Monday, August 25, 2014

'लक्ष्मी दर्शन' से 'महालक्ष्मी दर्शन' तक

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (23 अगस्त  2014)



केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि आरटीओ कार्यालय लक्ष्मी दर्शन की दुकान बन गए हैं, इसलिए उन्हें बंद किया जाएगा। इसकी जगह वे महालक्ष्मी दर्शन की दुकान खोलने जा रहे हैं। आरटीओ कार्यालय बंद होंगे और उनकी जगह खुलेंगे एलटीए का कार्यालय। रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस का नाम अब लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी होगा। आरटीओ वालों की कमाई से नितिन गडकरी संतुष्ट नहीं हैं, उन्हें लगता है कि आरटीओ वालों की कमाई और ज्यादा होनी चाहिए। ज्यादा कमाएंगे तभी तो ज्यादा पैमेंट कर पाएंगे बेचारे। आरटीओ वाले केवल लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन, परमिट आदि ही तो देते हैं। अब जो एलटीए आएगा जो लाइसेंस, परमिट, रजिस्ट्रेशन आदि का काम तो करेगा ही, साथ में सड़कें मरम्मत करने, सड़कों से अतिक्रमण हटाने, सड़कों पर प्रदर्शन धरना आदि करने से रोकने का काम     भी करेगा। 

बात साफ है, जब आरटीओ वाले केवल लाइसेंस, परमिट में ही अच्छी खासी कमाई कर लेते हैं, तो अब वे सड़क मरम्मत, जुलूस वगैरह की परमिशन और अतिक्रमण करने की अनुमति भी देंगे। अभी तक केवल पैसे लाओ लाइसेंस, परमिट ले जाओ था। अब हो जाएगा पैसे लाओ तो तुम्हारा अतिक्रमण नहीं हटाएंगे। पैसे लाओ तो तुम्हारे इलाके की सड़क दुरुस्त करा देंगे। पैसे दो और धरना कर लो। हमारी परमिशन के बिना तो कुछ काम होगा नहीं। इसलिए अब आरटीओ वालों का महत्व और बढऩे वाला है। लोग कहते हैं कि ट्रांसपोर्ट कमिश्नर की पोस्ट नीलामी की पोस्ट है। अब उस नीलामी में बढ़ा हुआ रेट लागू हो जाएगा। 

अभी आरटीओ वालों का काम क्या है? बिना दक्षिणा के आप वहां भीतर भी नहीं जा सकते। दक्षिणा वालों ने इतना सुंदर सिस्टम बना रखा है कि वाह-वाह कहने का जी करता है। हर काम का रेट तय। जल्दी काम, ज्यादा पैसा। ज्यादा पैसा, बिना दिक्कत के काम। और ज्यादा पैसा यानी होम डिलीवरी। आपको लाइसेंस चाहिए, पैसे दो तो आसानी से बन जाता है। और ज्यादा पैसे दो तो नो ट्रॉयल, नो एक्जाम। ऐसा नहीं कि वहां ट्रॉयल या एक्जाम का प्रावधान नहीं है। वो तो होता है, लेकिन मुन्नाभाई क्या केवल मेडिकल वालों की ही बपौती हैं? अगर और भी सुविधा चाहिए तो लाइसेंस घर बैठे भी मिल सकता है। हर सेवा का शुुल्क तय है। 
ये मीडिया वाले फिजूल ही आरटीओ वालों को बदनाम करते हैं। आरटीओ के कर्मचारी इतनी मेहनत करते हैं तो क्या उन्हें उनका मेहनताना नहीं मिलना चाहिए। दूसरे सरकारी दफ्तरों में जहां कर्मचारी काम ही नहीं करते, आरटीओ से प्रेरणा ले सकते हैं। हर कर्मचारी काम के लिए ऐसा प्रतिबद्ध कि छुट्टी लेने में हमेशा हिचकिचाता है। यहां तक कि वह ड्यूटी खत्म होने के बाद भी काम करता रहता है। इससे बढ़कर कई कर्मचारियों ने तो अपनी तनख्वाह में से काम करने वाले कर्मचारी नियुक्त कर रखे हैं। किसी और विभाग में होता है ऐसा? हो सकता है?

जिसे नितिन गडकरी लक्ष्मी दर्शन की दुकान कहते हैं, उससे सरकार को कोई घाटा है ही नहीं। आरटीओ के कर्मचारी ने दावा किया कि हमारी सेवाओं से सरकार को केवल फायदा ही फायदा है। अगर ड्राइविंग लाइसेंस के 300 रुपए लगते हैं तो क्या किसी को 299 रुपए में लाइसेंस बनाकर दिया गया? सरकार का जो रेट फिक्स है उतना पैसा खजाने में जमा होता है या नहीं? अब अगर लोग आरटीओ कर्मचारी के काम से खुश होकर उन्हें 'सेवा शुल्क' या 'प्रोत्साहन राशि'  देते हैं तो इसमें उन कर्मचारियों का क्या दोष? क्या होटल में खाना खाने के बाद लोग टिप नहीं देते? 

यह अच्छी बात है कि नितिन गडकरी नई एजेंसी को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाना चाहते हैं, पर वे यह काम बिना अच्छी सड़कों, बिना यातायात की शिक्षा, बिना स्वचलित सिग्नल प्रणाली आदि के बिना करना चाहते हैं। जिस देश में लोग लातों के भूत हों, कानून को अपनी जेब में रखते हों और हर व्यक्ति नेता हो, वहां नितिन गडकरी का कानून कितना सुधार कर पाएगा, यह देखने वाली बात होगी। जैसा कि और विभागों में हुआ है, आरटीओ में भी कमाई के रास्ते बढ़ जाएंगे और लोग नितिन गडकरी के गुण गाया करेंगे। नितिन गडकरीजी पहले वक्त पर गाडिय़ों की नंबर प्लेट तो बनवा दीजिए। इस नंबर प्लेट की क्वालिटी की बात भी कर लीजिए। ट्रांसपोर्ट कमिश्नर की नियुक्ति का सिस्टम सुधार लीजिए। इस बात की पूरी-पूरी संभावना है कि लक्ष्मी दर्शन की दुकानें अब महालक्ष्मी दर्शन की दुकानें न बन जाएं। 
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वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (23 अगस्त  2014)
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