Friday, April 01, 2011

छवि राजावत, एमबीए, सरपंच बाई सा.









मॉडर्न ख्यालों की, टेक्नॉलॉजी-सेवी, अंग्रेज़ीदां, हॉर्स राइडर, एसयूवी ड्राइवर, शेक्सपीयर से लेकर होटल मैनेजमेंट तक पर बहस कर सकनेवाली छवि नरेगा की बैठकों में गाँव के हालात पर बोलती तो अच्छे अच्छों की बोलती बंद हो जाती.



छवि राजावत, एमबीए, सरपंच बाई सा.

नाम - छवि राजावत,
उम्र - 30 साल,
शिक्षा - एमबीए,
शौक - घुड़सवारी,
प्रिय पहनावा - जींस टी शर्ट,
पद - सरपंच ग्राम पंचायत सोडा, (राजस्थान),
ताजा उपलब्धि - संयुक्त राष्ट्र में बीते दिनों हुए इन्फार्मेशन पावर्टी वर्ल्ड कांफ्रेंस में भारत की नुमाइंदगी.
लक्ष्य - अपनी ग्राम पंचायत के सभी लोगों के लिए शुद्ध पेयजल, सड़क, बिजली शौचालय और रोजगार मुहैया करना.

छवि को देखकर कई लोगों को लगता है कि शायद वह बॉलीवुड की कोई हीरोइन हैं या फिर मॉडल. फरवरी 2010 में ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के पहले छवि ने लाखों के टेलीकॉम कंपनी के जॉब को छोड़ा और अपने गाँव आकर पर्चा भरा. सरपंच का पद महिला आरक्षण कोटे में आने के बाद दर्जनभर से ज्यादा महिलायें दावा कर रही थीं, लेकिन छवि के पर्चा भरते ही केवल दो दावेदार बचीं. छवि के चुनाव ने यह बात गलत साबित की कि पंचायत चुनाव में जाति या धर्म का कोई रोल होता है. छवि को जिताने के लिए लोगों ने जाति, धर्म, क्षेत्र, जेंडर और यहाँ तक कि रिश्तेदारी तक को भूलकर वोटिंग की. छवि ने कहा कि जो काम 63 साल में नहीं हुए, तीन साल में करके दिखाना है. शुरूआत हो गयी और विकास के परंपरागत तरीकों के साथ ही अनेक एनजीओ और कार्पोरेट्स भी छवि की मदद करने में जुट गए. विकास में तेजी भी आई. उन लोगों का मुंह बंद हो गया जो कहते थे कि सरपंच बनने से क्या होगा? मीडिया की यह धारणा भी बदल गयी कि राजस्थान में महिला सरपंच यानी घूँघटधारी अंगूठाछाप स्त्री ! मॉडर्न ख्यालों की, टेक्नॉलॉजी-सेवी, अंग्रेज़ीदां, हॉर्स राइडर, एसयूवी ड्राइवर, शेक्सपीयर से लेकर होटल मैनेजमेंट तक पर बहस कर सकनेवाली छवि नरेगा की बैठकों में गाँव के हालात पर बोलती तो अच्छे अच्छों की बोलती बंद हो जाती.

सरपंच पद संभालते ही छवि टीवी चैनलों के लिए भी आकर्षण बन गयीं. फेसबुक पर छवि के सैकड़ों प्रशंसकों ने उनके काम को सराहा. अनेक एनजीओ मदद की पहल करने लगे. कोई माँ उनसे बायोडाटा मांगने लगी कि मेरी बेटी आप पर निबंध लिखना चाहती है तो कोई उन्हें कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनने की जिद करता है, कोई मिलने का वक्त चाहता है तो कोई उन पर डाक्युमेंटरी बनने की तमन्ना रखता है. एक साल में ही छवि आइकॉन बन चुकी हैं. लोग कहते हैं कि आप को गाँव की औरतों के साथ घुलना मिलना पसंद कैसे आता है? इस पर छवि का जवाब होता है मैं भी इसी गाँव की बेटी हूँ, ये सब मेरी बचपन की सहेलियां हैं. मुझे पढ़ाई के लिए अच्छा मौका मिला गया, बस.

छवि फौजियों के खानदान की हैं. उनके पिता को छोड़ दादा, परदादा, चाचा, बाबा सब फ़ौज में रहे. दादा रघुवीर सिंह ब्रिगेडियर थे. रिटायर होकर सोडा गाँव आ गए और गाँव का नक्शा बदलने में जुटे. लगातार तीन बार सरपंच चुने गए. छवि के परदादा सेना में कर्नल थे और आजाद भारत में सोडा के पहले सरपंच बने थे. दादा की जिद पर छवि को नो एक्जाम,नो यूनीफार्म वाले ऋषि वैली स्कूल भेजा गया, फिर अजमेर के मेयो और फिर दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज. पुणे के बालाजी मैनेजमेंट संस्थान से एमबीए के बाद छवि जयपुर में अपनी माँ के पास (जिनका अपना होटल बिजनेस है) आयीं थीं कि सोडा के लोग बस में भरकर आ गए और उनसे सरपंच का चुनाव लड़ने की मांग करने लगे. गांववालों के आगे तो छवि को झुकना पड़ा लेकिन अपने काम और इरादों से छवि ने पूरी दुनिया को अपने आगे झुका दिया है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

नईदुनिया
10 अप्रैल 2011
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