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Saturday, March 29, 2014

इलेक्शन टूरिज्म का मौसम


वीकेंड पोस्ट के  29 मार्च 2014   के अंक में  मेरा कॉलम
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अगले तीन-चार हफ्ते इलेक्शन टूरिज्म के नाम होंगे। 
चुनाव के साथ ही नेता, क्रिकेटर और फिल्मी हीरो हीरोइनों को देखने सुनाने का अद्भुत संयोग! अचानक यूपीवालों की बन आई है। काशी  यानी वाराणसी आकर्षण का फिर केंद्र बन गया है। ताजमहल के लिए आगरा और कबाब के लिए लखनऊ फेमस था ही, अब काशी-मथुरा का नाम लिया जा रहा है।
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इलेक्शन टूरिज्म का सीजन फिर आ गया है। अगले तीन-चार हफ्ते इलेक्शन टूरिज्म के नाम होंगे। चुनाव के साथ ही नेता, क्रिकेटर और फिल्मी हीरो हीरोइनों को देखने सुनाने का अद्भुत संयोग! अचानक यूपीवालों की बन आई है। काशी  यानी वाराणसी आकर्षण का फिर केंद्र बन गया है। ताजमहल के लिए आगरा और कबाब के लिए लखनऊ फेमस था ही, अब काशी का नाम नरेंन्द्र मोदी, विजय प्रकाश जायसवाल (बसपा) और अरविंद केजरीवाल के कारण फिर चर्चा में है। मथुरा का नाम कृष्ण मंदिरों के साथ-साथ दिलावर खान यानी धरम पाजी की बेगम आयशा बी यानी एशा देओल की सगी और सनी देओल पाजी की सौतेली मां हेमा मालिनी के लिए लिया जा रहा है।

गाजियाबाद को एनसीआर का महत्वपूर्ण केन्द्र माना जाता है, आज वह राज बब्बर, जनरल वीके सिंह और शाजिया के लिए जाना जा रहा है। अमेठी जाने वालों की भी कतार है, कुमार विश्वास की कविताएं कैसी हैं, जानना दिलचस्प होगा। कभी यहां से संजय गांधी सांसद हुआ करते थे, उनकी मौत के बाद यहां से राजीव गांधी खड़े हुए तो तौलियों की मॉडलिंग कर चुकी गांधी परिवार की बहू मेनका यहां से कड़ी हो गईं, पर जेठजी (राजीव गांधी) से उन्होंने जोरदार मात खाई। ऐसी मात कि अब संजय के बेटे वरुण ने अपनी पार्टी के नेताओं से साफ कह दिया कि मैं भैया (राहुल) और ताईजी (सोनिया गांधी के क्षेत्र रायबरेली) जाऊंगा ही नहीं। रायबरेली  सोनियाजी का इलाका है और समाजवादी पार्टी ने कहा है कि वह यहां से उम्मीदवार ही खड़ा नहीं करेगी, क्योंकि डिम्पल यादव के खिलाफ कांग्रेस ने उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था। हिसाब बराबर! लखनऊ में कबाब के साथ राजनाथसिंह और हेमवतीनंदन की बेटी रीता बहुगुणा के भाषणों का लुत्फ! 

यूपी के ही फूलपुर में भी इलेक्शन टूरिज्म की अच्छी संभावनाएं हैं। यहां से तीन-तीन बार नेहरूजी जीत चुके हैं। इस बार क्रिकेटर मोहम्मद कैफ इलेक्शन के मैदान में वोटों के रन बनाएंगे। अगर क्रिकेट और नेतागीरी का घालमेल ही देखना हो तो राजस्थान में सवाई माधोपुर जाना पड़ेगा, जहां भूतपूर्व मिस इंडिया और भूतपूर्व  हीरोइन संगीता बिजलानी के भूतपूर्व पति और क्रिकेट सट्टे  के मामले में जानकार मोहम्मद अजहरुद्दीन मैदान में हैं। राजस्थान के जयपुर ग्रामीण में भूतपूर्व ओलिम्पियन निशानेबाज राज्यवर्धन सिंह निशानेबाजी कर रहे हैं। 
केंद्रीय शासन वाले चंडीगढ़ भी कौन जाना नहीं चाहेगा? आरोपों के बाद हटाने वाले रेल मंत्री पवन बंसल के साथ ही साथ यहां अनुपम खेर की बीवी किरण खेर मैदान में हैं और उनके सामने समलैंगिकों की पक्षधर मिस इंडिया रह चुकी गुल पनाग यहां अपने जलवे दिखने वाली हैं। चंडीगढ़ से अमृतसर जाकर आप स्वर्ण मंदिर साहिब के दर्शन कर सकते हैं और पटियाला पैग वाले पटियाला के भूतपूर्व राजा अमरिंदर सिंह से मिल सकते हैं।  अगर खुश हों तो हो सकता है आपको एक-दो ऑफर कर दें। 

बिहार के पटना पहुंचें तो पटना साहिब गुरुद्वारे मत्था टेकने के साथ सोनाक्षी सिन्हा के बापू शत्रुघ्न सिन्हा को भी देख लेंगे। संतरों के शहर में जाकर नागपुर आप नितिन गडकरी से मिल सकते हैं, संतरे खा सकते हैं, संघ का मुख्यालय बाहर से देख सकते हैं (अंदर कौन जाने देगा?)। साउथ घूमने का मन  हो तो वहां फिल्मी सितारों और उनके बीवी-बच्चों का माहौल देख सकते हैं और देश के (ऑफिशियली) सबसे मालदार उम्मीदवार नंदन नीलेकणि से मिलने बेंगलुरु जा सकते हैं, जिनके पास आधिकारिक रूप से 7700 करोड़ की सम्पदा है। और दिल्ली? दिल्ली क्या जाना, जिनको हमेशा से ही टीवी पर 'नमस्काआआआरÓ करते सुनते आए ऐसे (आशुतोषजी) नेताओं से क्या मिलना ? वो जीत भी गए तो भी दिल्ली ही जाएंगे, हारे तो भी वहीं मिलेंगे। तो बना लो अपना टूर प्रोग्राम! मुझे भी साथ ले चलना।

--प्रकाश हिन्दुस्तानी 

वीकेंड पोस्ट ,  29 मार्च 2014 

Saturday, March 22, 2014

ताकि सनद रहे (4) चुनाव में नारों का मज़ा

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  आजादी के वक्त नारे मन्त्र होते थे, अब मसखरी लगते हैं। नारों के  लिहाज़  से यह चुनाव मज़ेदार रहेगा। नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में वाराणसी से भी लड़ रहे हैं, जहाँ नारों का अपना आनंद है।
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आजादी के वक्त नारे मन्त्र होते थे, अब मसखरी लगते हैं। चुनाव  आते ही नए नए नारे सुनकर मज़ा आ जाता है। कितने फ़र्टाइल दिमाग हैं हमारे नेताओं के ! हजारों लफ्ज़ों की बात चार-छह शब्दों में हो जाती है। इक़बाल का  -  'सारे  जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां  हमारा ' आज भी गया जाता है।  गांधी जी ने  'भारत छोड़ो ' और 'करो या मरो ' का नारा दिया था, जिसने गजब ढा दिया।  नेताजी ने कहा था- 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' बेहद प्रभावी रहे। तिलक ने कहा था -'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है ', यह नारा जन जन की आवाज बना। बंकिम चन्द्र चटर्जी का नारा - 'वंदे मातरम् ' और और भगत सिंह के 'इंकलाब जिंदाबाद ' ने तो चमत्कार कर दिया था।  आजादी के बाद लालबहादुर शास्त्री का 'जय जवान जय किसान' खूब चला, जिसमें अटलबिहारी वाजपेयी ने 'जय विज्ञान ' भी जोड़ दिया था. अमेरिका में 'ब्लैक पॉवर', 'ब्लैक इज़ ब्यूटीफुल 'और 'ब्रेड एंड रोज़ेज़ 'जैसे नारे चले। वामपंथियों ने 'ईट दि रिच ' जैसे नारे दिए तो प्रगतिशीलों के  'एवरीमैन इज किंग', 'पॉवर टु द पीपल', 'गो फॉर ग्रोथ' जैसे नारे भी खूब चलन में रहे हैं। 
  

नारों के लिहाज़  से यह चुनाव मज़ेदार रहेगा। नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में वाराणसी से भी लड़ रहे हैं, जहाँ नारों का अपना आनंद है। भाजपा ने 2004 में 'इण्डिया शाइनिंग'  का नारा दिया था, जो पिट गया। भाजपा के लिए 'अबकी बार'  लकी है '--'अबकी बारी अटल बिहारी'  चल गया था। 
इस बार नारा है  'अबकी बार, मोदी सरकार' ; कैसा रहता है, देखेंगे। 'वोट फॉर इण्डिया' नारा भी चल पड़ा है। 'कसम राम की खाते हैं, मंदिर वहीँ बनाएंगे';  और  बाबरी गिराने  के बाद - 'ये तो पहली झांकी है, काशी मथुरा बाकी है' चला था।  काशी  के बाद मथुरा का   वहाँ से हेमा मालिनी मैदान में हैं। कांग्रेस  के पास इस बार नारा है, 'मैं नहीं हम' ।   इसके पहले 'गरीबी हटाओ',  'जात  पर न पात पर, मुहर लगेगी हाथ पर'  और 'चुनिए उन्हें जो सरकार  चला सके'  जैसे नारों के बूते कांग्रेस  सत्ता  तक पहुंची थी।
उत्तरप्रदेश में मायावती - 'तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार' ; 'ब्राह्मण , ठाकुर , बनिया चोर ; बाकी सब हैं डीएस फोर' ,  'ब्राह्मण साफ , ठाकुर हाफ , बनिया माफ' ;  'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा , विष्णु ,महेश है'  जैसे नारे चलाती रही हैं. मुलायम सिंह का  'यूपी में है दम , क्योंकि यहां जुर्म है कम'  चमत्कार नहीं दिखा पाया। 'जिसका जलवा कायम है उसका नाम मुलायम है'  नारे से सत्ता में आ चुके हैं। मुलायम के बेटे अखिलेश इस बार फिर उम्मीद से हैं और  'उम्मीदों की साइकिल' चला रहे हैं.

आप पार्टी वाले आजकल  'झाड़ू चलाओ, बेईमान भगाओ' का नारा दे रहे हैं।  उनके नारे बार बार बदलते रहे हैं।  'मैं भी आम आदमी', 'मैं भी अण्णा, तू भी अण्णा' , 'मुझे चाहिए पूर्ण स्वराज' आते-जाते रहते हैं। ये नारे भी खूब चर्चित रहे हैं --  'जब तक रहेगा समोसे में आलू , तब तक रहेगा बिहार में लालू' ; भाजपा की पुरा आत्मा जनसंघ का चुनाव चिह्न दीपक था और कांग्रेस का बैल की जोड़ी। जनसंघ का नारा   था 'जली झोंपडी़ भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल'  कांग्रेसी उसके जवाब में कहते थे --'इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं'.  डॉ. राम मनोहर लोहिया जी के दौर में जब संसोपा (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) बनी थी, नारा दिया गया था 'संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ'. 'एमवाई का राग है झूठा , राबड़ी को मिला अंगूठा';   'राजा नहीं फकीर है , जनता की तकदीर है' ( वीपी सिंह के लिए ) ; 'सेना खून बहाती है , सरकार कमीशन खाती है' ( बोफोर्स घोटाला ) नारे कभी अच्छे चलते थे।  नारों का चुनाव आयोग पर भी असर पड़ा है और वह भी नारे दे रहा है -- 'पहले अपना वोट डलेगा, चूल्हा उसके बाद जलेगा'  और 'सारे काम छोड़ दो सबसे पहले वोट दो !'

-- © प्रकाश हिन्दुस्तानी 



Tuesday, March 18, 2014




वीकेंड पोस्ट के  15 मार्च 2014   के अंक में  मेरा कॉलम

   भगोरिया का इत्ता इंतजार 

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भगोरिया का जित्ता  इंतजार कैमरामैनों को रहता है, उत्ता तो आदिवासियों को भी नहीं रहता होगा। कब होली आए और भगोरिया के फोटो खींचने का मौका मिले।  ताड़ी का मजा ले सकें। और तो और अब तो सरकारी तौर पर भी भगोरिया को प्रचारित किया जाने लगा है और भोपाल-इंदौर से पत्रकारों को भर-भरकर भगोरिया घूमने का चलन है
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भगोरिया का जित्ता  इंतजार कैमरामैनों को रहता है, उत्ता तो आदिवासियों को भी नहीं रहता होगा। कब होली आए और भगोरिया के फोटो खींचने का मौका मिले।  ताड़ी का मजा ले सकें। और तो और अब तो सरकारी तौर पर भी भगोरिया को प्रचारित किया जाने लगा है और भोपाल-इंदौर से पत्रकारों को भर-भरकर भगोरिया घूमने का चलन है। प्रणय पर्व की तरह प्रचारित भगोरिया अब वैसा नहीं है, जैसा प्रचारित किया जाता रहा है। इतिहास बताता है कि राजा भोज के समय लगने वाले हाटों को भगोरिया कहा जाता था। उस समय के दो भील राजाओं कासूमार और बालून ने अपनी राजधानी भागोर में विशाल मेले और हाट का आयोजन करना शुरू किया। धीरे-धीरे आस-पास के भील राजाओं ने भी ऐसा करना शुरू किया जिससे हाट और मेलों को भगोरिया कहना शुरू हुआ। कुछ लोगों ने भगोरिया को आदिवासियों का वैलेंटाइन-डे बताना शुरू कर दिया है। कुछ का मानना है कि भोंगर्या से भगोरिया बना है जिसका अर्थ होता है त्योहार में लगने वाली सामग्री। 

भगोरिया ही नहीं, आदिवासी अंचलों का बहुत कुछ बदल चुका  है। मुश्किल यह है कि गैर आदिवासी समाज यह मानने को तैयार नहीं। आदिवासी जगत के बारे में ऐसी-ऐसी कहानियां गढ़ी जाती हैं कि सवाल आता है कि कौन पिछड़ा है? शहरी तथाकथित सभ्य समाज या आदिवासी?

आदिवासी जगत में बढ़ रही शिक्षा, विकास की बातें, उपलब्धियों पर चर्चा की किसी को फुरसत नहीं। हर कोई भुना लेना चाहता है अपने पूर्वाग्रहों को। अधिकांश पत्रकारों के दिमाग में जो छवि बरसों से है, उसे बदलने की जरूरत कब समझेंगे? अब आदिवासी लंगोट पहनकर नंगे बदन नहीं घूमते, उनकी बहू-बेटियां भी फिल्मी आदिवासियों की तरह अद्र्धनग्न नहीं रहतीं, वे सभी रंग-बिरंगी पोशाकें, चांदी के भारी गहने, बढिय़ा जूते-चप्पल पहनती हैं।  आदिवासी नौजवान अब मोटरसाइकिलों पर भर्राते हुए आते-जाते हैं, कई पढ़े-लिखे संपन्न तो कार भी रखते हैं। इस महत्वपूर्ण समाज का नक्शा बदल रहा है, जो देश की सूरत भी बदल रहा है। हमें यह सब क्यों नहीं दिखता?

सच है कि वे कलरफुल जीवन जीते हैं, बढिय़ा तस्वीरों का कच्चा माल हैं वे। पर इससे ज्यादा भी हैं वे। कई मामलों में तो हमसे भी आगे! 

प्रकाश हिन्दुस्तानी 

वीकेंड पोस्ट के  15 मार्च 2014   के अंक में  मेरा कॉलम


Saturday, March 08, 2014

औरतें अच्छी हैं, औरतें अच्छी हैं, औरतें अच्छी हैं !!!

(वीकेंड पोस्ट के  08 मार्च 2014   के अंक में  मेरा कॉलम)



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कुछ औरतें बहुत एक्टिव हैं उनके लिए  नारीवादी के  मायने हैं  -बात-बिना बात मर्दों को गालियां देना, मर्दों को कोसना, मर्दों को जलील करना और अगर कोई मर्द तीखी  प्रतिक्रिया  लिख दे तो महिला थाने जाकर रिपोर्ट लिखाने  की धमकी देना।  उन्हें लगता  है कि यही फेमिनिज्म  है और इससे उन्हें कोई ख़ास ओहदा मिलनेवाला है। ....................................................
सोशल मीडिया में कुछ औरतें बहुत एक्टिव हैं और उनमें  कुछ ऐसी  हैं जो खुद को  नारीवादी कहती हैं। उनके लिए  नारीवादी के  मायने हैं  -बात-बिना बात मर्दों को गालियां देना, मर्दों को कोसना, मर्दों को जलील करना और अगर कोई मर्द तीखी  प्रतिक्रिया  लिख दे तो महिला थाने जाकर रिपोर्ट लिखाने  की धमकी देना।  उन्हें लगता  है कि यही फेमिनिज्म  है और इससे उन्हें कोई ख़ास ओहदा मिलनेवाला है।  इनमें से कुछ औरतें  हैं और घर की भड़ास के अलावा नौकरी कि भड़ास भी उनके लेखन में आ जाती है।  फेमिनिस्ट होना आसान है,  कुछ करना नहीं पड़ता; सिवाय गाली देने के। वे लिखती हैं सारे मर्द ख़राब होते हैं, (उनके भाई-बाप को छोड़कर). उनके पति खराब हैं, प्रेमी बदजात हैं, नौकरी के पुरुष  सहयोगी लोलुपता से भरे  हैं, सड़क पर चलनेवाला हर मर्द घिनौना है, पुरुष लेखक लम्पट हैं, वगैरह वगैरह।  ये लिखती हैं औरतें ही हैं कि देश और दुनिया चल रही है  वरना कहर आ जाता। इनकी दुनिया 'मैं' से  होती है और 'मैं' पर ही ख़त्म हो जाती  है।  

क्या औरत और मर्द दोनों बराबर नहीं हैं? न औरतें कमतर हैं न मर्द।  दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं,  यह लिखने में वाहवाही नहीं मिलती। वाहवाही मिलती है नारीवादी होने से. 'बेटी है तो कल है' लिखने और बोलने में। ... और अगर गलती से बेटा है तो ? ये नारीवादी लिखती हैं कि औरतें केवल औरतों के ही संसर्ग में रहें, उन्हें गम गलत करने को कंधा ही तो चाहिए। बस, कन्धा ही?

ये औरतें क्यों भूल जाती हैं कि जाती हैं कि अगर महिलाएं घर संभालती हैं तो पुरुष भी तो खदानों-खेतों-खलिहानों में जुते  रहते हैं। समुद्री जहाज़ों में, कारगिल जैसी पहाड़ियों  में,  लोहा तपती भट्टियों में, खतरनाक रसायन उद्योगों में, एयर ट्रैफिक कंट्रोल  विभाग में, गहरे समंदर में मछलियां पकड़ने  में,  रेल  पटरियां  बिछाने जैसे दुरूह कार्य और भूमिगत सीवेज लाइनों की सफाई जैसे कार्यों में लगे हैं. ख़ास बात  यह है कि वे अकसर इसका जिक्र नहीं कर करते। 

ये कथित फेमिनिस्ट अपना ही रोना क्यों रोती रहती हैं? वे अपने प्रेमी या पति में अपनी माँ को क्यों तलाशने लगती हैं? उन्हें अपने कथित ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ कहने, सहयोगी पुरुष सहकर्मियों को मतलबी करार देने, बदतमीज़ी को आधुनिकता सिद्ध करने की हुक क्यों लगी रहती है?  कई घरों में बेटे और बेटी में भेदभाव  होगा। मैं ऐसे कई मित्रों को जानता  हूँ, बेटी को तवज्जो मिलती रही है, किसी  भाई ने कभी आपत्ति नहीं की।...कोई मुझसे बहस करता है तो मैं उसे देता हूँ और कहने लगता हूँ कि वाकई औरतें अच्छी हैं, औरतें अच्छी हैं, औरतें अच्छी हैं !!!

--प्रकाश हिन्दुस्तानी 
(वीकेंड पोस्ट के 08  मार्च 2014   के अंक में  मेरा कॉलम)

Saturday, March 01, 2014

(वीकेंड पोस्ट के  1 मार्च 2014   के अंक में  मेरा कॉलम)


  हे भगवान, तेरा शुक्र है … 

अगर राजनीति में भी छद्म नाम का चलन बंद हो जाए तो पहचान का संकट ही पैदा हो जाए। फिल्मों में यूसुफ़ खान दिलीप कुमार के नाम से जाने जा सकते हैं, राजीव हरी ओम भाटिया को लोग अक्षय कुमार के नाम से पहचान सकते हैं, मुमताज जहाँ बेगम देहलवी को लोग मधुबाला के नाम से पहचान सकते हैं, अजय देओल को सनी देओल के नाम से पहचान सकते हैं, पर अगर कोई उसके नेता-पिता-अभिनेता धर्मेन्द्र  को दिलावर खान पुकारे तो कौन पहचानेगा?  कौन पहचानेगा भाजपा की नेत्री हेमा मालिनी को आयशा बी कहें तो कौन पहचानेगा?   



आजकल जो कुछ हो रहा है उसे देखते हुए हर दिन अनेक बार मुंह से निकलता है कि हे भगवान, तेरा शुक्र है। 

-- हे भगवान, तेरा शुक्र है कि चीयर लीडर्स क्रिकेट में ही होती हैं, अगर राजनीति में भी होतीं तो? आप  नरेंद्र मोदी की सभा सुन रहे हों, वे कोई डॉयलाग बोलें  और चीयर लीडर्स झूम झूम कर नाचने लगें। बाद में विवाद हो कि फलां चीयर लीडर तो विदेशी बाला  थी और उसे बुलवाना अनैतिक कृत्य था! केजरीवाल कोई आरोप मढ़ें और चीयर लीडर लगे कूल्हे मटकाने ! क्या नज़ारा हो सकता है! क्रिकेट अगर तमाशा है तो फिर चुनाव को भी नेताओं ने तमाशे से क्या कम रहने  दिया है? राहुल गांधी मंच पर अपनी दादी, पापा, ग्रेट ग्रैंड फादर के बलिदान का जिक्र छेड़ें और चीयर लीडर का डांस चालू !

-- हे भगवान, तेरा शुक्र है कि आईपीएल में ही खिलाडियों की नीलामी होते है।  अगर राजनीति  के खिलाड़ियों  की भी नीलामी शुरू हो जाए तो? यहाँ नेताओं को तो कोई खरीदेगा नहीं, पर हो सकता है कि नेता लोग खुद पदों की बोलियां लगाने लगें।  नगर अध्यक्ष से लेकर बड़े बड़े मंत्री पद की बोलियां लगने लगे, जो ज्यादा का ऑफर दे, उसकी कुर्सी पक्की। जो सेवा भावी हो, उसे आजीवन निशुल्क सेवा का मौका दिया जाए और वह बेचारा बिना मेवे के सेवा करता रहे। 

-- हे भगवान, तेरा शुक्र है कि फिल्मों की तरह राजनीति में भी छद्म नाम चलते रहते हैं। अगर राजनीति में भी छद्म नाम का चलन बंद हो जाए तो पहचान का संकट ही पैदा हो जाए। फिल्मों में यूसुफ़ खान दिलीप कुमार के नाम से जाने जा सकते हैं, राजीव हरी ओम भाटिया को लोग अक्षय कुमार के नाम से पहचान सकते हैं, मुमताज जहाँ बेगम देहलवी को लोग मधुबाला के नाम से पहचान सकते हैं, अजय देओल को सनी देओल के नाम से पहचान सकते हैं, पर अगर कोई उसके नेता-पिता-अभिनेता धर्मेन्द्र  को दिलावर खान पुकारे तो कौन पहचानेगा?  कौन पहचानेगा भाजपा की नेत्री हेमा मालिनी को आयशा बी कहें तो कौन पहचानेगा?   संगीतकर ए  एस दिलीप कुमार को कौन पहचानता है, अल्लाह रक्खा रहमान यानी  ए आर रहमान को सब जानते हैं!

-- हे भगवान, तेरा शुक्र है कि इतनी महंगाई, इतनी मारा मारी, इतने दंगों-फसादों के बाद भी हमारा विश्वास कायम है।  कई बार तो हालत संता सिंह जैसी हो जाती है।  हुआ यह कि एक दिन संता अपनी बेटी को बुलाने उसके कमरे में गया. उसने दरवाज़ा थोड़ा सा खोला तो अंदर से सिगरेट की गंध आई.
“हे भगवान … मेरी बेटी सिगरेट पीती है !”
दरवाज़ा थोड़ा सा और खोला तो सामने टेबल पर व्हिस्की से भरा  गिलास दिखाई दिया ….
“ओह नो !!! ये तो शराब भी पीने लगी है !!!”
फिर दरवाज़ा पूरा खोला तो सामने  'अस्त व्यस्त' दशा में एक  लड़का  उसकी बेटी के साथ बैठा दिखाई दिया …
“ओहो तो ये सब इस लड़के का है, और मैं खामखाँ अपनी बेटी पर शक कर रहा था … भगवान तेरा लाख-लाख शुक्र है … !!!”
और संता दरवाज़ा बंद करके वापिस चला आया… !!!
--प्रकाश हिन्दुस्तानी 

(वीकेंड पोस्ट के  1 मार्च 2014   के अंक में  मेरा कॉलम)


Saturday, February 22, 2014

(वीकेंड पोस्ट के 22 फ़रवरी 2014  के अंक में  मेरा कॉलम)


दिल्ली की मेट्रो और (आने वाली) हमारी !!

दिल्ली मेट्रोवाले में क्या ले जा सकते हैं दूध की टंकियांखिड़की से लटकाकर? क्या वहां महिलाओं के डिब्बे में पुरुष जा सकते हैं? क्या थूक सकते हैं मेट्रो के प्लेटफार्म पर? मेट्रो स्टेशनों पर क्या पोहे खा सकते हैं? क्या वहां झूठा दोना फेंक सकते हैं? पान की पीक थूक सकते हैं क्या? फिर काहे का कल्चर? सू-सू के तो पैसे मांगते हैं और बात करते हैं कल्चर की। अरे भाई, प्रकृति के खिलाफ क्या जाना, जहां चाहे वहां यह प्राकृतिक कार्य करने दो, जैसा हमारे इंदौर में होता है।




अभी दिल्ली की मेट्रो में हूं और बहुत बुरा लग रहा है। इन दिल्लीवालों को बिलकुल शऊर नहीं है। ऐसे चलाते हैं मेट्रो? मेट्रो चलाना हो तो आओ इंदौर। हम दिल्लीवालों को सिखाएंगे कि मेट्रो कैसे चलाई जाए। अब आप पूछेंगे कि जब इंदौर में मेट्रो है ही नहीं, तब ये मेट्रोवालों को सिखाएंगे क्या? यह वैसा ही है कि क्या बरात में केवल शादीशुदा लोग ही जाते हैं?  बरातों में जा जाकर ही बहुत से लोग कई बातें सीख जाते हैं। लाखों घरों में औरतें और मर्द आमलेट बनाते हैं तो इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि पहले अंडे दो, फिर आमलेट बनाओ? मुर्गी अंडे दे सकती है तो क्या वही आमलेट भी बना सकती है?

मेट्रोमैन श्री ई. श्रीधरन को 1995 में  दिल्ली मेट्रो कंपनी बनाकर काम सौंपा गया था। 2002 में उन्होंने मेट्रो शुरू कर दी। केवल सात साल में। 58 स्टेशन और 65 किलोमीटर की लाइन दाल दी। आज सात रूट पर 192 किलोमीटर का सफर मेट्रो से तय किया जा सकता है। जब इसके सभी चरण पूरे हो जाएंगे तब यह दुनिया की सबसे लंबी 413 किलोमीटर की हो जाएगी, लंदन की मेट्रो से भी बड़ी। पर बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर? माहौल ही नहीं बन पाया था मेट्रो का कि मेट्रो शुरू। ये भी कोई बात हुई? हमारे इंदौर में देखो 13 किलोमीटर का बीआरटीएस बनाने में क्या माहौल बनाया था! मेट्रो कर पाई थी क्या बीआरटी का मुकाबला? रोज-रोज खबरें आतीं, आज पुलिया बनाने का फैसला होगा, फिर पुलिया  के नक्शे पास होने की खबर, फिर पुलिया का शिलान्यास, फिर (पुलिया का) उद्घाटन! ऐसे ही साइकिल ट्रैक, फुटपाथ, सिग्नल्स, लेफ्ट टर्न, राइट टर्न आदि के बारे में खबरें छपीं। अतिक्रमण हटाने और 'धार्मिक स्थलोंÓ के शॉट होने की भी सौ-सवा सौ खबरें प्रकाशित हुईं। ये माहौल बना कि बीआरटी आ रही है। पता नहीं कितने सौ एक्सपर्ट पधारे और नॉर्वे-स्वीडन आदि देशों के पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन चुराकर हमें दिखाकर बता गए कि बस लेन ऐसी बनेगी। और दिल्ली में? पूरा का पूरा कनाट प्लेस खोद डाला और तीन-तीन मंजिल का स्टेशन बना मारा, न धूल उडऩे दी, न कोई बड़ा माहौल बनाया। आज दिल्ली के साथ इतने ज्यादा 'फस्र्टÓ जुड़े हैं कि अगर लिखने बैठो तो पूरा पन्ना  भर जाए। 

दिल्ली मेट्रोवाले विजन, मिशन और कल्चर की बातें करते हैं। जरा देखें तो हमारे इंदौर में आकर। दिल्ली मेट्रो में ले जा सकते हैं बकरी और कुत्ते? हमारी लोकल मीटरगेज देख लो। इसे बोलते हैं कल्चर - सभी प्राणी भाई-भाई हैं। आदमी ट्रेन में जाए और बेचारा कुत्ता, बकरी, मुर्गा अलग रास्ते से? ये क्या कल्चर हुआ भाई? क्या ले जा सकते हैं मेट्रो में दूध की टंकियां ट्रेन की खिड़की से लटकाकर? क्या वहां महिलाओं के डिब्बे में पुरुष जा सकते हैं? क्या थूक सकते हैं मेट्रो के प्लेटफार्म पर? मेट्रो स्टेशनों पर क्या पोहे खा सकते हैं? क्या वहां झूठा दोना फेंक सकते हैं? पान की पीक थूक सकते हैं क्या? फिर काहे का कल्चर? सू-सू के तो पैसे मांगते हैं और बात करते हैं कल्चर की। अरे भाई, प्रकृति के खिलाफ क्या जाना, जहां चाहे वहां यह प्राकृतिक कार्य करने दो, जैसा हमारे इंदौर में होता है।

इंदौर इज दी बेस्ट! आने तो दो यहां पर मेट्रो या मोनो ट्रेन। यहां आएगी और पूरा माहौल बनाकर आएगी। फिर जयपुर, बंगलुरु, हैदराबाद,  अहमदाबाद, पुणे, कानपुर, पटना, लखनऊ, सूरत, नागपुर, कोच्चि, कोजीखोड़े, कोयंबटूर, नागपुर आदि हमारी नकल करेंगे।  याद रखो, इंडिया पूरे वल्र्ड का ज्ञान गुरु है और इंदौर पूरे इंडिया का। 

-प्रकाश हिन्दुस्तानी

(वीकेंड पोस्ट के 22 फ़रवरी 2014  के अंक में  मेरा कॉलम)

Tuesday, February 18, 2014

(वीकेंड पोस्ट के 15 फ़रवरी 2014  के अंक में  मेरा कॉलम)




ये लफ़्ज़ों के तोहफ़े!
 ये फ़र्ज़ी अवतार  !!
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एक और शब्द है जिसका धड़ल्ले से बिना सोचे-समझे उपयोग होता है -- अवतार।  बचपन से पढते सुनते आये हैं कि इस धरा पर भगवान  अवतार लेते आये हैं।  आजकल यह काम कोई भी कर लेता है --''आनेवाली फ़िल्म में दीपिका नए अवतार में नज़र आएँगी'', मतलब यही है न कि दीपिका को नया रोल मिला है।  ऐसा  शीर्षक भी देखा है -''नए साल में मल्लिका  कैबरे डांसर के अवतार में होगी'', तो क्या कैबरे करनेवाली वास्तव में  देवियाँ होती हैं? जो अवतार लेकर इस धरती का कल्याण हैं ? अधनंगी-नंगी होकर नाचना क्या दैवीय कार्य है? 
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वैलेंटाइन वीक में प्यारभरे  तोहफों का दौर चलता रहता है, लेकिन हमारा मीडिया पूरे 52 सप्ताह 'तोहफे' दिलवाता रहता  है।  ऐसा लगता  है कि मीडिया के मित्रों का शब्द-भंडार कम है और वे फैसले, आदेश, अधिकार और  वितरण जैसे शब्दों  की जगह तोहफा लिख  देते है. तोहफे भी ऐसे अजब-ग़ज़ब कि दिमाग भन्ना जाए।  उदाहरण के लिए --'एक अप्रैल   से मिलेगा कर्मचारियों को बढे हुए वेतन का तोहफा', 'फलां जिले को मिला  कृषि विश्वविद्यालय का तोहफा', 'दीपावली पर कर्मचारियों को  मिलेगा बोनस का तोहफा', 'फलां गाँव को मिला सड़क का तोहफा', 'अल्पसंख्यकों को मिलेगा आरक्षण का तोहफा', 'अजा-अजजा को मिलेगा प्रमोशन का तोहफा', 'बेघर लोगों को मिलेगा घर का तोहफा' वगैरह-वगैरह। 

बढ़ा हुआ वेतन, सड़क, बोनस,  आरक्षण, प्रमोशन, शिक्षा केन्द्र का खुलना आदि वे चीज़ें  हैं जिन पर  लोगों का अधिकार है। शिक्षा, मकान, वेतन वृद्धि,सड़क, आरक्षण, प्रमोशन आदि में तोहफे जैसी क्या बात है?  यह तो अधिकार है और अधिकार तोहफा कैसे हो सकता है? तोहफा देने  का अर्थ है --किसी को प्रसन्न करने के लिए धन, वस्त्र या उसके काम या पसंद की वस्तु, जो बिना किसी अपेक्षा के प्रदान की जाती हे, तोहफा कहलाती है। तोहफा या  उपहार मन की खुशी को प्रकट करने के लिए या किसी को सम्मानित करने के लिए भी दिए जाते हैं, इनके बदले में किसी धन की अपेक्षा नहीं की जाती है। हांलांकि यह अपेक्षा अंतर्निहित हो सकती है कि जिसको उपहार दिया गया है वह अपना प्रेम और कृपा देने वाले पर बनाए रखेगा। अड अधिकार होता है और तोहफा, तोहफ़ा।

बात यहाँ तक भी होती तो ठीक था, पर कई बार तोहफे के नाम पर अजीबोगरीब शीर्षक देखने  को मिलते हैं : मसलन 'पूनम पाण्डेय देंगी भारतीय टीम के सामने न्यूड होने का तोहफा' या 'सनी लियोन ने ट्विटर पर दिया हॉट तोहफा' या 'पामेला एंडरसन ने फेन्स को दिया  फड़कता तोहफा ',  या ''कैटरीना ने दिया रणवीर को प्यार का तोहफा' या  'सलमान खान ने दिया सुपर  हिट का तोहफ़ा'. ऐसे  शीर्षकों का अर्थ क्या है? कोई बताए तो कि  इन तथाकथित सुंदरियों के 'तोहफों' से किसी का भला हो जाएगा? सलमान खान की फ़िल्म  सुपर हिट रही तो यह तोहफा कैसे? क्या फ़ोकट में जनता को फ़िल्म दिखाई गई थी? तहफा तो जनता ने हीरो को फ़िल्म सुपर हिट कराकर दिया। 

एक और शब्द है जिसका धड़ल्ले से बिना सोचे-समझे उपयोग होता है -- अवतार।  बचपन से पढते सुनते आये हैं कि इस धरा पर भगवान  अवतार लेते आये हैं।  आजकल यह काम कोई भी कर लेता है --''आनेवाली फ़िल्म में दीपिका नए अवतार में नज़र आएँगी'', मतलब यही है न कि दीपिका को नया रोल मिला है।  ऐसा  शीर्षक भी देखा है -''नए साल में मल्लिका  कैबरे डांसर के अवतार में होगी'', तो क्या कैबरे करनेवाली वास्तव में  देवियाँ होती हैं? जो अवतार लेकर इस धरती का कल्याण हैं ? अधनंगी-नंगी होकर नाचना क्या दैवीय कार्य है? एक शीर्षक देखकर तो सचमुच ही  माथा कूटने का मन करने लगा -''अर्जुन-रणबीर की जोड़ी अब गुंडे के अवतार में.''

…आप ही बताइए -- क्या करुं? खुद का माथा कूटूँ या शीर्षक लिखनेवाले  सिर फोडूं?

--प्रकाश हिन्दुस्तानी 
(वीकेंड पोस्ट के 15 फ़रवरी 2014  के अंक में  मेरा कॉलम)

Monday, February 10, 2014

मज़ा कैसे आता है ?


वीकेंड पोस्ट के 8 फ़रवरी 2014  के अंक में  मेरा कॉलम


मज़ा कैसे आता है ?

..." अखबार खरीदा  जाता है खबरों के लिए, विचारों के लिए।  कैसे मज़ा आता है तुम्हें? और मज़े के लिए पेपर क्यों खरीदते हो यार?  अखबार कोई मज़े के लिए खरीदता है क्या ? मज़े के लिए तो  शराब पीते हैं, बैंकाक जाते हैं, कैबरे देखते हैं, औरतों के पास जाते हैं और तुम साले  गधे, मज़े के लिए अखबार खरीदते हो? एक रुपये का अखबार जो तुम्हारे घर रोज सुबह बिना नागा किये तुम्हारे घर पहुँच जाता है, जिसे पढ़ा जाता है, फिर अनेक उपयोग के बाद रद्दी में भी बेच दिया जाता है , उससे तुम मज़े कैसे ले सकते हो? क्या अखबार में कोई गारंटी छपी रहती है कि एक रुपये में मज़े की गारंटी? तुम जैसे लोगों को 'मुगले आज़म' देखकर भी मज़ा नहीं आता ! क्या पचास रुपये में मधुबाला को बेडरूम में नचवाओगे? एक रुपये में क्या संपादक तुम्हारी लंगोट धोये-सुखाये-प्रेस करे?"

  उन दिनों 'नवभारत टाइम्स' में था।  एक पुराने मित्र आये और कहने लगे --''यार, तुहारे पेपर में मज़ा नहीं आ रहा है। ''
  मैंने पूछा --"क्या बड़ी ख़बरें चूक रहे हैं?''
  ''नहीं।''
  क्या सम्पादकीय ठीक नहीं है? छपाई खराब है? निष्पक्षता नहीं है?
  ''नहीं''
  ''फिर क्या काग़ज़ ख़राब लग रहा है? स्याही से  बदबू आती है? क्या पेपर के अक्षर छोटे हैं? वक़्त पर पेपर नहीं मिलता?''
  ''वो बात भी नहीं है''
  ''फिर क्या बात है? पेपर निष्पक्ष है, खबरें नहीं चूकता, सबकी और सारी खबरे देता है, सम्पादकीय भी ठीक है, छपाई अच्छी है, फोटू- वोटू भी ठीक हैं, काग़ज़- स्याही ठीक है। अखबार लेट भी नहीं होता तो फिर क्या दिक्कत है भाई? क्या अखबार घर पर नहीं आ रहा?''
  ''नहीं , ऐसा भी नहीं है। हर रोज़  मेरे उठने से पहले ही सात बजे तक आ जाता है।'' 
  नवभारत टाइम्स उन दिनों एक रुपये का बिकता था फिर भी मैंने पूछ लिया --''कितने का है नवभारत टाइम्स?''
  वे बोले -''एक रुपये का''
 अब बारी मेरी थी, मैंने कहा -''आप एक रुपये का अखबार लेते हो, जो रोज़ सुबह तुम्हारे घर पहुँच जाता है। खबरों, लेखों, काग़ज़, छपाई किसी से आप को शिकायत नहीं है।  फिर क्या बात है ?''
  वे बोले --''यार, मज़ा नहीं आ रहा पेपर में?''
  मैं भन्ना उठा -''क्या करें कि तुम्हें मज़ा आने लगे?''
  वे बोले -''पता नहीं, पर मज़ा नहीं आ रहा। ''
--''तो क्या तुम्हारे घर आकर रोज कैबरे डांस करें कि तुम्हें मज़ा आ जाए? एक रुपये में पान का पत्ता नहीं  आता, जूते की पॉलिश नहीं हो सकती? एक कंडोम नहीं आता एक रुपये में।  पानी की बोतल नहीं खरीद सकते एक रुपये में  तुम! बड़े आये 'मज़ा नहीं आ रहा' कहनेवाले? ? अखबार खरीदा  जाता है खबरों के लिए, विचारों के लिए।  कैसे मज़ा आता है तुम्हें? और मज़े के लिए पेपर क्यों खरीदते हो यार?  अखबार कोई मज़े के लिए खरीदता है क्या ? मज़े के लिए तो लोग   शराब पीते हैं, बैंकाक जाते हैं, कैबरे देखते हैं, औरतों के पास जाते हैं और तुम साले  गधे, मज़े के लिए अखबार खरीदते हो? एक रुपये का अखबार जो  रोज सुबह बिना नागा किये तुम्हारे घर पहुँच जाता है, जिसे पढ़ा जाता है, फिर अनेक उपयोग के बाद रद्दी में भी बेच दिया जाता है , उससे तुम मज़े कैसे ले सकते हो? क्या अखबार में कोई गारंटी छपी रहती है कि एक रुपये में मज़े की गारंटी? तुम जैसे लोगों को 'मुगले आज़म' देखकर भी मज़ा नहीं आता ! क्या पचास रुपये में मधुबाला को बेडरूम में नचवाओगे? एक रुपये में क्या संपादक तुम्हारी लंगोट धोये-सुखाये-प्रेस करे?''
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… अब वह मेरा मित्र नहीं रहा इसलिए पता नहीं, मज़े के लिए वह क्या करता है? लेकिन कहीं आप भी मज़े के लिए तो अखबार नहीं खरीदते हैं न?
---प्रकाश हिन्दुस्तानी 
(वीकेंड पोस्ट के 8 फ़रवरी 2014  के अंक में  मेरा कॉलम)