Monday, December 19, 2011

क्रिकेट ने हमारी ज़िंदगी बदल दी है

रविवासरीय हिन्दुस्तान (18 - 12 - 2011) के एडिट पेज पर प्रकाशित मेरा कॉलम



क्रिकेट ने हमारी ज़िंदगी बदल दी है

राहुल द्रविड़ को लोग भारत की दीवार कहते हैं. कई लोग उन्हें 'मिस्टर रिलायबल' भी कहते हैं. उनके नाम पर क्रिकेट में कई रेकार्ड्स हैं. ताज़ा रिकार्ड है टेस्ट क्रिकेट में तेरह हज़ार रन बनाने का. केवल सचिन ही हैं जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में उनसे ज्यादा रन बनाये हैं. सर डोनाल्ड (डॉन) ब्रेडमैन के बाद राहुल द्रविड़ अकेले ऐसे क्रिकेटर हैं, जिनके खाते में इंग्लैण्ड के खिलाफ तीन या उससे ज्यादा शतक हैं. सुनील गावस्कर ने राहुल के बारे में कहा है --''राहुल भारतीय टीम के लौह कवच हैं. उनका हरेक कदम उनके चरित्र का बखान करता है.'' सुरेश रैना उन्हें अपना आदर्श मानते हैं. पंद्रह साल पहले उन्हें सिंगर कप के लिए विनोद काम्बली की जगह श्रीलंका के खिलाफ वन डे मैच में मैदान में उतारा गया था और फिर बाद में हटा लिया गया. लेकिन अपनी खेल प्रतिभा से राहुल द्रविड़ क्रिकेट के चमकीले सितारे बने. लेकिन उन्हें 14 दिसंबर को कैनबरा के वार मेमोरियल में सर डॉन ब्रेडमैन स्मृति भाषण के लिए आमंत्रित किया गया था. वे पहले क्रिकेटर हैं जो गैर आस्ट्रेलियन होते हुए भी इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में बुलाये गए थे. इस भाषण में राहुल द्रविड़ ने जो बातें कहीं, वे अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि उसमें राहुल द्रविड़ का एक नया ही रूप सामने आया. यहाँ राहुल द्रविड़ ने किसी बेहद अनुभवी कूटनीतिक की तरह बातें कहीं और भारत और आस्ट्रेलिया के रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश की.
क्रिकेट और युद्ध
भारत और आस्ट्रेलिया के बारे में जब भी बात होती है तब कहा जाता है कि दोनों ही देशों को क्रिकेट और नज़दीक लेकर आ गया है. आज़ाद भारत ने अपना पहला क्रिकेट मैच अगर किसी देश के साथ खेला था तो वह आस्ट्रेलिया के साथ. आज़ादी के तीन महीने बाद नवम्बर १९४७ में वह मैच खेला गया. जो एक तरह का युद्ध कहा जा सकता है. लेकिन इतिहास बताता है कि हम उससे भी कहीं पहले एक साथ जुड़ चुके थे और हम एक दूसरे के खिलाफ नहीं, साथ साथ युद्ध भी लड़ चुके हैं. असली युद्ध. गल्लिपोली (तत्कालीन ओट्टोमन साम्राज्य, वर्तमान में तुर्की) में भारत और आस्ट्रेलिया प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान (25 अप्रैल 1915 से 9 जनवरी 1916 ) साथ साथ लड़े थे. इसमें भारत के १३०० से ज्यादा जांबाज़ सैनिक शहीद हुए थे और आस्ट्रेलिया के भी हजारों जवानों ने प्राणों की आहुति दी थी. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भी भारत और आस्ट्रेलिया के फौजी साथ साथ अल अलामीन, उत्तरी अफ्रीका, सीरिया-लेबनान और बर्मा में कंधे से कन्धा मिलाकर सिंगापुर पर कब्जे के लिए साथ साथ लड़े थे.

राहुल द्रविड़ ने अपने भाषण में कहा कि हम यहाँ क्रिकेट की चर्चा कर रहे हैं और युद्ध में दोनों देशों के शहीदों को याद कर रहे हैं. प्रतिस्पर्धी होने के पहले हम भारतीय और आस्ट्रेलियाई साथी थे. आपने मुझे इस भाषण के लिए बुलाया, आभारी हूँ. लॉर्ड्स में क्रिकेट के मैदान में सर डॉन ने लंच के पहले ही सेंचुरी मार ली थी, जबकि मुझे इसमें लगभग पूरा दिन लग गया था. बड़ी बात यह है कि सर डॉन ने भारत के विरुद्ध केवल पांच टेस्ट खेले थे 1947-48 में. यह उनका अपने होम ग्राउंड पर अंतिम सीजन था. और सर डॉन ने भारत में खेला ही नहीं था. भारत भूमि पर सर डॉन के कदम मई 1953 में पड़े थे, जब वे इंग्लैण्ड जा रहे थे और उनका विमान कोलकाता में रुका था. वहां करीब एक हज़ार लोग उनका अभिवादन करने को खड़े थे, लेकिन वे सेना की जीप में बैठकर सुरक्षित ईमारत में चले गए थे. भारतीयों ने उन्हें पहली बार तभी देखा. मेरे देश में क्रिकेट प्रेमियों की एक पीढी उन्हें एक ऐसे विलक्षण क्रिकेटर के रूप में जानती है जो इंग्लैण्ड के बाहर का था.
रेकार्ड टूटने का विरोध
कुछ दिलचस्प बातें : 28 जून 1930 को ब्राडमैन ने लोर्ड्स में इंग्लैण्ड के खिलाफ 254 रन बनाये थे, और यही वह दिन था जब जवाहरलाल नेहरू को ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार किया था. नेहरू आजादी की लड़ाई के प्रमुख सिपाही थे और आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. एक और किस्सा. 1933 में जब ब्रेडमैन का 334 रनों का रिकार्ड टूटा, तब उनके कुछ क्रिकेट फेंस ने काली पत्तियां बाँधकर इसका विरोध जताया था, क्योकि वे ब्रेडमैन का रिकार्ड टूटने से खफा थे. ब्रेडमैन का मानना था कि क्रिकेट खिलाड़ी इस महान खेल के ट्रस्टी हैं. मुझे यह कहते हुए ख़ुशी है कि मैं कुछ बड़ी दिलचस्प बातें सर डॉन से शेयर करता हूँ. वे भी, मूलत; मेरी तरह ही तीसरे क्रम के बल्लेबाज़ थे. यह एक कठिन कार्य है. हमने यह कार्य किया लेकिन उन्होंने इसे और भी सफलता और स्टाइल से किया. वे गेंदबाजों पर छा जाते थे और फिर अपनी तशरीफ़ ले जाते थे. ..वे अस्सी के दशक में सार्वजानिक जीवन से रिटायर हो गए. मुझे ज्ञात हुआ कि वे सुनील गावस्कर की पीढ़ी के खिलाड़ियों को आस्ट्रेलिया में खेलते हुए देख चुके है...मैं उनका कायल हूँ, जिस कुशलता के साथ वे खेले, और जिस गरिमा, सत्यनिष्ठा, साहस और विनम्रता से उन्होंने ज़िन्दगी को जीया. उन्होंने आजीवन विश्वास किया स्वाभिमान, महत्वाकांक्षा, प्रतिबध्धता और प्रतियोगितात्मकता पर. ये वे शब्द हैं जिन्हें पूरी दुनिया में क्रिकेट के ड्रेसिंग रूम में चस्पा कर देना चाहिए. .. वे हमारे बीच से 25 फरवरी 2001 को चले गए, मुंबई में भारत आस्ट्रेलिया सीरिज शुरू होने के दो दिन पहले.
क्रिकेट की शिक्षाएं
आई पी एल को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि आज भारतीय और आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी एक ड्रेसिंग रूम शेयर करते हैं. शेन वाटसन की राजस्थान रॉयल्स में सहभागिता, माइक हँसी का चेन्नई में रोल और शेन वार्न की भारतीय टीम में रूचि महत्वपूर्ण है. क्रिकेटर के रूप में हम अपने अपने देश के राजदूत हैं....यहाँ मैं यह कहना चाहता हूँ कि हम वास्तव में एक दूसरे को समझना, स्वीकारना, सम्मान करना सीख रहे हैं. जब मैंने अंडर 19 मैच न्यूजीलैंड के खिलाफ खेला था तब हमारी टीम में दो गेंदबाज़ थे, जिनमें से एक हिन्दीभाषी उत्तर भारत का था और दूसरा केरल का मलयालम भाषी. दोनों एक दूसरे से बात करने में असमर्थ थे. लेकिन जब मैच हुआ तब दोनों ने सौ रनों की भागीदारी की थी. यह सब क्रिकेट में संभव है. क्रिकेट ने भारत का ताना बाना ही बदल डाला है.
जैसे सर डॉन आस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स के बारह हज़ार आबादी के कस्बे से आये थे, वैसे ही हमारे देश के क्रिकेटरों की भी कहानियां है. रणजी ट्रॉफ़ी के लिए 27 तीमें खेलती हैं. पिछली बार जीती राजस्थान की टीम. झारखण्ड की टीम ने पहली बार वन डे जीता. जहीर खान महाराष्ट्र के जिस कस्बे से आते हैं, वहां सलीके का एक मैदान तक नहीं. गुजरात का एक 17 साल का युवक भारत का सबसे तेज़ गेंदबाज़ बना है. मुनाफ पटेल के टीम में आने के बाद उनके गाँव और रेलवे स्टेशन के बीच का रोड सुधर गया क्योंकि सैकड़ों पत्रकार उनसे मिलने जा रहे थे. क्रिकेट के कारण उमेश यादव ने अपना पुलिस में भर्ती होने का सपना छोड़ा. वीरेंद्र सहवाग प्रैक्टिस के लिए रोजाना 84 किलोमीटर का सफ़र बस से करते थे. भारत के हर क्रिकेटर की एक कहानी है. भारतीय क्रिकेट की आत्मा और ह्रदय की कहानी.
क्रिकेट के नए रूप
क्रिकेट ने हमारी ज़िन्दगी बदल दी है. हम जीतें या ना जीत पायें, जनता हमारे लिए दुआ मांगती है, हमें देखकर मुसकराती है, हाथ हिलाती है. क्रिकेट हमारे लिए रोजी रोटी नहीं, एक वरदान है. इसके बिना हम केवल मामूली इंसान हैं. हमें इस मौके पर पुनरवलोकन भी करना चाहिए. मैंने पिछले महीनों में एक भारतीय मैच में स्टैंड में कई सीटें खाली पायी. यह एक चेतावनी भी है. 1981 से अब तक भारत 227 वन डे इंटरनेशनल खेल चुका है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि आखिर हम हैं तो परफार्मर, इंटरटेनर, क्रिकेटर. और हमें अपने दर्शकों से प्यार है. आस्ट्रेलिया या इंग्लैण्ड की तरह हमारे यहाँ और कोई खेल नहीं है जो इतना रेवेन्यु अर्जित कर पाए. अब टेस्ट मैच, वन डे और 20 -20 में तालमेल बैठकर खेल को आगे बढ़ाना चाहिए. हमें मूल क्रिकेट को और उसकी भावना को बचाकर रखने की कोशिश करनी चाहिए. क्रिकेट की तीनों विधाओं के लिए अलग अलग कौशल की ज़रुरत पड़ती है.टेस्ट क्रिकेट वह पद्धति है जिसे क्रिकेटर खेलना चाहते हैं. वन डे तीन दशकों से रेवेन्यू का एक अच्छा माध्यम है और अब 20 - 20 नए रूप में आ चुका है, इस रूप को दर्शक देखना चाहते हैं.
प्रकाश हिन्दुस्तानी


(दैनिक हिन्दुस्तान (18 - 12 - 2011) के एडिट पेज पर प्रकाशित)
Post a Comment