Saturday, November 23, 2013

वीकेंड पोस्ट के 23  नवम्बर  2013 के अंक में  मेरा कॉलम



… बट,व्हा  शुड आइ डू ?


शिव खेड़ा  से लेकर  नरेन्द्र मोदी तक  एक ही डॉयलॉग सिखा हैं, --यस, आइ कैन, वी कैन। यानी मैं कर सकता हूँ, हम  कर सकते हैं। कर तो  सकते  हैं , पर मेरा सवाल है  … बट, व्हाय शुड आइ डू ? कर सकते हैं , पर करें क्यों? नहीं करना, हमारी मर्ज़ी ! करने को तो हम बहुत कुछ कर सकते हैं, पर करते हैं क्या? आप  कर सकते हो तो कर डालो , हमें नहीं करना, करना होता तो अब तक कर नहीं डालते?  हमारे पिताजी, दादाजी और  उनके भी पिताजी-दादाजी भी बहुत कुछ कर सकते थे, उन्होंने  करने लायक नहीं समझा होगा, नहीं किया;  तो हम भी नहीं ही करेंगे।

यस, आइ कैन , तो क्या कर डालूं ? मैं किसी की जेब काट सकता हूँ, किसी को चाकू मार  सकता हूँ, रास्ते चलती किसी स्त्री  को आँख मार सकता हूँ, फ़र्ज़ी वोट डाल सकता हूँ, चुनाव लड़ सकता हूँ , कार  से किसी को भी ठोक सकता हूँ , जेल जा सकता हूँ, गटर साफ़ कर सकता हूँ, हज़ारों अच्छे काम भी कर सकता हूँ और बुरे भी। यस, आइ कैन.… बट, क्यों करूँ ? इफ़ आइ कैन, डजन्ट मीन आइ शुड डू ! हर काम, जो आप कर सकते हो, करो क्यों ? नफा-नुकसान देखो, आगे-पीछे देखो, ऊँच-नीच देखो, अपना-पराया देखो;  फिर ये देखो कि उसको करने से झांकी कितनी जमती है, कैसी जमती है, और फिर आपको जमे तो कर डालो। 

कलाम साहब ने कहा, वे करते हैं; नरेन्द्र मोदी ने कहा, एक हद तक उन्होंने  भी कर दिखाया।  पर ये शिव खेड़ा जी और उनकी देखा-देखी हर कोई ये बात सिखाने  पर ही अड़ा  है कि तुम कर सकते हो, कर डालो।  शिव खेड़ा साहब, आप तो खड़े हुए थे ना चुनाव में , क्या तीर मार लिया? और क्या हुआ आपकी भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी का? आपके पिताजी बिजनेस मैं थे ना, आप भी बिजनेसमैन बन सकते थे , बन जाते।  बने क्यों नहीं? एलआईसी के एजेंट का काम भी किया था, और काम करते, अच्छा काम करते तो बन जाते वहाँ मैनेजर? तब कहते यस आइ कैन। खेड़ा जी 'यू कैन विन' की काफी सामग्री यहाँ वहाँ से ले सकते थे, तो उसके  ७३ प्रतिशत चुटकुले एवं सूक्तियाँ अमृत लाल की किताब 'एनफ़ इज़ एनफ़'  से ले  ली।  यू  कैन,एंड यू  डिड ! 

आम  हिन्दुस्तानी की तरह मेरा फार्मूला है --यस, आइ कैन , एंड ओनली समटाइम्स आइ डू।  कोई ज्ञान बांटने आता है तो मैं कहता हूँ, मैं हज़ारों काम कर सकता हूँ, पर करता नहीं, क्योंकि मैं हर काम के बारे में सोचता हूँ और सही लगता है तो करता हूँ।  यहाँ तक कि कई बार तो मैं यह भी सोचता हूँ कि इस बाते में सोचूँ या नहीं। 

आप क्या करते हैं?

--प्रकाश हिन्दुस्तानी 

(वीकेंड पोस्ट के 23 नवम्बर  2013 के अंक में  मेरा कॉलम)


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