Sunday, November 20, 2011

'अग्नि' की बेटी, 'तेजस' की माँ

रविवासरीय हिन्दुस्तान (20/11/2011) के एडिट पेज पर मेरा कॉलम




'अग्नि' की बेटी, 'तेजस' की माँ

डॉ. टेसी थॉमस को कुछ लोग मिसाइल वूमन कहते हैं तो कई लोग उन्हें 'अग्नि - पुत्री' का खिताब देते हैं. वे देश के मिसाइल प्रोजेक्ट (डी आर डी ओ) की प्रमुख हैं और उन्हीं के नेतृत्व में 15 नवम्बर को उड़ीसा के व्हीलर द्वीप से तीन हज़ार किलोमीटर तक सतह से सतह पर मार करने वार करने की क्षमता वाली मिसाइल अग्नि-4 का सफल प्रक्षेपण किया. यह मिसाइल अपने साथ एक हज़ार किलो तक के परमाणु हथियार लेकर जा सकती है और दुश्मन के इलाके में तबाही मचा सकती है. टेसी पहली भारतीय महिला हैं, जो मिसाइल प्रॉजेक्ट का नेतृत्व कर रही हैं. अब पाँच हज़ार किलोमीटर तक मार कर सकने वाली अग्नि-5 बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण करने की भी योजना है.जिसकी प्रमुख भी टेसी ही हैं. डॉक्टर ए पी जे कलाम की शिष्या टेसी ऐसे क्षेत्र में कार्य कर रही हैं जहाँ पुरुषों का वर्चस्व माना जाता है. भारतीय सुरक्षा की एक प्रमुख आधार टेसी की कामयाबी के कुछ सूत्र :
एकाधिकार को तोड़ें
आमतौर पर रणनीतिक हथियारों और परमाणु क्षमता वाले मिसाइल के क्षेत्र में पुरुषों का वर्चस्व रहा है. इस अवधारणा को तोड़कर टेसी थॉमस ने सच कर दिखाया कि हर उड़ान पंखों से नहीं, हौसलों से होती है. 1988 में वे अग्नि परियोजना से जुड़ीं और तभी से लगातार इस परियोजना में काम कर रही हैं. उनकी प्रेरणा से डी आर डी ओ में करीब दो सौ से ज़्यादा महिलाएँ कार्यरत हैं जिनमे से करीब बीस तो सीधे तौर पर उनसे जुड़ी हैं. शुरू में लोग उनसे यह भी कहते कि आप किस दुनिया में काम कर रहीं है, यहाँ तो केवल पुरुषों का वर्चस्व है, तब वे मुस्करा देतीं. उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज कोई यह नहीं कह सकता कि परमाणु मिसाइल बनाने का क्षेत्र पुरुषों का ही है. अगर वे तब पीछे हट जातीं तो आज उन्हें यह गौरव प्राप्त नहीं होता.
असफलताओं से पस्त ना हों
टेसी तीन साल पहले ही अग्नि परियोजना की प्रमुख बनी थी और उन्हें पहला आघात तब लगा जब अग्नि-3 मिसाइल का परीक्षण सफल नहीं हो सका. अरबों रुपये की परियोजना का हिस्सा अग्नि -3 का परीक्षण उड़ीसा के बालासौर के पास द्वीप पर हो रहा था और अग्नि-3 मिसाइल के प्रक्षेपण होने के तीस सेकंड के भीतर ही वह मिसाइल समुद्र में जेया गिरी. लेकिन तमाम आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और कहा की यह विफलता ज़रूर थी, लेकिन ऐसी नहीं की हमारे हौसलों को तोड़ सके. उन्होंने मामूली सी तकनीकी त्रुटि की भी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली और कहा कि हम विफल नहीं हुए हैं, फिर कोशिश करेंगे और कामयाब होंगे. ऐसी परियोजना, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें हों, की विफलता का अर्थ भी वे जानती थीं और उसकी कामयाबी का भी. मेहनत, लगन, निष्ठा और मेघा से उन्होंने अपने लक्ष्य को पाया.
नेतृत्व के लिए आगे बढ़ें
टेसी ने कभी भी अपने जहाँ में यह ख़याल नहीं आने दिया की वे ऐसे क्षेत्र में हैं, जहाँ पुरुषों का बोलबाला है, इससे आगे बढ़कर उन्होंने अपने वैज्ञानिकों की टीम का नेतृत्व भी किया और टीम के मनोबल को भी बनाए रखा. उनका पूरा रास्ता कंटकाकीर्ण था. बेहद गोपनीय प्रोजेक्ट होने के कारण कामयाबी का श्रेय तो लगभग नहीं ही था, और नाकामी का ठीकरा फोड़ने के लिए देशी ही नहीं, विदेशी मीडिया भी तैयार खड़ा था कि कब टेसी के बहाने ही सही, भारत की रक्षा नीति पर हमला करे. मिसाइल की नाकामी भारत को उलाहना देने के लिए पर्याप्त कारण थी. टेसी ने कभी भी किसी की परवाह नहीं की, उन्हें सदा अपने लक्ष्य को पाने की चिंता थी और अपनी टीम के मनोबल को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी. महिलाओं के मिसाइल क्षेत्र में आने पर वे कहतीं हैं कि साइंस हेज़ नो ज़ेंडर. उनकी एक महत्वपूर्ण खूबी यह है की वे अपनी टीम को कामयाबी की क्रेडिट देने में कभी कोई कोताही नहीं करतीं. हाल की कामयाबी के लिए उन्होंने कहा है कि यह तो उनकी टीम की उपलब्धि है.
अपने लक्ष्य को जानें
टेसी को बचपन से ही साइंस और गणित में दिलचस्पी थी. रॉकेट और मिसाइल से उनका लगाव तब बढ़ा, जब यूएस का अपोलो चंद्रमा मिशन सफल हुआ. उन्होंने छुटपन में ही तय कर लिया था कि उन्हें आगे जाकर इंजीनियर बनना है. कोझीकोड के त्रिसूर इंजीनियरिंग कॉलेज से उन्होंने बीटेक की डिग्री ली और फिर उनका चयन पुणे के डिफेंस इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड टेक्नॉलोजी से एमटेक के लिए हो गया. डीआरडीओ के 'गाइडेड वेपन कोर्स' के लिए उनका चयन होते ही मिसाइल वुमन के तौर पर सफर शुरू हुआ। उन्होंने 'सॉलिड सिस्टम प्रोपेलेंटस' में विशेष दक्षता प्राप्त की, यही वह तत्व है, जो अग्नि मिसाइल में ईंधन का काम करता है. टेसी ने इग्नू से पी एचडी की उपाधि ली. टेसी को इस बात की खुशी है कि लोग उनकी पहचान हमेशा ही वैज्ञानिक के रोपोप में करते हैं न कि किसी महिला के रूप में. वे अपनी यही पहचान बचपन से चाहती थी.
काम महत्वपूर्ण है, प्रसिद्धि नहीं
टेसी जानती हैं कि वे जो काम कर रही हैं वह महत्वपूर्ण है, लेकिन इसमें ग्लैमर या प्रसिद्धि अपेक्षाकृत कम है. गोपनीयता के कारण वे सार्वनजिक जीवन में बहुत से लोगों से मिलती-जुलती नहीं, मिल-जुल भी नहीं सकतीं. वे अपना ज़्यादातर समय अपने काम में ही बिताती हैं. उनके जैसी बेहद महत्वपूर्ण शख्सियत मीडिया से गिनी चुनी बार ही मुखातिब हुई है. उनकी ताज़ा उपलब्धि पर भी मीडिया को जानकारी उन्होंने नहीं दी. जब अग्नि -3परियोजना विफल हुई थी, तब भी उन्होंने मीडिया से बात नहीं की थी. उनका फार्मूला साफ है कि काम खुद बोले तो बेहतर. महत्वपूर्ण केवल काम है.
परिवार पर भी दें ध्यान
टेसी जानती हैं की सबसे बड़ा शॉक एब्जार्वर अगर कोई है तो वह परिवार ही है. डॉ कलाम की शिष्या वे ज़रूर हैं, लेकिन उन्होंने शादी की है और उनका एक बेटा है, जिसका नाम मिसाइल के नाम पर 'तेजस' रखा है. उनके पति भारतीय नौसेना में कमोडोर हैं. वास्तव में उनके पति भी बेहद व्यस्त जीवन जीते हैं और दोनों को अपने निजी जीवन के लिए बहुत ही कम वक़्त मिल पता है. इस समस्या का हाल उन्होंने यह निकाला है कि जो भी वक़्त मिले उसे क्वालिटी टाइम के रूप में बिताया जाए. वे खुद मध्यवर्गीय परिवार की हैं और परिवार के मूल्यों को खूब जानती पहचानती हैं.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

दैनिक हिन्दुस्तान 20/11/2011 के एडिट पेज पर प्रकाशित मेरा कॉलम.
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