Saturday, May 02, 2015

अमेरिका की डायरी के पन्ने (1)

अंकल सैम का खजाना, जो अंकल सैम का नहीं है

न्यू यॉर्क के लिबर्टी स्ट्रीट पर 33 नंबर की बिल्डिंग है फ़ेडरल रिजर्व बैंक। मोटे-मोटे शब्दों में कहा जाए तो इस बैंक का काम वहीं है जो भारतीय रिजर्व बैंक का है, लेकिन इस बैंक में अमेरिकी सरकार की हिस्सेदारी नहीं है और न ही इसकी संपत्तियां अमेरिकी सरकार की हैं। जैसे भारतीय रिजर्व बैंक, बैंकों का बैंक है वैसे ही फ़ेडरल बैंक, अमेरिका के बैंकों का बैंक है। अमेरिका यात्रा के दौरान इस बैंक का एक शैक्षणिक टूर बड़ा दिलचस्प और यादगार रहा।

एक महीने पहले ही इस टूर के लिए ऑनलाइन  बुकिंग की जा चुकी थी। हमें समय मिला था दोपहर 12.30 बजे से 2 बजे तक। हम वहां करीब 12 बजे पहुंच गए थे, तो सुरक्षाकर्मी ने कहा कि आप 12.30 बजे ही प्रवेश कर सकते है। आधे घंटे न्यू यॉर्वâ की गलियों में घूमने के बाद हम 12.30 बजे वहां पहुंचे और तमाम जामा तलाशी और स्केनिंग के बाद हमें प्रवेश दिया गया। इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बंद करने का आदेश भी हुआ। पांच मिनिट बाद ही करीब 20 लोगों का ग्रुप तैयार था, जिसमें अमेरिकन, जापानी, जर्मनी और भारत के हम दो नागरिक शामिल थे। जब तक हमारी गाइड वहां नहीं पहुंची, तब तक हमें बैंक के कॉरिडोर में घूमने की अनुमति थी, वहां बैंक के बारे में तमाम सूचनाएं मौजूद थी। सुंदर तस्वीरें और महलनुमा अंदरुनी साज-सजावट वास्तव में दिल छूने वाली थी। 




थोड़ी ही देर में दो गाइड वहां पहुंची और हमारा बैंक का टूर शुरू हुआ। हमें कुछ वीडियो फिल्में भी दिखाई गई और फिर एक कक्ष में ले जाया गया, जहां अमेरिकी नोटों के बारे में जानकारियां थी। खुर्दबीन से उन नोटों को सैकड़ों गुना बढ़ा करके भी देखा जा सकता था। नोटों की एक-एक बारिकी समझाई गई और फिर हमारी गाइड हमें लेकर गई एक अलग कक्ष में। उस कक्ष में कांच के एक बड़े से बक्से में सौ-सौ डॉलर के नोटों का जखीरा रखा था। बताया गया कि उसमें कुल 3 करोड़ डॉलर रखे है। इतने बड़े जखीरे के बॉक्स को छूना भी अपने आप में एक अनुभव रहा।
इसके बाद हमें बताया गया कि अमेरिका में हर नोट की उम्र तय है। एक निश्चित अवधि के बाद उन नोटों को इकट्ठा करके नष्ट कर दिया जाता है। ऐसे ही एक दूसरे बक्से में लाखों डॉलर के नोटों की बारिक-बारिक कतरन में भरी हुई थी। अमेरिकी नोटों को जलाने की परंपरा नहीं है। डॉलर की उम्र तय करने के पीछे फ़ेडरल  बैंक की धारणा यह बताई गई कि किसी भी देश की मुद्रा उस देश के आर्थिक साम्राज्य से जुड़ी होती है। अगर किसी देश में कटे-फटे नोट चलते है तो इससे उस मुद्रा के महत्व का पता चलता है। अमेरिका में कोई भी नोट 22 माह से अधिक चलन में नहीं रहने दिया जाता।

इसके बाद हमें बताया गया कि बैंक की बिल्डिंग के नीचे की पांचवी मंजिल वाले तयखाने में ले जाया जाएगा, जहां खरबों डॉलर के सोने का भंडार है। सुरक्षाकर्मी हमें अलग-अलग समूह में लिफ्ट तक लेने गए और बताया कि बिल्डिंग में 11 मंजिल नीचे है, जिसमें से वे हमें पांचवीं मंजिल वाले तहखाने में ले जा रहे है, जो जमीन के स्तर से 110 फीट नीचे है। एक विशेष तरह की लिफ्ट में हमें ले जाया गया। उस लिफ्ट का दरवाजा पिंâगर प्रिंट लॉक से खुलता था और एक खास तरीके से ही उस लिफ्ट को संचालित किया जा सकता था। सुरक्षाकर्मी हमें नीचे लेकर गए जहां भारी गर्मी थी। एयर वंâडिशन होने के बावजूद हमें गर्मी का एहसास हो रहा था। वहां हमें एक दूसरी गाइड मिली की हम ऐसी जगह जा रहे है जो दुनिया की सबसे बड़ी सम्पदा है। इस सोने के भंडार का वजन ३७ हजार टन बताया गया। इस सोने की सिल्लियां सलीके से अलग-अलग खांचे में रखी गई। हमें लोहे के एक बड़े से जालीदार दरवाजे के पीछे रोक दिया गया, जहां से हम सोने की सिल्लियां देख सकते थे। इस सोने की कीमत दुनिया में सोने के भाव के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। मोटे-मोटे अनुमान के अनुसार उस सोने का तत्कालीन बाजार भाव 3 खरब अमेरिकी डॉलर से भी अधिक था। दिलचस्प बात यह है कि इस सोने में अमेरिका का खुद का हिस्सा केवल 2 प्रतिशत है।  98 प्रतिशत हिस्सा दूसरे देशों का है। खासकर के मित्र राष्ट्रों का। इन देशों ने अपना सोना वहां जमा कर रखा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सोने की सुरक्षा कई देशों के लिए संकट बन गई थी और उन्होंने इसके लिए अमेरिकी फ़ेडरल बैंक को चुना।
हमें बताया गया कि बैंक की पूरी बिल्डिंग ही कांक्रीट की बनी हुई है। उन तहखानों को बम गिराकर भी नष्ट नहीं किया जा सकता। सुरक्षा का इंतजाम इतना तगड़ा की चीटीं भी नहीं पहुंच सकती। केवल कुछ अधिकृत लोग ही वहां जा सकते है और वह भी पर्याप्त शिनाख्त के बाद। इतनी बड़ी-बड़ी तिजोरियां और ताले थे, जिसकी कल्पना भी मुश्किल है। बिल्डिंग के बाहरी हिस्से में चट्टानों को काटकर इस तरह र्इंट की तरह लगाया गया और उस पर रंग पोता गया कि वे सोने की चट्टानें लगती थी और बिल्डिंग के अंदर किसी कार्पोरेट हाउस के मुख्यालय का अनुभव को होता था। इतनी भव्य और मजबूत बिल्डिंग के पीछे उसके आर्किटेक्ट की यह भावना बताई गई कि जब कोई भी मित्र राष्ट्र वहां अपना सोना डिपाजिट करेगा, तो उसके मन में यह भाव आना चाहिए कि उसका सोना पूरी तरह सुरक्षित है। किसी कैसल की तरह ही बिल्डिंग की सजावट की गई थी। जिससे यह भान होता था कि हम किसी महल में खड़े है। 
 
मेरे मन में उस सारे सोने और नोटों के बक्से को देखकर कोई विशेष भाव नहीं आया,  जो अपना है  ही नहीं, उसके बारे में क्या सोचना। मन बार-बार यहीं कह रहा था कि पूरी दुनिया की लूटी हुई दौलत इस बिल्डिंग में सुरक्षित है, जहां आना किसी के भी बस की बात नहीं। गाइड से मैंने पूछ ही लिया कि क्या कभी इस बिल्डिंग में लूट की कोशिश की गई थी। गाइड ने हंसते हुए कहा- केवल फिल्मों में ही यह हुआ है। अन्यथा किसी की कोई हिम्मत कभी भी नहीं हुई। तलघर की पांचवीं मंजिल से भूतल पर आने के बाद मैंने रेस्ट रूम के बारे में पूछा। रेस्ट रूम जाकर मैंने सबसे पहले लघुशंका की। हाथ थोए और बाहर आकर मन ही मन कहा कि अमेरिका के पेâडरल बैंक में कितनी भी दौलत हो मैं तो वहां वहीं करके आया, जो कर सकता था। 
यह एक कबीराना अंदाज था।
कॉपीराइट © 2015 प्रकाश हिन्दुस्तानी
(सभी चित्र फ़ेडरल बैंक के सौजन्य से)

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