Wednesday, April 29, 2015

अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में प्रकाश हिन्दुस्तानी का वक्तव्य एवं प्रस्तुति





















आज जिस भाषा को हम हिन्दी कहते है। वह आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप है। आर्यों की प्राचीनतम भाषा वैदिक संस्कृत रही है, जो साहित्य की भाषा थी। वेद, संहिता और उपनिषदों व वेदांत का सृजन वैदिक भाषा में हुआ था। इसे संस्कृत भी कहा जाता है। अनुमान है कि ईसा पूर्व आठवीं सदी में संस्कृत का प्रयोग होता था। संस्कृत में ही रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ रचे गए। संस्कृत का साहित्य विश्व का सबसे समृद्ध साहित्य माना जाता है, जिसमें वाल्मीकि, व्यास, कालीदास, माघ, भवभूती, विशाख, मम्मट, दण्डी, अश्वघोष और श्री हर्ष जैसी महान विभूतियों ने योगदान दिया।
 संस्कृत की भाषा धीरे-धीरे बदलती चली गई और कालांतर में इसे पाली कहा गया। महात्मा बुद्ध के समय में लोकभाषा पाली ही थी। महात्मा बुद्ध के उपदेश पाली में ही प्रचारित-प्रसारित किए गए। यहीं पाली आगे जाकर प्राकृत भाषा हुई। आगे जाकर यहीं प्राकृत भाषा अलग-अलग रूप में अपभ्रंश के रूप में प्रतिष्ठित हुई। माना जाता है कि 500 से 1000 ईसवी तक ये भाषाएं अपना रूप बदलती रही। माना जाता है कि करीब 1000 साल पहले आधुनिक आर्य भाषाओं के अपभ्रंश से ही हिन्दी का जन्म हुआ। यह भी माना जाता है कि हिन्दी साहित्य की रचना का काम 1150 ईसवी के आसपास आरंभ हुआ।
हम जिसे हिन्दी कहते है वो फारसी भाषा का शब्द है। जिसका अर्थ है हिन्द से संबंधित। हिन्दी शब्द बना है सिंधु-सिंध से। ईरानी भाषा में स का उपचारण ह किया जाता था। वास्तव में सिंधु शब्द का प्रतिरूप हिन्दु हुआ और हिन्द की भाषा हिन्दवी या हिन्दी बनी।
इस हिन्दी में तमाम भाषाओं के शब्द आते गए और नदी के प्रवाह की तरह हिन्दी भी प्रवाह मान रही। क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द भी है, अंग्रेजी के शब्द भी आए, अरबी-फारसी के शब्द भी आए और हिन्दी में उन सभी को अंगीकार कर लिया। हिन्दी की अनेक बोलियाँ (उपभाषाएँ) हैं। इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना भी हुई है। ऐसी बोलियों में ब्रजभाषा और अवधी प्रमुख हैं। ये बोलियाँ हिन्दी की विविधता हैं और उसकी शक्ति भी। वे हिन्दी की जड़ों को गहरा बनाती हैं। हिन्दी की बोलियाँ और उन बोलियों की उपबोलियाँ हैं जो न केवल अपने में एक बड़ी परंपरा, इतिहास, सभ्यता को समेटे हुए हैं वरन स्वतंत्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के खिलाफ भी उसका रचना संसार सचेत है।[4]
हिन्दी की बोलियों में प्रमुख हैं- अवधी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, भोजपुरी, हरयाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, झारखंडी, कुमाउँनी, मगही आदि। किन्तु हिंदी के मुख्य दो भेद हैं - पश्चिमी हिंदी तथा पूर्वी हिंदी। इन भाषाओं के शब्द और मुहावरे हिन्दी में आए और लोगों ने उन मुहावरों को अपना लिया। हिन्दी में मिलकर ये मुहावरे भी हिन्दी के हो गए। इसीलिए हिन्दी का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न मिलता है। उत्तरप्रदेश में हिन्दी के जैसे मुहावरे प्रचलित है वैसे मुहावरे राजस्थान में कम चलन में है। राजस्थान में जैसे शब्द आम तौर पर उपयोग में लाए जाते है वैसे शब्द हिमाचल प्रदेश में नहीं लाए है। यहीं विविधता हिन्दी की शक्ति भी है और कमजोरी भी। विशाल भारत देश में ही जब हिन्दी के इतने स्वरूप प्रचलित है, तब अनिवासी भारतीयों में उसका स्वरूप अलग होना स्वाभाविक ही है। अनिवासी भारतीयों ने हिन्दी मेंं अंग्रेजी के साथ-साथ प्रेंâच, स्पेनिश, जर्मन, पोर्तुगीस आदि भाषाओं के शब्द भी अपनी सुविधा से समाविष्ट कर लिए है। इन सब कारणों से हिन्दी एक ऐसी भाषा बन गई जिसका विशाल शब्द संसार यह भाषा अनेक बोलियों और उप बोलियों की कहावतों और मुहावरों से संपन्न है।
हिन्दी शब्दावली में मुख्य रूप से दो वर्ग हैं-
तत्सम शब्द- ये वो शब्द हैं जिनको संस्कृत से जस का तस अपना लिया गया है जैसे अग्नि, दुग्ध दन्त, मुख।
तद्भव शब्द- ये वो शब्द हैं जिनका जन्म संस्कृत या प्राकृत में हुआ था, लेकिन उनमें काफ़ी ऐतिहासिक बदलाव आया है। जैसे— आग, दूध, दाँत, मुँह।
इसके अतिरिक्त हिन्दी में कुछ देशज शब्द भी हैं। देशज यानी - 'जो देश में ही उपजा या बना हो'। जो न तो विदेशी हो और न किसी दूसरी भाषा के शब्द से बना है। ऐसा शब्द जो न संस्कृत हो, न संस्कृत का अपभ्रंश हो और न किसी दूसरी भाषा के शब्द से बना हो, बल्कि किसी प्रदेश के लोगों ने बोल-चाल में जों ही बना लिया हो। जैसे- खटिया, लुटिया। इसके अलावा हिन्दी में कई शब्द अरबी, फ़ारसी, तुर्की, अंग्रेज़ी आदि से भी आये हैं। इन्हें विदेशी शब्द कह सकते हैं।
जिस हिन्दी में अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी के शब्द लगभग पूरी तरह से हटा कर तत्सम शब्दों को ही प्रयोग में लाया जाता है, उसे "शुद्ध हिन्दी" कहते हैं।
हिन्दी में इंटरनेट के प्रादुर्भाव के साथ ही हिन्दी के मानकीकरण पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा। देवनागरी लिपि के कारण इसमें कुछ बाधाएं थीं तो कुछ सुविधाएँ भी . इसमें फॉण्ट की समस्या प्रमुख थी.
रघु नामक युनिकोड फॉण्ट प्रो.रघुनाथ कृष्ण ने विण्डोज के लिए तैयार किए.हरिराम पंसारी(इण्डिक कंप्युटिग),अभिषेक और डॉ.श्वेता चौधरी(हिंदवी सिस्टम),अलोका कुमार(देवनागरी नेट),कुलप्रीत सिंह(शून्य इन),रवि रतमाली(लिनक्स)विनाय जैन(हाइट्रॉस)ऐसे अनेक नाम है.जिनके कारण हिंदी भाषा का संगणकीय प्रणाली में विकास हुआ. ऐसे अनेक ब्लॉग है,सिस्टमस हैं,सॉफ्ट्वेअरर्स हैं जो आज मानक हिंदी वर्तनी का संगणकीय प्रणाली में प्रयोग कर रहें है. “विंडीक यह एक सॉफ्टवेयर प्रोग्राम है, जो प्रयोग में बेहद आसान है.इस में अंग्रेजी के अलावा हिंदी,तमिल,गुजराती और मराठी में काम किया जा सकता है.यह बहुभाषी स्प्रेड्सीट अनुप्रयोग है,जिसमें आप भारतीय भाषाओं में व्यावसायिक आंकडों को व्यवस्थित कर सकते है, व्यावसायिक उपयोग के दस्तावेज भारतीय भाषाओं में बना सकते है. ”6 कहना आवश्यक नहीं कि कंप्युटिग हिंदी में अनेक सुविधाएँ उपलब्ध होने के कारण हिंदी की संगणकीय प्रणाली में लोकप्रियता तथा संभावनाएँ बढ रही है.माइक्रोसॉफ्टऑफिस हिंदी में जारी करने के कारण मानक हिंदी वर्तनी का विकास संगणकीय प्रणाली में और अधिक गतिशील बना.
वर्तमान में हिंदी का मानका रूप ही संगणक प्रणाली में दृष्टिगोचार होता है.डॉस, इस्की,इनस्र्किप्ट कुंजीपटल के साथ - साथ युनिकोड, संपूर्ण भारतीय भाषी साफ्टवेयर,लीप ऑफिस2000,डायनैमिक फॉन्ट,हिंदी लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम,विण्डोज की एक्स.पी. ,विस्ता संस्कारण,श्रुतलेखन सॉफ्टवेयर,गुगल ने तो अनेक सुविधाएँ हिंदी में उपलब्ध करायी.वर्तमानकालीन संगणकीय हिंदी भाषा का अध्ययन करने से पता चलता है कि इसमें अनेक त्रुटियॉं है लेकिन मानक हिंदी वर्तनी का प्रयोग दिन- ब- दिन सही तरीके से हो रहा है.इसे मानना होगा. हिंदी की संगणकीय प्रणाली में लोकप्रियता तथा संभावनाएँ बढ रही है.माइक्रोसॉफ्टऑफिस हिंदी में जारी करने के कारण मानक हिंदी वर्तनी का विकास संगणकीय प्रणाली में और अधिक गतिशील बना.वैश्वीकरण के इस दौर में हिंदी भाषा ‘बाजार’से अछूती नहीं रही है.बाजारवाद के इस दौर में हिंदी अपना अलग वैश्वीकमंच तैयार कर आने वाले दशक में मानक हिंदी वर्तनी का विकसनशील संगणकीय परिदृश्य संपूर्णतः विकसित होगा. इस में दो राय नहीं.
न्दी कम्प्यूटरी, हिन्दी टाइपिंग, कम्प्यूटर और हिन्दी, हिन्दी कम्प्यूटिंग का इतिहास, मोबाइल फोन में हिन्दी समर्थन और अन्तरजाल पर हिन्दी के उपकरण (सॉफ्टवेयर)
कम्प्यूटर और इन्टरनेट ने पिछ्ले वर्षों मे विश्व मे सूचना क्रांति ला दी है। आज कोई भी भाषा कम्प्यूटर (तथा कम्प्यूटर सदृश अन्य उपकरणों) से दूर रहकर लोगों से जुड़ी नही रह सकती। कम्प्यूटर के विकास के आरम्भिक काल में अंग्रेजी को छोडकर विश्व की अन्य भाषाओं के कम्प्यूटर पर प्रयोग की दिशा में बहुत कम ध्यान दिया गया जिससे कारण सामान्य लोगों में यह गलत धारणा फैल गयी कि कम्प्यूटर अंग्रेजी के सिवा किसी दूसरी भाषा (लिपि) में काम ही नही कर सकता। किन्तु यूनिकोड (Unicode) के पदार्पण के बाद स्थिति बहुत तेजी से बदल गयी।
इस समय हिन्दी में सजाल (websites), चिट्ठे (Blogs), विपत्र (email), गपशप (chat), खोज (web-search), सरल मोबाइल सन्देश (SMS) तथा अन्य हिन्दी सामग्री उपलब्ध हैं। इस समयअन्तरजाल पर हिन्दी में संगणन के संसाधनों की भी भरमार है और नित नये कम्प्यूटिंग उपकरण आते जा रहे हैं। लोगों मे इनके बारे में जानकारी देकर जागरूकता पैदा करने की जरूरत है ताकि अधिकाधिक लोग कम्प्यूटर पर हिन्दी का प्रयोग करते हुए अपना, हिन्दी का और पूरे हिन्दी समाज का विकास करें।
देवनागरी लिपि आधारित अन्य भारतीय भाषाओं जैसे कि बोडो, डोगरी, कोंकणी, मैथिली, मराठी, नेपाली और सिंधी आदि के साथ भी यही बात थी। । मानक हिंदी से संबंधित ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनके उत्तर किसी पुस्तक में नहीं मिल सकते हैं। भाषा गतिशील होती है और बदलती सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों के साथ भाषा का स्वरूप भी बदलता रहता है। अनुवादकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे भाषा के मानक रूप का प्रयोग करें, मगर ऐसा करना हमेशा आसान नहीं होता है। दिक्कत तो तब आती है जब एक शब्द के अनेक रूप प्रचलित होते हैं और हमारे लिए उस शब्द का "मानक" रूप चुनना लगभग असंभव हो जाता है। कई बार व्याकरण और विरामादि चिह्नों के प्रयोग को लेकर भी मतैक्य नहीं हो पाता है। इंटरनेट के विकास के साथ ही इसके व्यावसायिक पक्ष पर जोर दिया जाने लगा। जब व्यावसायिक पक्ष प्रमुख हो गए तब यह जरूरी हो गया था कि उससे अधिक से अधिक मुनाफा कमाया जाए। इसलिए इंटरनेट का विस्तार विकसित देशों में ज्यादा तेजी से किया गया। इंटरनेट की सारी खोजें, सभी तकनीकी विकास उन देशों की ओर प्रवृत्त हो गए जो पहले से ही विकसित थे।
आज अंग्रेजी भाषा के 58.4 प्रतिशत लोगों तक इंटरनेट की पहुंच है, जबकि हिन्दी में यह संख्या बहुत ही कम है। यह संख्या इतनी कम है कि अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद तीसरी सबसे बड़ी भाषा होते हुए भी हिन्दी इंटरनेट की 10 प्रमुख भाषाओं में शामिल नहीं है।
भारत में विकास के बढ़ते कदम और हिन्दी भाषी समाज की सक्षम आर्थिक स्थिति के आगे इंटरनेट प्रदाताओं को यह लगने लगा कि अगर विशाल हिन्दी भाषी समाज इंटरनेट को अपनाएगा, तो उनका कारोबार और तेजी से बढ़ेगा। देवनागरी लिपि आधारित अन्य भारतीय भाषाओं जैसे कि बोडो, डोगरी, कोंकणी, मैथिली, मराठी, नेपाली और सिंधी आदि में भी इस डोमेन का उपयोग किया जा सकता है।गूगल के अनुसार भारत में अंग्रेजी भाषा समझने वालों की संख्या करीब २० करोड़ है और इनमें से ज्यादातर लोग इंटरनेट से जुड़ चुके है। लगभग 16 प्रतिशत अंग्रेजी के जानकार होने के बावजूद भी इंटरनेट पर मौजूद 55.8 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में है। अनुमान है कि पूरी दुनिया में 21 प्रतिशत लोग ही हिन्दी समझ सकते है। इंटरनेट प्रदाताओं को लगता है कि इस भाषाई समस्या के कारण उनका कारोबार थम सा गया है। यह हालात तब है जब अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा मानने वाले लोग केवल पांच प्रतिशत है।
इंटरनेट पर हिन्दी को महत्वूर्ण स्थान देने की कोशिश इसलिए जरूरी है कि इसके बिना इंटरनेट प्रदाताओं को कारोबार और फल पूâल नहीं सकता, लेकिन उनके सामने समस्या है हिन्दी के ही मानकीकरण की। तकनीकी चुनौतियां अपने सामने है, साथ ही भाषा के मानकीकरण की चुनौती भी मुंह बाये खड़ी है, क्योंकि जैसी भाषा लोग जोधपुर में बोलते है, वैसी भाषा मुजफ्फरपुर में नहीं बोलते। जिन शब्दों और मुहावरों का इस्तेमाल इंदौर में होता है जरूरी नहीं कि वैसे ही मुहावरें नागपुर में प्रचलित हो। इंटरनेट को हिन्दी के क्षेत्रों में लोकप्रिय बनाने के लिए मानकीकरण की जो कोशिश की जा रही है। उसमे हिन्दी की विविधता में और स्थानीय स्वरूप को पीछे छोड़ दिया गया है और एक ऐसी भाषा गढ़ने की कोशिश की जा रही है जो सभी के लिए सहज और सरल हो। जिसे कोई अनिवासी भारतीय भी आसानी से पढ़ और समझ सवेंâ। इस भाषा में शब्दों का लालित्य और भाषा की रवानी से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसकी संप्रेषण की क्षमता। क्योंकि इंटरनेट की हिन्दी वैश्विक हिन्दी है। अगर हिन्दी के क्लिष्ट शब्द आए तो उन शब्दों को किसी भी दूसरी भाषा में लिखने में कोई संकोच नहीं किया जाए। भारत में ही 40 करोड़ से ज्यादा ऐसे लोग है जो अंग्रेजी के बजाय हिन्दी आसानी से समझते है और उससे अपनत्व भी रखते है। इन 40 करोड़ लोगों के बीच इंटरनेट को लोकप्रिय बनाने का सबसे अच्छा तरीका उनकी पसंद विषय वस्तु उनकी भाषा में उपलब्ध कराना। पिछले चार वर्षों में भारत के जीडीपी में इंटरनेट का योगदान तीस अरब डॉलर से बढ़कर 100 अरब डॉलर हो गया है। आगामी तीन वर्षों में भारत में दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा इंटरनेट के उपभोक्ता होंगे और वे हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषाओं का उपयोग करेंगे। हिन्दी में सर्च इंजन बनाने की कोशिशें भी की गई, लेकिन उनके लिए जितना बड़ा निवेश जरूरी था, वह नहीं किया गया। हिन्दी के इन सर्च इंजन में भारत की स्थानीयता को ध्यान में रखा गया। अब जो तकनीके उपयोग मेंं लाई जा रही है। उसके अनुसार इंटरनेट का उपयोग करने के लिए किसी भी भाषा को जानने की अनिवार्यता नहीं रहेगी। गूगल की स्पीच रेकग्निशन तकनीक पर आधारित वाइस सर्च शुरू हो गई है और यह आशा है कि इस तकनीक के बाद वे लोग भी इंटरनेट को अपनाएंगे जो अंग्रेजी नहीं जानते।
इंटरनेट का कारोबार करने वालों के लिए हिन्दी एक बाजार मात्र है। उन्हें हिन्दी के मानकीयकरण या मौलिकता से कोई मतलब नहीं है। हिन्दी की शुद्धता और अशुद्धता भी उनके लिए अर्र्थहीन है। हिन्दी उनके लिए एक बाजार है। इसीलिए गूगल ने हिन्दी वेब.कॉम नाम की सेवा शुरू की है, जिसका उद्देश्य है हिन्दी में उपलब्ध सम्पूर्ण सामग्री को एक ही स्थान पर ले आना। लक्ष्य है कि 2017 तक तीस करोड़ लोगों को इंटरनेट से जोड़ना। चाहे वे स्मार्ट फोन से जुड़े या टेबलाइट के माध्यम से। इंटरनेट से हिन्दी का मानकीकरण थोड़ा ही सही है, पर कुछ तो हुआ। हिन्दी के मानकीकरण के साथ ही हिन्दी की मौलिकता और विविधता बनी रहे और उसका विस्तार हो, इसके लिए हिन्दी के विद्यार्थियों शिक्षकों और कार्यकर्ताओं को ही कार्य करना होगा, अगर वे इंटरनेट पर सही हिन्दी को महत्व देंगे तभी हिन्दी सही स्वरूप में आगे बढ़ेगी अन्यथा हिन्दी लोकप्रिय भले ही हो जाए इंटरनेट के उपभोक्ताओं की पसंद में महत्वपूर्ण स्थान पा लें अपना मूल रूप नहीं बचा पाएगी।
कॉपीराइट © 2015 प्रकाश हिन्दुस्तानी
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