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Tuesday, June 02, 2015

श्रीलंका में भारत के प्रति अदावत का रिश्ता

कोलंबो एयरपोर्ट पर उतरने के बाद ऐसा लगा नहीं कि किसी पराए देश की जमीन पर हैं। यह एहसास थोड़ी ही देर रहा। हमारे साथ ही उतरी दो महिला यात्रियों को कस्टम विभाग ने रोक लिया। वे दोनों महिलाएं तमिल भाषी थीं। हमारा वीसा और पासपोर्ट देखने के बाद हमें तो ग्रीन चैनल से जाने दिया गया, लेकिन हमारे ही एक साथी को कहा गया कि आपका वीसा नकली है। आपको फिर से आवेदन करना होगा और वीसा फीस भी देनी होगी। हमारे साथी अड़ गए और काफी हुज्जत के बाद एयरपोर्ट से बाहर आ सके। दरअसल वीसा की जांच कर रहे अधिकारी ने उनकी जन्मतिथि गलत फीड कर दी थी। जिससे उनकी यात्रा की पुष्टि नहीं हो पा रही थी। गलती सामने आने के बाद भी उस अधिकारी ने कोई खास विनम्रता नहीं दिखाई। कायदे से उसको माफी मांगनी चाहिए थी।


एयरपोर्ट के तमाम होर्डिंग्स और सूचनापट सिंहली में लिखे गए थे या अंग्रेजी में। हिन्दी का कहीं नामो निशान नहीं था। एयरपोर्ट पर बताया गया कि श्रीलंका में विदेशी यात्रियों से भुगतान या तो श्रीलंकाई रुपए में लिया जाता है या अमेरिकी डॉलर में। मेरे पास कुछ अमेरिकी डॉलर थे, तो मैंने उन्हें श्रीलंकाई रुपए में बदलने के लिए कहा। एक डॉलर के बदले 133 श्रीलंकाई रुपए मिले। भारत में एक डॉलर के 64 भारतीय रुपए मिल रहे थे। इस बात की राहत हुई कि श्रीलंका में भारतीय रुपये की कीमत दो गुने से भी ज्यादा है। कोलंबो एयरपोर्ट के रेस्तरां में भारतीय रुपया स्वीकार नहीं था। उन्हें डॉलर में भुगतान पसंद था। यहीं पता चला कि श्रीलंका के अंदर भारतीय रुपया  दुकानदार स्वीकार कर लेते है और उनकी कीमत श्रीलंकाई रुपए की तुलना में दोगुनी है।


कोलंबो एयरपोर्ट पर आने वाले यात्रियों में भारतीयों की तादाद अच्छी-खासी थी, लेकिन विदेशी उससे भी अधिक थे। चीनी, जापानी, जर्मन, फ्रेंच और यूरोपीय देशों के यात्री बड़ी संख्या में नजर आ रहे थे। मुझ जैसे व्यक्ति के लिए सिंहली और तमिल में अंतर करना मुश्किल था। मैं जिस आयोजन में जा रहा था उसके अतिथियों में भी श्रीलंकाई सरकार का कोई प्रतिनिधि नहीं था। मुझे बताया गया कि श्रीलंका में भारतीयों से सरकार काफी डरी हुई लगती है। उसकी निगाह में सभी भारतीय पृथकतावादी, तमिल ईलम के समर्थक है। श्रीलंका में गृह युद्ध खत्म हो चुका है और अब वहां विकास की बात हो रही है। नए राष्ट्रपति बनने के बाद मैत्रिपाल सिरिसेना ने पहली विदेश यात्रा भारत की ही की थी, लेकिन अभी भी भारतवासियों के प्रति उनके मन में कुछ शक तो है। पिछले तीस साल में श्रीलंका गृह युद्ध की स्थिति से निपटता रहा है और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति आतंकवाद की भेंट चढ़ चुके हैं। पिछले तीस साल में करीब 70 हजार तमिलों की हत्या आतंकवाद के नाम पर की गई। तमिलनाडु में जब से यह खुलेआम ऐलान हुआ है कि हम श्रीलंका में स्वतंत्र तमिल राष्ट्र बनाने में पूरा सहयोग करेंगे, श्रीलंका की सरकार लगातार भारत से दूरी बनाए हुए है। यह बात और है कि श्रीलंका कि एकता बनाए रखने के लिए भारत के अनेक सैनिकों ने अपना बलिदान किया था। जो पीस कीपिंग फोर्स का हिस्सा थे। श्रीलंका को लगता है कि भारत से आतंकी उनके देश में कभी भी प्रवेश कर सकते है और वहां की एकता को खतरा हो सकते है। श्रीलंका के पास कच्चा तिवु द्वीप के इलाके में खूब मछलियां मिलती है और भारतीय मछुआरे वहां मछलियां पकड़ने जाया करते है। लंबे समय तक यह द्वीप विवादों में रहा और आखिरकार भारत ने उस पर से अपना दावा छोड़ दिया। भारतीय मछुआरे यहां जाकर विश्राम कर सकते है, लेकिन यहां मछलियां नहीं पकड़ सकते।



श्रीलंका के पर्यटन केन्द्रों पर जाए तो ऐसा लगता है मानो यूरोप के किसी देश में आए हो। ऐसे देश में जहां के लोग भारत जैसे ही दिखते है, लेकिन वास्तव में है नहीं। श्रीलंका के तमाम होटल यूरोपीय पर्यटकों को लुभाने में कोई कमी नहीं छोड़ते है। उन्हें शायद डॉलर का ज्यादा मोह है। होटलों की सभी सेवाएं यूरोप के पर्यटकों को ध्यान में रखकर तय की गई है। बेहद महंगी और औसत दर्जे की। कैंडी के होटल में मैंने अपनी तीन कमीज ड्रायक्लीन के लिए दी। जिनका बिल आया 155 रुपए प्रति शर्ट। माना की श्रीलंका के रूपए की कीमत भारतीय रुपए से आधी है, लेकिन फिर भी यह एक डॉलर से अधिक ही होती है। पानी की आधा लीटर की बोतल सौ रुपए से कम की नहीं। एक कोल्डड्रिंक की बोतल 150 रुपए की। ऐसा लगा मानो उन्हें भारतीय पर्यटकों में कोई रुचि नहीं है।

इस बात की पुष्टि तब हुई जब हमने अपने गाइड से कहा कि हमें अशोक वाटिका और सीता वाटिका देखना है। गाइड महोदय लगे हीला हवाला करने। वो खुद ईसाई थे, लेकिन गाइड का यह काम नहीं है कि वह अपनी राय किसी पर थोपे। गाइड ने कहा कि वहां देखने लायक कुछ है नहीं। आप वहां जाओगे तो निराश ही होओगे। हमने कहा कि हमें जाना ही है, तब उसने कहा कि अगर आप अशोक वाटिका और सीता वाटिका देखने जाएंगे तो आप बहुत सी जगहें नहीं देख पाएंगे। हमने कहा कि हमें तो वहां जाना ही जाना है। बड़े हताश मन से वह हमें सीता वाटिका और अशोक वाटिका लेकर गए। वहां रामायण कालीन इन धार्मिक स्थानों की दशा बहुत ही खराब थी। सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं। पर्यटकों के लिए कोई सूचना नहीं, पर्यटकों के लिए कोई सुविधा भी नहीं। सीधा सा ख्याल आया कि इन स्थानों को प्रचारित करके श्रीलंका करोड़ों पर्यटकों को बुलावा दे सकता है, लेकिन लगता है कि श्रीलंकाई सरकार के लिए हर भारतीय पृथकतावादी तमिल ही है।


श्रीलंका के भ्रमण में जगह-जगह चीन के सहयोग से बनी इमारतें नजर आ जाती है। भारत की रुचि श्रीलंका में दो बातों पर केन्द्रित है। पहली तो यह कि वहां रहने वाले भारतीय मूल तमिलों के अधिकारों की रक्षा हो और दूसरा भारत की सीमाओं पर कोई खतरा न मंडराए। श्रीलंका की सरकार ने भारत के साथ अपने संबंधों का उपयोग रणनीति के तौर पर किया। भारत के निवेश को कम प्राथमिकता दी और चीनी निवेश को बढ़ावा दिया। भारत श्रीलंका को बहुत बड़ी आर्थिक मदद देता आया है, लेकिन श्रीलंका चीन की गोदी में जाकर बैठ जाता है। भारत ने हमेशा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी श्रीलंका का साथ दिया, लेकिन श्रीलंका इतना वफादार नहीं रहा। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी श्रीलंका का यहीं रवैया जारी है और इसी के चलते उसने श्रीलंका बंदरगाह पर चीनी परमाणु पनडुब्बी को ठहरने की अनुमति दे दी थी।

श्रीलंकाई सरकार का चाहे जो रवैया हो, वहां के नागरिकों को भारतीयों से कोई शिकायत नहीं है। वे अपने आप को भारतीयों के ज्यादा करीब पाते है। जिस होटल में हम रुके थे, वहां भारतीय रुपया स्वीकार नहीं था, लेकिन डिनर के वक्त वहां लाइव म्युजिक के दौरान चार गायकों ने डेढ़ घंटे तक हिन्दी फिल्मी गाने सुनाकर हमारा दिल जीत लिया। होटल के कर्मचारी हमसे हिन्दी में ही बात करते। जब हम पूछते कि क्या आप भी भारत से है तो सभी एक सुर में यह कहना था कि हमने हिन्दी दुबई में सीखी है। पता नहीं वे भारत आए भी होंगे या नहीं। अगर वे आए भी होंगे कि वे यह कहने में सकुचाते हैं कि उनके भारत से संबंध हैं।

नोगेम्बो समुद्र तट पर एक छोटी सी चाय की दुकान में जब मैं चाय पीने गया तब वहां भारतीय ढाबों की तरह चाय उपलब्ध थी। इतना ही नहीं आलू बड़े, इडली, समोसे आदि भी उपलब्ध थे। चाय बना रहे व्यक्ति से हमने पूछा कि आप कहां से है तो उसने कहा कि मैं नेपाल से हूं। उसके हाव-भाव शक्ल सूरत कहीं से भी यह नहीं लग रहा था कि वह नेपाल से श्रीलंका गया होगा। बाद में मुझे पता चला कि श्रीलंका मे बड़ी संख्या में पाकिस्तानी और बांग्लादेशी अवैध रूप से रह रहे हैं। कुछ इलाके तो भारत के बिहार और उत्तरप्रदेश के किसी गांव-कस्बे की तरह नजर आते है। थोड़ी-थोड़ी दूर पर मस्जिदें और दरगाह नजर आती है। बुर्का पहने महिलाएं काम पर जाती हुई नजर आ जाती हैं। श्रीलंका के स्थानीय सिंहली लोगों से बात की तो उनका कहना था कि वे इन मुस्लिम समुदाय के लोगों से घुलना-मिलना पसंद नहीं करते। इन लोगों से उन्हें असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती है।

एक निकटवर्ती पड़ोसी देश होने के नाते श्रीलंका में हमें जितना अपनत्व लगता है उतना अपनत्व वहां जाकर महसूस नहीं हुआ। यह अपनत्व नेपाल और भूटान में साफ नजर आता है। श्रीलंका में लगता है कि हम किसी अजनबी देश में है, जहां के लोग हम जैसे नजर आते है, लेकिन हैं नहीं।
कॉपीराइट © 2015 प्रकाश हिन्दुस्तानी

श्रीलंका में डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी सम्मानित

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कोलम्बो (श्री लंका) के कॉनकॉर्ड ग्रैंड होटल में 25 मई को हुए कार्यक्रम में प्रकाश हिन्दुस्तानी को ब्लॉग पर श्रेष्ठ समसामयिक लेखन के लिए 11,000 रूपए, प्रशस्ति पत्र, अंग वस्त्रम् और श्रीफल से सम्मानित किया गया।प्रकाश हिन्दुस्तानी को सम्मानित करते हुए श्रीलंका के सीनियर ड्रामेटिस्ट सोमरत्न विठाना, उत्तरप्रदेश के पूर्व मंत्री नकुल दुबे और आयोजन समिति के के के यादव। प्रकाश हिन्दुस्तानी  पांचवे इंटरनेशनल ब्लॉगर्स सम्मलेन के मुख्य सत्र के मुख्य वक्ता भी थे, उन्होंने सृजनात्मक साहित्य और ब्लॉग लेखन पर भाषण दिया
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पांचवे इंटरनेशनल ब्लॉगर्स सम्मलेन में  डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी  का भाषण 

सृजनात्मक साहित्य में हिन्दी ब्लॉग का योगदान

मैथ्यू अर्नाल्ड ने कहा है पत्रकारिता जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य है, लेकिन मेरा कहना है कि ब्लॉगिंग सुविचारित और समयबद्ध साहित्य है। एक ऐसा साहित्य जो हर जगह उपलब्ध है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अभिव्यक्त किया गया साहित्य ब्लॉग साहित्य के रूप में सामने आ गया है। अब साहित्य को पढ़ने के लिए छपी हुई किताबों की निर्भरता खत्म हो गई है। त्रैमासिक, मासिक, साप्ताहिक और दैनिक अखबारों में भी अब साहित्य पढ़ने के लिए इंतजार करने की जरूरत नहीं। किताबों का वह दौर लगभग खत्म हो गया है, जब किताबों में गुलाब के फूल रखकर प्रेमी-प्रेमिका को भेजे जाते थे। अब यह बात अब केवल रोमांटिक कल्पना ही बची है। जिसकी मौत कगार पर है, लेकिन साहित्य हमेशा से ही सामूहिक प्रेम, बंधुत्व, भाईचारा और नई दिशाएं तलाशने तथा अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है। साहित्य के बिना जीवन सुना सा है। 


साहित्यकारों और साहित्य के पाठकों के लिए ब्लॉग एक अनमोल तोहफा है। अभिव्यक्ति का बेजोड़ हथियार। यहां अभिव्यक्ति के बाद भरपूर आत्मसंतोष मिलता है। ब्लॉगिंग के माध्यम से बेहतर लेखन भी संभव हो पाया है, क्योंकि लेखक खुद अपने आप को बार-बार सुधार सकता है। इसके साथ ही लेखन के क्षेत्र में नेटवर्किंग भी आसान हो गई है।

किसी भी सृजनात्मक ब्लॉगर के लिए अपने पाठकों के सामने वैश्विक सौहाद्र्र को बढ़ाना एक प्रमुख लक्ष्य होता है। इसके साथ ही उसका लक्ष्य होता है साहित्य के लिए नई जमीन तलाशना। हिन्दी में ब्लॉगिंग अंग्रेजी की तुलना में देरी से शुरू हुई। 2003 में हिन्दी का पहला ब्लॉग 9-2-11 सामने आया। 2007 में यूनिकोड के आगमन के बाद हिन्दी की ब्लॉगिंग में तेजी आई। आज हिन्दी में करीब 50 हजार ब्लॉग मौजूद है। खुशी की बात यह है कि इसमें से एक चौथाई ब्लॉगर्स महिलाएं है। 

ब्लॉगिंग की कुछ बेमिसाल खूबियां है, जिसके कारण सृजनात्मक साहित्यिक के सृजनकर्ता ब्लॉगिंग की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यहां विधा का चयन करने की पूरी छूट है। कहानी, कविता, व्यंग्य, निबंध, समीक्षा आदि में से रचनाकार कुछ भी चुन सकता है। यहां भाषा के बंधन से भी मुक्त साहित्य रचने की आजादी है। ब्लॉगर चाहे तो अपने ब्लॉग में एक से अधिक भाषा में सृजन कर सकता है। 


ब्लॉगिंग के माध्यम से साहित्य के सृजन में सबसे बड़ी सुविधा यह है कि यह मुक्ति का मार्ग है। साहित्य के ठेकेदारों से मुक्ति यहीं संभव है। यहां विषय चयन की पूरी आजादी है और शब्द सीमाओं का भी कोई बंधन नहीं है। महात्मा गांधी ने कहा था कि अगर आपको गलतियां करने की आजादी नहीं है, तो ऐसी आजादी बेमानी है। ब्लॉगिंग की दुनिया में आपको गलतियां करने की पूरी आजादी है। ब्लॉगिंग मानसिक दबाव से मुक्ति दिलाती है। यह अपने पाठकों तक तत्काल पहुंच कराती है। भौगोलिक सीमाओं से बाहर ब्लॉगिंग के जरिये आप दुनियाभर में कहीं भी पहुंच सकते है। 

ब्लॉगिंग के माध्यम से रचनाकार पूरी तरह आत्मनिर्भर होकर सृजन कर सकता है। क्योंकि वह यहां खुद ही लेखक, प्रकाशक और मुद्रक है। गूगल ऐडसेन्स से जोड़कर वह अपने ब्लॉग में धनोपार्जन भी कर सकता है। हालांकि अभी हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में विज्ञापनों का अच्छा प्रतिसाद नहीं मिल रहा है, लेकिन अनेक ब्लॉगर सीधे विज्ञापन दाताओं से संपर्क कर ठीक ठाक पारिश्रमिक पा रहे है। यह एक बहुत बड़ी शुरूआत है। 

सृजनात्मक साहित्य जगत में महिला ब्लॉगर्स की प्रेरणादायक उपस्थिति पूरे समाज को उत्साहित करने वाली है। ब्लॉगिंग के क्षेत्र में करीब एक चौथाई महिलाएं है और अधिकांश सृजनात्मक साहित्य रच रही है। मुझे यह बताते हुए खुशी है कि इस सत्र के बाद का सत्र महिला ब्लॉगर्स के लिए विशेष तौर पर समर्पित है। यहां हम जिन विशिष्ठ महिला ब्लागर से मिलेंगे उनमें आकांक्षा यादव, सुनीता प्रेम यादव, डॉ. सर्जना शर्मा, डॉ. रचना श्रीवास्तव, डॉ. अनिता श्रीवास्तव और डॉ. उर्मिला शुक्ल सहित अनेक प्रमुख महिला ब्लागर मौजूद हैं। यहां सभी का नाम लेना संभव नहीं हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति मात्र प्रेरित करने और आशा जगाने वाली है। 

 इस कार्यक्रम में हिन्दी साहित्य जगत के अनेक सितारें है जो ब्लॉगिंग के जरिए विश्व भर में अपनी पहचान बना चुके हैं। इसका काफी श्रेय श्री रवीन्द्र प्रभात को जाता है। हिन्दी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में एक आंदोलन तैयार करने और ब्लागर्स के लिए नई जमीन खोजने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वे भी बधाई के पात्र है। 

हिन्दी के साहित्यिक ब्लागर्स को सादर नमन करते हुए मैं उनके योगदान को रेखांकित करना चाहता हूं। यहां पर उपस्थित सर्वश्री रवीन्द्र प्रभात, कृष्णकुमार यादव, जीतेन्द्र दीक्षित, ललित शर्मा, सुनीता प्रेम यादव, आकांक्षा यादव जैसे प्रमुख हिन्दी ब्लॉगर्स की उपस्थिति में मैं उन हिन्दी साहित्य के ब्लॉगर्स कोे याद करना चाहता हूं, जिन्होंने अपनी साहित्यिक कृतियों को ब्लॉग के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने में अनूठा योगदान दिया है और साहित्य सृजन के लिए नई जमीन तोड़ी है। शायद ही कोई साहित्यकार हो, जो आज ब्लॉगिंग के क्षेत्र में न हो। कुछ ऐसे ब्लॉगर्स भी है, जिन्होंने साहित्यिक ब्लॉगिंग में विशेष कार्य किए है। उन सब के नाम यहां लेना संभव नहीं है। हो सकता है उनमें से कई नाम छूट गए हो और कई नाम इसलिए नहीं लिए जा सकते क्योंकि अगर वह सूची पढ़ी जाए तो उसमें घंटों बीत सकते है। मेरे ध्यान में उदय प्रकाश, अरुण आदित्य, मौलश्री, प्रभात रंजन, रमेश उपाध्याय, अशोक कुमार पाण्डेय, अरुण देव, देवेन्द्र कुमार देवेश, पंकज चतुर्वेदी, रचना, फिरदौस खान, शशांक द्विवेदी, अजय ब्रह्मात्मज, विभा रानी, शरद कोकास, कुमार अम्बुज, विवेक, अनुराग वत्स, महेश आलोक, गिरिश कुमार मौर्य, शशि भूषण, चन्दन, निलय उपाध्याय, अरविन्द श्रीवास्तव, कृष्णमोहन झा, प्रियंकर, शिखा वाष्र्णेय, अर्चना देव जैसे  अनेकानेक नाम बिना विचारें सामने आ रहे है। कबाड़खाना, जानकी पुल, परिकल्पना, समालोचना, हम कलम, समवादी, कलम, भोज पत्र, जनशब्द, आवाहन, अनहद नाद आदि ब्लॉग साहित्य सृजन में अपनी विशेष पहचान बना चुके है। मुझे मालूम है कि मैंने कुछ नाम ही लिए हैं। सभी तक पहुंच पाना संभव नहीं है। 

कोलंबो में आयोजित इस समारोह में आप सभी का हार्दिक धन्यवाद देते हुए शुभकामनाएं व्यक्त करना चाहता हूं कि साहित्य के क्षेत्र में आपका योगदान लगातार बना रहे। हिन्दी में ब्लॉगिंग भविष्य में और भी आसान और लोकप्रिय हो और ब्लॉगर्स के काले अक्सर दुधारू भैंस की तरह अर्थ प्राप्ति का माध्यम बने। 

आप सभी का धन्यवाद।