Tuesday, October 21, 2014

कहां मध्यप्रदेश, कहां हरियाणा?

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (05 जुलाई 2014)



हमारा मध्यप्रदेश उस बीपीएल परिवार की तरह है, जिसमें खाने के लाले पड़ते हैं, लेकिन शादी-ब्याह का जश्न बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। प्रदेश की हालत चाहे जो हो, सरकारी आयोजनों में करोड़ों रुपए खर्च करना सामान्य बात है। प्रतिव्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम होने के बावजूद मध्यप्रदेश में पेट्रोलियम पदार्थों पर सर्वाधिक टैक्स है। बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री जयंत मलैया इस पर कुछ नहीं कहते और बाद में जब पत्रकार पूछते हैं तब कहते हैं कि केन्द्र सरकार के बजट के बाद इस पर विचार होगा। शब्दों पर गौर करें 'इस पर विचार होगाÓ। उन्होंने यह नहीं कहा कि मध्यप्रदेश में पेट्रो पदार्थ सस्ते किए जाएंगे। विचार होगा और विचार तो किया ही जाता है, यह थोड़ी कहा कि बजट के बाद मध्यप्रदेश में भी गोवा जैसे टैक्स कम कर दिए जाएंगे। 

मध्यप्रदेश सरकार का सारा तामझाम प्रचार-प्रसार और आयोजनों में ही नजर आता है। आम आदमी तक सरकारी योजनाएं कितनी पहुंचती होंगी, इसका अंदाज भी हमारे नेताओं को शायद नहीं है। मध्यप्रदेश कल्याणकारी राज्य तो शायद नहीं बन पाया, लेकिन प्रचार बहुत हो रहा है। पिछले दिनों हरियाणा जाना हुआ, तो यह जानकर आश्चर्य हुआ कि अकेले हरियाणा में 250 से ज्यादा एमएनसी (मल्टी नेशनल कॉर्पोरेशन) हैं। हरियाणा में किसानों को 10 पैसे यूनिट में बिजली मिलती है। कोई किसान या मजदूर दुर्घटना में मर जाए तो उसके परिवार को 5 लाख रुपया मिलता है। शहरों की तरह गांवों में भी सफाई कर्मचारी नियुक्त हैं। मध्यप्रदेश से लगभग 3 गुना ज्यादा प्रतिव्यक्ति आय वहां पर है। पिछले 5 साल में 6 नई रेल लाइनें बिछना शुरू हुईं। एक रेलवे कोच फैक्टरी भी बन रही है। साइबर सिटी, मेडिसिटी, मॉल हरियाणा की पहचान बन गए हैं। पिछले पांच साल में नौगुना निवेश इस राज्य में बढ़ा। 2 साल में पंद्रह हजार करोड़ डॉलर का निवेश उद्योग धंधों में हुआ। देश में बनने वाले 50 प्रतिशत ट्रैक्टर, करीब 60 प्रतिशत कारें, 60 प्रतिशत दोपहिया वाहन, 50 प्रतिशत फ्रिज हरियाणा में बनते हैं। हरियाणा में महिलाओं का एक मेडिकल कॉलेज है। एज्युकेशन सिटी इस प्रदेश में है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हरियाणा में 96 प्रतिशत लोग पक्के घरों में रहते हैं, केवल 4 प्रतिशत लोग ही हैं, जिन्हें पक्के मकानों की छत उपलब्ध नहीं है। देश का सबसे ज्यादा बासमती चावल यही राज्य उत्पादित करता है और निर्यात करता है। प्रतिव्यक्ति दूध की उपलब्धता पौन लीटर है। दुधारू पशु की मौत हो जाए तो सरकार 50 हजार रुपए तक मुआवजा देती है। पिछले दिनों यहां एक दुधारू मुर्राह भैंस 25 लाख रुपए में बिकी थी। वहां सड़कों के किनारे गुजरो तो बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज और ऑडी कारें नजर आना सामान्य बात है। सड़क किनारे के ढाबों पर आप दाल-मखानी से लेकर पिज्जा-बर्गर तक खा सकते हैं। लोटो और एडीडास के जूते गुमटियों से खरीद सकते हैं। 

हरियाणा में वृद्धों को 1000 रुपए प्रतिमाह पेंशन मिलती है (मध्यप्रदेश में 300 रुपए देने का प्रावधान है)। अगर आप सेना में हैं और परमवीर चक्र जीतते हैं तो हरियाणा सरकार 2 करोड़ रुपए देती है। हरियाणा में भोजन का अधिकार सबसे पहले लागू किया गया है। हरियाणा में 20 लाख बच्चे 600 रुपए महीना पेंशन पाते हैं। खेलों में 'पदक लाओ, पद पाओÓ योजना लागू है। यानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपने कोई पदक जीता, तो सरकारी नौकरी पक्की। करीब 500 खिलाडिय़ों को इस योजना में नौकरी मिली हुई है। अजा-अजजा के लोगों को पानी मुफ्त में दिया जाता है और 200 लीटर की टंकी भी मुफ्त दी गई है। विधवा की बेटी की शादी पर सरकार 31000 रुपए की मदद करती है। किसानों के सारे कर्ज माफ हैं। किसानों की गिरफ्तारी नहीं हो सकती और न ही किसी किसान को हथकड़ी लग        सकती है। 

मध्यप्रदेश वाले अभी भी आदिवासी राज्य का ही रोना रोते हैं, जबकि बात नीयत की है। इतनी जमीन, इतने खनिज, इतने वन मध्यप्रदेश में हैं और हम उनका दोहन नहीं कर पा रहे हैं। विकास से ज्यादा विकास का दिखावा करना हमारा शगल है। कृषि प्रधान मध्यप्रदेश में हर जिले में कृषि विश्वविद्यालय क्यों नहीं खोले जाना चाहिए? जिले को छोड़ो, संभाग में ही खोल दो। यही हाल पशु चिकित्सा महाविद्यालय का है। हम अपने पशु धन का संवर्धन नहीं कर पा रहे हैं। मानव आबादी बढ़ती जा रही है और पशु धन घटता जा रहा है। कृषि में हमारी ग्रोथ इन्द्र देवता और नर्मदा मैया के भरोसे ज्यादा है। हमारे अपने बाहुबल और इच्छाशक्ति में कहीं कमजोरी है।
मध्यप्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश की बातें करने वाले जरा आस-पास के राज्यों में भी देख लें। गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान तो हमारे पड़ोसी हैं। वहां भी यही कानून है, जो हमारे प्रदेश में है। फिर ऐसा क्यों कि वहां विकास ज्यादा तेज हो रहा है? गोवा, हिमाचल, केरल, पंजाब जैसे राज्यों से भी मध्यप्रदेश बहुत कुछ सीख सकता है। बस, एक बार पुनरावलोकन जरूरी है। 
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वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (05 जुलाई 2014)
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