Saturday, November 02, 2013

एक लाइन लिखने की ज़िम्मेदारी

वीकेंड पोस्ट के 02 नवम्बर  2013 के अंक में  मेरा कॉलम

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इस देश में अधिकांश लोगों के सिर पर बड़ी भारी ज़िम्मेदारी है। सिर्फ एक लाइन लिखवाने  की ज़िम्मेदारी। बस, एक लाइन लिखवा  दो, हो गई  ज़िम्मेदारी  ख़त्म !  यही स्टाइल है हमारा।  काम कितना भी बड़ा और महत्वपूर्ण हो, पल्ला झाड़ने का ये तरीका हमारी जीवन शैली बन चुका है। हर जगह आपको इसका नमूना देखने को मिलेगा :

--''यात्री अपने सामान की सुरक्षा के लिए खुद जवाबदार होगा''. लक्ज़री बसों तक में लिखा होता है. सामान को बस का कंडक्टर छत पर या नीचे बनी डिक्की में रखवा  देता है और यात्री बैठता है बस के भीतर।  अब वह कैसे संभालेगा सामान? पर लिख दिया तो लिख दिया और मुक्त हो गए सामान की सुरक्षा की जवाबदारी से. 

--''वाहन  की सुरक्षा चालक खुद करे.'' यह ब्रह्मवाक्य भी तमाम इमारतों के बाहर लिखा दिखता है। आप भले ही किसी काम से उस बिल्डिंग में गए हों, वहां चौकीदार  हो, उसने आपको टोकन दिया हो, पर ज़िम्मेदारी आपकी ही है. बिल्डिंग के मैनेजमेंट की, चौकीदार की कोई ज़िम्मेदारी नहीं। 

--''टूट-फूट की हमारी कोई जवाबदारी नहीं।'' यह अनमोल वचन भी यातायात पुलिस की 'रिकवरी' गाड़ियों पर लिखा होता है. यानी यातायात पुलिस का काम केवल चालान बनाना (और वसूली यानी 'रिकवरी' करना) ही है. पार्किंग की जगह पर अतिक्रमण क्या वाहन चालक हटवाएगा?  सड़कों से आवारा ढोर हटाने की नगर निगम की कोई ज़िम्मेदारी  नहीं?

--''पाठक इस समाचार पत्र में छपे विज्ञापनों की सत्यता की पड़ताल के बाद ही  कोई निर्णय करे, इस पर हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी।'' आजकल अखबारों में यह भी छपने लगा है। पहले तो मुझे लगा कि  शायद प्रिंटिंग की त्रुटि हो गई है और खबरों के बजाय विज्ञापन छप  गया है, होना भी यही चाहिए था क्योंकि आजकल अखबारों में जैसी खबरें छप  रही हैं, उससे तो यही लगता है. पर जब यही सूचना हर पेज पर छपी देखी  तो सवाल उठा कि विज्ञापन तुम छापो, करोड़ों रुपये की कमाई तुम करो और पुष्टि हर करें।  अखबार खरीदें भी और पढ़ने की यातना भी झेलें और विज्ञापनों  की सच्चाई की पड़ताल भी हम ही करें। …तो फिर आप क्या करोगे?

इलाज कराने अस्पताल में जाओ तो वहाँ इलाज के पहले दो काम कराये जाते हैं : 1.  इलाज के पैकेज का एडवान्स जमा और 2.  इलाज का डिक्लेयरेशन , जिस पर लिखा होता है कि अगर मरीज़ खुदा न खास्ता, खुदा  को प्यारा हो जाए जो इस अस्पताल के डॉक्टरों की, स्टाफ की, मालिकों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। जान मरीज़ की जोखिम में, लाखों चुकाएगा वह, तकलीफ भी भोगेगा वही और उसके घरवाले, लेकिन मोटी वसूली के बाद भी ज़िम्मेदारी अस्पतालवालों की नहीं। 

इस देश में सारी की सारी ज़िम्मेदारी हम नागरिकों की है. शुक्र इसी बात का है कि पुलिस थानों में जो भी होता हो, यह लिखने का चलन नहीं आया है  कि आपकी ज़िन्दगी की ज़िम्मेदारी आपकी खुद की है. स्कूलों-कॉलेजों में अभी ये लिखना बाकी है कि यहाँ आकर पढ़ना आप ही को है, हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं। …और  हाँ, नोटों पर अभी यह नहीं लिखा जा रहा है कि रिश्वत लेना और देना अपराध है, अपनी जोखिम से ही आप ये काम करें। 

यानी इस देश का आम  नागरिक अगर आज दुखी, शोषित, पीड़ित, ठगाया हुआ, उपेक्षित, व्यथित और लुटा-पिटा है तो इसके लिए कोई और ज़िम्मेदार नहीं है. हर जगह तो लिखा है कि ज़िम्मेदारी उसी की है. 

--प्रकाश हिन्दुस्तानी 
(वीकेंड पोस्ट के 02 नवम्बर 2013 के अंक में  मेरा कॉलम)
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