Thursday, November 27, 2014

धंधा, भीख मांगने और वेश्यावृत्ति का

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एच.एल. दत्तू ने कहा है कि भीख मांगने और वेश्यावृत्ति करने को अपराध मानना ठीक नहीं। इसका अर्थ यहीं हुआ कि भीख मांगना और वेश्यावृत्ति करने को कानूनी रूप से मान्यता मिल जाए और यह भी एक धंधा मान लिया जाए। कहा जाता है कि कोई भी व्यक्ति मजबूरी में ही यह धंधे करने के लिए बाध्य होता है। अब यह बात अलग है कि यह दोनों ही धंधे मुनापेâ के धंधे बन गए है। अच्छे खासे ह्रष्ट-पुष्ट लोग भीख मांगते या मंगवाते पाए गए है और वेश्यावृत्ति भी योग्यता से अधिक आसानी से कमाई का जरिया बन चुकी है।
शुक्र है कि दत्तू साहब ने यह नहीं कहा कि इन धंधों के लिए सरकारी बैंकों से कम ब्याज पर लोन मिलना चाहिए। जरा कल्पना तो कीजिए कि इन दोनों को धंधा बना लिया जाए और सरकारी बैंकों के आदेशित किया जाए कि इन धंधों के लिए आसान शर्तों और कम ब्याज दरों पर लोन दिया जाए। ताकि इस धंधे का कल्याण हो सवेंâ। अगर ऐसा हुआ तो सरकारी बैंकों के दरवाजे पर कर्ज लेने वालों की भारी भीड़ जमा हो जाएगी। हो सकता है कि भिखारियों को दिया गया पैसा कभी वापस न आए और वेश्यावृत्ति के लिए दिया गया पैसा कम पड़ जाए।
सरकारी बैंकों में इन कर्जों के लिए अलग से विभाग खोले जा सकते है। इन विभागों को जो आवेदन मिल सकते है वे भी कोई कम दिलचस्प नहीं होंगे। जैसे भिक्षावृत्ति के लिए दिए गए आवेदनों में तमाम यह जानकारी हो सकती है कि उसके कितने बच्चे है और वह कितने बच्चे और पैदा करने की वूâवत रखता है। उन बच्चों को को इस धंधे में लगाकर कितना पैसा कमाया जा सकता है। नए बच्चों को कौन-कौन सी शारीरिक विकलांगता पैदा की जाएगी, ताकि लोग द्रवित होकर ज्यादा भीख दे सके। हो सकता है कि आवेदक के लिए एक कॉलम यह भी हो कि वह किस क्षेत्र में भिक्षावृत्ति करेगा और क्या उसके लिए उसने स्थान बुक कर रखा है। यह स्थान पुâटपॉथ, मंदिर के सामने या आजू-बाजू की जगह, शहर का व्यस्त इलाका अथवा मॉल के सामने की जगह इस धंधे में कितनी फायदेमंद हो सकती है। हो सकता है कि इस मुद्दे को लेकर राजनीति भी गरमा जाए और अलग-अलग जातियों के लोग अपनी जाति के लिए अधिक से अधिक आरक्षण कराने के लिए संघर्ष करने लगे। जिसका नतीजा हो सकता है चुनाव परिणामों पर भी पड़े। 
वेश्यावृत्ति के लिए कर्ज मांगने वाले अपने आवेदन में बता सकता है कि उनके परिवार में कितनी लड़कियां या महिलाएं है, जो इस धंधे को आगे बढ़ाने में योगदान दे सकती है। हो सकता है कि सौंदर्य स्पर्धाओं की तरह यहां भी आवेदन के साथ शरीर से संबंधित विभिन्न फिगर्स लिखे जाएं। अलग-अलग एंगल से लिए गए फोटो आवेदकों को चिपकाना पड़ेंगे, जिसका उपयोग बैंक के अधिकारी कर्ज देते वक्त कर सवेंâगे। हो सकता है कि यहां बैंक के अधिकारियों को रिश्वत तो मिले, लेकिन वह नकद रुपयों में न हो। अगर ज्यादा आवेदन आए तो बैंकों के भीतर भी अराजकता हो सकती है, क्योंकि तमाम अधिकारी इस विभाग में आने के लिए तिकड़में भिड़ा सकते है। 
बहुत सारे बुद्धिजीवियों को इसमें कोई आपत्ति नजर नहीं आती। उनका कहना है कि जब सरकार भिक्षावृत्ति और वेश्यावृत्ति को खत्म नहीं कर पा रही है, तो उसे कानूनी रूप दे देने में क्या बुराई है। उन लोगों के लिए एक यहीं तर्वâ काफी है कि सरकार रिश्वतखोरी, चोरी, डवैâती, बलात्कार जैसे अपराधों को भी रोकने में कामयाब नहीं हो पा रही है, तो क्या इसका अर्थ यह कि इन सब अपराधों को कानूनी मान्यता दे दी जाए। रिश्वत के रेट तय कर दिए जाए, चोरी-डवैâती को रोजगार मान लिया जाए। जिन चीजों को सरकार नहीं रोक पा रही है, उन्हें रोकने की कोशिश तो जरूर करनी चाहिए। यहां बात सही और गलत की है। क्या हो रहा है और क्या होना चाहिए, इसकी है। अपराध रुक नहीं पा रहे है, तो उन्हें कम से कम होने देने की कोशिश करना प्राथमिकता होनी चाहिए। यह बात वैâसे हो सकती है कि अगर अपराधों पर अंकुश नहीं लगा सके तो उन्हें वैध कर दिया जाए।
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27 nov.2014

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