Saturday, December 13, 2014

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (12 अप्रैल 2014)

चुनाव और मोहब्बत में सब जायज 

मोहब्बत और चुनाव सत्य है।  शादी तथा सरकार मिथ्या !

चुनाव और मोहब्बत में बहुत समानता है। दोनों के लिए वयस्क होना ज़रूरी है।  दोनों में कामयाबी पाना  आसान नहीं। दोनों में आदमी  संयोग से ही घुसता है।  दोनों में आदमी अपनी इच्छा से नहीं पड़ता, दोनों ही गले पड़नेवाली चीजें हैं; और गले पड़  जाए तो छूटती नहीं। दोनों में लोगों को नींद कहाँ आती है? दोनों में लोग तमाशाई होते हैं, मददगार नहीं। दोनों में सफलता स्थायी  नहीं होती। दोनों में पराजित होकर तो लोग दुखी होते ही हैं, जीतकर भी दुखी होते हैं। दोनों बहुत बड़ी जिम्मेदारी हैं। दोनों में अपने और पराये का भेद समझ में आ जाता है।  दोनों में चाँद तारे तोड़कर लाने की बात होती है  दोनों में वादों और दावों  का जोर होता है।  दोनों में वादाखिलाफी आम बात है। गर्ल फ्रेंड को भी फ़ोकट में मोबाइल चाहिए और वोटर को भी। चुनाव में हाथ की अंगुली पर पक्की स्याही लगाने का चलन है और सुहागन स्त्री की स्याही उसका सिन्दूर होता है जो मस्तक पर लगा रहता है। शादी के बिना मोहब्बत अधूरी और मतदान के बिना चुनाव। मोहब्बत के बाद शादी हो जाए तो घर में झगड़े होना कम्पलसरी होता है; वैसे ही चुनाव में सरकार बनानेवाली पार्टी के अंदर भी जूतमपैजार चलाती रहती है।  दोनों में डिप्लोमेसी चलती है और सबसे बड़ी बात --दोनों में हाँ का मतलब तो हाँ होता ही है; नहीं का मतलब भी हाँ होता है। 

जब प्रेमी कहता है - मैं तुम्हें यूं ही जीवन  भर प्रेम करूंगा तब उसका मतलब भी वैसा ही होता है जैसा चुनाव के घोषणा पत्र में लिखा होता है। किया तो किया, नहीं तो क्या कर लोगे? जब प्रेमी कहता है कि मैं तुम्हें ताउम्र  रानी बनाकर रखूंगा तो क्या उसका सचमुच यही मतलब होता है? जब  सरकार बनाने के लिए लाइन में लगी पार्टी कहती है कि है  कि हम  गरीबी हटाएंगे तो क्या उसका यही तात्पर्य होता है? जब कोई पार्टी कहती है कि आचार संहिता के कारण हम  घोषणा नहीं कर पा रहे हैं तो यह वैसा ही है जब लड़केवाले कहते हैं कि हमें दहेज़ में कुछ नहीं चाहिए। चाहते दोनों हैं, पर घोषणा नहीं करते।  यह 'नहीं' ही 'हाँ' होती है। 

चुनाव में उम्मीदवार जहाँ तहां से धन जुटाकर खर्च करता है. मोहब्बत में दीवाना सबके आगे कटोरा लिए खड़ा रहता है और मौका आने पर चोरी से भी बाज़ नहीं आता। चुनाव में कानाफूसी आम है, मोहब्बत में भी। चुनाव में जीत का सेहरा किसी के बजाए किसी और को बांध जाता है; मोहब्बत में यह आम बात है। चुनाव लोकतंत्र के लिए अहम् है और मोहब्बत जिंदगानी के लिए। 


मोहब्बत और चुनाव सत्य है।  शादी तथा सरकार मिथ्या !
Copyright © प्रकाश हिन्दुस्तानी
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