Saturday, February 22, 2014

(वीकेंड पोस्ट के 22 फ़रवरी 2014  के अंक में  मेरा कॉलम)


दिल्ली की मेट्रो और (आने वाली) हमारी !!

दिल्ली मेट्रोवाले में क्या ले जा सकते हैं दूध की टंकियांखिड़की से लटकाकर? क्या वहां महिलाओं के डिब्बे में पुरुष जा सकते हैं? क्या थूक सकते हैं मेट्रो के प्लेटफार्म पर? मेट्रो स्टेशनों पर क्या पोहे खा सकते हैं? क्या वहां झूठा दोना फेंक सकते हैं? पान की पीक थूक सकते हैं क्या? फिर काहे का कल्चर? सू-सू के तो पैसे मांगते हैं और बात करते हैं कल्चर की। अरे भाई, प्रकृति के खिलाफ क्या जाना, जहां चाहे वहां यह प्राकृतिक कार्य करने दो, जैसा हमारे इंदौर में होता है।




अभी दिल्ली की मेट्रो में हूं और बहुत बुरा लग रहा है। इन दिल्लीवालों को बिलकुल शऊर नहीं है। ऐसे चलाते हैं मेट्रो? मेट्रो चलाना हो तो आओ इंदौर। हम दिल्लीवालों को सिखाएंगे कि मेट्रो कैसे चलाई जाए। अब आप पूछेंगे कि जब इंदौर में मेट्रो है ही नहीं, तब ये मेट्रोवालों को सिखाएंगे क्या? यह वैसा ही है कि क्या बरात में केवल शादीशुदा लोग ही जाते हैं?  बरातों में जा जाकर ही बहुत से लोग कई बातें सीख जाते हैं। लाखों घरों में औरतें और मर्द आमलेट बनाते हैं तो इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि पहले अंडे दो, फिर आमलेट बनाओ? मुर्गी अंडे दे सकती है तो क्या वही आमलेट भी बना सकती है?

मेट्रोमैन श्री ई. श्रीधरन को 1995 में  दिल्ली मेट्रो कंपनी बनाकर काम सौंपा गया था। 2002 में उन्होंने मेट्रो शुरू कर दी। केवल सात साल में। 58 स्टेशन और 65 किलोमीटर की लाइन दाल दी। आज सात रूट पर 192 किलोमीटर का सफर मेट्रो से तय किया जा सकता है। जब इसके सभी चरण पूरे हो जाएंगे तब यह दुनिया की सबसे लंबी 413 किलोमीटर की हो जाएगी, लंदन की मेट्रो से भी बड़ी। पर बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर? माहौल ही नहीं बन पाया था मेट्रो का कि मेट्रो शुरू। ये भी कोई बात हुई? हमारे इंदौर में देखो 13 किलोमीटर का बीआरटीएस बनाने में क्या माहौल बनाया था! मेट्रो कर पाई थी क्या बीआरटी का मुकाबला? रोज-रोज खबरें आतीं, आज पुलिया बनाने का फैसला होगा, फिर पुलिया  के नक्शे पास होने की खबर, फिर पुलिया का शिलान्यास, फिर (पुलिया का) उद्घाटन! ऐसे ही साइकिल ट्रैक, फुटपाथ, सिग्नल्स, लेफ्ट टर्न, राइट टर्न आदि के बारे में खबरें छपीं। अतिक्रमण हटाने और 'धार्मिक स्थलोंÓ के शॉट होने की भी सौ-सवा सौ खबरें प्रकाशित हुईं। ये माहौल बना कि बीआरटी आ रही है। पता नहीं कितने सौ एक्सपर्ट पधारे और नॉर्वे-स्वीडन आदि देशों के पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन चुराकर हमें दिखाकर बता गए कि बस लेन ऐसी बनेगी। और दिल्ली में? पूरा का पूरा कनाट प्लेस खोद डाला और तीन-तीन मंजिल का स्टेशन बना मारा, न धूल उडऩे दी, न कोई बड़ा माहौल बनाया। आज दिल्ली के साथ इतने ज्यादा 'फस्र्टÓ जुड़े हैं कि अगर लिखने बैठो तो पूरा पन्ना  भर जाए। 

दिल्ली मेट्रोवाले विजन, मिशन और कल्चर की बातें करते हैं। जरा देखें तो हमारे इंदौर में आकर। दिल्ली मेट्रो में ले जा सकते हैं बकरी और कुत्ते? हमारी लोकल मीटरगेज देख लो। इसे बोलते हैं कल्चर - सभी प्राणी भाई-भाई हैं। आदमी ट्रेन में जाए और बेचारा कुत्ता, बकरी, मुर्गा अलग रास्ते से? ये क्या कल्चर हुआ भाई? क्या ले जा सकते हैं मेट्रो में दूध की टंकियां ट्रेन की खिड़की से लटकाकर? क्या वहां महिलाओं के डिब्बे में पुरुष जा सकते हैं? क्या थूक सकते हैं मेट्रो के प्लेटफार्म पर? मेट्रो स्टेशनों पर क्या पोहे खा सकते हैं? क्या वहां झूठा दोना फेंक सकते हैं? पान की पीक थूक सकते हैं क्या? फिर काहे का कल्चर? सू-सू के तो पैसे मांगते हैं और बात करते हैं कल्चर की। अरे भाई, प्रकृति के खिलाफ क्या जाना, जहां चाहे वहां यह प्राकृतिक कार्य करने दो, जैसा हमारे इंदौर में होता है।

इंदौर इज दी बेस्ट! आने तो दो यहां पर मेट्रो या मोनो ट्रेन। यहां आएगी और पूरा माहौल बनाकर आएगी। फिर जयपुर, बंगलुरु, हैदराबाद,  अहमदाबाद, पुणे, कानपुर, पटना, लखनऊ, सूरत, नागपुर, कोच्चि, कोजीखोड़े, कोयंबटूर, नागपुर आदि हमारी नकल करेंगे।  याद रखो, इंडिया पूरे वल्र्ड का ज्ञान गुरु है और इंदौर पूरे इंडिया का। 

-प्रकाश हिन्दुस्तानी

(वीकेंड पोस्ट के 22 फ़रवरी 2014  के अंक में  मेरा कॉलम)

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