ्रष्टाचार लाइव ! अभी अभी चालू हुआ है सर।
नेता : ये क्या नाम है चैनल का ?
मैं : सर, यह सच्चा चैनल है। देश और प्रदेश में हर तरह के चैनल हैं ना; न्यूज़, फ़िल्म, संगीत, धर्म, युवा, कार्टून, खेल, फैशन, बिजनेस चैनल जैसा ही यह भ्रष्टाचार लाइव चैनल है!
नेता : ये चैनल नेशनल है या रीजनल ?
मैं ; सर, मैं तो नेशनल चैनल से हूँ , हमारे रीजनल चैनल भी हैं भ्रष्टाचार लाइव एम पी -सीजी, भ्रष्टाचार लाइव यूपी-उत्तराखंड, भ्रष्टाचार लाइव दिल्ली एन सी आर, भ्रष्टाचार लाइव राजस्थान, भ्रष्टाचार लाइव बिहार-झारखंड …
नेता : बहुत अच्छे ! पार्टी ने मुझे प्रकोष्ठ का प्रमुख बनाया है और आप भ्रष्टाचार लाइव के ब्यूरो चीफ हैं। मिलते रहा करो।
मैं : सर, आपके बाइट्स चाहिए दो तीन मुद्दों पर।
नेता : क्यों मुझे मरवाएगा क्या? भाग यहाँ से.....
मैं : मैं ऐसा कैसे सोच सकता हूँ सर? दादा, आप तो माई बाप हो, आप की दया के किस्से तो सब जानते हैं। आप कितने दयालु हो यह किसी से छुपा है क्या ? मैं तो क्या मेरा मालिक भी आपके गुणगान में लगा रहता है , हमारा चैनल आप का सेवक है.....सर, मेरी नौकरी चली जाएगी बाइट नहीं मिली तो ....
नेता : ठीक है, ठीक है … चल पूछ.…
मैं : थैंक यू सर, ( माइक अड़ाने के बाद) भ्रष्टाचार प्रकोष्ठ का नेता बनकर कैसा लग रहा है ?
नेता : अबे हट, तेरे कू तो येई नई पता के मैं भ्रष्टाचार प्रकोष्ठ का नहीं, भ्रष्टाचार उन्मूलन प्रकोष्ठ का प्रमुख हूँ। हट.... हट.... हट.... हट....
मैं : सर, मेरा मतलब ये ही था ---- (माइक को नेता के मुंह के और पास लगाते हुए) आप भ्रष्टाचार के लिए क्या करनेवाले हैं ?
नेता : जैसा पार्टी के माननीय अध्यक्ष ने कहा है, हम किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को सहन नहीं करने वाले। एक-एक को चुन-चुन कर जेल भिजवाकर रहेंगे। हमारी नीति साफ़ है। हम साफ़ सरकार देंगे। हमारी सरकार के रहते किसी का भी हक़ मारा नहीं जा सकता।
मैं : सर-सर. सर, एक और बाइट प्लीज़ ! जबसे आप इस प्रकोष्ठ के प्रमुख बने हैं पूरे प्रदेश में भ्रष्टाचार रुक गया लगता है , आपके राष्ट्रीय नेता भी यह बात कह चुके हैं, अब क्या आप अपने अनुभव का लाभ दूसरे राज्यों को भी देंगे?
नेता : ये सवाल बड़ा ही इंटेलेक्चुअल है। बिल्कुल बिल्कुल सही। पार्टी जो भी आदेश देगी सेवा के लिए, करेंगे।
मैं : सर, एक और सवाल, आपको बहुत बहुत बधाई सर, कि आप एक महा आयोजन करवा रहे हैं, जिसमें बीस लाख लोगों को इकठ्ठा किया जाएगा। इसका उद्देश्य क्या है ?
नेता : हमारी नीतियों के समर्थन में बीस-तीस लाख लोग आ रहे हैं -- यही बताने कि ईमानदारी की मिसाल हमने रखी है, वह सही है।
मैं : ( माइक हटा, केबल समेटते हुए) सर, एक काम करा दो ना, मेरा एक कजिन है ई ई, आर पी सिंह दरबार, कोई मलाईदार पोस्टिंग मिल जाती तो। …
नेता ; अबे तू ठहरा पंडित तो तेरा भाई सिंह कैसे हो गया रे ? मेरे को चूना लगाएगा?
मैं : सर भाई नहीं है पर भाई जैसा है , सेवा शुल्क चुका देगा
नेता : ये बोल. करा दूँगा, सेवा शुल्क ! हें हें हें, अच्छा वर्ड बनाया है रे।
मैं : सर गरीबों की तरफ से एक याचना है। नए शहर में बड़े चौक पर गरीबों की गुमटियां न हटाई जाए सर ,रोजी रोटी का सवाल है बेचारों का, बेचारे गरीब कहाँ जाएंगे …?
नेता : तेरी गुमटी है, कौन सी ?
मैं : बड़े भैया की है जो प्रॉपर्टी का काम करते हैं....सब उनकी ही है बीस-पच्चीस होगी सर.
नेता : ठीक है, उनको बोलो रैली में, भंडारे में सबको आना चाहिए पार्टी के साथ। गरीबों की पार्टी है, लगना भी चाहिए।
मैं : थैंक्यू सर, थैंक्यू सर , एक और जरा सी बात है …हमारे सम्पादक जी ने धन्यवाद कहा है और एक और प्रार्थना की है कि उनके जो भाई पुलिस में ए एस पी हैं न, उनको ट्रांसपोर्ट विभाग में ट्रांसफर चाहिए सर …।
नेता ; मैं एयरपोर्ट जा रहा हूँ, तू भी गाड़ी में बैठ जा, रस्ते में बात कर लेंगे। तू तो अपना ही आदमी है, मिलकर काम करेंगे तो दोनों आगे तक जायेंगे।
मैंने माइक कैमरामैन को दिया और कहा तू चल, मैं नेताजी के साथ जा रहा हूँ। कैसेट अपने पास ही रखना, नेता जी काम करेंगे तो ही खबर चलवाएंगे, वरना ……।
--प्रकाश हिन्दुस्तानी
(वीकेंड पोस्ट के11 जनवरी 2014 के अंक में मेरा कॉलम)
Monday, January 06, 2014
चला गया 2013 !
वीकेंड पोस्ट के 4 जनवरी 2014 के अंक में मेरा कॉलम
=
2013 में यह हुआ :
--सलमान और राहुल गांधी की शादी नहीं हो सकी। बेचारे दोनों चिरकुंवारे। काम-धंधे के मारे। पकिस्तान की वीना मलिक भारतीय, ब्रिटिश, आस्ट्रेलियाई आदि के प्रेमियों की वेटिंग लिस्ट अधूरी छोड़ गई और दुबईवाले की हो गई। बेचारी पूनम पाण्डे, शर्लिन चोपड़ा और पायल रोहतगी का यहाँ-वहाँ डोरे डालना (या बांटना ?) कोई काम नहीं आ पाया।
--राहुल के प्रधानमंत्री पद की घोषणा नहीं हो सकी। मोदी की हो गई। चैनलवालों ने तो केजरीवाल, करात, मायावती, मुलायम, जयललिता और न जाने किस किस को प्रधानमंत्री का दावेदार बता डाला। अभी और भी कई भावी प्रधानमंत्री आयेंगे।
--मध्यप्रदेश में कांग्रेस की वापसी दस साल बाद भी नहीं हो सकी। पार्ट टाइम पॉलिटिशंस पिछड़ गए बेचारे। अब वास्तव में काम-धंधा खोजना होगा। छतीसगढ़ में भी यही हुआ। शीला आंटी ने बहुत काम किया था, लेकिन लोगों ने फिर भी खिलाफ में हवा बना दी और उनका फिर सी एम बनने का सपना धरा रह गय़ा। डॉक्टर हर्षवर्धन 32 विधायकों के टॉनिक के बावजूद मरीज़ हर्षवर्धन बन गए। राजस्थान में लोगों ने रॉयल फेमिली की ही नेता को फिर चुना।
--तरुण तेजपाल, आसाराम और नारायण साईं की जमानत नहीं हो सकी। लोग कि बाबा लोग अति करने में मारे गए। अहंकार भी था, जो ले डूबा। तेजपाल का तेज जाता रहा। उसे मोनिका लेविंस्की का रोल करना भारी पड़ा और उससे भी भारी पड़ा माफ़ी मांगना।
-- सचिन ने आखिरकार रिटायर होकर बड़ी राहत दी। भारत रत्न- राज्यसभा सदस्य और न जाने क्या क्या हो गए और देशवासियों पर महान उपकार किया। कुछ लोगों का कहना है कि अब अभय कुरवीला और वेंकटेश प्रसाद को भी सचिन की राह पकड़ लेनी चाहिए।
--केजरीवाल शासन-प्रशासन कैसा भी चलायें --टीवी चैनलों पर एंकरों से भी ज्यादा वक़्त छाये रहे हैं और आगे भी छाये रहेंगे। वे टीवी चैनलों के लिए कपिल शर्मा के 'अवतार' हैं जिनके बिना बुलेटिन अधूरा रहता है। केजरीवाल जानते हैं कि दिल्ली की आई इस ठण्ड में कोई परिवार 700 लीटर पानी रोज मांगेगा नहीं। ऐसी ठण्ड में लोग नहाना तो क्या, धोना भी नहीं चाहते!
--संजय दत्त खातिर जैल यात्रा पर हैं, पर वे जैसे पेरोल लेते हैं, वैसे तो भैनजी बच्चों को पानी पेशाब की छुट्टी भी नहीं देती। मान्यता दत्त की मान्यता है कि दुल्हन वही जो पेरोल दिलवाये।
--धूम-3 भी आ गई। लोगों ने झेली। आशा है यशराज का बैनर अब देश पर कृपा करेगा। अगर उदय चोपड़ा यश चोपड़ा का बेटा नहीं होता तो शायद अपने पैसे से ऐसी महँगी फ़िल्म में काम करना तो दूर, धूम-3 का महंगा टिकिट भी नहीं खरीद पाता। अब देश उदय की तरफ आशा भरी निगाहों से देख रहा है क्योंकि उन्होंने भी संन्यास की घोषणा की है।
--बीता साल दिल टूटने का भी रहा। अण्णा का केजरीवाल से वैसे ही दिल टूटा, ह्रतिक रोशन का सुजैन से। जिआ खान ने आत्महत्या कर ली। नॉएडा के तलवार दंपत्ति को मिला।
--दिल टूट गया जब दौडियाकलां में खुदाई हुई, कुछ मिला नहीं। गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च सनी लिओनी की हुई। भारत महान है क्योंकि यहाँ क़ानून अंधा है, पी एम गूंगा, आसाराम संत, वाड्रा किसान।
--प्रकाश हिन्दुस्तानी
(वीकेंड पोस्ट के 4 जनवरी 2014 के अंक में मेरा कॉलम)
Monday, June 03, 2013
ऋतु दा या ऋतु दी....?
ऋतुपर्णो घोष या ऋतु दा(?) बहुत महान फिल्मकार थे. इसमें दो मत नहीं. लेकिन वे जो 'व्यक्ति' थे, जैसे 'शख्स' थे, उसके लिए हिन्दी में शब्द ही नहीं है. जेंडरनिरपेक्ष शायद! {जातिनिरपेक्ष यानी जाति से निरपेक्ष, धर्मनिरपेक्ष यानी धर्म से निरपेक्ष} शायद इसलिए कि वे जेंडर से निरपेक्ष, उससे ऊपर पहुँच चुके थे. लिपस्टिक,काजल,फाउन्डेशन,रूज़, खिज़ाब का उपयोग समझ में आता
है, स्त्रीयोचित ज़ेवर, सलवार-कुर्ता-दुपट्टा के शौकीन होना भी उनकी अपनी
पसंद थी. ठीक है. ...पर राखी सावंत बनने की ज़िद में ब्रेस्ट इम्प्लान्ट और
हार्मोंस लेना जेंडरनिरपेक्षता नहीं, कुछ और ही है. उन्हें कई बीमारियों
ने घेर लिया था, लेकिन हार्मोन्स का शौक जारी था. चाहते क्या थे, शायद
उन्हें खुद पता नहीं था.
बेचारे बच्चे कंफ्यूज़ा जाते थे कि उन्हें अंकल कहें या आंटी; सह कलाकार चाहकर भी ऋतु दा को ऋतु दी नहीं बोल पाते थे कि बरसों से ऋतु दा बोल रहे हैं तो अब 'दी' कैसे कहें? वह भी तब, जब वे दी हैं भी या नहीं, पता नहीं हो.
प्रकृति ने जैसा बनाया, जो भी बनाया; ठीक है. उससे क्यों पंगेबाज़ी? मर्द बनाया हो या स्त्री; खुद को बेहतर इंसान बनाना प्राथमिकता होनी चाहिए. वैसे हर मर्द में एक औरत छुपी है और हर स्त्री में एक पुरुष रह रह कर कुलाँचे मारता है. इसीलिए पिता में ममत्व और माता में पिता का सख़्त अनुशासन प्रकट होता है. वैचारिक स्तर पर तसलीमा नसरीन हैं और भौतिक स्तर पर बिग बॉस फेम इमाम.
ऋतुपर्णो घोष LGBT अथवा GDS community अथवा थर्ड जेंडर के लिए समर्पित व्यक्ति भी नहीं थे. उनके माता पिता नहीं रहे, भाई ने नाता तोड़ लिया, यार कुछ और चाहते थे और वे खुद कुछ और ! उन डॉक्टरों के खिलाफ जाँच क्यों नहीं हो जिन्होंने उनके ओपरेशन किए और ख़तरनाक दवाइयाँ दीं?
ऋतुपर्णो महान फिल्मकार थे, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन ये महान लोग भी कैसे कैसे काम कर लेते थे ! जैसे गाँधीजी महान राष्ट्रनायक थे, लेकिन लोगों के विरोध के बावजूद उन्होंने 'सत्य के प्रयोग' कर डाले. तब टीवी चैनल्स नहीं थे. पर अब तो है....किसी ने खुलकर चर्चा नहीं किया.
...सचमुच साधारण इंसान होना कितना अच्छा है! कितना सार्थक और कितना आसान भी!!!
--प्रकाश हिन्दुस्तानी
ऋतुपर्णो घोष या ऋतु दा(?) बहुत महान फिल्मकार थे. इसमें दो मत नहीं. लेकिन वे जो 'व्यक्ति' थे, जैसे 'शख्स' थे, उसके लिए हिन्दी में शब्द ही नहीं है. जेंडरनिरपेक्ष शायद! {जातिनिरपेक्ष यानी जाति से निरपेक्ष, धर्मनिरपेक्ष यानी धर्म से निरपेक्ष} शायद इसलिए कि वे जेंडर से निरपेक्ष, उससे ऊपर पहुँच चुके थे. लिपस्टिक,काजल,फाउन्डेशन,रूज़,
बेचारे बच्चे कंफ्यूज़ा जाते थे कि उन्हें अंकल कहें या आंटी; सह कलाकार चाहकर भी ऋतु दा को ऋतु दी नहीं बोल पाते थे कि बरसों से ऋतु दा बोल रहे हैं तो अब 'दी' कैसे कहें? वह भी तब, जब वे दी हैं भी या नहीं, पता नहीं हो.
प्रकृति ने जैसा बनाया, जो भी बनाया; ठीक है. उससे क्यों पंगेबाज़ी? मर्द बनाया हो या स्त्री; खुद को बेहतर इंसान बनाना प्राथमिकता होनी चाहिए. वैसे हर मर्द में एक औरत छुपी है और हर स्त्री में एक पुरुष रह रह कर कुलाँचे मारता है. इसीलिए पिता में ममत्व और माता में पिता का सख़्त अनुशासन प्रकट होता है. वैचारिक स्तर पर तसलीमा नसरीन हैं और भौतिक स्तर पर बिग बॉस फेम इमाम.
ऋतुपर्णो घोष LGBT अथवा GDS community अथवा थर्ड जेंडर के लिए समर्पित व्यक्ति भी नहीं थे. उनके माता पिता नहीं रहे, भाई ने नाता तोड़ लिया, यार कुछ और चाहते थे और वे खुद कुछ और ! उन डॉक्टरों के खिलाफ जाँच क्यों नहीं हो जिन्होंने उनके ओपरेशन किए और ख़तरनाक दवाइयाँ दीं?
ऋतुपर्णो महान फिल्मकार थे, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन ये महान लोग भी कैसे कैसे काम कर लेते थे ! जैसे गाँधीजी महान राष्ट्रनायक थे, लेकिन लोगों के विरोध के बावजूद उन्होंने 'सत्य के प्रयोग' कर डाले. तब टीवी चैनल्स नहीं थे. पर अब तो है....किसी ने खुलकर चर्चा नहीं किया.
...सचमुच साधारण इंसान होना कितना अच्छा है! कितना सार्थक और कितना आसान भी!!!
--प्रकाश हिन्दुस्तानी
Monday, July 02, 2012
उसके दुश्मन हैं बहुत, आदमी अच्छा होगा !!!
यशवंत सिंह ने क्या किया, यह तो पता नहीं, लेकिन उनके खिलाफ मामला बनाकर जिस तरह पेश किया गया, उसे ध्यान से देखने -समझाने के बाद ये कुछ बातें तो साफ़ हुई .
मुलाहिजा फरमाएं :
यशवंत सिंह ने किसी के साथ कोई मारपीट नहीं की, किसी को एक चांटा तक नहीं मारा, न ही किसी को भी जान से मारा या मारने की कोशिश की. उनके किसी भी कृत्य से किसी को भी खरोंच तक नहीं आई. वरना उन पर दफा 302 , 307 , 323 या 326 लगतीं या लगवाई जातीं.. ये धाराएँ नहीं लगी या लगाईं नहीं जा सकीं. यानी बन्दे ने किसी के साथ कोई ऐसी हरकत नहीं की है.
यशवंत सिंह ने किसी की मानहानि भी नहीं की, जो वे अपने मीडिया पोर्टल के जरिये कर सकते थे, यानी उन्होंने अपने मीडिया पोर्टल भड़ास पर जो कुछ भी प्रकाशित किया, उससे किसी कि मानहानि नहीं हुई, यानी मीडिया पोर्टल पर सारी बातें सही ही प्रकाशित होती रहीं होंगी. अगर उन्होंने किसी की इज्ज़त उतारी होती तो वह शख्स यशवंत के खिलाफ दफा 499 , 500 या 501 का मामला दर्ज कराता. यह नहीं हुआ, यानी उन्होंने जिसजिस के भी खिलाफ जो जो लिखा, सही लिखा.
यशवंत सिंह क्या रूपर्ट मर्डोक बनना चाह रहे होंगे और इसके लिए रंगदारी यानी एक्स्टार्शन पर उअतर आये होंगे और वह भी किसी और से नहीं, इसी मीडिया के किसी शख्स से? कौन यकीन करेगा?
आजकल अगर आप थोड़े रिसोर्सफुल हैं और थोड़ा खर्चा करने की कूवत रखते हों तो किसी के भी खिलाफ थाने में पव्वा लगाकर केस दर्ज करा दीजिये कि इन्होंने मेरा रास्ता रोका, धमकाया, गाली गलौज किया, दुष्प्रचार किया, बस आपका काम हो गया. कोई सरकारी कर्मचारी तो कुछ कर ही नहीं पायेगा, अगर कोई आजादखयाल इंसान हो तो ऐसी हरकतों से उस व्यक्ति को परेशान किया जा सकता है.
ऐसे लोग क्यों भूल जाते हैं कि वे किसी थाने में सेटिंग कर सकते हैं, किसी अफसर को पता सकते हैं, न्यायपालिका को नहीं बरगला सकते. न्यायालय के सामने सारे तथ्य पहुँचाने दीजिये, यशवंत सिंह की ज़मानत तत्काल हो जायेगी. उनके निंदकों का आभार मानना चाहिए कि इससे बन्दे के दम ख़म का पता बाकी लोगों को भी चल जाएगा. यह पता चल जाएगा कि मीडिया के समंदर में ही कितने बड़े बड़े शार्क हैं जो रोजाना छोटी मछलियों को निगल रहे हैं. ये लोग चाहते हैं कि शोषित - पीड़ित, दूरस्थ मीडियावालों की बात कहने वाला कोई सामने न आ सके और अगर वह आये तो उसे इतना परेशान कर दो कि दूसरों के लिए नजीर बन जाए. ऐसे व्यक्ति को बदनाम कर दो, शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर दो ताकि वह फिर किसी और की तो क्या अपनी बात भी कहने का साहस न कर सके.
.....पर ऐसा नहीं होगा, और जो होगा ऐसा लगता है कि मीडिया जगत में कुछ अच्छा, बहुत ही अच्छा होगा. यह उसका पूर्व पाठ है. पुलिस ने जिस वहशियाना तरीके से यशवंत सिंह के खिलाफ कार्रवाई की , उसकी जितनी निंदा की जाये, कम है. पुलिस को इतनी जल्दी क्या थी एफ आई आर की? सुना है कि यूपी में तो एफ आई आर करने में ही जान निकल जाती है और फिर यशवंत सिंह के खिलाफ शिकायत हुई तो उन्हें भी क्रास कंप्लेन का मौका दिया जाना था. जिस तरह की धाराएं उनके खिलाफ लगाईं गयी हैं, वैसे केस तो नॉएडा - दिल्ली में रोजाना हजारों लिखे जा सकते हैं, मगर जिस तेजी से यशवंत सिंह के खिलाफ कार्रवाई की गयी, वह चौंकानेवाली बात है.
निदा फ़ाज़ली की एक ग़ज़ल की पंक्तियाँ हैं :
उसके दुश्मन हैं बहुत, आदमी अच्छा होगा
वो भी 'तेरी' तरह इस शहर में तन्हा होगा
इतना सच बोल कि होंठों का तबस्सुम न बुझे
रोशनी ख़त्म न कर आगे अंधेरा होगा
---प्रकाश हिन्दुस्तानी
2 / 7 / 2012
Sunday, January 15, 2012
जिंदगी में हर जगह है इम्तिहान
रविवासरीय हिन्दुस्तान (15-01-2012)के एडिट पेज पर मेरा कॉलम
जिंदगी में हर जगह है इम्तिहान
जिनकी मदद से आप कामयाब हुए हैं, उन्हें क्या आपने श्रेय दिया है? सबसे बड़ी बात यह है कि आपमें विजय या कामयाबी के बाद मानवीयता का अंश बढ़ा है या नहीं? अगर सफलता से मानवीयता का अंश नहीं बढ़ता, तो वह उपयोगी नहीं रह जाएगी।
नंदन नीलेकणि फिर परीक्षा दे रहे हैं। संसद की स्थायी समिति ने उस परियोजना को खत्म करने की सिफारिश की है, जिसके तहत देश के हरेक नागरिक के लिए ‘आधार’ नाम से विशिष्ट पहचान प्रणाली के कार्ड दिए भी जा रहे थे। केंद्र सरकार यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया की इस योजना को लोगों को, खासकर गरीबों को मिलने वाली कई सुविधाओं से जोड़ा जाना था।
योजना की तकनीकी जटिलता और इसके लिए इनोवेशन की जरूरत को देखते हुए यह जिम्मेदारी नंदन नीलेकणि को सौंपी गई थी। लेकिन अब इस पर ब्रेक लग गया है। इस झटके के बावजूद वह अपने काम में व्यस्त हैं और भविष्य की योजनाएं बना रहे हैं। नीलेकणि इतनी जल्दी हार मानने वाले नहीं हैं। उनके पास भारत की और उसके भविष्य की एक परिकल्पना है। इन्हें उन्होंने अपनी किताब इमेजिंग इंडिया नाम की किताब में विस्तार से दिया है।
स्पष्ट लक्ष्य, ध्यान निशाने पर
नंदन नीलेकणि मानते हैं कि उनकी कामयाबी का एक प्रमुख कारण यह रहा है कि उन्होंने इन्फोसिस की स्थापना के पहले अपना लक्ष्य तय कर रखा था और उसी पर अपना सारा ध्यान केंद्रित भी कर लिया था। ‘हम सभी इस बात पर एकमत और दृढ़ थे कि हमें किस इंडस्ट्री में जाना है और उसके किस क्षेत्र पर ध्यान टिकाना है। हमारा बिजनेस मॉडल क्या होगा और हम किस वैल्यू सिस्टम को अपनाएंगे। हमारे मुखिया कौन होंगे, उनके क्या अधिकार होंगे और किन बातों का फैसला वह अपने सहयोगियों से पूछे बिना नहीं करेंगे।
...स्पष्ट लक्ष्य के कारण ही इन्फोसिस नास्दाक में लिस्टेड पहली भारतीय कंपनी बनी। अपने कर्मचारियों को स्टॉक ऑप्शन देने वाली पहली कंपनी भी बनी। अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहने के कारण ही केवल दस हजार रुपये और एक फ्लैट के ड्रॉइंग रूम से शुरू होने वाली यह कंपनी 2004 में एक अरब डॉलर के कारोबारी लक्ष्य तक पहुंच सकी।’
जीत के लिए मैदान में होना जरूरी
‘मैदान में डटे रहो, डटे रहो, डटे रहो। जब आप कोई भी महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए मैदान पकड़ते हैं, तो सबसे बड़ी चुनौती होती है मैदान में बने रहने की।कई लोग आपकी स्पर्धा में आ जाते हैं, कई लोगों को आपके काम से बाधा पहुंचती है और कई किसी और को खुश करने के इरादे से आपको नुकसान पहुंचाने के लिए मैदान में आकर खड़े हो जाते हैं। ऐसे में अगर जीत हासिल करना है, तो मैदान में बने रहना जरूरी है। अगर मैदान ही छोड़ दिया, तो जीत की आस ही नहीं रहती। इसलिए आप किसी भी कार्यक्षेत्र में हों, मैदान छोड़कर न हटें।
फिल्मों के अलावा कोई भी चमत्कार मिनट या घंटों में नहीं होता, उसके लिए संघर्ष व साधना करनी पड़ती है। इन्फोसिस को ही लें, उसे पब्लिक कंपनी बनाने में 12 वर्ष लग गए। एक अरब डॉलर का कारोबारी लक्ष्य पाने में 23 वर्ष लग गए, पर एक बार अगर आपने लक्ष्य को पा लिया तो, अगला लक्ष्य पाना आसान होता है। एक अरब डॉलर तक पहुंचने में भले 23 साल लगे हों, दस अरब डॉलर का लक्ष्य पाने में 23 महीने भी नहीं लगे।’
झटकों से घबराएं नहीं
‘आप जीवन में कुछ भी करें, झटके लगना लाजिमी है। याद रखिए, कामयाबी का सफर हमेशा ही सुखकर नहीं होगा। उसमें झटके आएंगे व नाकामियां भी मिलेंगी। सारा सफर हाइवे-सा ही हो, जरूरी नहीं। कोई भी कार्य करने के पहले संतुष्ट हो जाएं कि इसे करने में कुछ न कुछ दिक्कतें आनी ही हैं। इससे निपटने का बढ़िया तरीका यह है कि हर झटके से सबक सीखते रहें, ताकि अगली बार वैसा ही झटका न सहना पड़े। यह भी जरूरी है कि आप हर झटके के लिए मानसिक तैयारी रखें। हर झटके के बाद की शिक्षा को गांठ बांधना न भूलें।
सबसे बड़ी बात यह कि सफर छोड़े नहीं। अगर मंजिल तक पहुंचना है, तो सफर जारी रखना एकमात्र उपाय है। अपनी नाकामी के लिए किसी और को जिम्मेदार मत ठहराइए, क्योंकि आपकी विफलता के लिए कोई और जिम्मेदार हुआ, तो आपकी सफलता का श्रेय भी उसे ही देना होगा। अपनी नाकामी का जिम्मा लें और कामयाबी का जश्न मानते चलें।’
सफलता में दिमाग ठीक रखें
‘खुद को उन लोगों में शुमार होने से बचाएं, जो कामयाबी हजम नहीं कर पाते। ...तेनजिंग नोर्गे ने एवरेस्ट पर, नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर झंडा गाड़ा, तो क्या वे वहीं बस गए? याद रखिए, जो ऊपर जाता है, कभी न कभी नीचे भी आता है। सफलता स्थायी नहीं होती। अत: उसे कभी दिमाग खराब मत करने दो। याद करो कि क्या किया, जो सफल रहे और अगली बार उसे किस तरह दोहराओगे कि फिर सफलता मिले। विफल होनेवालों का उपहास न करो, उनकी नाकामी की भी समीक्षा करो। जिस कार्य के लिए आप सफल हुए हैं, जरा सोचो कि क्या उसका कोई और बड़ा लक्ष्य भी हो सकता है। जिन लोगों की मदद से आप कामयाब हुए हैं, उन्हें क्या आपने श्रेय दिया है? सबसे बड़ी बात यह है कि आपमें विजय या कामयाबी के बाद मानवीयता का अंश बढ़ा है या नहीं? अगर सफलता से मानवीयता का अंश नहीं बढ़ता, तो वह उपयोगी नहीं रह जाएगी।’
नए नजरिये की जरूरत
नीलेकणि मानते हैं कि 60 व 70 के दशक में हम आबादी को चिंता के रूप में देखते थे। आज हमें लगता है कि वह मानव संपदा है। ‘आज चीन व जापान सहित दुनिया के कई देशों में बुजुर्गों की संख्या बहुत ज्यादा है। भारत ही ऐसा देश है, जो युवाओं का देश है। हम उद्यमियों को अब शंका की निगाह से नहीं, विकास के सारथी के रूप में देखते हैं। अब हम अंग्रेजी को साम्राज्यवाद की भाषा नहीं कहते, बल्कि दुनिया से जुड़ने का औजार मानते हैं। आजादी के बाद बरसों तक हम अपने अधिकारों के प्रति उतने सजग नहीं थे, पर आज हैं। टेक्नोलॉजी ने हमें पूरी तरह बदलकर रख दिया है।
जरा देखिए तो, देश के करोड़ों लोगों ने टेलीफोन का उपयोग नहीं किया था, पर आज वे मोबाइल क्रांति का लाभ ले रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल भी एक क्रांतिकारी कदम है। आज भारत का जो वैश्विक नजरिया है, कितने लोगों ने इसकी कभी कल्पना की थी?’
प्रकाश हिन्दुस्तानी
जिंदगी में हर जगह है इम्तिहान
जिनकी मदद से आप कामयाब हुए हैं, उन्हें क्या आपने श्रेय दिया है? सबसे बड़ी बात यह है कि आपमें विजय या कामयाबी के बाद मानवीयता का अंश बढ़ा है या नहीं? अगर सफलता से मानवीयता का अंश नहीं बढ़ता, तो वह उपयोगी नहीं रह जाएगी।
नंदन नीलेकणि फिर परीक्षा दे रहे हैं। संसद की स्थायी समिति ने उस परियोजना को खत्म करने की सिफारिश की है, जिसके तहत देश के हरेक नागरिक के लिए ‘आधार’ नाम से विशिष्ट पहचान प्रणाली के कार्ड दिए भी जा रहे थे। केंद्र सरकार यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया की इस योजना को लोगों को, खासकर गरीबों को मिलने वाली कई सुविधाओं से जोड़ा जाना था।
योजना की तकनीकी जटिलता और इसके लिए इनोवेशन की जरूरत को देखते हुए यह जिम्मेदारी नंदन नीलेकणि को सौंपी गई थी। लेकिन अब इस पर ब्रेक लग गया है। इस झटके के बावजूद वह अपने काम में व्यस्त हैं और भविष्य की योजनाएं बना रहे हैं। नीलेकणि इतनी जल्दी हार मानने वाले नहीं हैं। उनके पास भारत की और उसके भविष्य की एक परिकल्पना है। इन्हें उन्होंने अपनी किताब इमेजिंग इंडिया नाम की किताब में विस्तार से दिया है।
स्पष्ट लक्ष्य, ध्यान निशाने पर
नंदन नीलेकणि मानते हैं कि उनकी कामयाबी का एक प्रमुख कारण यह रहा है कि उन्होंने इन्फोसिस की स्थापना के पहले अपना लक्ष्य तय कर रखा था और उसी पर अपना सारा ध्यान केंद्रित भी कर लिया था। ‘हम सभी इस बात पर एकमत और दृढ़ थे कि हमें किस इंडस्ट्री में जाना है और उसके किस क्षेत्र पर ध्यान टिकाना है। हमारा बिजनेस मॉडल क्या होगा और हम किस वैल्यू सिस्टम को अपनाएंगे। हमारे मुखिया कौन होंगे, उनके क्या अधिकार होंगे और किन बातों का फैसला वह अपने सहयोगियों से पूछे बिना नहीं करेंगे।
...स्पष्ट लक्ष्य के कारण ही इन्फोसिस नास्दाक में लिस्टेड पहली भारतीय कंपनी बनी। अपने कर्मचारियों को स्टॉक ऑप्शन देने वाली पहली कंपनी भी बनी। अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहने के कारण ही केवल दस हजार रुपये और एक फ्लैट के ड्रॉइंग रूम से शुरू होने वाली यह कंपनी 2004 में एक अरब डॉलर के कारोबारी लक्ष्य तक पहुंच सकी।’
जीत के लिए मैदान में होना जरूरी
‘मैदान में डटे रहो, डटे रहो, डटे रहो। जब आप कोई भी महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए मैदान पकड़ते हैं, तो सबसे बड़ी चुनौती होती है मैदान में बने रहने की।कई लोग आपकी स्पर्धा में आ जाते हैं, कई लोगों को आपके काम से बाधा पहुंचती है और कई किसी और को खुश करने के इरादे से आपको नुकसान पहुंचाने के लिए मैदान में आकर खड़े हो जाते हैं। ऐसे में अगर जीत हासिल करना है, तो मैदान में बने रहना जरूरी है। अगर मैदान ही छोड़ दिया, तो जीत की आस ही नहीं रहती। इसलिए आप किसी भी कार्यक्षेत्र में हों, मैदान छोड़कर न हटें।
फिल्मों के अलावा कोई भी चमत्कार मिनट या घंटों में नहीं होता, उसके लिए संघर्ष व साधना करनी पड़ती है। इन्फोसिस को ही लें, उसे पब्लिक कंपनी बनाने में 12 वर्ष लग गए। एक अरब डॉलर का कारोबारी लक्ष्य पाने में 23 वर्ष लग गए, पर एक बार अगर आपने लक्ष्य को पा लिया तो, अगला लक्ष्य पाना आसान होता है। एक अरब डॉलर तक पहुंचने में भले 23 साल लगे हों, दस अरब डॉलर का लक्ष्य पाने में 23 महीने भी नहीं लगे।’
झटकों से घबराएं नहीं
‘आप जीवन में कुछ भी करें, झटके लगना लाजिमी है। याद रखिए, कामयाबी का सफर हमेशा ही सुखकर नहीं होगा। उसमें झटके आएंगे व नाकामियां भी मिलेंगी। सारा सफर हाइवे-सा ही हो, जरूरी नहीं। कोई भी कार्य करने के पहले संतुष्ट हो जाएं कि इसे करने में कुछ न कुछ दिक्कतें आनी ही हैं। इससे निपटने का बढ़िया तरीका यह है कि हर झटके से सबक सीखते रहें, ताकि अगली बार वैसा ही झटका न सहना पड़े। यह भी जरूरी है कि आप हर झटके के लिए मानसिक तैयारी रखें। हर झटके के बाद की शिक्षा को गांठ बांधना न भूलें।
सबसे बड़ी बात यह कि सफर छोड़े नहीं। अगर मंजिल तक पहुंचना है, तो सफर जारी रखना एकमात्र उपाय है। अपनी नाकामी के लिए किसी और को जिम्मेदार मत ठहराइए, क्योंकि आपकी विफलता के लिए कोई और जिम्मेदार हुआ, तो आपकी सफलता का श्रेय भी उसे ही देना होगा। अपनी नाकामी का जिम्मा लें और कामयाबी का जश्न मानते चलें।’
सफलता में दिमाग ठीक रखें
‘खुद को उन लोगों में शुमार होने से बचाएं, जो कामयाबी हजम नहीं कर पाते। ...तेनजिंग नोर्गे ने एवरेस्ट पर, नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर झंडा गाड़ा, तो क्या वे वहीं बस गए? याद रखिए, जो ऊपर जाता है, कभी न कभी नीचे भी आता है। सफलता स्थायी नहीं होती। अत: उसे कभी दिमाग खराब मत करने दो। याद करो कि क्या किया, जो सफल रहे और अगली बार उसे किस तरह दोहराओगे कि फिर सफलता मिले। विफल होनेवालों का उपहास न करो, उनकी नाकामी की भी समीक्षा करो। जिस कार्य के लिए आप सफल हुए हैं, जरा सोचो कि क्या उसका कोई और बड़ा लक्ष्य भी हो सकता है। जिन लोगों की मदद से आप कामयाब हुए हैं, उन्हें क्या आपने श्रेय दिया है? सबसे बड़ी बात यह है कि आपमें विजय या कामयाबी के बाद मानवीयता का अंश बढ़ा है या नहीं? अगर सफलता से मानवीयता का अंश नहीं बढ़ता, तो वह उपयोगी नहीं रह जाएगी।’
नए नजरिये की जरूरत
नीलेकणि मानते हैं कि 60 व 70 के दशक में हम आबादी को चिंता के रूप में देखते थे। आज हमें लगता है कि वह मानव संपदा है। ‘आज चीन व जापान सहित दुनिया के कई देशों में बुजुर्गों की संख्या बहुत ज्यादा है। भारत ही ऐसा देश है, जो युवाओं का देश है। हम उद्यमियों को अब शंका की निगाह से नहीं, विकास के सारथी के रूप में देखते हैं। अब हम अंग्रेजी को साम्राज्यवाद की भाषा नहीं कहते, बल्कि दुनिया से जुड़ने का औजार मानते हैं। आजादी के बाद बरसों तक हम अपने अधिकारों के प्रति उतने सजग नहीं थे, पर आज हैं। टेक्नोलॉजी ने हमें पूरी तरह बदलकर रख दिया है।
जरा देखिए तो, देश के करोड़ों लोगों ने टेलीफोन का उपयोग नहीं किया था, पर आज वे मोबाइल क्रांति का लाभ ले रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल भी एक क्रांतिकारी कदम है। आज भारत का जो वैश्विक नजरिया है, कितने लोगों ने इसकी कभी कल्पना की थी?’
प्रकाश हिन्दुस्तानी
Sunday, January 08, 2012
ताउम्र सीखने की ईमानदारी बरतें
रविवासरीय हिन्दुस्तान (08-01-2012) के एडिट पेज पर मेरा कॉलम
ताउम्र सीखने की ईमानदारी बरतें
मेट्रो मैन के नाम से विख्यात ई. (ईलात्तूवल्पिल) श्रीधरन साल 1990 में ही भारतीय रेल सेवा से रिटायर हो गए थे, लेकिन दिल्ली मेट्रो के एमडी पद से वह करीब एक सप्ताह पहले सेवानिवृत्त हुए हैं। केरल के मुख्यमंत्री चाहते हैं कि श्रीधरन अब कोच्चि मेट्रो का कामकाज संभाल लें।
12 जून, 1932 को जन्मे ई. श्रीधरन को अस्सी साल में भी लोग नई जिम्मेदारियां सौंपना चाहते हैं। दरअसल, रेल सेवा से रिटायर होने के बाद उन्होंने कोंकण रेलवे की जिम्मेदारी संभाली थी और उसे पूरा करने के बाद बेहद चुनौतीपूर्ण दिल्ली मेट्रो का दायित्व संभाला।
पद्म विभूषण से सम्मानित श्रीधरन का मानना है कि जीवन में वही लोग कामयाब हो पाते हैं, जो हमेशा सीखने को तैयार रहते हैं। आईआईएलएम इंस्टिटय़ूट ऑफ हायर एजुकेशन के समारोह में साल 2008 में उन्होंने अपने अनुभव इस प्रकार बांटे थे :
हर जगह सीखें
मित्रो, सीखना जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है। आप कहीं भी हों, उम्र के किसी भी पड़ाव पर हों, सीखने का कोई मौका नहीं छोड़ें। पढ़ाई के बाद आप जहां कार्य करेंगे, वहां भी सीखने के अनेक अवसर आपको मिलते रहेंगे। प्रोजेक्ट मैनेजमेंट के तरीके की बात करें, तो मुझे लगता है कि दिल्ली मेट्रो में हमने कुछ ऐसी शैली अपनाई, जो प्रेरणादायी हो सकती है।
दिल्ली मेट्रो देश की कोई पहली मेट्रो नहीं है, पहली मेट्रो का श्रेय कोलकाता को है, जहां 17 किलोमीटर लंबी रेल लाइन है और वह भी ज्यादातर अंडरग्राउंड। लेकिन कोलकाता का अनुभव सुखद नहीं रहा, न तो कोलकाता के लिए और न ही देश के लिए। 17 किलोमीटर की लाइन डालने में 22 साल लग गए और इस बीच लागत भी करीब 14 गुना बढ़ गई। यह कोलकाता का ही सबक था कि हमने दिल्ली मेट्रो के लिए अलग शैली अपनाई। हमने वहां 10,500 करोड़ रुपये की 65.1 किलोमीटर की लाइन रिकॉर्ड सवा सात साल में बिछाई।
जब यह प्रोजेक्ट हमें सौंपा गया था, तब दस साल में इसे पूरा करने का लक्ष्य था, हमने पौने तीन साल पहले ही लक्ष्य प्राप्त कर लिया और वह भी तय बजट के भीतर। मैनेजमेंट के छात्रों के लिए यह एक सबक है। हमने दिल्ली मेट्रो को वर्ल्ड क्लास बनाया है, और वह भी मुख्य रूप से उधार के धन से। 10,500 करोड़ में से दो तिहाई धनराशि कर्ज की है और एक तिहाई सरकार की।
दिल्ली मेट्रो पर यह जवाबदारी है कि वह कर्ज ली गई राशि लौटाए। आज हम न केवल अपने मेट्रो परिचालन के खर्चें निकाल पा रहे हैं, बल्कि कर्ज चुकाने के लिए भी पर्याप्त व्यवस्था कर रहे हैं। हमने इस बात का पूरा खयाल रखा कि मेट्रो निर्माण के दौरान दिल्ली के लोगों को कम से कम असुविधा हो। इसके लिए मेट्रो के कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया गया था। लेकिन कोलकाता में ऐसा नहीं हो सका था।
वक्त की पाबंदी का महत्व
दिल्ली मेट्रो में वक्त की पाबंदी का अर्थ है, एकदम ठीक वक्त पर। हमें इस बात का इल्म था कि अगर हमें अपना प्रोजेक्ट वक्त पर पूरा करना है, तो हम में से हर एक को वक्त का पाबंद होना पड़ेगा। यह एक बुनियादी जरूरत थी। मुझे गर्व है कि दिल्ली मेट्रो में हम वक्त की पाबंदी मिनटों में नहीं, सेकंडों में मापते हैं। अगर कोई ट्रेन 60 सेकंड्स देर से चल रही है, तो हमारी नजर में वह विलंब से है। टोक्यो, सिंगापुर, हांगकांग जैसी जगहों पर भी तीन मिनट तक की देरी को ‘विलंब’ नहीं माना जाता।
मुझे यह बताते हुए खुशी है कि 1997-98 में हमारी 99.78 प्रतिशत मेट्रो ट्रेनें वक्त की पाबंद रहीं। मुझे लगता है कि वक्त की पाबंदी और कुछ नहीं, दूसरों के प्रति आपकी शालीनता है। आप लोगों को सेवा के लिए इंतजार नहीं करा सकते।
ईमानदार होने का मतलब
दिल्ली मेट्रो की दूसरी खूबी यह है कि वह अपने कर्तव्य के प्रति सत्यनिष्ठ है। सत्यनिष्ठ यानी सत्य के प्रति निष्ठा रखने वाला, जिसके नैतिक मूल्य ऊंचे हैं। सत्य के प्रति यही निष्ठा अच्छे चरित्र का आधार है। इसलिए करियर शुरू करते ही युवाओं को यह छवि अजिर्त करनी चाहिए। ईमानदार और सत्यनिष्ठ होने की छवि एक पासपोर्ट की तरह है। आप जहां भी जाएंगे, इनकी बदौलत अपनी छाप छोड़ते जाएंगे। हां एक और बात। अपने व्यवसाय में आगे बढ़ने के लिए आपको एक और चीज चाहिए और वह है ज्ञान यानी नॉलेज। आपको अपने विषय का श्रेष्ठ ज्ञाता होना ही चाहिए। अगर आप अपने विषय के ज्ञाता हैं, तो आपको कोई चोट नहीं पहुंचा सकता। अगर आप अपना काम ठीक से करना जानते हैं और उसे ठीक से करते हैं, तो लोग आपकी इज्जत करेंगे। आपके वरिष्ठ अधिकारी जहां आपके काम की सराहना करेंगे, वहीं जूनियर साथी आपके प्रशंसक बन जाएंगे।
तीन बातों का रखें ध्यान
दिल्ली मेट्रो परिवार में हमने एक बात का खास ध्यान रखा है और वह है सेहत। जी हां, मेरा कहना है कि आप अपनी सेहत का खास ध्यान रखें, क्योंकि अगर आप जीवन में कुछ भी पाना चाहते हैं, तो इसके लिए आपका फिट रहना जरूरी है। अच्छी सेहत के बिना आप कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। अगर आप मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं, तो आप में कार्य करने की अद्भुत क्षमता महसूस होगी। इसलिए आप अपने जीवन को व्यवस्थित कीजिए। दिल्ली मेट्रो के प्रशिक्षण विद्यालय में हमने इस बात का खास ध्यान रखा है। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि दिल्ली मेट्रो वह संस्थान है, जहां मेडिकल बिल सबसे कम है।
दूसरी जरूरी बात यह है कि आप पौष्टिक भोजन और भोजन के वक्त का भी ध्यान रखें। यह बहुत कठिन काम नहीं है, पर आपकी सेहत के लिए जरूरी है। तीसरी और सबसे बड़ी बात यह है कि आपको व्यायाम जरूर करना चाहिए। आप एयरोबिक्स, वॉकिंग, जॉगिंग और योगासन में कोई या एकाधिक तरीका चुन सकते हैं। आप स्वस्थ होंगे, तभी तो आपका दिमाग चौकन्ना रहेगा।
याद रखिए, आप केवल अपने लिए ही नहीं, अपने घर-परिवार और समाज के लिए भी काम करते हैं। आप जो भी पाते हैं, इसी समाज से शेयर करते हैं। इसलिए आपका समाज के प्रति भी कुछ दायित्व है।
प्रकाश हिन्दुस्तानी
हिन्दुस्तान (08-01-2012) के एडिट पेज पर प्रकाशित
ताउम्र सीखने की ईमानदारी बरतें
‘याद रखिए, आप केवल अपने लिए ही नहीं, अपने घर-परिवार और समाज के लिए भी काम करते हैं। आप जो भी पाते हैं, इसी समाज से शेयर करते हैं। इसलिए आपका समाज के लिए भी कुछ दायित्व बनता है।’ |
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मेट्रो मैन के नाम से विख्यात ई. (ईलात्तूवल्पिल) श्रीधरन साल 1990 में ही भारतीय रेल सेवा से रिटायर हो गए थे, लेकिन दिल्ली मेट्रो के एमडी पद से वह करीब एक सप्ताह पहले सेवानिवृत्त हुए हैं। केरल के मुख्यमंत्री चाहते हैं कि श्रीधरन अब कोच्चि मेट्रो का कामकाज संभाल लें।
12 जून, 1932 को जन्मे ई. श्रीधरन को अस्सी साल में भी लोग नई जिम्मेदारियां सौंपना चाहते हैं। दरअसल, रेल सेवा से रिटायर होने के बाद उन्होंने कोंकण रेलवे की जिम्मेदारी संभाली थी और उसे पूरा करने के बाद बेहद चुनौतीपूर्ण दिल्ली मेट्रो का दायित्व संभाला।
पद्म विभूषण से सम्मानित श्रीधरन का मानना है कि जीवन में वही लोग कामयाब हो पाते हैं, जो हमेशा सीखने को तैयार रहते हैं। आईआईएलएम इंस्टिटय़ूट ऑफ हायर एजुकेशन के समारोह में साल 2008 में उन्होंने अपने अनुभव इस प्रकार बांटे थे :
हर जगह सीखें
मित्रो, सीखना जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है। आप कहीं भी हों, उम्र के किसी भी पड़ाव पर हों, सीखने का कोई मौका नहीं छोड़ें। पढ़ाई के बाद आप जहां कार्य करेंगे, वहां भी सीखने के अनेक अवसर आपको मिलते रहेंगे। प्रोजेक्ट मैनेजमेंट के तरीके की बात करें, तो मुझे लगता है कि दिल्ली मेट्रो में हमने कुछ ऐसी शैली अपनाई, जो प्रेरणादायी हो सकती है।
दिल्ली मेट्रो देश की कोई पहली मेट्रो नहीं है, पहली मेट्रो का श्रेय कोलकाता को है, जहां 17 किलोमीटर लंबी रेल लाइन है और वह भी ज्यादातर अंडरग्राउंड। लेकिन कोलकाता का अनुभव सुखद नहीं रहा, न तो कोलकाता के लिए और न ही देश के लिए। 17 किलोमीटर की लाइन डालने में 22 साल लग गए और इस बीच लागत भी करीब 14 गुना बढ़ गई। यह कोलकाता का ही सबक था कि हमने दिल्ली मेट्रो के लिए अलग शैली अपनाई। हमने वहां 10,500 करोड़ रुपये की 65.1 किलोमीटर की लाइन रिकॉर्ड सवा सात साल में बिछाई।
जब यह प्रोजेक्ट हमें सौंपा गया था, तब दस साल में इसे पूरा करने का लक्ष्य था, हमने पौने तीन साल पहले ही लक्ष्य प्राप्त कर लिया और वह भी तय बजट के भीतर। मैनेजमेंट के छात्रों के लिए यह एक सबक है। हमने दिल्ली मेट्रो को वर्ल्ड क्लास बनाया है, और वह भी मुख्य रूप से उधार के धन से। 10,500 करोड़ में से दो तिहाई धनराशि कर्ज की है और एक तिहाई सरकार की।
दिल्ली मेट्रो पर यह जवाबदारी है कि वह कर्ज ली गई राशि लौटाए। आज हम न केवल अपने मेट्रो परिचालन के खर्चें निकाल पा रहे हैं, बल्कि कर्ज चुकाने के लिए भी पर्याप्त व्यवस्था कर रहे हैं। हमने इस बात का पूरा खयाल रखा कि मेट्रो निर्माण के दौरान दिल्ली के लोगों को कम से कम असुविधा हो। इसके लिए मेट्रो के कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया गया था। लेकिन कोलकाता में ऐसा नहीं हो सका था।
वक्त की पाबंदी का महत्व
दिल्ली मेट्रो में वक्त की पाबंदी का अर्थ है, एकदम ठीक वक्त पर। हमें इस बात का इल्म था कि अगर हमें अपना प्रोजेक्ट वक्त पर पूरा करना है, तो हम में से हर एक को वक्त का पाबंद होना पड़ेगा। यह एक बुनियादी जरूरत थी। मुझे गर्व है कि दिल्ली मेट्रो में हम वक्त की पाबंदी मिनटों में नहीं, सेकंडों में मापते हैं। अगर कोई ट्रेन 60 सेकंड्स देर से चल रही है, तो हमारी नजर में वह विलंब से है। टोक्यो, सिंगापुर, हांगकांग जैसी जगहों पर भी तीन मिनट तक की देरी को ‘विलंब’ नहीं माना जाता।
मुझे यह बताते हुए खुशी है कि 1997-98 में हमारी 99.78 प्रतिशत मेट्रो ट्रेनें वक्त की पाबंद रहीं। मुझे लगता है कि वक्त की पाबंदी और कुछ नहीं, दूसरों के प्रति आपकी शालीनता है। आप लोगों को सेवा के लिए इंतजार नहीं करा सकते।
ईमानदार होने का मतलब
दिल्ली मेट्रो की दूसरी खूबी यह है कि वह अपने कर्तव्य के प्रति सत्यनिष्ठ है। सत्यनिष्ठ यानी सत्य के प्रति निष्ठा रखने वाला, जिसके नैतिक मूल्य ऊंचे हैं। सत्य के प्रति यही निष्ठा अच्छे चरित्र का आधार है। इसलिए करियर शुरू करते ही युवाओं को यह छवि अजिर्त करनी चाहिए। ईमानदार और सत्यनिष्ठ होने की छवि एक पासपोर्ट की तरह है। आप जहां भी जाएंगे, इनकी बदौलत अपनी छाप छोड़ते जाएंगे। हां एक और बात। अपने व्यवसाय में आगे बढ़ने के लिए आपको एक और चीज चाहिए और वह है ज्ञान यानी नॉलेज। आपको अपने विषय का श्रेष्ठ ज्ञाता होना ही चाहिए। अगर आप अपने विषय के ज्ञाता हैं, तो आपको कोई चोट नहीं पहुंचा सकता। अगर आप अपना काम ठीक से करना जानते हैं और उसे ठीक से करते हैं, तो लोग आपकी इज्जत करेंगे। आपके वरिष्ठ अधिकारी जहां आपके काम की सराहना करेंगे, वहीं जूनियर साथी आपके प्रशंसक बन जाएंगे।
तीन बातों का रखें ध्यान
दिल्ली मेट्रो परिवार में हमने एक बात का खास ध्यान रखा है और वह है सेहत। जी हां, मेरा कहना है कि आप अपनी सेहत का खास ध्यान रखें, क्योंकि अगर आप जीवन में कुछ भी पाना चाहते हैं, तो इसके लिए आपका फिट रहना जरूरी है। अच्छी सेहत के बिना आप कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। अगर आप मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं, तो आप में कार्य करने की अद्भुत क्षमता महसूस होगी। इसलिए आप अपने जीवन को व्यवस्थित कीजिए। दिल्ली मेट्रो के प्रशिक्षण विद्यालय में हमने इस बात का खास ध्यान रखा है। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि दिल्ली मेट्रो वह संस्थान है, जहां मेडिकल बिल सबसे कम है।
दूसरी जरूरी बात यह है कि आप पौष्टिक भोजन और भोजन के वक्त का भी ध्यान रखें। यह बहुत कठिन काम नहीं है, पर आपकी सेहत के लिए जरूरी है। तीसरी और सबसे बड़ी बात यह है कि आपको व्यायाम जरूर करना चाहिए। आप एयरोबिक्स, वॉकिंग, जॉगिंग और योगासन में कोई या एकाधिक तरीका चुन सकते हैं। आप स्वस्थ होंगे, तभी तो आपका दिमाग चौकन्ना रहेगा।
याद रखिए, आप केवल अपने लिए ही नहीं, अपने घर-परिवार और समाज के लिए भी काम करते हैं। आप जो भी पाते हैं, इसी समाज से शेयर करते हैं। इसलिए आपका समाज के प्रति भी कुछ दायित्व है।
प्रकाश हिन्दुस्तानी
हिन्दुस्तान (08-01-2012) के एडिट पेज पर प्रकाशित
Sunday, January 01, 2012
भविष्य को देखें और समझें
रविवासरीय हिन्दुस्तान (1 -1- 2012) के एडिट पेज पर मेरा कॉलम
भविष्य को देखें और समझें
रतन टाटा ग्रुप दुनिया के शीर्ष 50 व्यवसाय समूह में गिना जाता है. यह समूह 96 तरह के व्यवसाय करता है और कहा जाता है कि उनकी संपत्ति बिल गेट्स और वारेन बफेट से भी ज्यादा है, लेकिन फ़ोर्ब्स की सूची में उनका नाम बाद में इसलिए है कि इस समूह की 28 प्रमुख कम्पनियाँ दुनिया के अलग अलग शेयर मार्केट में विभिन्न नामों से लिस्टेड है. सामाजिक जवाबदेही के कारण टाटा का नाम एक अलग ही इज्ज़त से लिया जाता है. उनके कर्मचारियों ने भी हमेशा अपने दायित्व का पालन किया. 26 /11 के आतंकी हमले के दौरान मुंबई के ताज होटल के स्टाफ ने बहादुरी और समझदारी का ऐतिहासिक परिचय दिया और होटल के सैकड़ों मेहमानों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने से नहीं चूके. उस दिन होटल में एक शादी समारोह था, यूनीलीवर के सी ई ओ की अंतरराष्ट्रीय मीटिंग थी और दो प्रमुख कार्पोरेट बैठकें भी थीं जिनमें अनेक विदेशी मेहमान भी थे. टाटा ने आतंकी हमले में हताहत उस हरेक कर्मचारी को 36 लाख से 85 लाख रुपये तक की मदद की, चाहे उस कर्मचारी ने एक दिन ही काम क्यों न किया हो. टाटा अपने स्टाफ के ज़िम्मेदार व्यवहार के लिए उनकी ट्रेनिंग को श्रेय देते हैं. हैदराबाद के इंडियन स्कूल ऑफ़ बिजनेस में 8 अप्रैल 2006 को दिया गया उनका भाषण विद्यार्थियों के लिए इसी मायने में महत्वपूर्ण था कि उसमें सही नेतृत्व को परिभाषित किया गया था और बजाय दूसरों का अनुसरण करने के, खुद नेतृव करने पर जोर दिया गया था.
चेयरमैन का महत्व
रतन टाटा कहा करते हैं "मैं सही निर्णय लेने का दावा कतई नहीं करता. मैं तो निर्णय ले लेता हूँ और फिर काम करके उसे करके सही साबित कर देता हूँ." अपने भाषण की शुरुआत में रतन टाटा ने एक कहानी सुनायी, जो कुछ ऐसी थी.
एक आदमी तोता खरीदने दुकान में गया और एक तोते की कीमत पूछी. दुकानदार ने दाम बताया पांच हज़ार डॉलर.
''यह तो बहुत ज्यादा है. ऐसा क्या करता है वह ?'' उस ग्राहक ने पूछा.
''वह अपनी चोंच से अंग्रेज़ी में टाइप कर लेता है''
''यह तो बहुत ज्यादा है. दूसरे की कितनी कीमत है?''
''दूसरा दस हज़ार डॉलर का है क्योंकि वह तीन या चार भाषाओँ का जानकार है और वह एसएपी में भी माहिर है.''
''नहीं, यह भी नहीं चाहिए, उस तीसरे के बारे में बताइए.''
"वह तीस हज़ार का है.''
''वह क्या करता है?"
दुकानदार ने कहा --''मुझे नहीं मालूम, लेकिन बाकी उसे चेयरमैन कहते हैं''
रतन टाटा कहते हैं कि मेरे संगठन में लोग ऐसा समझते हैं.
इंडियन स्कूल ऑफ़ बिजनेस के सभी विद्यार्थियों के बारे में मैं इत्मीनान से कह सकता हूँ कि यहाँ के विद्यार्थी शीर्ष पदों पर कार्य करेंगे और उनकी अपनी पहचान देश में होगी. व्यवसाय का नेतृत्व करते हुए ये विद्यार्थी दुनिया भर में जायेंगे जहाँ देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.
यह स्वर्ण काल है
"मैं यहाँ आपके बीच खड़े होकर अपने अफसोस का इजहार कर रहा हूँ कि मैं इस हर्षित करनेवाले वास्तविक समय में मैं आपकी उम्र का नहीं हूँ . मुझे पता है कि आप में से ज़्यादातर लोगों के आने वाले साल पूर्ण संतुष्टि के होंगे जब आप देश के विकास के लिए खड़े होंगे और उसमें हिस्सेदारी निभा रहे होंगे. आपमें कई आनेवाले वर्षों में देश का नेतृत्व भी करेंगे. आपके कंधों पर एक महान जवाबदारी है. आपके कन्धों पर जो भी जवाबदारी दी गयी है वह बहुत बड़ी है मुझे पता है किया आपमें से ज़्यादातर लोगों के आनेवाले साल सफलता और संतुष्टि के होंगे क्योंकि तब आप देश के विकास के लिए खड़े होंगे. आनेवाले वर्षों में आपमें से कई इस देश का नेतृत्व कर रहे होंगे. इस भूमिका में आपको केवल श्रेष्ठतम कार्य ही करना है. मैं आश्वस्त हूँ कि आप में से कई अपने आसपास के लोगों के बीच, अपने नियोक्ताओं के बीच और अपने समुदाय और बिरादरी के सामने अपनी शानदार नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करेंगे.
नेतृत्व करो, पीछे न चलो
मैं आशा करता हूँ कि आपमें से ज़्यादातर लोग सिद्धांतों पर आधारित नेतृत्व के लिए मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयास करेंगे. क्योंकि यही तो वह बुनियाद है जिसकी ज़रुरत इस देश को है ताकि वह दुनिया में अपनी जगह बना सके. मैं आशा करता हूँ कि आपमें से हर एक एक उदहारण प्रस्तुत करेगा. मैं यह भी अपेक्षा करता हूँ कि आपमें से हर एक अपने जीवन मूल्यों के लिए जीएगा आप जिसके साथ जीवन भर के बंधन में बाँधे हैं. ...मैं उम्मीद करता हूँ कि आप में से हर एक में भविष्य का ज्ञानबोध होगा क्योंकि जिस बात की इस देश में कमी है वह यही है-- भविष्य को देख और समझ पाने की क्षमता. इसी के माध्यम से आप देश को एक दिशा दे सकते हैं. यह हमारी कमजोरी है कि हमारे बिजनेस लीडर नेतृत्व करने की जगह अनुसरणकर्ता बन जाते हैं.
दृढ़ निश्चयी होना आवश्यक
"नेतृत्व करने के लिए आपमें दृढ़ निश्चयी होना आवश्यक है. इसके लिए आपमें यह विश्वास होना चाहिए कि आपका यही इरादा भी है. मैं यह मानता हूँ कि कई बार ऐसे मौके आयेंगे जब आप के मान में संशय की स्थिति उत्पन्न होगी. ऐसे में आपको सही पथ चुनना होगा और लगातार उसी का अनुसरण दृढ़ता पूर्वक करना होगा. मुझे यकीन है कि आप कामयाब होंगे. इस सभी में आपकी एक विशेष भूमिका रहेगी. इस तरीके से सही राह पर दृढ़तापूर्वक चलकर ही आप यह साबित कर सकते हैं कि आपने, आपके अभिभावकों ने आपकी शिक्षा में जो कुछ निवेश किया है वह जीवन का सबसे बेशकीमती निवेश है. इसी ने आपका जीवन संवारा है.
"मैं यकीन करता हूँ कि वे लोग जो कुलीन पदों पर पहुंचेंगे वे देश के कुलीन वर्ग में होंगे, और आप उन सभी के प्रति मानवीय और संवेदनापूर्ण काम करेंगे जो चाहे आपके साथ काम कर रहे हों या न कर रहे हों. आप जो भी काम करेंगे, जिस भी क्षेत्र में काम करेंगे, पूरे जोश और जुनून के साथ, उत्कंठा के साथ ही करेंगे. आपके काम में आपको संतुष्टि मिले, कार्य का उचित प्रतिसाद भी मिले, जो न्यायपूर्ण हो. आपको जो भी भूमिका निभानी हो, छोटी या बड़ी, उससे लोगों का जीवन स्तर सुधरे, खासकर गाँव के लोगों का. वे एक हो या अनेक, ६ हों या ७० करोड़. मैं आशा करता हूँ कि आप जो कुछ भी करें,उससे लोगों का जीवन स्तर किसी न किसी रूप में ज़रूर सुधरे, प्रत्यक्ष तरीके से या अप्रत्यक्ष तरीके से. और इसी से देश विकास की राह पर आगे जा सकेगा.
"आपमें से अधिकांश लोग भविष्य में अपने काम में पूरी तरह डूब हो जायेंगे और व्यवसाय जगत में अत्यधिक तल्लीन हो जायेंगे. लेकिन याद रखिये कि आप केवल व्यवसाय जगत में ही नहीं जा रहे हैं,केवल उद्योग जगत के सहकर्मियों में ही नहीं, आप जा रहे हैं भारत भर में, दुनिया भर में. यहाँ आपको अपनी अमित छाप छोड़नी होगी ताकि दुनिया आपके दिए अभिदान को, आपके सहयोग को, आपके यो गदान को आनेवाली पीढियां भी देख सकें कि आपने उनके लिए क्या किया है"
साबुन से लेकर स्टील तक और नमक से लेकर नेनो तक बनानेवाले रतन टाटा का ख्वाब है कि उनके समूह में महिलाओं की भागीदारी बढाई जाए, खासकर इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र में, और इसके लिए युवावस्था में ही उन्हें प्रबंधन में जगह देकर ट्रेनिंग दी जाए जिससे वे शीर्ष पदों पर पहुंचकर अपनी प्रतिभा का सिक्का जमा सके.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
हिन्दुस्तान (1 -1- 2012) के एडिट पेज पर प्रकाशित
भविष्य को देखें और समझें
रतन टाटा ग्रुप दुनिया के शीर्ष 50 व्यवसाय समूह में गिना जाता है. यह समूह 96 तरह के व्यवसाय करता है और कहा जाता है कि उनकी संपत्ति बिल गेट्स और वारेन बफेट से भी ज्यादा है, लेकिन फ़ोर्ब्स की सूची में उनका नाम बाद में इसलिए है कि इस समूह की 28 प्रमुख कम्पनियाँ दुनिया के अलग अलग शेयर मार्केट में विभिन्न नामों से लिस्टेड है. सामाजिक जवाबदेही के कारण टाटा का नाम एक अलग ही इज्ज़त से लिया जाता है. उनके कर्मचारियों ने भी हमेशा अपने दायित्व का पालन किया. 26 /11 के आतंकी हमले के दौरान मुंबई के ताज होटल के स्टाफ ने बहादुरी और समझदारी का ऐतिहासिक परिचय दिया और होटल के सैकड़ों मेहमानों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने से नहीं चूके. उस दिन होटल में एक शादी समारोह था, यूनीलीवर के सी ई ओ की अंतरराष्ट्रीय मीटिंग थी और दो प्रमुख कार्पोरेट बैठकें भी थीं जिनमें अनेक विदेशी मेहमान भी थे. टाटा ने आतंकी हमले में हताहत उस हरेक कर्मचारी को 36 लाख से 85 लाख रुपये तक की मदद की, चाहे उस कर्मचारी ने एक दिन ही काम क्यों न किया हो. टाटा अपने स्टाफ के ज़िम्मेदार व्यवहार के लिए उनकी ट्रेनिंग को श्रेय देते हैं. हैदराबाद के इंडियन स्कूल ऑफ़ बिजनेस में 8 अप्रैल 2006 को दिया गया उनका भाषण विद्यार्थियों के लिए इसी मायने में महत्वपूर्ण था कि उसमें सही नेतृत्व को परिभाषित किया गया था और बजाय दूसरों का अनुसरण करने के, खुद नेतृव करने पर जोर दिया गया था.
चेयरमैन का महत्व
रतन टाटा कहा करते हैं "मैं सही निर्णय लेने का दावा कतई नहीं करता. मैं तो निर्णय ले लेता हूँ और फिर काम करके उसे करके सही साबित कर देता हूँ." अपने भाषण की शुरुआत में रतन टाटा ने एक कहानी सुनायी, जो कुछ ऐसी थी.
एक आदमी तोता खरीदने दुकान में गया और एक तोते की कीमत पूछी. दुकानदार ने दाम बताया पांच हज़ार डॉलर.
''यह तो बहुत ज्यादा है. ऐसा क्या करता है वह ?'' उस ग्राहक ने पूछा.
''वह अपनी चोंच से अंग्रेज़ी में टाइप कर लेता है''
''यह तो बहुत ज्यादा है. दूसरे की कितनी कीमत है?''
''दूसरा दस हज़ार डॉलर का है क्योंकि वह तीन या चार भाषाओँ का जानकार है और वह एसएपी में भी माहिर है.''
''नहीं, यह भी नहीं चाहिए, उस तीसरे के बारे में बताइए.''
"वह तीस हज़ार का है.''
''वह क्या करता है?"
दुकानदार ने कहा --''मुझे नहीं मालूम, लेकिन बाकी उसे चेयरमैन कहते हैं''
रतन टाटा कहते हैं कि मेरे संगठन में लोग ऐसा समझते हैं.
इंडियन स्कूल ऑफ़ बिजनेस के सभी विद्यार्थियों के बारे में मैं इत्मीनान से कह सकता हूँ कि यहाँ के विद्यार्थी शीर्ष पदों पर कार्य करेंगे और उनकी अपनी पहचान देश में होगी. व्यवसाय का नेतृत्व करते हुए ये विद्यार्थी दुनिया भर में जायेंगे जहाँ देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.
यह स्वर्ण काल है
"मैं यहाँ आपके बीच खड़े होकर अपने अफसोस का इजहार कर रहा हूँ कि मैं इस हर्षित करनेवाले वास्तविक समय में मैं आपकी उम्र का नहीं हूँ . मुझे पता है कि आप में से ज़्यादातर लोगों के आने वाले साल पूर्ण संतुष्टि के होंगे जब आप देश के विकास के लिए खड़े होंगे और उसमें हिस्सेदारी निभा रहे होंगे. आपमें कई आनेवाले वर्षों में देश का नेतृत्व भी करेंगे. आपके कंधों पर एक महान जवाबदारी है. आपके कन्धों पर जो भी जवाबदारी दी गयी है वह बहुत बड़ी है मुझे पता है किया आपमें से ज़्यादातर लोगों के आनेवाले साल सफलता और संतुष्टि के होंगे क्योंकि तब आप देश के विकास के लिए खड़े होंगे. आनेवाले वर्षों में आपमें से कई इस देश का नेतृत्व कर रहे होंगे. इस भूमिका में आपको केवल श्रेष्ठतम कार्य ही करना है. मैं आश्वस्त हूँ कि आप में से कई अपने आसपास के लोगों के बीच, अपने नियोक्ताओं के बीच और अपने समुदाय और बिरादरी के सामने अपनी शानदार नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करेंगे.
नेतृत्व करो, पीछे न चलो
मैं आशा करता हूँ कि आपमें से ज़्यादातर लोग सिद्धांतों पर आधारित नेतृत्व के लिए मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयास करेंगे. क्योंकि यही तो वह बुनियाद है जिसकी ज़रुरत इस देश को है ताकि वह दुनिया में अपनी जगह बना सके. मैं आशा करता हूँ कि आपमें से हर एक एक उदहारण प्रस्तुत करेगा. मैं यह भी अपेक्षा करता हूँ कि आपमें से हर एक अपने जीवन मूल्यों के लिए जीएगा आप जिसके साथ जीवन भर के बंधन में बाँधे हैं. ...मैं उम्मीद करता हूँ कि आप में से हर एक में भविष्य का ज्ञानबोध होगा क्योंकि जिस बात की इस देश में कमी है वह यही है-- भविष्य को देख और समझ पाने की क्षमता. इसी के माध्यम से आप देश को एक दिशा दे सकते हैं. यह हमारी कमजोरी है कि हमारे बिजनेस लीडर नेतृत्व करने की जगह अनुसरणकर्ता बन जाते हैं.
दृढ़ निश्चयी होना आवश्यक
"नेतृत्व करने के लिए आपमें दृढ़ निश्चयी होना आवश्यक है. इसके लिए आपमें यह विश्वास होना चाहिए कि आपका यही इरादा भी है. मैं यह मानता हूँ कि कई बार ऐसे मौके आयेंगे जब आप के मान में संशय की स्थिति उत्पन्न होगी. ऐसे में आपको सही पथ चुनना होगा और लगातार उसी का अनुसरण दृढ़ता पूर्वक करना होगा. मुझे यकीन है कि आप कामयाब होंगे. इस सभी में आपकी एक विशेष भूमिका रहेगी. इस तरीके से सही राह पर दृढ़तापूर्वक चलकर ही आप यह साबित कर सकते हैं कि आपने, आपके अभिभावकों ने आपकी शिक्षा में जो कुछ निवेश किया है वह जीवन का सबसे बेशकीमती निवेश है. इसी ने आपका जीवन संवारा है.
"मैं यकीन करता हूँ कि वे लोग जो कुलीन पदों पर पहुंचेंगे वे देश के कुलीन वर्ग में होंगे, और आप उन सभी के प्रति मानवीय और संवेदनापूर्ण काम करेंगे जो चाहे आपके साथ काम कर रहे हों या न कर रहे हों. आप जो भी काम करेंगे, जिस भी क्षेत्र में काम करेंगे, पूरे जोश और जुनून के साथ, उत्कंठा के साथ ही करेंगे. आपके काम में आपको संतुष्टि मिले, कार्य का उचित प्रतिसाद भी मिले, जो न्यायपूर्ण हो. आपको जो भी भूमिका निभानी हो, छोटी या बड़ी, उससे लोगों का जीवन स्तर सुधरे, खासकर गाँव के लोगों का. वे एक हो या अनेक, ६ हों या ७० करोड़. मैं आशा करता हूँ कि आप जो कुछ भी करें,उससे लोगों का जीवन स्तर किसी न किसी रूप में ज़रूर सुधरे, प्रत्यक्ष तरीके से या अप्रत्यक्ष तरीके से. और इसी से देश विकास की राह पर आगे जा सकेगा.
"आपमें से अधिकांश लोग भविष्य में अपने काम में पूरी तरह डूब हो जायेंगे और व्यवसाय जगत में अत्यधिक तल्लीन हो जायेंगे. लेकिन याद रखिये कि आप केवल व्यवसाय जगत में ही नहीं जा रहे हैं,केवल उद्योग जगत के सहकर्मियों में ही नहीं, आप जा रहे हैं भारत भर में, दुनिया भर में. यहाँ आपको अपनी अमित छाप छोड़नी होगी ताकि दुनिया आपके दिए अभिदान को, आपके सहयोग को, आपके यो गदान को आनेवाली पीढियां भी देख सकें कि आपने उनके लिए क्या किया है"
साबुन से लेकर स्टील तक और नमक से लेकर नेनो तक बनानेवाले रतन टाटा का ख्वाब है कि उनके समूह में महिलाओं की भागीदारी बढाई जाए, खासकर इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र में, और इसके लिए युवावस्था में ही उन्हें प्रबंधन में जगह देकर ट्रेनिंग दी जाए जिससे वे शीर्ष पदों पर पहुंचकर अपनी प्रतिभा का सिक्का जमा सके.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
हिन्दुस्तान (1 -1- 2012) के एडिट पेज पर प्रकाशित
Sunday, December 25, 2011
क्रिसमस की वह मुबारक़बाद
रविवासरीय हिन्दुस्तान (25 - 12 - 2011) के एडिट पेज पर मेरा कॉलम
क्रिसमस की वह मुबारक़बाद
त्योहारों के बारे में एक धारणा यह है कि वे अपनों और परायों का भेद खत्म कर देते हैं। सिर्फ अपने-पराये ही नहीं, ऐसे मौकों पर अक्सर दुश्मन भी गले मिल जाते हैं। ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद का क्रिसमस के मौके पर बधाई संदेश देना ऐसा ही एक मौका था। किसने सोचा था कि एक कट्टर इस्लामी माने जाने वाले ईरान जैसे देश का नेता ईसाई बंधुओं को उनके पावन पर्व पर शुभकामनाएं देगा? लेकिन यह तब मुमकिन हुआ, जब ब्रिटेन के चैनल फोर ने उनसे क्रिसमस संदेश देने का आग्रह किया और वह मान गए। उस समय यह बहुत बड़ी खबर थी, क्योंकि वह महज तीन साल पहले ही ईरान के राष्ट्रपति बने थे और अपने कई विवादास्पद बयानों की वजह से चर्चा में थे।
अगर क्रिसमस की भावना आपके दिल में नहीं है तो वह क्रिसमस ट्री के नीचे भी नहीं मिलेगी. क्रिसमस का सन्देश ही है कि आप अकेले नहीं है और कोई भी शख्स पराया नहीं है. इसीलिये लोग आपसी बैर भुलाकर भाईचारे की बात करने लगते हैं. क्रिसमस आते ही फिजाओं में प्रेम का सन्देश फैलने लगता है और हर चीज़ कोमल, अपनत्व से भरी और सुन्दर नज़र आने लगती है. ब्रिटेन के चैनल फोर पर ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद का यह भाषण इसी बात की तरफ इशारा करता है कि क्रिसमस सभी धर्मों का है और सभी प्रेम चाहते हैं. ये वही अहमदीनेजाद हैं जिन्होंने कभी कहा था कि जो भी देश इस्राईल को मान्यता देगा, उसे जलाकर खाक कर दिया जाएगा.दुनिया के नक्शे से ईस्राईल का नामो निशान मिटा दिया जाएगा. ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद का यह भाषण एक ऐतिहासिक धरोहर बन चुका है. ईरान के छठवें और वर्तमान राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने कभी यह भी कहा था कि परमाणु शक्ति अल्लाहताला का आशीर्वाद है और हम उसे पूरे इस्लामी जगत में फैलाना चाहते हैं. वे परिवार को नियोजित करने के कट्टर विरोधी रहे हैं और सात करोड़ के ईरान की आबादी १२ करोड़ जल्दी देखना चाहते हैं. इसके लिए लड़कियों की विवाह की आयु घटाकर १६ साल करने के पक्षधर हैं. उनके क्रिसमस सन्देश के भाषण का अंश :
हम ईश्वर की रचना
अहमदीनेजाद ने अपने संदेश की शुरुआत परंपरागत ढंग से की,"ईसा मसीह के जन्म के मौके पर मैं उनके अनुयायियों को मुबारकबाद देता हूँ. उस सर्वशक्तिमान ने इंसानों के लिए ब्रह्माण्ड की रचना की और इंसान बनाये. उन्होंने इंसान को ऐसा बनाया कि वह परिपूर्णता की हद तक काबिल बनाया. इंसान की ज़र्रे से शुरू होनेवाले सफ़र में रास्ता दिखाने के लिए पैगम्बर भेजे जिन्होंने मोहब्बत और भाईचारे का पैगाम दिया और इंसानों के मिलजुलकर प्रेम से रहने की शिक्षा दी. माता मरियम के बेटे यीशु ने लोगों को अन्याय और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष की प्रेरणा दी. पैगम्बरों के बताये रास्ते से भटकने के कारण इंसान की रह में मुश्किलात आये. ईश्वर के दूतों की बातों को भूलना इंसानियत को भारी पड़ा, खासकर यीशु की शिक्षा को. इसी कारण हमारे समाज, घर-परिवार, नैतिकता, राजनीति, सुरक्षा और अर्थ व्यवस्था पर दबाव आने लगे क्योंकि हमने देवदूतों के संदेशों की अनदेखी की.''
अगर आज यीशु होते
इसके बाद अहमदीनेजाद आज की दुनिया की दूसरी गड़बड़ियों की ओर ले जाते हैं, जो हमें दुनिया की राजनीति तक ले जाती है, "अगर आज यीशु धरती पर होते तो वे जोर-ज़बरदस्ती करनेवाले बददिमागी विस्तार्वादियों के खिलाफ जनता के साथ खड़े होते.
अगर आज यीशु धरती पर होते तो वे न्याय, मानवता और प्रेम की झंडाबरदारी कर रहे होते और दुनिया भर युद्धोत्तेजना फैलानेवाले विस्तार्वादियों की जबरदस्ती के खिलाफ संघर्ष कर रहे होते.अगर आज यीशु धरती पर होते तो दुनिया में फ़ैल रही आर्थिक और राजनैतिक दमनकारी नीतियों के खिलाफ जूझ रहे होते, वैसे ही, जैसे कि वे आजीवन जूझते रहे थे.आज के दौर की तमाम समस्याओं का समाधान केवल ईश्वर के दूतों के सहयोग से ही संभव है. उनके नक्श ए कदम पर चलकर ही हम इन परेशानियों से निजात पा सकते हैं, जिन्हें अल्लाह ताला ने इंसानियत के भले के लिए धरती पर भेजा था.''
''आज, दुनिया के तमाम मुल्कों में बुनियादी बदलाव की मांग जोर पकड़ती जा रही है. अब इसका रुख साफ़ हो रहा है. बदलाव की मांग, कायापलट की मांग, मानवीय मूल्यों पर वापस लौटने की मांग, और अब यह मांग है दुनिया में सबसे अव्वल रहने की. इन तमाम मांगों का जवाब सच्चा और असली होना चाहिए. इनमें सबसे पहली ज़रुरत है इन उद्देश्यों में मकसदों, इरादों और दिशाओं में बदलाव की. अगर निरंकुश इरादों पर लगाम न कसी गयी और इन्हें मुल्कों के सामने चुनौती के रूप में यों ही खड़े रहने दिया गया तो ये बातें उन मुल्कों के ही परेशानी का सबब बन जायेगी.''
एक किरण भी चमत्कारी
"दुर्योग से आज के संकट और भेदभाव बहुस्तरीय हैं. आशा की एक किरण भी ऐसे में चमत्कार कर सकती है. अच्छे भविष्य की आशा और न्याय की उम्मीद, सच्ची शांति और सदभाव के माहौल का भरोसा, सदचरित्र और धर्मपरायण शासकों की चाह जो अपनी प्रजा से प्रेम करते हों और उनकी सेवा करने की इच्छा रखते हों, वैसा ही, जैसा कि उस सर्वशक्तिमान ने वादा किया था. हमें यकीन है कि यीशु फिर लौटेंगे, इस्लाम के उस परम सम्मानित संदेसा वाहक के बच्चे के साथ और नेतृत्व करेंगे दुनिया को मोहब्बत, भाईचारे और न्याय दिलाने के लिए.''
''अब यह जवाबदारी है ईसाई और अब्राहमिक आस्था के अनुयायियों की, कि वे उस पवित्र वचन के पालन करनेवालों के पथ को तैयार करें और भविष्य में आनेवाले उस आनंदकारी, चमकीले और अनोखे काल का आगमन आसान और संभव हो सके. मुझे उम्मीद है कि हम सब मुल्कों की मिलीजुली एकसूत्र में होनेवाली कोशिशों से वह सर्वशक्तिशाली विधाता अपने शासन से धरती को रोशन करेगा और धरती पर उसका नूर नज़र आएगा. सभी को यीशु के जन्म की वर्ष गाँठ पर मुबारकबाद. दुआ है कि आनेवाला नया साल खुशिया, सम्पन्नता, शांति, भाईचारा और मानवता लाये. आप सब कि कामयाबी और खुशियों के लिए मेरी शुभकामनाएं."
निस्संदेह, इस संदेश में अहमदीनेजाद का अपना एजेंडा छिपा था। लेकिन इसमें कहीं कोई दुर्भावना नहीं थी, कोई कट्टरता नहीं थी। और सबसे बड़ी बात है कि सीधे किसी के खिलाफ कुछ नहीं कहा गया था। ऐसे संदेश से हम यह उम्मीद करते हैं कि वह दूरियां पाटेगा। लेकिन कुछ हद तक हुआ इसका उल्टा ही। राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के इस भाषण पर दुनिया भर में तूफान-सा उठ खड़ा हुआ। ब्रिटेन के तमाम अखबारों ने इस पर प्रतिक्रियाएं प्रकाशित कीं। पक्ष और विपक्ष में।
टाइम्स, मिरर, बिजनेस पोस्ट, इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून, डेली मेल आदि ने या तो इस भाषण की सराहना की या फिर कुछ शब्दों/वाक्यांशों के लिए आलोचना की। पर इससे पश्चिमी देशों को इस बात का आभास तो हो ही गया कि शांति और सद्भाव के लिए हर कोई अपने-अपने ढंग से सोच रहा है। तारीफ और आलोचना करने वाले सिर्फ पश्चिमी देशों में ही नहीं थे, अहमदीनेजाद के अपने देश ईरान और दूसरे इस्लामिक में भी यही हाल था। यह संदेश ईसाइयों के लिए था, लेकिन इसने असर सब पर दिखाया।
प्रकाश हिन्दुस्तानी
दैनिक हिन्दुस्तान (25 - 12 - 2011) को प्रकाशित
क्रिसमस की वह मुबारक़बाद
त्योहारों के बारे में एक धारणा यह है कि वे अपनों और परायों का भेद खत्म कर देते हैं। सिर्फ अपने-पराये ही नहीं, ऐसे मौकों पर अक्सर दुश्मन भी गले मिल जाते हैं। ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद का क्रिसमस के मौके पर बधाई संदेश देना ऐसा ही एक मौका था। किसने सोचा था कि एक कट्टर इस्लामी माने जाने वाले ईरान जैसे देश का नेता ईसाई बंधुओं को उनके पावन पर्व पर शुभकामनाएं देगा? लेकिन यह तब मुमकिन हुआ, जब ब्रिटेन के चैनल फोर ने उनसे क्रिसमस संदेश देने का आग्रह किया और वह मान गए। उस समय यह बहुत बड़ी खबर थी, क्योंकि वह महज तीन साल पहले ही ईरान के राष्ट्रपति बने थे और अपने कई विवादास्पद बयानों की वजह से चर्चा में थे।
अगर क्रिसमस की भावना आपके दिल में नहीं है तो वह क्रिसमस ट्री के नीचे भी नहीं मिलेगी. क्रिसमस का सन्देश ही है कि आप अकेले नहीं है और कोई भी शख्स पराया नहीं है. इसीलिये लोग आपसी बैर भुलाकर भाईचारे की बात करने लगते हैं. क्रिसमस आते ही फिजाओं में प्रेम का सन्देश फैलने लगता है और हर चीज़ कोमल, अपनत्व से भरी और सुन्दर नज़र आने लगती है. ब्रिटेन के चैनल फोर पर ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद का यह भाषण इसी बात की तरफ इशारा करता है कि क्रिसमस सभी धर्मों का है और सभी प्रेम चाहते हैं. ये वही अहमदीनेजाद हैं जिन्होंने कभी कहा था कि जो भी देश इस्राईल को मान्यता देगा, उसे जलाकर खाक कर दिया जाएगा.दुनिया के नक्शे से ईस्राईल का नामो निशान मिटा दिया जाएगा. ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद का यह भाषण एक ऐतिहासिक धरोहर बन चुका है. ईरान के छठवें और वर्तमान राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने कभी यह भी कहा था कि परमाणु शक्ति अल्लाहताला का आशीर्वाद है और हम उसे पूरे इस्लामी जगत में फैलाना चाहते हैं. वे परिवार को नियोजित करने के कट्टर विरोधी रहे हैं और सात करोड़ के ईरान की आबादी १२ करोड़ जल्दी देखना चाहते हैं. इसके लिए लड़कियों की विवाह की आयु घटाकर १६ साल करने के पक्षधर हैं. उनके क्रिसमस सन्देश के भाषण का अंश :
हम ईश्वर की रचना
अहमदीनेजाद ने अपने संदेश की शुरुआत परंपरागत ढंग से की,"ईसा मसीह के जन्म के मौके पर मैं उनके अनुयायियों को मुबारकबाद देता हूँ. उस सर्वशक्तिमान ने इंसानों के लिए ब्रह्माण्ड की रचना की और इंसान बनाये. उन्होंने इंसान को ऐसा बनाया कि वह परिपूर्णता की हद तक काबिल बनाया. इंसान की ज़र्रे से शुरू होनेवाले सफ़र में रास्ता दिखाने के लिए पैगम्बर भेजे जिन्होंने मोहब्बत और भाईचारे का पैगाम दिया और इंसानों के मिलजुलकर प्रेम से रहने की शिक्षा दी. माता मरियम के बेटे यीशु ने लोगों को अन्याय और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष की प्रेरणा दी. पैगम्बरों के बताये रास्ते से भटकने के कारण इंसान की रह में मुश्किलात आये. ईश्वर के दूतों की बातों को भूलना इंसानियत को भारी पड़ा, खासकर यीशु की शिक्षा को. इसी कारण हमारे समाज, घर-परिवार, नैतिकता, राजनीति, सुरक्षा और अर्थ व्यवस्था पर दबाव आने लगे क्योंकि हमने देवदूतों के संदेशों की अनदेखी की.''
अगर आज यीशु होते
इसके बाद अहमदीनेजाद आज की दुनिया की दूसरी गड़बड़ियों की ओर ले जाते हैं, जो हमें दुनिया की राजनीति तक ले जाती है, "अगर आज यीशु धरती पर होते तो वे जोर-ज़बरदस्ती करनेवाले बददिमागी विस्तार्वादियों के खिलाफ जनता के साथ खड़े होते.
अगर आज यीशु धरती पर होते तो वे न्याय, मानवता और प्रेम की झंडाबरदारी कर रहे होते और दुनिया भर युद्धोत्तेजना फैलानेवाले विस्तार्वादियों की जबरदस्ती के खिलाफ संघर्ष कर रहे होते.अगर आज यीशु धरती पर होते तो दुनिया में फ़ैल रही आर्थिक और राजनैतिक दमनकारी नीतियों के खिलाफ जूझ रहे होते, वैसे ही, जैसे कि वे आजीवन जूझते रहे थे.आज के दौर की तमाम समस्याओं का समाधान केवल ईश्वर के दूतों के सहयोग से ही संभव है. उनके नक्श ए कदम पर चलकर ही हम इन परेशानियों से निजात पा सकते हैं, जिन्हें अल्लाह ताला ने इंसानियत के भले के लिए धरती पर भेजा था.''
''आज, दुनिया के तमाम मुल्कों में बुनियादी बदलाव की मांग जोर पकड़ती जा रही है. अब इसका रुख साफ़ हो रहा है. बदलाव की मांग, कायापलट की मांग, मानवीय मूल्यों पर वापस लौटने की मांग, और अब यह मांग है दुनिया में सबसे अव्वल रहने की. इन तमाम मांगों का जवाब सच्चा और असली होना चाहिए. इनमें सबसे पहली ज़रुरत है इन उद्देश्यों में मकसदों, इरादों और दिशाओं में बदलाव की. अगर निरंकुश इरादों पर लगाम न कसी गयी और इन्हें मुल्कों के सामने चुनौती के रूप में यों ही खड़े रहने दिया गया तो ये बातें उन मुल्कों के ही परेशानी का सबब बन जायेगी.''
एक किरण भी चमत्कारी
"दुर्योग से आज के संकट और भेदभाव बहुस्तरीय हैं. आशा की एक किरण भी ऐसे में चमत्कार कर सकती है. अच्छे भविष्य की आशा और न्याय की उम्मीद, सच्ची शांति और सदभाव के माहौल का भरोसा, सदचरित्र और धर्मपरायण शासकों की चाह जो अपनी प्रजा से प्रेम करते हों और उनकी सेवा करने की इच्छा रखते हों, वैसा ही, जैसा कि उस सर्वशक्तिमान ने वादा किया था. हमें यकीन है कि यीशु फिर लौटेंगे, इस्लाम के उस परम सम्मानित संदेसा वाहक के बच्चे के साथ और नेतृत्व करेंगे दुनिया को मोहब्बत, भाईचारे और न्याय दिलाने के लिए.''
''अब यह जवाबदारी है ईसाई और अब्राहमिक आस्था के अनुयायियों की, कि वे उस पवित्र वचन के पालन करनेवालों के पथ को तैयार करें और भविष्य में आनेवाले उस आनंदकारी, चमकीले और अनोखे काल का आगमन आसान और संभव हो सके. मुझे उम्मीद है कि हम सब मुल्कों की मिलीजुली एकसूत्र में होनेवाली कोशिशों से वह सर्वशक्तिशाली विधाता अपने शासन से धरती को रोशन करेगा और धरती पर उसका नूर नज़र आएगा. सभी को यीशु के जन्म की वर्ष गाँठ पर मुबारकबाद. दुआ है कि आनेवाला नया साल खुशिया, सम्पन्नता, शांति, भाईचारा और मानवता लाये. आप सब कि कामयाबी और खुशियों के लिए मेरी शुभकामनाएं."
निस्संदेह, इस संदेश में अहमदीनेजाद का अपना एजेंडा छिपा था। लेकिन इसमें कहीं कोई दुर्भावना नहीं थी, कोई कट्टरता नहीं थी। और सबसे बड़ी बात है कि सीधे किसी के खिलाफ कुछ नहीं कहा गया था। ऐसे संदेश से हम यह उम्मीद करते हैं कि वह दूरियां पाटेगा। लेकिन कुछ हद तक हुआ इसका उल्टा ही। राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के इस भाषण पर दुनिया भर में तूफान-सा उठ खड़ा हुआ। ब्रिटेन के तमाम अखबारों ने इस पर प्रतिक्रियाएं प्रकाशित कीं। पक्ष और विपक्ष में।
टाइम्स, मिरर, बिजनेस पोस्ट, इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून, डेली मेल आदि ने या तो इस भाषण की सराहना की या फिर कुछ शब्दों/वाक्यांशों के लिए आलोचना की। पर इससे पश्चिमी देशों को इस बात का आभास तो हो ही गया कि शांति और सद्भाव के लिए हर कोई अपने-अपने ढंग से सोच रहा है। तारीफ और आलोचना करने वाले सिर्फ पश्चिमी देशों में ही नहीं थे, अहमदीनेजाद के अपने देश ईरान और दूसरे इस्लामिक में भी यही हाल था। यह संदेश ईसाइयों के लिए था, लेकिन इसने असर सब पर दिखाया।
प्रकाश हिन्दुस्तानी
दैनिक हिन्दुस्तान (25 - 12 - 2011) को प्रकाशित
Monday, December 19, 2011
क्रिकेट ने हमारी ज़िंदगी बदल दी है
रविवासरीय हिन्दुस्तान (18 - 12 - 2011) के एडिट पेज पर प्रकाशित मेरा कॉलम
क्रिकेट ने हमारी ज़िंदगी बदल दी है
राहुल द्रविड़ को लोग भारत की दीवार कहते हैं. कई लोग उन्हें 'मिस्टर रिलायबल' भी कहते हैं. उनके नाम पर क्रिकेट में कई रेकार्ड्स हैं. ताज़ा रिकार्ड है टेस्ट क्रिकेट में तेरह हज़ार रन बनाने का. केवल सचिन ही हैं जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में उनसे ज्यादा रन बनाये हैं. सर डोनाल्ड (डॉन) ब्रेडमैन के बाद राहुल द्रविड़ अकेले ऐसे क्रिकेटर हैं, जिनके खाते में इंग्लैण्ड के खिलाफ तीन या उससे ज्यादा शतक हैं. सुनील गावस्कर ने राहुल के बारे में कहा है --''राहुल भारतीय टीम के लौह कवच हैं. उनका हरेक कदम उनके चरित्र का बखान करता है.'' सुरेश रैना उन्हें अपना आदर्श मानते हैं. पंद्रह साल पहले उन्हें सिंगर कप के लिए विनोद काम्बली की जगह श्रीलंका के खिलाफ वन डे मैच में मैदान में उतारा गया था और फिर बाद में हटा लिया गया. लेकिन अपनी खेल प्रतिभा से राहुल द्रविड़ क्रिकेट के चमकीले सितारे बने. लेकिन उन्हें 14 दिसंबर को कैनबरा के वार मेमोरियल में सर डॉन ब्रेडमैन स्मृति भाषण के लिए आमंत्रित किया गया था. वे पहले क्रिकेटर हैं जो गैर आस्ट्रेलियन होते हुए भी इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में बुलाये गए थे. इस भाषण में राहुल द्रविड़ ने जो बातें कहीं, वे अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि उसमें राहुल द्रविड़ का एक नया ही रूप सामने आया. यहाँ राहुल द्रविड़ ने किसी बेहद अनुभवी कूटनीतिक की तरह बातें कहीं और भारत और आस्ट्रेलिया के रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश की.
क्रिकेट और युद्ध
भारत और आस्ट्रेलिया के बारे में जब भी बात होती है तब कहा जाता है कि दोनों ही देशों को क्रिकेट और नज़दीक लेकर आ गया है. आज़ाद भारत ने अपना पहला क्रिकेट मैच अगर किसी देश के साथ खेला था तो वह आस्ट्रेलिया के साथ. आज़ादी के तीन महीने बाद नवम्बर १९४७ में वह मैच खेला गया. जो एक तरह का युद्ध कहा जा सकता है. लेकिन इतिहास बताता है कि हम उससे भी कहीं पहले एक साथ जुड़ चुके थे और हम एक दूसरे के खिलाफ नहीं, साथ साथ युद्ध भी लड़ चुके हैं. असली युद्ध. गल्लिपोली (तत्कालीन ओट्टोमन साम्राज्य, वर्तमान में तुर्की) में भारत और आस्ट्रेलिया प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान (25 अप्रैल 1915 से 9 जनवरी 1916 ) साथ साथ लड़े थे. इसमें भारत के १३०० से ज्यादा जांबाज़ सैनिक शहीद हुए थे और आस्ट्रेलिया के भी हजारों जवानों ने प्राणों की आहुति दी थी. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भी भारत और आस्ट्रेलिया के फौजी साथ साथ अल अलामीन, उत्तरी अफ्रीका, सीरिया-लेबनान और बर्मा में कंधे से कन्धा मिलाकर सिंगापुर पर कब्जे के लिए साथ साथ लड़े थे.
राहुल द्रविड़ ने अपने भाषण में कहा कि हम यहाँ क्रिकेट की चर्चा कर रहे हैं और युद्ध में दोनों देशों के शहीदों को याद कर रहे हैं. प्रतिस्पर्धी होने के पहले हम भारतीय और आस्ट्रेलियाई साथी थे. आपने मुझे इस भाषण के लिए बुलाया, आभारी हूँ. लॉर्ड्स में क्रिकेट के मैदान में सर डॉन ने लंच के पहले ही सेंचुरी मार ली थी, जबकि मुझे इसमें लगभग पूरा दिन लग गया था. बड़ी बात यह है कि सर डॉन ने भारत के विरुद्ध केवल पांच टेस्ट खेले थे 1947-48 में. यह उनका अपने होम ग्राउंड पर अंतिम सीजन था. और सर डॉन ने भारत में खेला ही नहीं था. भारत भूमि पर सर डॉन के कदम मई 1953 में पड़े थे, जब वे इंग्लैण्ड जा रहे थे और उनका विमान कोलकाता में रुका था. वहां करीब एक हज़ार लोग उनका अभिवादन करने को खड़े थे, लेकिन वे सेना की जीप में बैठकर सुरक्षित ईमारत में चले गए थे. भारतीयों ने उन्हें पहली बार तभी देखा. मेरे देश में क्रिकेट प्रेमियों की एक पीढी उन्हें एक ऐसे विलक्षण क्रिकेटर के रूप में जानती है जो इंग्लैण्ड के बाहर का था.
रेकार्ड टूटने का विरोध
कुछ दिलचस्प बातें : 28 जून 1930 को ब्राडमैन ने लोर्ड्स में इंग्लैण्ड के खिलाफ 254 रन बनाये थे, और यही वह दिन था जब जवाहरलाल नेहरू को ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार किया था. नेहरू आजादी की लड़ाई के प्रमुख सिपाही थे और आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. एक और किस्सा. 1933 में जब ब्रेडमैन का 334 रनों का रिकार्ड टूटा, तब उनके कुछ क्रिकेट फेंस ने काली पत्तियां बाँधकर इसका विरोध जताया था, क्योकि वे ब्रेडमैन का रिकार्ड टूटने से खफा थे. ब्रेडमैन का मानना था कि क्रिकेट खिलाड़ी इस महान खेल के ट्रस्टी हैं. मुझे यह कहते हुए ख़ुशी है कि मैं कुछ बड़ी दिलचस्प बातें सर डॉन से शेयर करता हूँ. वे भी, मूलत; मेरी तरह ही तीसरे क्रम के बल्लेबाज़ थे. यह एक कठिन कार्य है. हमने यह कार्य किया लेकिन उन्होंने इसे और भी सफलता और स्टाइल से किया. वे गेंदबाजों पर छा जाते थे और फिर अपनी तशरीफ़ ले जाते थे. ..वे अस्सी के दशक में सार्वजानिक जीवन से रिटायर हो गए. मुझे ज्ञात हुआ कि वे सुनील गावस्कर की पीढ़ी के खिलाड़ियों को आस्ट्रेलिया में खेलते हुए देख चुके है...मैं उनका कायल हूँ, जिस कुशलता के साथ वे खेले, और जिस गरिमा, सत्यनिष्ठा, साहस और विनम्रता से उन्होंने ज़िन्दगी को जीया. उन्होंने आजीवन विश्वास किया स्वाभिमान, महत्वाकांक्षा, प्रतिबध्धता और प्रतियोगितात्मकता पर. ये वे शब्द हैं जिन्हें पूरी दुनिया में क्रिकेट के ड्रेसिंग रूम में चस्पा कर देना चाहिए. .. वे हमारे बीच से 25 फरवरी 2001 को चले गए, मुंबई में भारत आस्ट्रेलिया सीरिज शुरू होने के दो दिन पहले.
क्रिकेट की शिक्षाएं
आई पी एल को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि आज भारतीय और आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी एक ड्रेसिंग रूम शेयर करते हैं. शेन वाटसन की राजस्थान रॉयल्स में सहभागिता, माइक हँसी का चेन्नई में रोल और शेन वार्न की भारतीय टीम में रूचि महत्वपूर्ण है. क्रिकेटर के रूप में हम अपने अपने देश के राजदूत हैं....यहाँ मैं यह कहना चाहता हूँ कि हम वास्तव में एक दूसरे को समझना, स्वीकारना, सम्मान करना सीख रहे हैं. जब मैंने अंडर 19 मैच न्यूजीलैंड के खिलाफ खेला था तब हमारी टीम में दो गेंदबाज़ थे, जिनमें से एक हिन्दीभाषी उत्तर भारत का था और दूसरा केरल का मलयालम भाषी. दोनों एक दूसरे से बात करने में असमर्थ थे. लेकिन जब मैच हुआ तब दोनों ने सौ रनों की भागीदारी की थी. यह सब क्रिकेट में संभव है. क्रिकेट ने भारत का ताना बाना ही बदल डाला है.
जैसे सर डॉन आस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स के बारह हज़ार आबादी के कस्बे से आये थे, वैसे ही हमारे देश के क्रिकेटरों की भी कहानियां है. रणजी ट्रॉफ़ी के लिए 27 तीमें खेलती हैं. पिछली बार जीती राजस्थान की टीम. झारखण्ड की टीम ने पहली बार वन डे जीता. जहीर खान महाराष्ट्र के जिस कस्बे से आते हैं, वहां सलीके का एक मैदान तक नहीं. गुजरात का एक 17 साल का युवक भारत का सबसे तेज़ गेंदबाज़ बना है. मुनाफ पटेल के टीम में आने के बाद उनके गाँव और रेलवे स्टेशन के बीच का रोड सुधर गया क्योंकि सैकड़ों पत्रकार उनसे मिलने जा रहे थे. क्रिकेट के कारण उमेश यादव ने अपना पुलिस में भर्ती होने का सपना छोड़ा. वीरेंद्र सहवाग प्रैक्टिस के लिए रोजाना 84 किलोमीटर का सफ़र बस से करते थे. भारत के हर क्रिकेटर की एक कहानी है. भारतीय क्रिकेट की आत्मा और ह्रदय की कहानी.
क्रिकेट के नए रूप
क्रिकेट ने हमारी ज़िन्दगी बदल दी है. हम जीतें या ना जीत पायें, जनता हमारे लिए दुआ मांगती है, हमें देखकर मुसकराती है, हाथ हिलाती है. क्रिकेट हमारे लिए रोजी रोटी नहीं, एक वरदान है. इसके बिना हम केवल मामूली इंसान हैं. हमें इस मौके पर पुनरवलोकन भी करना चाहिए. मैंने पिछले महीनों में एक भारतीय मैच में स्टैंड में कई सीटें खाली पायी. यह एक चेतावनी भी है. 1981 से अब तक भारत 227 वन डे इंटरनेशनल खेल चुका है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि आखिर हम हैं तो परफार्मर, इंटरटेनर, क्रिकेटर. और हमें अपने दर्शकों से प्यार है. आस्ट्रेलिया या इंग्लैण्ड की तरह हमारे यहाँ और कोई खेल नहीं है जो इतना रेवेन्यु अर्जित कर पाए. अब टेस्ट मैच, वन डे और 20 -20 में तालमेल बैठकर खेल को आगे बढ़ाना चाहिए. हमें मूल क्रिकेट को और उसकी भावना को बचाकर रखने की कोशिश करनी चाहिए. क्रिकेट की तीनों विधाओं के लिए अलग अलग कौशल की ज़रुरत पड़ती है.टेस्ट क्रिकेट वह पद्धति है जिसे क्रिकेटर खेलना चाहते हैं. वन डे तीन दशकों से रेवेन्यू का एक अच्छा माध्यम है और अब 20 - 20 नए रूप में आ चुका है, इस रूप को दर्शक देखना चाहते हैं.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
(दैनिक हिन्दुस्तान (18 - 12 - 2011) के एडिट पेज पर प्रकाशित)
क्रिकेट ने हमारी ज़िंदगी बदल दी है
राहुल द्रविड़ को लोग भारत की दीवार कहते हैं. कई लोग उन्हें 'मिस्टर रिलायबल' भी कहते हैं. उनके नाम पर क्रिकेट में कई रेकार्ड्स हैं. ताज़ा रिकार्ड है टेस्ट क्रिकेट में तेरह हज़ार रन बनाने का. केवल सचिन ही हैं जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में उनसे ज्यादा रन बनाये हैं. सर डोनाल्ड (डॉन) ब्रेडमैन के बाद राहुल द्रविड़ अकेले ऐसे क्रिकेटर हैं, जिनके खाते में इंग्लैण्ड के खिलाफ तीन या उससे ज्यादा शतक हैं. सुनील गावस्कर ने राहुल के बारे में कहा है --''राहुल भारतीय टीम के लौह कवच हैं. उनका हरेक कदम उनके चरित्र का बखान करता है.'' सुरेश रैना उन्हें अपना आदर्श मानते हैं. पंद्रह साल पहले उन्हें सिंगर कप के लिए विनोद काम्बली की जगह श्रीलंका के खिलाफ वन डे मैच में मैदान में उतारा गया था और फिर बाद में हटा लिया गया. लेकिन अपनी खेल प्रतिभा से राहुल द्रविड़ क्रिकेट के चमकीले सितारे बने. लेकिन उन्हें 14 दिसंबर को कैनबरा के वार मेमोरियल में सर डॉन ब्रेडमैन स्मृति भाषण के लिए आमंत्रित किया गया था. वे पहले क्रिकेटर हैं जो गैर आस्ट्रेलियन होते हुए भी इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में बुलाये गए थे. इस भाषण में राहुल द्रविड़ ने जो बातें कहीं, वे अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि उसमें राहुल द्रविड़ का एक नया ही रूप सामने आया. यहाँ राहुल द्रविड़ ने किसी बेहद अनुभवी कूटनीतिक की तरह बातें कहीं और भारत और आस्ट्रेलिया के रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश की.
क्रिकेट और युद्ध
भारत और आस्ट्रेलिया के बारे में जब भी बात होती है तब कहा जाता है कि दोनों ही देशों को क्रिकेट और नज़दीक लेकर आ गया है. आज़ाद भारत ने अपना पहला क्रिकेट मैच अगर किसी देश के साथ खेला था तो वह आस्ट्रेलिया के साथ. आज़ादी के तीन महीने बाद नवम्बर १९४७ में वह मैच खेला गया. जो एक तरह का युद्ध कहा जा सकता है. लेकिन इतिहास बताता है कि हम उससे भी कहीं पहले एक साथ जुड़ चुके थे और हम एक दूसरे के खिलाफ नहीं, साथ साथ युद्ध भी लड़ चुके हैं. असली युद्ध. गल्लिपोली (तत्कालीन ओट्टोमन साम्राज्य, वर्तमान में तुर्की) में भारत और आस्ट्रेलिया प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान (25 अप्रैल 1915 से 9 जनवरी 1916 ) साथ साथ लड़े थे. इसमें भारत के १३०० से ज्यादा जांबाज़ सैनिक शहीद हुए थे और आस्ट्रेलिया के भी हजारों जवानों ने प्राणों की आहुति दी थी. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भी भारत और आस्ट्रेलिया के फौजी साथ साथ अल अलामीन, उत्तरी अफ्रीका, सीरिया-लेबनान और बर्मा में कंधे से कन्धा मिलाकर सिंगापुर पर कब्जे के लिए साथ साथ लड़े थे.
राहुल द्रविड़ ने अपने भाषण में कहा कि हम यहाँ क्रिकेट की चर्चा कर रहे हैं और युद्ध में दोनों देशों के शहीदों को याद कर रहे हैं. प्रतिस्पर्धी होने के पहले हम भारतीय और आस्ट्रेलियाई साथी थे. आपने मुझे इस भाषण के लिए बुलाया, आभारी हूँ. लॉर्ड्स में क्रिकेट के मैदान में सर डॉन ने लंच के पहले ही सेंचुरी मार ली थी, जबकि मुझे इसमें लगभग पूरा दिन लग गया था. बड़ी बात यह है कि सर डॉन ने भारत के विरुद्ध केवल पांच टेस्ट खेले थे 1947-48 में. यह उनका अपने होम ग्राउंड पर अंतिम सीजन था. और सर डॉन ने भारत में खेला ही नहीं था. भारत भूमि पर सर डॉन के कदम मई 1953 में पड़े थे, जब वे इंग्लैण्ड जा रहे थे और उनका विमान कोलकाता में रुका था. वहां करीब एक हज़ार लोग उनका अभिवादन करने को खड़े थे, लेकिन वे सेना की जीप में बैठकर सुरक्षित ईमारत में चले गए थे. भारतीयों ने उन्हें पहली बार तभी देखा. मेरे देश में क्रिकेट प्रेमियों की एक पीढी उन्हें एक ऐसे विलक्षण क्रिकेटर के रूप में जानती है जो इंग्लैण्ड के बाहर का था.
रेकार्ड टूटने का विरोध
कुछ दिलचस्प बातें : 28 जून 1930 को ब्राडमैन ने लोर्ड्स में इंग्लैण्ड के खिलाफ 254 रन बनाये थे, और यही वह दिन था जब जवाहरलाल नेहरू को ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार किया था. नेहरू आजादी की लड़ाई के प्रमुख सिपाही थे और आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. एक और किस्सा. 1933 में जब ब्रेडमैन का 334 रनों का रिकार्ड टूटा, तब उनके कुछ क्रिकेट फेंस ने काली पत्तियां बाँधकर इसका विरोध जताया था, क्योकि वे ब्रेडमैन का रिकार्ड टूटने से खफा थे. ब्रेडमैन का मानना था कि क्रिकेट खिलाड़ी इस महान खेल के ट्रस्टी हैं. मुझे यह कहते हुए ख़ुशी है कि मैं कुछ बड़ी दिलचस्प बातें सर डॉन से शेयर करता हूँ. वे भी, मूलत; मेरी तरह ही तीसरे क्रम के बल्लेबाज़ थे. यह एक कठिन कार्य है. हमने यह कार्य किया लेकिन उन्होंने इसे और भी सफलता और स्टाइल से किया. वे गेंदबाजों पर छा जाते थे और फिर अपनी तशरीफ़ ले जाते थे. ..वे अस्सी के दशक में सार्वजानिक जीवन से रिटायर हो गए. मुझे ज्ञात हुआ कि वे सुनील गावस्कर की पीढ़ी के खिलाड़ियों को आस्ट्रेलिया में खेलते हुए देख चुके है...मैं उनका कायल हूँ, जिस कुशलता के साथ वे खेले, और जिस गरिमा, सत्यनिष्ठा, साहस और विनम्रता से उन्होंने ज़िन्दगी को जीया. उन्होंने आजीवन विश्वास किया स्वाभिमान, महत्वाकांक्षा, प्रतिबध्धता और प्रतियोगितात्मकता पर. ये वे शब्द हैं जिन्हें पूरी दुनिया में क्रिकेट के ड्रेसिंग रूम में चस्पा कर देना चाहिए. .. वे हमारे बीच से 25 फरवरी 2001 को चले गए, मुंबई में भारत आस्ट्रेलिया सीरिज शुरू होने के दो दिन पहले.
क्रिकेट की शिक्षाएं
आई पी एल को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि आज भारतीय और आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी एक ड्रेसिंग रूम शेयर करते हैं. शेन वाटसन की राजस्थान रॉयल्स में सहभागिता, माइक हँसी का चेन्नई में रोल और शेन वार्न की भारतीय टीम में रूचि महत्वपूर्ण है. क्रिकेटर के रूप में हम अपने अपने देश के राजदूत हैं....यहाँ मैं यह कहना चाहता हूँ कि हम वास्तव में एक दूसरे को समझना, स्वीकारना, सम्मान करना सीख रहे हैं. जब मैंने अंडर 19 मैच न्यूजीलैंड के खिलाफ खेला था तब हमारी टीम में दो गेंदबाज़ थे, जिनमें से एक हिन्दीभाषी उत्तर भारत का था और दूसरा केरल का मलयालम भाषी. दोनों एक दूसरे से बात करने में असमर्थ थे. लेकिन जब मैच हुआ तब दोनों ने सौ रनों की भागीदारी की थी. यह सब क्रिकेट में संभव है. क्रिकेट ने भारत का ताना बाना ही बदल डाला है.
जैसे सर डॉन आस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स के बारह हज़ार आबादी के कस्बे से आये थे, वैसे ही हमारे देश के क्रिकेटरों की भी कहानियां है. रणजी ट्रॉफ़ी के लिए 27 तीमें खेलती हैं. पिछली बार जीती राजस्थान की टीम. झारखण्ड की टीम ने पहली बार वन डे जीता. जहीर खान महाराष्ट्र के जिस कस्बे से आते हैं, वहां सलीके का एक मैदान तक नहीं. गुजरात का एक 17 साल का युवक भारत का सबसे तेज़ गेंदबाज़ बना है. मुनाफ पटेल के टीम में आने के बाद उनके गाँव और रेलवे स्टेशन के बीच का रोड सुधर गया क्योंकि सैकड़ों पत्रकार उनसे मिलने जा रहे थे. क्रिकेट के कारण उमेश यादव ने अपना पुलिस में भर्ती होने का सपना छोड़ा. वीरेंद्र सहवाग प्रैक्टिस के लिए रोजाना 84 किलोमीटर का सफ़र बस से करते थे. भारत के हर क्रिकेटर की एक कहानी है. भारतीय क्रिकेट की आत्मा और ह्रदय की कहानी.
क्रिकेट के नए रूप
क्रिकेट ने हमारी ज़िन्दगी बदल दी है. हम जीतें या ना जीत पायें, जनता हमारे लिए दुआ मांगती है, हमें देखकर मुसकराती है, हाथ हिलाती है. क्रिकेट हमारे लिए रोजी रोटी नहीं, एक वरदान है. इसके बिना हम केवल मामूली इंसान हैं. हमें इस मौके पर पुनरवलोकन भी करना चाहिए. मैंने पिछले महीनों में एक भारतीय मैच में स्टैंड में कई सीटें खाली पायी. यह एक चेतावनी भी है. 1981 से अब तक भारत 227 वन डे इंटरनेशनल खेल चुका है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि आखिर हम हैं तो परफार्मर, इंटरटेनर, क्रिकेटर. और हमें अपने दर्शकों से प्यार है. आस्ट्रेलिया या इंग्लैण्ड की तरह हमारे यहाँ और कोई खेल नहीं है जो इतना रेवेन्यु अर्जित कर पाए. अब टेस्ट मैच, वन डे और 20 -20 में तालमेल बैठकर खेल को आगे बढ़ाना चाहिए. हमें मूल क्रिकेट को और उसकी भावना को बचाकर रखने की कोशिश करनी चाहिए. क्रिकेट की तीनों विधाओं के लिए अलग अलग कौशल की ज़रुरत पड़ती है.टेस्ट क्रिकेट वह पद्धति है जिसे क्रिकेटर खेलना चाहते हैं. वन डे तीन दशकों से रेवेन्यू का एक अच्छा माध्यम है और अब 20 - 20 नए रूप में आ चुका है, इस रूप को दर्शक देखना चाहते हैं.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
(दैनिक हिन्दुस्तान (18 - 12 - 2011) के एडिट पेज पर प्रकाशित)
Sunday, December 11, 2011
सिखाती तो नाकामी ही है
रविवासरीय हिन्दुस्तान (11 - 12- 2011) के एडिट पेज पर मेरा कॉलम
सिखाती तो नाकामी ही है
इन्फोसिस के जनक एन आर नारायण मूर्ति अब रिटायर हो गए हैं, लेकिन शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों के कारण वे लगातार चर्चा में हैं. उन्होंने तीस साल पहले, 1981 में दस हज़ार रुपये की पूंजी से इन्फोसिस शुरू की थी, जिसका टर्नओवर आज तीस हज़ार करोड़ रुपये से भी अधिक है. किंवदंती बन चुके नारायण मूर्ति हमेशा ही कुछ नया करने, अपने जीवन में मूल्यों को महत्व देने, गांधीवाद को अपनाने और सही वक़्त पर पद छोड़ने के पैरोकार रहे हैं. उन्हें शीर्ष शिक्षा संस्थान विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देने के लिए बुलाते हैं, जहाँ वे अपने अनुभवों को बाँटते हैं.
नारायण मूर्ति के प्रमुख भाषणों में से यह भाषण भी है जिसमें उन्होंने युवाओं से कहा था -- अपने कर्म से प्रेम करो, कंपनी से नहीं; क्योंकि आप यह नहीं जानते कि कंपनी कब आपसे प्रेम करना बंद कर देगी!
आराम भी ज़रूरी है, काम की तरह
''मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ, जो सप्ताह में छह दिन रोजाना 12 घंटे या उससे भी ज्यादा कार्य करते हैं, क्योंकि इमर्जेन्सी में उन्हें यह करना पड़ता है. यह कुछ ही दिनों के लिए होता है. ऐसे लोग भी होते हैं जो इतने या इससे भी ज्यादा समय कार्यालय में बिताते हैं...यह कोई अच्छी बात नहीं है. जब कार्यालयों में लोग लम्बे समय तक रहते है, वे ज्यादा गलतियाँ करते हैं और फिर उन्हें सुधारने में ही काफी वक़्त लग जाता है. वे लोग आपस में शिकायतें करते हैं, जिसका कोई अच्छा नतीजा नहीं निकलता.
मेरी सलाह है कि हमें अपने जीवन में संतुलन बनाये रखना चाहिए. मेरी राय में यह दिनचर्या लाभदायक हो सकती है : (1 ) सुबह उठो, तैयार होओ, अच्छा नाश्ता करो और ड्यूटी पर जाओ. (2 ) ड्यूटी पर आठ या नौ घंटे जमकर, स्मार्ट तरीके से कार्य करो. (3 ). घर वक़्त पर पहुँचो. (4 ). परिवार को समय डॉ, बच्चों से खोलो, किताबें पढ़ो. टीवी देखो वगैरह वगैरह. (5 ). अच्छी तरह भोजन करो और बढ़िया नींद लो.
याद रखो -- जो लोग ऊपर लिखे पहले, तीसरे, चौथे या पांचवे कार्य को ठीक से नहीं कर पाते, वे दूसरे कार्य यानी ड्यूटी ठीक से नहीं कर पाते.
जो लोग देरी से घर पहुंचाते हैं, उनका परिवार इसकी कीमत अदा करता है.
कई लोगों को लगता है कि अगर वे ऑफिस में ना रहें तो कुछ अनहोनी हो जाएगी. ...और उन्हें यह लगता ही रहता है, ऐसी अनहोनी कभी नहीं होती.
बेहतर है कि आप आराम के वक़्त आराम और काम के वक़्त काम करें. आपका आराम भी ज़रूरी है. आप आराम करेंगे, तभी बेहतर कार्य कर सकेंगे. इसीलिये मैं यह कहता हूँ कि अपने कर्म से प्रेम करो,कंपनी से नहीं; क्योंकि आप यह नहीं जानते कि कंपनी कब आपसे प्रेम करना बंद कर देगी!
खुद के अनुभव से सीखें
नारायण मूर्ति ने अपने खुद के अनुभव से सीखने को बेहद महत्वपूर्ण करार दिया है. न्यू यॉर्क विश्वविद्यालय में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था --''आप कैसे और क्या सीखते हैं यह महत्वपूर्ण है, यह नहीं कि आपने कहाँ सीखा? अगर सीखने की क्षमता और गुणवत्ता अच्छी है तो यह बात ज्यादा फायदे की है.'' इसी भाषण में उन्होंने कहा --''सफलताओं से सीखना ज्यादा कठिन है, बनिस्बत असफलताओं के. क्योंकि जब भी हम नाकाम होते हैं, हम उसके बारे में गहनता से सोचते हैं. कामयाबी मिलने पर प्राय: ऐसा नहीं होता.'' असफलता हमारे विचारों को उद्वेलित कर देती है और सफलता हमारे सभी पुराने फैसलों को सही ठहराते हुए आगे बढ़ने को प्रेरित करती है.
दरअसल हमारा दिमाग इस तरह से विकसित होता है कि अगर हमारे सामने कोई चुनौती आये तो हम उसे टालने का यत्न करेंगे. हम हमेशा उपयोगी लेकिन नकारात्मक सलाहों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. जो लोग चुनौतियों और अपनी आलोचनाओं से सीखना जानते हैं वे ही कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ पाते हैं. याद रखिये, हमारे जीवन कि सबसे बड़ी, महत्वपूर्ण और निर्णायक घटना यही होती है कि हम संकट के पलों में प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त करते है? हमारी यही भूमिका सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण है.
भारतीय परंपरा का महत्व
नारायण मूर्ति भारतीय परंपरा को बहुत महत्व देते हैं. हमारी परंपरा आत्म ज्ञान की है. यही ज्ञान का सबसे बड़ा प्रकार है. आत्म ज्ञान है क्या? यह है अपने बारे में जानना है. यह अपने आप को भीतर तक जाकर समझना है. आप अपने आप में कितना यकीन करते हैं? आपमें हौसला है क्या? और इस सबसे ऊपर यह कि मानवता का कितना अंश आपमें जीवित है? अगर आपमें मानवता का अंश नहीं बचा है तो आप कभी भी अपनी सफलता को गरिमामाय तरीके से प्राप्त नहीं कर पाएंगे. मैं अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता हूँ कि अनुभवों से सीखना इस बात पर निर्भर है कि आप अपने दिमाग को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं? आप में अपने आप को बदलने की कितनी इच्छा और कूवत है? घटनाओं पर आप के दिमाग में कब, कौन सी और कितनी तेज़ प्रतिक्रियाओं की बिजली कौंधती है?
कुछ साल पहले मैं शून्य था. आज मैं कामयाब हूँ.. मेरे जीवन में आनेवाले हर रोड़े ने, रास्ते के हर पत्थर ने मुझे सफलता की राह सुझाई है. यही रुकावटें थीं कि मैं आज सफल हो सका. मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि हमारा भवितव्य पहले से तय होता है. हम क्या करेंगे, क्या बनेंगे यह हम ही तय करते हैं. क्या आप यह मानते हैं कि आपका भविष्य लिखा जा चुका है या आप यह मानते हैं कि उसे अभी लिखा जाना है और भविष्य क्या होगा यह तय करेंगे कुछ हालात? क्या आप यह मानते हैं कि वे हालात आपके जीवन में निर्णायक घडी होंगे? क्या आपको लगता है कि आप अपनी कामयाबी की किताब खुद, स्वर्णाक्षरों में लिख सकते हैं? आप उस किताब को और भी सुन्दर, यादगार और महान बना सकते हैं? मैं यह मानता हूँ कि आप यह समझते हैं कि आपका भविष्य अनेक निर्णायक मोड़ों और शिक्षाप्रद संभावनाओं के मध्य से गुजरेगा. मैं इसी रास्ते से होकर गुजरा हूँ. यह बड़ा ही सुखकर रास्ता है, बड़ा ही दिलचस्प और उम्मीदों से भरा.
आपके निशां होंगे ज़माने पर
नारायण मूर्ति युवाओं के लिए आश्वस्त हैं उन्हें भरोसा है कि युवा वक़्त की रेत पर अपने निशां ज़रूर छोड़ेंगे. आप सब यह बात ज़रूर याद रखिये कि हम सब अपनी आनेवाली पीढ़ी के लिए अभिरक्षक या रखवाली करनेवाले हैं. हम चाहे कुछ भी उपलब्धि प्राप्त कर लें, कोई भी संपत्ति बना लें या साम्राज्य ही क्यों न खड़ा कर लें, चाहे वह आर्थिक, बौद्धिक, भावनात्मक उपलब्धि ही क्यों न हो, हम होंगे तो उसके कस्टोडियन या अभिरक्षक ही. आपके पास जो भी सम्पदा हो, उसका सर्वोत्तम उपयोग यही है कि आप उसे उन लोगों के साथ बाँटें जो कम सौभाग्यशाली हैं. मैं यकीन करता हूँ कि आप इस बात से वाकिफ हैं कि हम जो फल आज खा रहे हैं, उसे देने वाले पेड़ हमने नहीं लगाये. उनके पौधे हमने नहीं रोपे. उनके बीजों को हमने अंकुरित नहीं किया. अब यह हमारी बारी है कि हम उन पेड़ों को लगाने की तैयारी करें, जिनके फल शायद हम जीते जी नहीं खा पाएंगे, लेकिन व्यापक रूप में हमारी आनेवाली नस्लें उसका फायदा ले पाएगी. ऐसे पेड़ों को अंकुरित करना, रोपना और बड़ा करना हमारी पद्मपावन जवाबदारी है.
नारायण मूर्ति हमेशा यही कहते हैं कि मैं एक साधारण इंसान हूँ और मैंने भी कई गलतियाँ की हैं, मैं भी नाकाम हुआ हूँ, लेकिन मैं हर बार संभाला हूँ और कुछ नया, बेहतर और उपयोगी करने की कोशिश करता रहा हूँ.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
दैनिक हिन्दुस्तान 11- 12- 2011 के अंक में प्रकाशित
सिखाती तो नाकामी ही है
इन्फोसिस के जनक एन आर नारायण मूर्ति अब रिटायर हो गए हैं, लेकिन शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों के कारण वे लगातार चर्चा में हैं. उन्होंने तीस साल पहले, 1981 में दस हज़ार रुपये की पूंजी से इन्फोसिस शुरू की थी, जिसका टर्नओवर आज तीस हज़ार करोड़ रुपये से भी अधिक है. किंवदंती बन चुके नारायण मूर्ति हमेशा ही कुछ नया करने, अपने जीवन में मूल्यों को महत्व देने, गांधीवाद को अपनाने और सही वक़्त पर पद छोड़ने के पैरोकार रहे हैं. उन्हें शीर्ष शिक्षा संस्थान विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देने के लिए बुलाते हैं, जहाँ वे अपने अनुभवों को बाँटते हैं.
नारायण मूर्ति के प्रमुख भाषणों में से यह भाषण भी है जिसमें उन्होंने युवाओं से कहा था -- अपने कर्म से प्रेम करो, कंपनी से नहीं; क्योंकि आप यह नहीं जानते कि कंपनी कब आपसे प्रेम करना बंद कर देगी!
आराम भी ज़रूरी है, काम की तरह
''मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ, जो सप्ताह में छह दिन रोजाना 12 घंटे या उससे भी ज्यादा कार्य करते हैं, क्योंकि इमर्जेन्सी में उन्हें यह करना पड़ता है. यह कुछ ही दिनों के लिए होता है. ऐसे लोग भी होते हैं जो इतने या इससे भी ज्यादा समय कार्यालय में बिताते हैं...यह कोई अच्छी बात नहीं है. जब कार्यालयों में लोग लम्बे समय तक रहते है, वे ज्यादा गलतियाँ करते हैं और फिर उन्हें सुधारने में ही काफी वक़्त लग जाता है. वे लोग आपस में शिकायतें करते हैं, जिसका कोई अच्छा नतीजा नहीं निकलता.
मेरी सलाह है कि हमें अपने जीवन में संतुलन बनाये रखना चाहिए. मेरी राय में यह दिनचर्या लाभदायक हो सकती है : (1 ) सुबह उठो, तैयार होओ, अच्छा नाश्ता करो और ड्यूटी पर जाओ. (2 ) ड्यूटी पर आठ या नौ घंटे जमकर, स्मार्ट तरीके से कार्य करो. (3 ). घर वक़्त पर पहुँचो. (4 ). परिवार को समय डॉ, बच्चों से खोलो, किताबें पढ़ो. टीवी देखो वगैरह वगैरह. (5 ). अच्छी तरह भोजन करो और बढ़िया नींद लो.
याद रखो -- जो लोग ऊपर लिखे पहले, तीसरे, चौथे या पांचवे कार्य को ठीक से नहीं कर पाते, वे दूसरे कार्य यानी ड्यूटी ठीक से नहीं कर पाते.
जो लोग देरी से घर पहुंचाते हैं, उनका परिवार इसकी कीमत अदा करता है.
कई लोगों को लगता है कि अगर वे ऑफिस में ना रहें तो कुछ अनहोनी हो जाएगी. ...और उन्हें यह लगता ही रहता है, ऐसी अनहोनी कभी नहीं होती.
बेहतर है कि आप आराम के वक़्त आराम और काम के वक़्त काम करें. आपका आराम भी ज़रूरी है. आप आराम करेंगे, तभी बेहतर कार्य कर सकेंगे. इसीलिये मैं यह कहता हूँ कि अपने कर्म से प्रेम करो,कंपनी से नहीं; क्योंकि आप यह नहीं जानते कि कंपनी कब आपसे प्रेम करना बंद कर देगी!
खुद के अनुभव से सीखें
नारायण मूर्ति ने अपने खुद के अनुभव से सीखने को बेहद महत्वपूर्ण करार दिया है. न्यू यॉर्क विश्वविद्यालय में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था --''आप कैसे और क्या सीखते हैं यह महत्वपूर्ण है, यह नहीं कि आपने कहाँ सीखा? अगर सीखने की क्षमता और गुणवत्ता अच्छी है तो यह बात ज्यादा फायदे की है.'' इसी भाषण में उन्होंने कहा --''सफलताओं से सीखना ज्यादा कठिन है, बनिस्बत असफलताओं के. क्योंकि जब भी हम नाकाम होते हैं, हम उसके बारे में गहनता से सोचते हैं. कामयाबी मिलने पर प्राय: ऐसा नहीं होता.'' असफलता हमारे विचारों को उद्वेलित कर देती है और सफलता हमारे सभी पुराने फैसलों को सही ठहराते हुए आगे बढ़ने को प्रेरित करती है.
दरअसल हमारा दिमाग इस तरह से विकसित होता है कि अगर हमारे सामने कोई चुनौती आये तो हम उसे टालने का यत्न करेंगे. हम हमेशा उपयोगी लेकिन नकारात्मक सलाहों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. जो लोग चुनौतियों और अपनी आलोचनाओं से सीखना जानते हैं वे ही कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ पाते हैं. याद रखिये, हमारे जीवन कि सबसे बड़ी, महत्वपूर्ण और निर्णायक घटना यही होती है कि हम संकट के पलों में प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त करते है? हमारी यही भूमिका सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण है.
भारतीय परंपरा का महत्व
नारायण मूर्ति भारतीय परंपरा को बहुत महत्व देते हैं. हमारी परंपरा आत्म ज्ञान की है. यही ज्ञान का सबसे बड़ा प्रकार है. आत्म ज्ञान है क्या? यह है अपने बारे में जानना है. यह अपने आप को भीतर तक जाकर समझना है. आप अपने आप में कितना यकीन करते हैं? आपमें हौसला है क्या? और इस सबसे ऊपर यह कि मानवता का कितना अंश आपमें जीवित है? अगर आपमें मानवता का अंश नहीं बचा है तो आप कभी भी अपनी सफलता को गरिमामाय तरीके से प्राप्त नहीं कर पाएंगे. मैं अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता हूँ कि अनुभवों से सीखना इस बात पर निर्भर है कि आप अपने दिमाग को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं? आप में अपने आप को बदलने की कितनी इच्छा और कूवत है? घटनाओं पर आप के दिमाग में कब, कौन सी और कितनी तेज़ प्रतिक्रियाओं की बिजली कौंधती है?
कुछ साल पहले मैं शून्य था. आज मैं कामयाब हूँ.. मेरे जीवन में आनेवाले हर रोड़े ने, रास्ते के हर पत्थर ने मुझे सफलता की राह सुझाई है. यही रुकावटें थीं कि मैं आज सफल हो सका. मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि हमारा भवितव्य पहले से तय होता है. हम क्या करेंगे, क्या बनेंगे यह हम ही तय करते हैं. क्या आप यह मानते हैं कि आपका भविष्य लिखा जा चुका है या आप यह मानते हैं कि उसे अभी लिखा जाना है और भविष्य क्या होगा यह तय करेंगे कुछ हालात? क्या आप यह मानते हैं कि वे हालात आपके जीवन में निर्णायक घडी होंगे? क्या आपको लगता है कि आप अपनी कामयाबी की किताब खुद, स्वर्णाक्षरों में लिख सकते हैं? आप उस किताब को और भी सुन्दर, यादगार और महान बना सकते हैं? मैं यह मानता हूँ कि आप यह समझते हैं कि आपका भविष्य अनेक निर्णायक मोड़ों और शिक्षाप्रद संभावनाओं के मध्य से गुजरेगा. मैं इसी रास्ते से होकर गुजरा हूँ. यह बड़ा ही सुखकर रास्ता है, बड़ा ही दिलचस्प और उम्मीदों से भरा.
आपके निशां होंगे ज़माने पर
नारायण मूर्ति युवाओं के लिए आश्वस्त हैं उन्हें भरोसा है कि युवा वक़्त की रेत पर अपने निशां ज़रूर छोड़ेंगे. आप सब यह बात ज़रूर याद रखिये कि हम सब अपनी आनेवाली पीढ़ी के लिए अभिरक्षक या रखवाली करनेवाले हैं. हम चाहे कुछ भी उपलब्धि प्राप्त कर लें, कोई भी संपत्ति बना लें या साम्राज्य ही क्यों न खड़ा कर लें, चाहे वह आर्थिक, बौद्धिक, भावनात्मक उपलब्धि ही क्यों न हो, हम होंगे तो उसके कस्टोडियन या अभिरक्षक ही. आपके पास जो भी सम्पदा हो, उसका सर्वोत्तम उपयोग यही है कि आप उसे उन लोगों के साथ बाँटें जो कम सौभाग्यशाली हैं. मैं यकीन करता हूँ कि आप इस बात से वाकिफ हैं कि हम जो फल आज खा रहे हैं, उसे देने वाले पेड़ हमने नहीं लगाये. उनके पौधे हमने नहीं रोपे. उनके बीजों को हमने अंकुरित नहीं किया. अब यह हमारी बारी है कि हम उन पेड़ों को लगाने की तैयारी करें, जिनके फल शायद हम जीते जी नहीं खा पाएंगे, लेकिन व्यापक रूप में हमारी आनेवाली नस्लें उसका फायदा ले पाएगी. ऐसे पेड़ों को अंकुरित करना, रोपना और बड़ा करना हमारी पद्मपावन जवाबदारी है.
नारायण मूर्ति हमेशा यही कहते हैं कि मैं एक साधारण इंसान हूँ और मैंने भी कई गलतियाँ की हैं, मैं भी नाकाम हुआ हूँ, लेकिन मैं हर बार संभाला हूँ और कुछ नया, बेहतर और उपयोगी करने की कोशिश करता रहा हूँ.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
दैनिक हिन्दुस्तान 11- 12- 2011 के अंक में प्रकाशित
Sunday, December 04, 2011
धन से बड़े हैं मन के मकसद
रविवासरीय हिन्दुस्तान (04 - 12 - 2011) के एडिट पेज पर मेरा कॉलम
केवल धन के लिए काम ना करें
स्टीव 'वोज' (स्टीफन गेरी वोज्निआक) कॉलेज ड्रॉपआउट हैं, लेकिन उनके पास अमेरिका के नौ विश्वविद्यालयों की मानद पीएच डी की उपाधियाँ हैं.
उन्होंने स्टीव जॉब्स के साथ एप्पल की स्थापना की थी और बहुत कम लोगों को पता होगा कि एप्पल का डिजाइन वास्तव में वोज की देन है, न कि स्टीव जॉब्स की. वास्तव में स्टीव जॉब्स ने एप्पल का कोई भी पुर्जा डिजाइन ही नहीं किया है, सब कुछ किया है वोज ने. वह भी वोज के ही घर पर. एप्पल कंप्यूटर लांच करने के लिए जॉब्स ने अपना केलकुलेटर और वोज ने अपनी पुरानी गाड़ी बेचकर १३५० डॉलर इकट्ठे किये थे. उन्होंने ही किशोरावस्था में स्टीव जॉब्स और रोनाल्ड वायने के साथ मिलकर कंपनी बनाई थी.
वोज १८ साल की उम्र में वे पहली बार स्टीव जॉब्स से मिले थे, तब जॉब्स केवल १३ साल के थे. दोनों की दिलचस्पी कम्प्यूटर्स में थी और दोनों ही कुछ ख़ास करना चाहते थे. कुछ मुलाकातों के बाद दोनों ने २५ डॉलर में एक माइक्रोप्रोसेसर खरीदा और पर्सनल कंप्यूटर बनाने की कोशिशें शुरू कीं. इस कोशिश में उन्होंने एक 'ब्यू बॉक्स' बना डाला जिसके जरिये वे 'टोल फ्री' टेलीफोन काल्स करने लगे थे. वोज कहते है --''यह थी एप्पल कंपनी की शुरुआत. अगर यह ब्यू बॉक्स नहीं होता तो आज एप्पल कंप्यूटर भी नहीं होता.
लक्ष्य केवल धन कमाना नहीं
वोज इन दिनों भारत यात्रा पर हैं. कंप्यूटर गेम बनाना असंभव था अगर वोज ने हाई रेज़ कलर, ग्राफिक्स और साउंड की खोज नहीं की होती. वोज ने ही कंप्यूटर के असेम्बली कोड लिखे थे और उन्हें बिनारी में विश्लेषित किये थे. ये कोड उन्होंने एक नोटबुक में अपने हाथ से पेन से लिखे थे, जो आज भी सुरक्षित रखे गए हैं. वीडियो डिस्प्ले में प्रयुक्त माइक्रोकंप्यूटर, रिकार्डर का मेग्नेटिक डिस्क कंट्रोलर जैसे कई अन्वेषण उनके नाम पर पेटेंट किये गए हैं. विद्यार्थी जीवन में ही वे अपनी इन खोजों के बारे में ग्राहक खोजते रहते थे. लेकिन लाख टेक बात वे जानते थे --'' मेरा लक्ष्य कभी भी ढेर सारा धन कमाना नहीं, बल्कि ये रहा कि मैं एक बहुत अच्छा कंप्यूटर बना सकूं.''
''हमें अपने कार्य में लोगों और समाज की मान्यता और सम्मान चाहिए था. इसके लिए ज़रूरी था कि लोग हमारे बनाये गए उत्पाद खरीदें, यह हमारे काम को मान्यता देने और सम्मान करने का एक तरीका मात्र था. हमें अपने काम में एक बड़ा फायदा यह मिला कि उन दिनों कम्यूटर के बारे में कोअनूं नहीं बने थे.''
याददाश्त खो चुके थे वोज
अपनी किशोरावस्था में ही वोज ने पहला वीडियो गेम बना डाला था. २० साल की उम्र में उन्होंने ह्यूलेट पेकार्ड में नौकरी शुरू कर दी थी और २६ की उम्र में स्टीव जॉब्स के साथ एप्पल कंप्यूटर कंपनी बना ली थी.वे कहते थे कि अगर हम सफल नहीं भी पाए तो कोई बात नहीं, कम से कम हम अपने बच्चों को यह तो कहा ही सकेंगे कि हम जवानी के दिनों में ही कंपनी के मालिक बन गए थे. फरवरी १९८१ में वोज का प्राइवेट विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें उनकी जान तो बच गयी पर वे अपनी याददाश्त खो बैठे थे. उस दुर्घटना के हफ़्तों बाद तक उन्हें याद नहीं था कि उनका विमान दुर्घटना का शिकार हो गया था. उन्हें रोज़मर्रा की बातें याद नहीं रहतीं थीं, वे शारीरिक तौर पर ठीक होने के बाद भी कई हफ़्तों तक अपने काम पर नहीं गए. कोई पूछता तो कहते कि यह वीकेंड है. वे लोगों से ही पूछते कि उन्हें काया हो गया था, लोग उन्हें दुर्घटना के बारे में बताते तो वे आश्चर्य व्यक्त करते. कुछ माह बाद उनकी याददाश्त धीरे धीरे वापस लौटी, पर कई बातें वे अब भी भूल जाते हैं. इस दुर्घटना के कारण उन्हें कुछ साल मिल गए एप्पल से अलग रहने के लिए और इसी दौरान उन्होंने अपनी कॉलेज की पढ़ाई फिर से शुरू की और पाँच साल बाद वे ग्रेजुएट हुए. इसी दौरान उन्होंने शादी कर डाली. जब वे वापस लौटे तब वे केवल एक इंजीनियर नहीं, अपनी कंपनी के लिए एक टीम लीडर भी थे.
एकरस ना रहें
स्टीव वोज ने अपने जीवन में एकरसता नहीं आने दी. उन्होंने माइक्रोसाफ्ट जैसी कंपनी के सामने अपने लक्ष्य को पाने के लिए तो काम किया ही, लेकिन अपने जीवन में भी विविधता के रंग भरे. उनके खिलंदड़ स्वभाव के कारण जीवन की कई परेशानियों से वे निजात पा सके. वोज पोलो के खिलाड़ी तो हैं ही, एक टीवी रीयल्टी शो 'डांसिंग विथ द स्टार' में भी वे भाग ले चुके हैं. मज़ेदार बात यह रही कि वे दस टीमों में उनकी टीम को सबसे कम अंक मिले, यानी वे दसवें क्रम पर रहे , लेकिन उन्होंने अपना उत्साह कम नहीं होने दिया. उन्हें बच्चों को पढ़ाने का शौक है और वे पांचवी कक्षा के बच्चों को भी पढ़ाते रहे हैं. १९८७ में उन्होंने एप्पल से अंशकालिक रूप से ही जुड़े हैं और अंशकालिक कर्मचारी के रूप में ही वेतन लेते रहे. कंपनी के प्रमुख शेयर होल्डर होने के नाते उनका सम्बन्ध एप्पल से रहा लेकिन उन्होंने अपने आप को कई दूसरे कामों से भी जोड़ा.
वोज ने टीवी कॉमेडी शो 'कोड मंकी' में भी भाग लिया और और वे एमी अवार्ड कार्यक्रम में भी देखे गए. कई छोटे- बड़े स्थानों पर वे भाषण देने भी जाते हैं और उन्होंने अपनी आत्मकथा भी लिखी है, जिसका शीर्षक है --'' आई वोज : फ्रॉम कंप्यूटर गीक तो कल्ट आयकोन.'' वे एक ऐसे शख्स के रूप में याद किये जाते हैं जिसने जिंदगी में बहुतेरे काम किये और उसका आनंद लिया. धन तो कमाया ही, लेकिन उसके पीछे पागल नहीं हुआ. उन्होंने अपनी जीवनी को ऑनलाइन भी कर रखा है और कोई भी उसे पढ़ सकता है. उन्होंने लिखा है ''आय एम मेंबर ऑफ़ चैरिटी लॉज कैम्पबेल, बुत नोट एक्टिव''
उन्होंने अपनी आत्म कथा में दिलचस्प तरीके से लिखा है कि उनके पिता किस तरह के गुप्त मिशन पर कार्य करते थे और बचपन से ही वोज ने नए नए उपकरण बनने में कैसे दिलचस्पी ली. इसमें उन्होंने स्टीव जॉब्स से अपनी दोस्ती का भी खूब विश्लेषण किया है. दोनों की उम्र में पांच साल का अंतर रहा है, लेकिन समान रुचियों ने उन्हें एक साथ ला दिया.
सम्मानों से मगरूर न हों
वोज को दुनिया भर के अनेक सम्मान मिल चुके हैं, विश्विद्यालयों की उपाधियाँ, वैज्ञानिक शोध के सम्मान, 'नेशनल इन्वेन्टर हाल ऑफ़ फेम', और 'नेशनल मैडल ऑफ़ टेक्नोलाजी' आदि. वोज का मानना है कि सम्मान पाकर जो मगरूर हो जाता है वह उसका हक खो देता है. ''सम्मान से विनम्रता आणि चाहिए और धन से भी. ये दोनों ही हमें लोगों से दूर करने के लिए काफी है.'' स्टीव जॉब्स से उनका नाता कई दशक तक रह, लेकिन जब उन्हें लगा कि अब मान नहीं मिल रहे तो वे पांच साल तक उनसे दूर रहे. स्टीव जॉब्स की मौत से वे थोड़े टूट से गए. इसी साल उन्हें यूएसए के राष्ट्रपति की तरफ से 'आउटस्टेंडिंग कंट्रीब्युशन टु ह्यूमैनिटी थ्रू आई टी ' से नवाजा गया है.
नी
दैनिक हिन्दुस्तान में 04 - 12 - 2011 को प्रकाशित
केवल धन के लिए काम ना करें
स्टीव 'वोज' (स्टीफन गेरी वोज्निआक) कॉलेज ड्रॉपआउट हैं, लेकिन उनके पास अमेरिका के नौ विश्वविद्यालयों की मानद पीएच डी की उपाधियाँ हैं.
उन्होंने स्टीव जॉब्स के साथ एप्पल की स्थापना की थी और बहुत कम लोगों को पता होगा कि एप्पल का डिजाइन वास्तव में वोज की देन है, न कि स्टीव जॉब्स की. वास्तव में स्टीव जॉब्स ने एप्पल का कोई भी पुर्जा डिजाइन ही नहीं किया है, सब कुछ किया है वोज ने. वह भी वोज के ही घर पर. एप्पल कंप्यूटर लांच करने के लिए जॉब्स ने अपना केलकुलेटर और वोज ने अपनी पुरानी गाड़ी बेचकर १३५० डॉलर इकट्ठे किये थे. उन्होंने ही किशोरावस्था में स्टीव जॉब्स और रोनाल्ड वायने के साथ मिलकर कंपनी बनाई थी.
वोज १८ साल की उम्र में वे पहली बार स्टीव जॉब्स से मिले थे, तब जॉब्स केवल १३ साल के थे. दोनों की दिलचस्पी कम्प्यूटर्स में थी और दोनों ही कुछ ख़ास करना चाहते थे. कुछ मुलाकातों के बाद दोनों ने २५ डॉलर में एक माइक्रोप्रोसेसर खरीदा और पर्सनल कंप्यूटर बनाने की कोशिशें शुरू कीं. इस कोशिश में उन्होंने एक 'ब्यू बॉक्स' बना डाला जिसके जरिये वे 'टोल फ्री' टेलीफोन काल्स करने लगे थे. वोज कहते है --''यह थी एप्पल कंपनी की शुरुआत. अगर यह ब्यू बॉक्स नहीं होता तो आज एप्पल कंप्यूटर भी नहीं होता.
लक्ष्य केवल धन कमाना नहीं
वोज इन दिनों भारत यात्रा पर हैं. कंप्यूटर गेम बनाना असंभव था अगर वोज ने हाई रेज़ कलर, ग्राफिक्स और साउंड की खोज नहीं की होती. वोज ने ही कंप्यूटर के असेम्बली कोड लिखे थे और उन्हें बिनारी में विश्लेषित किये थे. ये कोड उन्होंने एक नोटबुक में अपने हाथ से पेन से लिखे थे, जो आज भी सुरक्षित रखे गए हैं. वीडियो डिस्प्ले में प्रयुक्त माइक्रोकंप्यूटर, रिकार्डर का मेग्नेटिक डिस्क कंट्रोलर जैसे कई अन्वेषण उनके नाम पर पेटेंट किये गए हैं. विद्यार्थी जीवन में ही वे अपनी इन खोजों के बारे में ग्राहक खोजते रहते थे. लेकिन लाख टेक बात वे जानते थे --'' मेरा लक्ष्य कभी भी ढेर सारा धन कमाना नहीं, बल्कि ये रहा कि मैं एक बहुत अच्छा कंप्यूटर बना सकूं.''
''हमें अपने कार्य में लोगों और समाज की मान्यता और सम्मान चाहिए था. इसके लिए ज़रूरी था कि लोग हमारे बनाये गए उत्पाद खरीदें, यह हमारे काम को मान्यता देने और सम्मान करने का एक तरीका मात्र था. हमें अपने काम में एक बड़ा फायदा यह मिला कि उन दिनों कम्यूटर के बारे में कोअनूं नहीं बने थे.''
याददाश्त खो चुके थे वोज
अपनी किशोरावस्था में ही वोज ने पहला वीडियो गेम बना डाला था. २० साल की उम्र में उन्होंने ह्यूलेट पेकार्ड में नौकरी शुरू कर दी थी और २६ की उम्र में स्टीव जॉब्स के साथ एप्पल कंप्यूटर कंपनी बना ली थी.वे कहते थे कि अगर हम सफल नहीं भी पाए तो कोई बात नहीं, कम से कम हम अपने बच्चों को यह तो कहा ही सकेंगे कि हम जवानी के दिनों में ही कंपनी के मालिक बन गए थे. फरवरी १९८१ में वोज का प्राइवेट विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें उनकी जान तो बच गयी पर वे अपनी याददाश्त खो बैठे थे. उस दुर्घटना के हफ़्तों बाद तक उन्हें याद नहीं था कि उनका विमान दुर्घटना का शिकार हो गया था. उन्हें रोज़मर्रा की बातें याद नहीं रहतीं थीं, वे शारीरिक तौर पर ठीक होने के बाद भी कई हफ़्तों तक अपने काम पर नहीं गए. कोई पूछता तो कहते कि यह वीकेंड है. वे लोगों से ही पूछते कि उन्हें काया हो गया था, लोग उन्हें दुर्घटना के बारे में बताते तो वे आश्चर्य व्यक्त करते. कुछ माह बाद उनकी याददाश्त धीरे धीरे वापस लौटी, पर कई बातें वे अब भी भूल जाते हैं. इस दुर्घटना के कारण उन्हें कुछ साल मिल गए एप्पल से अलग रहने के लिए और इसी दौरान उन्होंने अपनी कॉलेज की पढ़ाई फिर से शुरू की और पाँच साल बाद वे ग्रेजुएट हुए. इसी दौरान उन्होंने शादी कर डाली. जब वे वापस लौटे तब वे केवल एक इंजीनियर नहीं, अपनी कंपनी के लिए एक टीम लीडर भी थे.
एकरस ना रहें
स्टीव वोज ने अपने जीवन में एकरसता नहीं आने दी. उन्होंने माइक्रोसाफ्ट जैसी कंपनी के सामने अपने लक्ष्य को पाने के लिए तो काम किया ही, लेकिन अपने जीवन में भी विविधता के रंग भरे. उनके खिलंदड़ स्वभाव के कारण जीवन की कई परेशानियों से वे निजात पा सके. वोज पोलो के खिलाड़ी तो हैं ही, एक टीवी रीयल्टी शो 'डांसिंग विथ द स्टार' में भी वे भाग ले चुके हैं. मज़ेदार बात यह रही कि वे दस टीमों में उनकी टीम को सबसे कम अंक मिले, यानी वे दसवें क्रम पर रहे , लेकिन उन्होंने अपना उत्साह कम नहीं होने दिया. उन्हें बच्चों को पढ़ाने का शौक है और वे पांचवी कक्षा के बच्चों को भी पढ़ाते रहे हैं. १९८७ में उन्होंने एप्पल से अंशकालिक रूप से ही जुड़े हैं और अंशकालिक कर्मचारी के रूप में ही वेतन लेते रहे. कंपनी के प्रमुख शेयर होल्डर होने के नाते उनका सम्बन्ध एप्पल से रहा लेकिन उन्होंने अपने आप को कई दूसरे कामों से भी जोड़ा.
वोज ने टीवी कॉमेडी शो 'कोड मंकी' में भी भाग लिया और और वे एमी अवार्ड कार्यक्रम में भी देखे गए. कई छोटे- बड़े स्थानों पर वे भाषण देने भी जाते हैं और उन्होंने अपनी आत्मकथा भी लिखी है, जिसका शीर्षक है --'' आई वोज : फ्रॉम कंप्यूटर गीक तो कल्ट आयकोन.'' वे एक ऐसे शख्स के रूप में याद किये जाते हैं जिसने जिंदगी में बहुतेरे काम किये और उसका आनंद लिया. धन तो कमाया ही, लेकिन उसके पीछे पागल नहीं हुआ. उन्होंने अपनी जीवनी को ऑनलाइन भी कर रखा है और कोई भी उसे पढ़ सकता है. उन्होंने लिखा है ''आय एम मेंबर ऑफ़ चैरिटी लॉज कैम्पबेल, बुत नोट एक्टिव''
उन्होंने अपनी आत्म कथा में दिलचस्प तरीके से लिखा है कि उनके पिता किस तरह के गुप्त मिशन पर कार्य करते थे और बचपन से ही वोज ने नए नए उपकरण बनने में कैसे दिलचस्पी ली. इसमें उन्होंने स्टीव जॉब्स से अपनी दोस्ती का भी खूब विश्लेषण किया है. दोनों की उम्र में पांच साल का अंतर रहा है, लेकिन समान रुचियों ने उन्हें एक साथ ला दिया.
सम्मानों से मगरूर न हों
वोज को दुनिया भर के अनेक सम्मान मिल चुके हैं, विश्विद्यालयों की उपाधियाँ, वैज्ञानिक शोध के सम्मान, 'नेशनल इन्वेन्टर हाल ऑफ़ फेम', और 'नेशनल मैडल ऑफ़ टेक्नोलाजी' आदि. वोज का मानना है कि सम्मान पाकर जो मगरूर हो जाता है वह उसका हक खो देता है. ''सम्मान से विनम्रता आणि चाहिए और धन से भी. ये दोनों ही हमें लोगों से दूर करने के लिए काफी है.'' स्टीव जॉब्स से उनका नाता कई दशक तक रह, लेकिन जब उन्हें लगा कि अब मान नहीं मिल रहे तो वे पांच साल तक उनसे दूर रहे. स्टीव जॉब्स की मौत से वे थोड़े टूट से गए. इसी साल उन्हें यूएसए के राष्ट्रपति की तरफ से 'आउटस्टेंडिंग कंट्रीब्युशन टु ह्यूमैनिटी थ्रू आई टी ' से नवाजा गया है.
नी
दैनिक हिन्दुस्तान में 04 - 12 - 2011 को प्रकाशित
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