Monday, September 08, 2014

चेतन भगत और गुलशन नंदा

वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (06 सितम्बर   2014)



एक ज़माने में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की हिंदी पत्रिका 'धर्मयुग' का बड़ा जलवा था। 'धर्मयुग' में एक कहानी छप जाने पर ही लोग किसी को लेखक मान  लेते थे और एक कविता भर छपने से कवि।  मैं धर्मयुग में  उप संपादक बनने के लिए  फाइनल इंटरव्यू दे रहा था। प्रसिद्ध साहित्यकार  डॉ धर्मवीर भारती उसके संपादक थे।  डॉ भारती ने पूछा --''क्या-क्या पढ़ते हो?''

''सब कुछ।''

''सब कुछ मतलब?''

''सब कुछ।  सभी लेखकों को पढ़ता  हूँ।''

''तुम्हारा प्रिय लेखक कौन है?'' 

भारती जी को लगा कि शायद उनका नाम लूँगा।  पर मैंने कहा --''गुलशन नंदा।'' 


भारती जी मुस्कराए -- ''क्या अच्छा  लगता है उनके लेखन में?''
''बढ़िया पारिवारिक कहानी, सीधी  सपाट भाषा और रोचक प्रस्तुति। ''

इंटरव्यू देकर बाहर आया तो दोस्तों  ने कहा -- ''तुम तो गए काम  से।  क्या ज़रुरत थी यह  कहने की? कह देते कि प्रिय लेखक भारती जी ही हैं, वे खुश हो जाते; जॉब पक्का  जाता।'' 

मेरे अजरज का ठिकाना न रहा जब मेरा चयन 'धर्मयुग' में हो गया जबकि मेरे साथ इंटरव्यू देनेवाले राजीव शुक्ला जैसे शख़्स का चयन नहीं हो सका। दो साल बाद ही मुझे गुलशन नंदा  इंटरव्यू  मौका मिला।  यह बात और है  कि वह इंटरव्यू 'धर्मयुग' में नहीं, 'दिनमान' में प्रकाशित हुआ था।  गुलशन नंदा उन दिनों 'सुपरस्टार' लेखक थे।  उनकी किताब 'झील के उस पार' का पहला संस्करण पांच लाख प्रतियों का था. तीस साल पहले के मान से यह बहुत बड़ी संख्या थी। उनकी तुलना में चेतन भगत कमतर ही माने जा सकते हैं। 'आराधना', 'खिलौना', 'काजल','शर्मीली', 'दाग','नया ज़माना','मेहबूबा', 'नीलकमल' 'पत्थर के सनम', 'सावन की घटा',जोशीला', 'जुगनू', अजनबी', 'बड़े दिल वाला', 'भंवर','आजाद', 'नजराना' आदि उनकी लिखी  फ़िल्में हैं। वे सलीम-जावेद के काफी पहले 'स्टार रायटर' का दर्जा पा चुके  थे। वे अपनी कमाई से बांद्रा के पाली हिल पर 'शीशमहल' नामक बंगला खरीद चुके थे और अपना लेखन कार्य केवल फाइव स्टार होटल में बैठकर  करते थे। उन्हें भी दिलीप कुमार की तरह हिन्दी या देवनागरी लिपि  ज्ञान नहीं था और वे भी उर्दू की तरह लिखते थे। करीब 30 उपन्यासों में से 20 से ज़्यादा पर फ़िल्में बनी थी. हाल यह था कि उनकी कोई किताब बाज़ार में आती, इसके पहले ही उस पर फिल्म बनना शुरू हो जाती।  अपनी फिल्मों के डॉयलॉग और स्क्रीन प्ले लिखने से वे हमेशा बचते रहते। 

गुलशन नंदा को कई लोग महिला समझते थे, क्योंकि नंदा उन दिनों की एक बेहद कामयाब हीरोइन थीं।  गुलशन नंदा ने अपने लेखन की शुरुआत साहित्यिक लेखन से ही की थी. 'सांवलीरात', 'रक्त और अंगारे', 'कलंकिनी' उनके शुरूआती उपन्यास थे जिनमें साहित्यिक पुट था, लेकिन वे बिके नाम मात्र के।  समीक्षा भी अच्छी नहीं छपी. इससे उन्होंने अपने लेखन की शैली बदली और लोकप्रियता का दामन थामा।उनके लिखे उपन्यासों को लोग आज भी याद करते हैं जिनमें 'सिसकते साज', झील के उस पार', 'गेलॉर्ड','जलती चट्टान', 'नीलकंठ', 'घाट  का पत्थर', 'पालेखां ' आदि प्रमुख हैं।  मुझे दिए इंटरव्यू में गुलशन नंदा कहा था कि उन्हें समीक्षकों की कोई परवाह नहीं। वे अपने अनुभवों के आधार पर लिखते हैं। अपने लेखन के प्रारंभिक दिनों में उन्हें आजीविका के लिए चश्मे की दूकान पर काम करना पड़ा था, जहाँ उनकी मुलाकातें अलग अलग वर्ग  से होती रहती थी. उनके उपन्यासों के बारे में  दिलचस्प बात यह कि उनके नाम पर कई प्रकाशक घोस्ट लेखन करवाकर छापते रहते थे।  

आज जब लोग चेतन भगत की बात हैं तब शायद उन्हें पता नहीं होता कि लेखकों का दौर पहले भी रहा है. फर्क है तो बस यह कि गुलशन नंदा हिंदी में प्रकाशित होते थे, और युवाओं-किशोरों में छाए हुए थे।  चेतन भगत अंग्रेज़ी में लिखते और मार्केटिंग करते हैं, लेकिन गुलशन नंदा के उपन्यासों जैसा सामाजिक सन्देश उनमें काम नज़र आता है. 
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वीकेंड पोस्ट में मेरा कॉलम (06 सितम्बर   2014)


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