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Tuesday, May 19, 2015

फिलास्फी ऑफ ऐडक्वैट रिसोर्सेस

अमेरिकी डायरी के पन्ने (8)


कोई  भी देश केवल वहां के बंदरगाहों, हवाईअड्डों, राज मार्गों, इमारतों, संग्राहलयों और वहां की सम्पन्नता से नहीं बनता। देश बनता है वहां के लोगों से। अमेरिका में अगर कुछ विशेष है, तो उसके पीछे वहां के नागरिक है। एक ऐसा देश जिसका इतिहास पांच सौ साल से पुराना नहीं है, जहां दुनिया की सभी जातियों-प्रजातियों के लोग बहुतायत से हैं, जहां मानव की गरिमा सर्वोच्च है और श्रम का पूरा सम्मान है। ये सब चीजें अमेरिका को विशिष्ट होने का दर्जा देती है, लेकिन इससे बढ़कर भी कुछ बातें है, जिसके कारण अमेरिका, अमेरिका कहलाता है। (यहां मेरा आशय यूएसए से है)

अमेरिका में आप कहीं भी जाए, कितने भी दिन रुके वह आपको चमत्कृत जरूर करता है। अमेरिकियों की कुछ बातें बेहद आकर्षित करती है कि वे बहुत मेहनती हैं। अमेरिकी श्रम की गरिमा को पहचानते है। वहां समानता का बर्ताव आमतौर पर नजर आता है। (कहीं-कहीं श्वेत-अश्वेत के बीच असमानता की बातें भी आती हैं, लेकिन अब यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं बचा है)। इंग्लैण्ड के गोरे अंग्रेजों के मुकाबले अमेरिका के गोरे ज्यादा संवेदनशील लगते है। आमतौर पर अमेरिकी भीतर और बाहर से एक जैसे ही नजर आते हैं। उनके नैतिकता के पैमाने अलग हो सकते है, लेकिन उनकी संवेदनाओं का स्तर भी वैसा ही है जैसा भारतीयों का है। आप कहीं भी जाएं अमेरिकी आपका स्वागत ही करेंगे । छोटी सी काफी शॉप में भी जाइए, आपका स्वागत उतने ही जोश से होता है जैसा किसी बड़े समारोह में जाने पर होता है।
अमेरिका में हर चीज विशाल है। राज मार्ग है तो बेहद विशाल, शिक्षा संस्थान है तो बड़े-बड़े, इमारतें गगनचुंबी, शॉपिंग मॉल विशाल क्षेत्र में, कारें महंगी और बड़ी-बड़ी, आमतौर पर वहां रहने वालों के घर भी बड़े और आधुनिक हैं। आमतौर पर कहीं भी कोई भीड़ नहीं टूट पड़ती। आखिर ऐसा क्या है कि वहां के लोग कभी भी आक्रामक तरीके से न बात करते हैं, न व्यवहार। सबकुछ शालीन नजर आता है। वहां रहने वाले एक अनिवासी भारतीय से पूछा कि यहां कैसा लगता है? तो उसने कहा- ऐसा लगता है कि हम भी इनसान हैं। भारत में लगता था कि शायद हम कीड़े-मकोड़े हैं। भारत में कहीं भी जाओ, भीड़-भाड़, धक्का-मुक्की और पहले पाने की तड़प। मैंने पूछा ऐसा क्यों है? जवाब मिला- शायद वहां संसाधन कम है और उस पर भी उन संसाधनों का वितरण समान नहीं है। जो पैसे वाला है और रसूखदार है वहीं सारे संसाधनों पर कब्जा जमाने की ताक में रहता है।
अनिवासी भारतीय की बात सही लगी। अमेरिका में फिलास्फी ऑफ ऐडक्वैट रिसोर्सेस चलता है। हर व्यक्ति को यह पता है कि वहां संसाधनों की कमी नहीं है। जब भी वह चाहेंगे वह संसाधन उसे मिल जाएगा। भारत में लोगों की प्रमुख जिम्मेदारियां हैं- अच्छा घर, ठीक-ठाक कार, बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा की व्यवस्था, सेवा निवृत्ति पर गुजारे की व्यवस्था और सम्मानजनक जीवन। इन चीजों के लिए भारत में लोग गहरा संघर्ष करते है। करोड़ों भारतीयों के लिए घर एक सपना ही है। मध्यमवर्ग किसी तरह किश्तों पर गाड़ी लेता है और भुगतता रहता है। बच्चों की पढ़ाई की बात करें तो भारतीय महानगरों में स्कूल में प्रवेश एक बहुत बड़ी चुनौती है। बीमार होने पर लोगों के घर बिकना आम बात है और बुढ़ापे में भारतीयों को परजीवी बनकर रहना पड़ता है। सरकार नाम की चीज कहीं नजर नहीं आती।भारतीय हालात के विपरीत अमेरिका में मूलभूत चीजों के लिए संघर्ष बहुत कम है। घर और मकान पक्की नौकरी हो तो आराम से किश्तों पर मिल जाते हैं, बच्चों की पढ़ाई सरकार की जवाबदारी है। वृद्धों के लिए पेंशन की व्यवस्था है। चिकित्सा व्यवस्था सभी के लिए उपलब्ध है। खास बात यह है कि कागजों पर तो यह सभी सुविधाएं भारतीयों को भी है, लेकिन हालात ऐसे नहीं है। महानगरों में तो मध्यवर्गीय परिवार एक से अधिक बच्चे इसलिए पैदा नहीं कर पा रहे है, क्योंकि वे उनकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते। केवल सरकारी नौकरियों से रिटायर होने वाले लोग ही ठीक-ठाक पेंशन पाते है। बाकी लोग 250-300 रुपए पेंशन के हकदार है और वह भी साल-साल, छह-छह महीने में मिलती है। अमेरिका में लोगों को लगता है कि वहां की सरकार के पास पर्याप्त संसाधन है और उन्हें जीने के लिए उतना संघर्ष नहीं करना पड़ेगा। अगर सरकार जरूरी समझेगी तो उन्हें पर्याप्त मदद मिल ही जाएगी। इस सिद्धांत के चलते अमेरिकी नागरिक व्यवहार रूप में संतोष का भाव रखते हैं, जबकि हमें ‘जब आवे संतोष धन’ जैसे सिद्धांतों पर चलकर जीवन गुजारना पड़ता है।
ऐसा नहीं है कि अमेरिकी लोगों के सामने चुनौतियों नहीं हैं। हर अमेरिकी कर्ज से दबा है, हर अमेरिकी सरकारी करों के बोझ से दबा है, हर अमेरिकी को उसकी बीमें की किश्त परेशान करती है। आम अमेरिकियों की आय का बहुत बड़ा हिस्सा कर्ज की किश्तों, टैक्स और बीमे की किश्त देने में ही बीत जाती है। इसके बावजूद अमेरिकी शांत, संयत और अनुशासित नजर आते हैं।
एक ऐसा देश जिसका क्षेत्रफल भारत से तीन गुना से भी अधिक हो और आबादी लगभग एक चौथाई। उस देश में हर जगह एक जैसा व्यवस्थित इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना मजाक नहीं है। इस सबके पीछे अमेरिका के लोगों की कड़ी मेहनत साफ नजर आती है। 250-300 साल पहले जब भारत में राजा-महाराजा छोटी-छोटी बातों के लिए लड़ रहे थे, तब अमेरिका अपनी आधारभूत संरचना को तैयार करने के लिए काम कर रहा था। जब भारत जातिवाद और सांप्रदायिक उन्माद में उलझा था, अमेरिकियों के आगे अपने देश का विकास लक्ष्य रहा था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने अपने देश के दरवाजे पूरी दुनिया के लिए खोल दिए थे और सारी दुनिया के लोग अमेरिका जाकर बसने लगे थे। बाद में अमेरिका को अपनी नीति से हाथ खींचना पड़ा, क्योंकि वहां की सरकार को लगा कि उन लोगों का बोझ वह नहीं उठा पाएगी, जो बड़ी संख्या में बाहर से आकर दायित्व बन रहे है।
अमेरिका के राज मार्गों पर मैंने देखा कि सुबह पांच बजे से भारी यातायात उमड़ पड़ता है। एक नागरिक ने बताया कि यहां ट्रैफिक के पीक ऑवर्स सुबह 5 से और शाम 3 से 7 होते है। 8 बजे तक अधिकांश कार्यालय पूरी तरह गतिशील हो जाते है। कई दफ्तर तो सुबह 7 बजे से ही काम करने लगते है। 11 बजते-बजते लंच ब्रैक हो जाता है और फिर काम शुरू। काम करने के लिए लोग 100-100, 150-150 किलोमीटर दूर से आते है। आमतौर पर वे देर रात तक रुकना पसंद नहीं करते और निर्धारित समय पर घर लौट जाते है। रात 10 बजे तक बड़े-बड़े शहरों में सन्नाटा पसर जाता है। सड़कों पर कोई हायतौबा नहीं, कोई हांकिंग नहीं, नियमों की अवहेलना नहीं, लोग एक-दूसरे को पूरा सम्मान देते हुए गाड़ियां चलाते है। घर जाने की हर एक को जल्दी होती है, लेकिन यातायात नियमों की अवहेलना कहीं नजर नहीं आती। तीन हफ्ते की यात्रा के दौरान अमेरिका में कहीं भी ऐसी दुर्घटना देखना को नहीं मिली, जिसमें किसी व्यक्ति की जान गई हो या कोई गंभीर घायल हुआ हो।

भारत में हम समझते है कि हमारा काम केवल गंदगी फैलाना ही है और सफाई करना नगर निगम या ग्राम पंचायत का काम है। वहां की सफाई का माहौल देखकर भारत से जाने वाला शख्स भी सफाई के प्रति सजग हो जाता है। गंदगी फैलाने पर भारी जुर्माने का प्रावधान तो है ही, जुर्माना किया और वसूला भी जाता है। किसी को यह भ्रम नहीं है कि वह बड़ा आदमी है या ऊंची राजनीतिक पहुंच वाला शख्स है। कानून सबके लिए बराबर है, तो है। कानून की गिरफ्त में सब बराबर हैं। एक अमेरिकी ने भारतीय यातायात के बारे में कहा कि वहां कानून का पालन क्यों नहीं होता? अगर सलमान खान ने शराब पीकर गाड़ी चलाई और किसी को कुचला तो उसका केस 15 साल से क्यों लटका है? अगर उसने अपराध किया है तो सीधा जेल भेज दो और अगर अपराध नहीं किया है तो मुक्त करो ताकि वह भी चेन से जी सके।
मानव श्रम की गरिमा अमेरिका में देखने को मिलती है, जब बड़े से बड़ा आदमी भी अपना काम खुद करता नजर आता है। घरेलू नौकर और ड्रायवर वहां दुर्लभ हैं। घरों में बड़े से बड़े लोग भी अपना काम खुद ही करते है और अपनी गाड़ी भी खुद ही चलाते है, वहां उनकी गाड़ी के दरवाजे खोलने के लिए कोई आगे नहीं आता। विशालतम पार्किंग लाट्स में गाड़ी खड़ी करके एक-एक मील तक लोग पैदल चलते हैं। इसके बावजूद आम अमेरिकी मोटापे के शिकार है और वहां पांच-पांच सौ लोग एक साथ कसरत कर सके इतने बड़े-बड़े जिम भी देखने को मिले। पर्याप्तता के सिद्धांत के कारण ही शायद वहां लोग खूब जी भरकर खाते है।
किसी भी चीज का व्यावसायीकरण करना अमेरिकी खूब जानते है। वहां कोई भी सुविधा नि:शुल्क नहीं है। पार्किंग हर जगह पैसे देने पर ही उपलब्ध होती है। टोल टैक्स अधिकांश मार्गों पर है। जनसुविधाओं की कीमत अच्छी खासी है। आमतौर पर पार्किंग शुल्क घंटों के आधार पर होता है और प्रमुख शहरों में वह 5 डॉलर प्रति घंटे से अधिक भी है। कहीं-कहीं तो 10 डॉलर घंटा भी देना पड़ता है। किसी होटल में जाकर रुके तो होटल कमरे के अलावा कार की पार्किंग का पैसा भी अलग देना पड़ता है। राज मार्गों पर टोल टैक्स के अलावा विशेष लेन भी हैं। जिन पर कम भीड़ होती है, क्योंकि वे ज्यादा पैसा वसूल करते है। भारत में आमतौर पर लोग साक-सब्जी की दुकानों पर मोल-भाव करते है वहां सीधा मोल-भाव तो नहीं होता, लेकिन डिस्काउंट का चलन काफी है। मंदी की मार से निपटने के लिए एक पर एक फ्री का फॉर्मूला वहां खूब आजमाया जाता है। जहां कई भी अमेरिकियों के हित पर आघात पहुंचता है वे तत्काल एक हो जाते हैं। यह खूबी वहां रहने वाले अनिवासी भारतीयों में नजर नहीं आई। भारतीय समुदाय के लोग वहां भी पंजाबी, मलियाली, तेलुगु, गुजराती, बिहारी जैसे खांचों में बंटे हैं। वहां भी ब्राह्मण, जाट और जैन जातियों के संगठन नजर आते हैं। हम भारतीय भारत में भी एक नहीं होते और वहां जाकर भी एक होने में हमें कष्ट होता है। इसी कारण वहां सम्पन्न भारतीयों की हत्या के मामले भी हुए है।
एकाकीपन महसूस करने वाले भारतीय मूल के लोग भी अमेरिका छोड़कर वापस आना नहीं चाहते। उनकी पीड़ा यह है कि वे अब भारत को अपना नहीं सकते क्योंकि उन्हें और उनके बच्चों को वहां की सुविधाओं की आदत पड़ चुकी है। दूसरी तरफ उनमें से अधिकांश लोग अमेरिकी मुख्यधारा में समाहित नहीं हुए है और वहां भी वे अपना अलग समुदाय बनाकर रहना पसंद करते हैं। इन कारणों से वे अमेरिकियों में लोकप्रिय नहीं है। उनमें से अधिकांश की दिक्कत यह भी नजर आई कि जो लोग 20-25 साल पहले भारत छोड़कर गए थे उन्हें लगता है कि भारत अब भी वैसा ही देश है। 20-25 साल की भारत की तरक्की उनमें से कुछ ही लोगों ने देखी है और जब वे भारत आकर देखते है कि दिल्ली और मुंबई का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा किसी भी अमेरिकी हवाई अड्डे से ज्यादा आधुनिक और सुविधाजनक है और इसी तरह दिल्ली की मेट्रो ट्रेन न्यूयार्क की वाशिंगटन की मेट्रो की तुलना में ज्यादा अच्छी, सुविधाजनक और सस्ती है, तो उन्हें अचरज होता है। एक शख्स ने कहा कि अब हम भारत क्यों जाए, अब तो भारत ही अमेरिका हो चला है।

Saturday, May 16, 2015

प्रकृति का विशाल वालपेपर है नियाग्रा


अमेरिकी डायरी के पन्ने (7)



नियाग्रा वाटर फाल्स को दुनिया एक खूबसूरत चमत्कार की तरह देखती है। धरती का जीवंत वालपेपर। गजब की खूबसूरती। गजब की लोकेशन। गजब की व्यवस्थाएं। नियाग्रा नदी के ये झरने यूएसए और कनाडा की सीमाओं को बांटते है। एक तरफ अमेरिका है और दूसरी तरफ कनाडा। नियाग्रा वाटर वाल्स दुनिया के सबसे ऊंचे झरने नहीं है, लेकिन फिर भी ये दुनिया के सबसे लोकप्रिय पर्यटन केन्द्र है। करीब 15 लाख पर्यटक प्रतिवर्ष यहां आते है।


हनीमून मनाने वालों के लिए यह लोकप्रिय स्थान है और हर साल करीब 50 हजार जोड़े इस पर्यटन केन्द्र पर आकर यादगार वक्त बिताते है। कहा जाता है कि नेपोलियन के भाई जेरोम बोनापार्ट और उनकी पत्नी ने 1803 में इस स्थान पर हनीमून मनाया था उसके बाद ही यह जगह हनीमून मनाने वालों के लिए लोकप्रिय हो गई। ऐसा कहा जाता है कि लाखों करोड़ों साल पहले जब ग्लेशियर पिघलने लगे और पानी की बड़ी-बड़ी झीलें बनने लगी तो उस पानी ने प्रशांत महासागर तक जाने के लिए जो रास्ता चुना वह नियाग्रा नदी कहलाई। यह नदी जब आगे बढ़ी और झरनों के रूप में उसका पानी नीचे गिरने लगा तब यह दुनिया के सबसे खूबसूरत जल प्रपात में माना जाने लगा। दुनिया का सबसे ऊंचा जल प्रपात नियाग्रा से 15 गुना ऊंचा है, लेकिन जितना चौड़ा पाट यहां नदी का है और जिस तरह अर्धचन्द्राकार में नदी गिरती है वह शानदार है और इससे भी शानदार है इस जल प्रपात से हर एक मिनिट में गिरने वाला करीब 14 करोड़ लीटर पानी।


जब यह जल प्रपात नीचे गिरता है तब तीन प्रमुख झरने बनते है। उसमें से कनाडा की तरफ से गिरने वाला झरना करीब 173 फीट नीचे है और अमेरिका की तरफ गिरने वाला करीब 100 फीट। दिलचस्प बात यह है कि कनाडा की तरफ जो झरना गिरता है वह अर्धचन्द्राकार है जिसे घोड़े की नाल के आकार के कारण अंग्रेजी में होर्स शू फॉल कहा जाता है। नियाग्रा झरने के दोनों तरफ जो शहर है उनका नाम एक ही है। अमेरिका की तरफ वाला भी ओंटारियो और कनाडा की तरफ भी ओंटारियो। दो अलग देश होने के कारण एक ओंटारियो से दूसरे ओंटारियो जाना आसान नहीं। वीजा संबंधित दिक्कतें रास्ते में आती है। अगर किसी के पास दोनों देशों का वीजा है तो वो दोनों देशों से नियाग्रा की यात्रा कर सकता है। ऐसा कहा जाता है कि कनाडा की तरफ से नियाग्रा ज्यादा सुंदर दिखता है। मेरे पास कनाडा का वीजा नहीं था और अमेरिका के ओंटारियो से ही नियाग्रा का नजारा देखना पड़ा, लेकिन वह भी अच्छा खासा दिलचस्प था।

 नियाग्रा में रात का नजारा देखने और वहां के होटल में रात बिताने के बाद फिर सुबह-सुबह नियाग्रा देखने का लोभ रोकना आसान नहीं था। 13 अप्रैल 2015 को जब हम रात में नियाग्रा देखने के लिए रवाना होने वाले थे तभी जोरदार बारिश होने लगी। सस्ती सी बरसाती (5 डॉलर) खरीदने के बाद उसे ओढ़कर जब हम झरने तक पहुंचे तब बारिश थोड़ी धीमी हो चुकी थी, लेकिन तेज हवाओं ने हमारी बरसाती को प्रभावहीन बना दिया था। ठंड अच्छी खासी थी और ठिठुरते हुए नियाग्रा झरनों को देखना अपने आप में सुवूâन भरा था। जिस तरह से रात के वक्त नियाग्रा जल प्रपात पर रोशनी की व्यवस्था की गई थी वह अपने आप में यादगार थी। उसे देखकर लगा की अगर रात के वक्त नियाग्रा नहीं देखते तो कुछ छूट जाता। रंग-बिरंगी रोशनी में गिरते हुए पानी का नजारा ऐसा था मानो प्रकृति ने कोई बेहद विशाल वालपेपर हमारे लिए छोड़ दिया है। जब हम वहां पहुंचे तब लाइट एंड साउंड शो चल रहा था। बारिश के कारण हमने उस शो को देखना स्थगित रखा।


सुबह-सुबह होटल की खिड़की से बाहर का नजारा देखा तो मन प्रसन्न हो गया। सामने विशाल नियाग्रा नदी बहती हुई नजर आई। अप्रैल तक बर्फ पूरी तरह पिघल नहीं पाई थी। अमेरिका के तरफ से देखो तो झरना इसलिए विशिष्ट लगता था कि नियाग्रा नदी यहां झरने के बाद 90 डिग्री तक मुड़ जाती है। अमेरिका और कनाडा के बीच के जल प्रपातों के बीच जमीन का भी एक टुकड़ा है, जिसे बताया गया कि यह गोट आईलैण्ड है। गोट आईलैण्ड की तरफ भी एक छोटा सा झरना है। जिसे ब्राइडल वेल (दुल्हन के घूंघट की तरह) कहा जाता है। इसके बाद भी एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा है उसे लूना आईलैण्ड कहा जाता है। अमेरिका की तरफ से नियाग्रा झरने को देखो तो 90 डिग्री का विशाल झरना, फिर लूना आईलैण्ड, फिर ब्राइडल वेल के झरने और फिर गोट आईलैण्ड। इसके बाद का हिस्सा कनाडा में है।


नियाग्रा में जिस तरह पर्यटकों की भीड़ थी और थक्का-मुक्की तो नहीं हो रही थी, लेकिन हालात उससे कम भी नहीं थे। झरने की तरफ से पानी के बारीक कणों के कारण विशालकाय इन्द्रधनुष बन गए थे। हर कोई उन इन्द्रधनुषों के पास अपनी तस्वीर खिंचवाना चाहता था। ऐसा लग रहा था मानो विशाल झरने में एक जीवंत इन्द्रधनुष ने वालपेपर में और वृद्धि कर दी हो। दुनियाभर के पर्यटक यहां नजर आए। हर उम्र, रंग और आय वर्ग के। इसमें बड़ी भारी संख्या भारतीयों और चीनियों की भी थी। हम जिस बस में नियाग्रा गए थे उसका ड्रायवर भी चीनी था और हम पर्यटकों की गाइड भी एक चीनी युवती थी, जो ठीक से अंग्रेजी नहीं बोल पा रही थी, लेकिन जब वह चीनी भाषा में कमेंट्री करती तो वह ज्यादा अच्छी थी। उसकी एक ही चीज ने प्रभावित किया कि वह हर बात चार-चार बार कहती थी। मसलन अगर उसे कहना हो कि हम लोग सुबह 6.50 मिनिट पर मिलेंगे, तो वह
कहती थी मार्निंग  सिक्स फिफ्टी, सिक्स फिफ्टी फिर वह उसे दोहराती थी मार्निंग सिक्स फाइव ज़ीरो, सिक्स फाइव ज़ीरो। थोड़ी ही देर में हमने देखा कि उसने अपने बेग में से एक झंडा निकाला और दृष्टिहीनों के काम आने वाली छड़ी भी अपने बेग से निकाली और झंडा छड़ी में लगा दिया। उसका झंडा पीले रंग था। हमने देखा कि वहां पर्यटकों के बहुत सारे समूह थे और उन सबके गाइड कोई न कोई रंग का झंडा लिए थे। अधिकांश पर्यटक दलों में गाइड का काम युवतियां ही कर रही थीं, अपवाद स्वरूप ही युवक गाइड नजर आ रहे थे।

अप्रैल के दूसरे सप्ताह में भी जबरदस्त ठंड थी। तापमान 2 डिग्री सेल्सियस के आसपास था। वहां जाने के पहले अखबारों में खबर पढ़ी थी कि भारी ठंड के कारण नियाग्रा जल प्रपात जम गया था। बर्फ की बड़ी-बड़ी पहाड़नुमा चट्टानें नीचे जमी हुई थी। नदी के दोनों तरफ की बर्फ पिघली नहीं थी और सफेद चादर जैसी बन गई थी। 1848 में इतनी ज्यादा ठंड पड़ी थी कि पूरा नियाग्रा जल प्रपात ही जम गया था और नदी का पाट भी पूरी तरह से बर्फ बन गया था, जिस पर लोग चहलकर्मी कर रहे थे। 1911 में भी ऐसे ही बर्फ जमी थी। इस बार भीषण ठंड के कारण नियाग्रा जम गया था, लेकिन पानी की धाराएं नीचे से बह रही थी। हमें बताया गया कि अगर दिसंबर से फरवरी के बीच यहां आए तो यहां का नजारा अलग मिलेगा। चारों तरफ जमी हुई बर्फ सूर्य की रोशनी से चमकती है और अलग ही नजारा पेश करती है। रात को चांदनी इस स्थान को खूबसूरत बना देती है।

अमेरिका और कनाडा दोनों ही सम्पन्न देश है और उन्होंने नियाग्रा फॉल्स को एक बहुत बड़े कारोबार में तब्दील कर दिया है। दोनों ही तरफ गगनचुंबी इमारतें हैं, जिनमें से 95 प्रतिशत होटल है। ये होटल इस तरह बनाए गए हैं कि उनके कमरों की खिड़कियों से ही आप नियाग्रा जल प्रपात का नजारा देख सकते है। यानि आपको अपने होटल से बाहर निकलने की जरूरत ही नहीं है। एक गगनचुंबी होटल ने तो अपनी छत पर्यटकों के लिए खोल रखी है और वह वहां जाने का टिकिट बेचती है। यानि अगर आप उतनी ऊंचाई से झरना देखना चाहें तो अलग से पैसा दीजिए। अमेरिका और कनाडा के महंगे से महंगे होटल यहां उपलब्ध है। अगर आपके जेब में ज्यादा पैसे कूद रहे हों तो लाख डेढ़ लाख रुपए रोज का कमरा भी आपको मिल सकता है। सर्दी के दिनों में यानि दिसंबर से फरवरी के बीच यहां पर्यटक कम आते हैं तो यह होटल वाले भी सब्जी की दुकानों की तरह अपने कमरे का किराया घटाते-बढ़ाते है। इसके बाद भी कई पर्यटक मोल-भाव करते है और किराया कम करवाकर ही मानते है। टूर पैकेज के नाम पर यात्रियों को ले जाने वाले थोक में ग्राहक उपलब्ध कराते है इसलिए उन्हें और भी सस्ती दरों पर यह कमरे उपलब्ध है।


अमेरिकी लोग पैसा बनाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते। वे हर बार कोई न कोई नया तरीका निकाल देते है और फिर उसमें एक और नया तरीका पैसा कमाने का ढूंढ लेते है। 1848 में यहां भाप से चलने वाली नौंकाएं यात्रियों को नदी के एक तरफ से दूसरे तरफ ले जाने लगी थी। छह साल बाद ही इन नौंकाओं की जगह विलासितापूर्ण नौंकाओं ने ले ली। उन्होंने एक और नया धंधा खोजा, नदी में यात्रियों को घुमाने का। डॉलर खर्च कीजिए और आधे घंटे की नदी की यात्रा कीजिए। नदी में से ही ऊपर से गिरते झरने को निहारिए। इतनी बड़ी मात्रा में जब पानी झरने से नीचे गिरता तो पानी बेहद बारीक-बारीक कणों में छितरकर नयनाभिराम दृश्य पैदा करता है। पहाड़ों के बादलों के मानिन्द इस माहौल में ले जाने के लिए एक अलग सेवा शुरू की गई है, जिसका नाम है- ‘मैड ऑफ द मिस्ट’। हमें बताया गया कि नदी में विशालकाय बर्फ की चट्टानों के कारण यह सेवा अभी बंद है, क्योंकि इन चट्टानों से टकराकर कोई भी नाव उलट सकती है। जैसे की टाइटेनिक फिल्म में जहाज बर्फ की चट्टान से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है वैसा नजारा यहां देखने को न मिले इसीलिए यह ऐहतियात बरती गई। मैड ऑफ द मिस्ट का किराया बचने की खुशी हुई। इसके अलावा नियाग्रा प्रपात के आसपास पर्यटकों के लिए अलग से ही शहर बस गए है। इन शहरों में पर्यटकों को लुभाने की हर कोशिश की जाती है। शराबखाने, एम्युजमेंट पार्क, वैक्स म्यूजियम, हेलीकॉप्टर से नजारा देखने की व्यवस्था, बंगी जम्पिंग जैसी कई सुविधाएं यहां उपलब्ध करवाई जाती है। मछली पकड़ने के शौकिन मछली मारने के लिए भी यहां आते है। इस इलाके में करीब दर्जन भर वाइन फैक्ट्रियां भी है। नियाग्रा नदी से गिरने वाले पानी का करीब-करीब आधा हिस्सा पनबिजली योजनाओं में उपयोग में आ जाता है। इस तरह इस झरने का उपयोग व्यावसायिक रूप से बिजली बनाने में भी किया जा रहा है। इस इलाके की बिजली की काफी मांग यहीं से पूरी हो जाती है।


नियाग्रा में भारतीयों के लिए खाने-पीने की हर सुविधा उपलब्ध है। यहां आप शाकाहारी भोजन भी खरीद सकते हो। एक रेस्टोरेंट में बिना लहसून व प्याज का जैन फूड भी उपलब्ध था। 'इंडिया किचन'  नामक एक बड़ा सा रेस्टोरेंट एक भारतीय का मिला, जिसमें शाकाहारी थाली से लेकर भेल पूरी और पानी पूरी तक हर तरह के व्यंजन उपलब्ध थे। 7 डॉलर की भेल पूरी खाने के पहले हमने डॉलर का रुपयों में परिवर्तन करके अंदाज लगाया कि इतनी महंगी भेल पूरी तो हम भारत में कभी नहीं खा सकते।

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