Sunday, May 29, 2011

लक्ष्य पर टिकी थी निगाहें

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम

सोलह साल के इम्मादी पृथ्वी तेज ने आईआईटी-जेईई में 4 लाख 68 हजार विद्यार्थियों में पहला स्थान पाया. यह पृथ्वी का पहला प्रयास था. पृथ्वी ने 1000 में से 970 अंकों का स्कोर अर्जित किया. अब पृथ्वी आईआईटी मुंबई में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में प्रवेश चाहता है. विदेश जाकर डॉलर कमाने के बजाए यूपीएससी की परीक्षा देकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना पृथ्वी का नया लक्ष्य है.

लक्ष्य पर टिकी थी निगाहें


केवल सोलह साल के इम्मादी पृथ्वी (तेलुगु उच्चारण पुरुध्वी) तेज ने आईआईटी-जेईई में 4 लाख 68 हजार विद्यार्थियों में पहला स्थान पाया. यह पृथ्वी का पहला प्रयास था. पृथ्वी ने 1000 में से 970 अंकों का स्कोर अर्जित किया. अब पृथ्वी आईआईटी मुंबई में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में प्रवेश चाहता है. विदेश जाकर डॉलर कमाने के बजाए यूपीएससी की परीक्षा देकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना पृथ्वी का नया लक्ष्य है. पृथ्वी आँध्रप्रदेश के तितुमाला का रहनेवाला है और विजयवाड़ा में श्री चैतन्य जूनियर कालेज का छात्र रहा है. पृथ्वी ने अपनी बुद्धि, मेहनत, योजनाबद्ध पढ़ाई और बगैर तनाव के वह मंजिल पा ली, जहाँ पहुंचना लाखों विद्यार्थियों का सपना होता है. पृथ्वी की इस बेमिसाल कामयाबी के कुछ सूत्र:

मज़बूत बुनियाद ज़रूरी

पृथ्वी के माता-पिता तिरुमाला में रहते हैं, जो एक छोटी सी जगह है और वहां आईआईटी में प्रवेश परीक्षा के लायक माहौल नहीं था. बेटे की पढ़ाई में रूचि देखते हुए उसके पिता ने उसे गुदिवाडा के विश्व भारती रेसिडेंसियल स्कूल में भारती करा दिया जहाँ उसने घर से दूर रहकर न केवल पढ़ाई की, बल्कि मैथ्स और साइंस के बुनियादी सिद्धांतों को कंठस्थ कर लिया. इन्हीं विषयों में गहरी समझ के कारण दसवीं की परीक्षा में उसे 96 प्रतिशत नंबर मिले और उसने आईआईटी-जेईई की तैयारी का लिए विजयवाड़ा में प्रवेश लिया. मूल विषयों की मज़बूत बुनियाद पृथ्वी की कामयाबी में महत्वपूर्ण रही.

लक्ष्य पर निगाहें
पृथ्वी की निगाहें छुटपन से ही आईआईटी पर थीं और उसे यह मालूम था कि वहां पहुँच पाना मज़ाक नहीं. उसके पिता इम्मादी नागेश्वर राव की तिरुमाला में ज्वेलरी की छोटी सी शॉप हैं और माँ रानी राव सामान्य गृहिणी हैं. पृथ्वी चाहता तो बचपन से ही ज्वेलरी शॉप का कामकाज संभालने का मन बना लेता, लेकिन उसका लक्ष्य शॉप नहीं थी. लक्ष्य को निगाह में रखते हुए स्कूलिंग के लिए पृथ्वी ने घर से दूर रहना मंजूर किया. निगाहे लक्ष्य पर, केवल लक्ष्य पर रखीं. छोटी-मोटी परेशानियों से विचलित हुए बिना पृथ्वी ने पढाई पर ध्यान दिया. परिवार का पूरा सपोर्ट तो था ही, पृथ्वी ने पूरी क्षमता लगा दी.

सही कोचिंग आवश्यक
पढ़ाई में बहुत अच्छा होने के बावजूद पृथ्वी को पता था कि बगैर सही कोचिंग के आईआईटी-जेईई क्रेक करना आसान नहीं. दसवीं के 96 प्रतिशत हासिल अंकों ने उसे हौसला दिलाया, लेकिन विजयवाड़ा में उसने जिस कोचिंग संस्थान में प्रवेश लिया वह इंजीनियरिंग का नहीं, मेडिकल में प्रवेश का अच्छा संस्थान माना जाता था. उस संस्थान के लिए भी यह चुनौती थी और उसके फैकल्टीज ने उस पर विशेष ध्यान दिया. पृथ्वी ने अपनी कामयाबी से साबित कर दिया कि जो सर्वश्रेष्ठ है वह किसी भी क्षेत्र में अपनी योग्यता साबित कर सकता है.

गाइडेंस पर पूरा अमल

पृथ्वी ने आईआईटी-जेईई के लिए अपने शिक्षको की सलाहों को हमेश ध्यान से सुना और उस पर अमल किया. अपनी कमजोरियों को जानने के लिए खुद नियमित रूप से अपने टेस्ट लिए. जो भी टेस्ट दिए वे इस गंभीरता से दिए मनो वही असली परीक्षा हो. सभी विषयों की तैयारी अच्छी तरह से की और यह भी ध्यान रखा कि उसकी अपनी दिलचस्पी और विशेष योग्यता किस में है और उसे किस सवाल का जवाब सबसे पहले देना है. दोस्तों के बजाए अपने टीचर्स से ही पढ़ाई के बारे में चर्चाएँ की और सभी विषयों के नोट्स परीक्षा के अनुसार ही बनाये.

सेल्फ स्टडी का सही तरीका
किसी भी परीक्षा में अव्वल आना हो तो टीचर्स केवल गाइड ही कर सकते हैं. पढ़ाई तो छात्र को खुद ही करनी होते है. पृथी ने अपनी पढाई का जो खाका बनाया था उस पर प्रतिदिन, प्रति सप्ताह और महीने भर के लक्ष्य निर्धारित थे. इसी तरह सेल्फ स्टडी के विषयवार लक्ष्य भी तय किये और उस पर अमल किया. हर विषय के हर प्रश्न को कई कई बार हाल किया. यह बार बार जांचा कि कहाँ कहाँ कोई कमी रह गयी है और उसे जल्दी दूर किया.

बगैर दबाव के पढ़ाई
पृथ्वी ने पढ़ाई और परीक्षा के दौरान दबाव के पढ़ने की कोशिश की. दबाव में नहीं आने का उसका फार्मूला यह रहा कि सारे बेसिक्स क्लियर कर पढ़ाई में जुटना चाहिए. पढ़ाई के दौरान दोस्तों, परिवारजनों और टीचर्स के दबाव में आये बिना पढ़ाई करना ही सफलता का रास्ता है. अगर आप दबाव में हैं तो पढ़ने में मन नहीं लग सकता और अगर दबाव झेलने की क्षमता नहीं हो तो परीक्षा में हड़बड़ी में गड़बड़ी हो सकती है.

टाइम मैनेजमेंट
परीक्षा की तैयारी ऐसे करें कि आपका टाइम मैनेजमेंट एकदम सटीक रहे. नींद पूरी हो और एक पल बर्बाद न हो. आपकी बॉडी क्लॉक इस तरह एडजस्ट हो जो आपको सपोर्ट करे. कई विद्यार्थी रात रात भर पढ़ते हैं और दिन में सोते हैं. जब दिन में परीक्षा का वक्त होता है तब उन्हें नींद आने लगती है. वक्त को बर्बाद किये बिना उसका सौ प्रतिशत सही इस्तेमाल करने की कला को समझना ज़रूरी है.

रिलेक्स होने की कला
पृथ्वी ने पढ़ाई के दौरान अपना क्रिकेट खेलना बंद नहीं किया. पढ़ाई और यहाँ तक कि परीक्षा के दौरान वह टीवी पर क्रिकेट देखने से नहीं चूका. हाँ, कुछ नयी फ़िल्में उसने परीक्षा के बाद देखने के इरादे से टाल दी थीं. पूरी पढ़ाई के दौरान उसने कभी भी आठ घंटे से कम की नींद नहीं ली. खेलते वक्त उसने यह ध्यान रखा कि कहीं वह थकान तो महसूस नहीं कर रहा. चौबीसों घंटे पढ़ाई करने की कोशिश उसने नहीं की क्योंकि वह जानता था कि यह संभव नहीं है.

अगला लक्ष्य भी निर्धारित

पृथ्वी ने आईआईटी मुंबई से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के डिग्री लेने के बाद का लक्ष्य भी निर्धारित कर लिया है. विदेश जाकर डॉलर कमाने के बजाए वह आईएएस बनकर अपने देश में ही लोगों की सेवा करना चाहता है. वह इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि आईआईटी केवल छात्रों के कारण महान संस्थान बने हैं, इन्हें महान बनाने में दूसरे फैक्टर भी हैं. वह मानता है कि हमारे कई नेता बहुत पढ़े लिखे हैं, कई तो आईआईटी और आईआईएम से निकले हैं और कई हार्वर्ड, केम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड में भी पढ़े हैं. अच्छा टेक्नोक्रेट बनकर वह देश के लिए काम करना चाहता है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 29 may 2011

Friday, May 20, 2011

ज़िद ने दिलाई यह मंज़िल




रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम

महज़ पाँच साल की उम्र में मान की ममता से मरहूम रजनीकांत इसरार भी करते तो किससे? सो अपनी नियति खुद ही तय करने की ज़िद पाल ली. उन्होंने कुली से लेकर कंडक्टर तक का कम शान से किया, क्योंकि उनकी निगाह में कोई भी काम छोटा नहीं है. पद्मभूषण और दर्जनों अवार्ड्स पा चुके सुपरस्टार रजनीकांत एशिया में जैकी चैन के बाद सबसे ज्यादा मेहनताना लेनेवाले स्टार हैं. फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें भारत के सब से प्रभावशाली भारतीयों में से एक माना है.

ज़िद ने दिलाई यह मंज़िल

जीते जी किंवदंती बन चुके सुपरस्टार रजनीकांत मराठी परिवार के हैं और तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और हिंदी में से कोई भी उनकी मातृभाषा नहीं है. ये सब भाषाएँ उन्होंने सीखी हैं. रजनीकांत ने पांच साल की उम्र में मां को खो दिया था. हालात ने उन्हें मज़दूरी को विवश किया था. उन्होंने कुलीगीरी से लेकर कंडक्टर तक की नौकरी की. रंगमंच पर एक्टिंग के शौक के कारण उन्हें कन्नड़ नाट्य निर्देशक पुनप्पा ने एक धार्मिक नाटक में दुर्योधन का रोल दे दिया और यही उनके लिए मील का पत्थर साबित हुआ. एक दोस्त ने उन्हें अपने खर्च से मद्रास फ़िल्म इंस्टीट्युट भेजा और दो साल तक उनका खर्च उठाया. लौटने पर उन्हें पहली फ़िल्म में छोटा सा नेगेटिव रोल मिला था, वह भी एक क्रूर पति का, फ़िल्म के हीरो कमल हसन थे. इसके बाद उन्होंने सात और फ़िल्में कीं. नौवीं फ़िल्म में उन्हें हीरो का रोल मिला और फिर उन्होंने पीछे नहीं देखा. पद्मभूषण और दर्जनों अवार्ड्स पा चुके सुपरस्टार रजनीकांत एशिया में जैकी चैन के बाद सबसे ज्यादा मेहनताना लेनेवाले स्टार हैं. फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें भारत के सब से प्रभावशाली भारतीयों में से एक माना है. रजनीकांत के सफलता के कुछ सूत्र :

असंभव कुछ भी नहीं
रजनीकांत ने निजी जीवन में और फ़िल्मी परदे पर जो कमाल किये हैं, वे बताते हैं कि इंसान के लिए असंभव कुछ भी नहीं है. हालात ये हैं कि संता बंता से भी ज्यादा जोक्स रजनीकांत को लेकर चल निकले हैं जो कमोबेश यही बात कहते हैं कि मेहनत और लगन से काम करो तो हर काम संभव है. रजनीकांत ने वयस्क होने के बाद कामकाज करते हुए कई भाषाएँ सीखीं, बिना किसी गॉडफ़ादर के सुपरस्टार का मुकाम पाया और यह सब अपनी मेहनत और पैशन के कारण. दृढ निश्चय हो तो साधनहीनता भी रुकावट नहीं बनती और न ही भाषा या क्षेत्र बाधा बनता है.

अपनी छाप छोड़ो
कोई भी काम करो, उस पर अपनी छाप ज़रूर छोड़ो. चाहे वह काम बस कंडक्टर का ही क्यों न हो. बस कंडक्टर के रूप में रजनीकांत खासे लोकप्रिय थे. कई यात्री इसी इंतज़ार में रहते कि वे उसी बस में जायेंगे, जिसमें रजनीकांत हों. रजनीकांत का टिकिट फाड़ने, पैसे गिनने और यात्रियों से बात करने का अंदाज़ ही निराला था. इसी स्टाइल ने उन्हें रंगमंच तक पहुँचाने में मदद की और वे सिनेमा की दुनिया में जा सके. सबक यह है कि कोई भी काम छोटा नहीं, बशर्ते आप उस पर अपनी छाप छोड़ें.

प्रोफेशनल रवैया रखो
आप जिस भी फील्ड में हों, अपने काम को प्रोफेशनल अंदाज़ में ही करें. व्यक्तिगत बातों को अपने व्यवसाय में हावी होने दें. इसी से आपकी गरिमा बनी रहती है. 62 वें वर्ष में चल रहे रजनीकांत से आधी उम्र की हीरोइनें उनके साथ काम कर रही हैं. आसिन, अनुष्का शर्मा, दीपिका जैसी हिरोइन उनके साथ काम कर रहीं हैं, लेकिन माधुरी दीक्षित ने उने साथ काम करने से मना कर दिया. बॉलीवुड में ऐसा किसीहीरो के साथ होता तो हंगामा हो जाता, लेकिन रजनीकांत ने कोई बयानबाजी नहीं की. अपनी हर फ़िल्म के डायरेक्टर, सिनेमाटोग्राफर, और पूरी टीम के साथ उनके सम्बन्ध बहुत प्रोफेशनल होते हैं. मीडिया में भी वे कभी लफ्फाजी नहीं करते.

बेहतर की जिद करो
आप जो भी कर रहो हो, उससे बेहतर और बड़ा करने की जिद अवश्य करो. यह जिद न होती तो रजनीकांत एक हीरो बनकर ही संतुष्ट हो जाते. हर फ़िल्म में उनका कद बड़ा होता गया है चाहे वह चाहे वो अंडरवर्ल्ड डॉन बिल्ला हो या मुरत्तु कलाई या फिर थिल्लू मुल्लू। इन फिल्मों में रजनी की स्टाइल ने उन्हें अलग पहचान दी। हिंदी में उनकी कई फ़िल्मों को मनचाही सफलता नहीं मिली, लेकिन वे हर फ़िल्म में कुछ न कुछ नया, भव्य और अनूठा करने की कोशिश करते हैं. दोहराव से बचने का यत्न करते हैं.

दान से निखरता है चरित्र
रजनीकांत के बारे में कहा जाता है कि हातिमताई की तरह दान देते हैं और किसी को इसकी खबर नहीं होने देते. लोग किसी भी काम में उनसे मदद लेने जाते हैं तो वे भरपूर मदद करते हैं पर इस शर्ट पर कि उसे प्रचारित नहीं किया जाए. अपने जन्मदिन पर उन्होंने कई साल तक हजारों लोगों को भोज दिए हैं, बिना उनकी सामाजिक हैसियत देखे. रजनीकांत को पता है कि वे अवाम के हीरो हैं और अवाम दिखावे से दूर स्वाभाविक लोगों को पसंद करती है. उन्हें लगता है कि कमाई को खर्च करने का सबसे अच्छा तरीका है उसे लोगों के साथ खर्च करना.

दिखावे से दूर रहें
रजनीकांत को अन्य हीरो की तरह शो ऑफ का शौक नहीं है. वे गंजे हैं और फिल्मों में तो विग पहनते हैं लेकिन रोजमर्रा में नहीं. वे इसे स्वीकार करते हैं कि फाइलों में विग पहनना ज़रूरी है. जहाँ तक शो ऑफ की बात है, वे कहते हैं कि मेरे जैसे फ़िल्मी हीरो के लिए शो ऑफ की सही जगह फ़िल्म का परदा ही है और वहीँ मैं अपना सारा ध्यान लगाता हूँ. रजनीकांत बड़बोलेपन से भी दूर हैं और आम तौर पर विवादों से दूर रहते हैं.

सामाजिक सरोकारों पर ध्यान
रजनीकांत ने फ़िल्मी दुनिया में रहते हुए भी सामाजिक सरोकारों की उपेक्षा नहीं होने दी. २००२ में जब कर्णाटक सरकार ने तमिल नाडू के लिए कावेरी नदी का पानी रोक लिया था तब वे दिन भर के धरने पर बैठे. जब पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने नदियों को जड़ने की घोषणा की तब उन्होंने इस काम में निजी तौर पर एक करोड़ रुपये के दान का ऐलान किया. वे हमेशा नेताओं से कहते रहे कि पानी जैसे मुद्दे पर राजनीति से बाज आयें और देश का हिट पहले देखें. श्रीलंका में तमिलों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ धरने पर बैठे.

परिवार भी महत्वपूर्ण
रजनीकांत एक पारिवारिक व्यक्ति हैं. अपने व्यवसाय की आपाधापी में भी वे परिवार से विमुख नहीं हुए. वे शादीशुदा दो बेटियों के पिता है और उनकी पत्नी एक स्कूल का संचालन करती हैं. परिवार के अलावा धर्म में भी उनकी आस्था है और वे सत्य साईं बाबा के भक्त रहे हैं. हर फ़िल्म के रिलीज होने के पहले वे परिवार सहित मंदिरों में जाते हैं. एक बेटी फ़िल्म व्यवसाय में ही है और दूसरी गृहिणी. रजनीकांत मनाते हैं कि परिवार और धर्म उन्हें भीतर से शक्ति देता है.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
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हिन्दुस्तान may 22, 2011

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रजनीकांत के कुछ लतीफ़े :



1. जब रजनीकांत स्कूल जाया करते थे तो स्कूल में बंक मारना टीचर का काम हुआ करता था।

2. रजनीकांत जब भी प्याज काटता है, प्याज से पानी की बूंदें निकलती हैं। साइंटिस्ट कहते हैं कि ये प्याज के आंसू होते हैं।

3. अगर आप सोचते हैं कि रजनीकांत का दिमाग कम्प्यूटर से तेज चलता है तो आप थोड़ा सा गलत हैं। रजनीकांत का दिमाग चाचा चौधरी से तेज चलता है।

4. एक बार रजनीकांत ने अपने उस बैंक एकाउंट का चेक काट दिया जिसमें संयोग से रुपये नहीं थे। नतीजा ये हुआ कि बैंक बाउंस हो गया।

5. रजनीकांत के कैलेंडर में 31 मार्च के बाद सीधे 2 अप्रैल की डेट आती है, क्योंकि कोई भी उसे अप्रैल फूल नहीं बना पाता।

6. रजनीकांत इतना तेज है कि वह पूरी दुनिया का एक चक्कर लगाकर अपनी पीठ पर पीछे से आकर खुद को मुक्का मार सकता है।

7. 'नो वन इज परफेक्ट', इस जुमले को रजनीकांत पर्सनल इंसल्ट के रूप में लेता है।

8. अद्भुत, अविश्वसनीय, बुद्धिमान, शक्तिशाली, महान जैसे कई शब्द 1949 में डिक्शनरी में जुड़े। इसी साल रजनीकांत का जन्म हुआ था।

9. दुनिया 2012 में समाप्त नहीं होगी क्योंकि रजनीकांत ने लाइफ टाइम वैलीडिटी वाला मोबाइल सिम खरीद लिया है।

10. रजनीकांत के कम्प्यूटर में रिसाइकिल बिन नहीं है। उसे रजनीकांत ने डिलीट कर दिया है।

11. पॉल द आक्टोपस ने फीफा वर्ल्ड कप में बिलकुल सटीक भविष्यवाणियां की थीं। उससे किसी ने पूछा कि रजनीकांत कब मरेगा? उसी दिन पॉल बाबा की मौत हो गई।

12. रजनीकांत यदि 200 साल पहले पैदा होता तो आज ब्रिटेनवासी अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहे होते।

13. रजनीकांत को बचपन में चिकेन पॉक्स नाम की बीमारी ने अपनी चपेट में लिया था। आज ये बीमारी दुनिया से गायब हो चुकी है।


14 .एक किसान ने अपने मक्के के खेत में कौवे उड़ने के लिए रजनीकांत की तस्वीर चिपका दी। नतीजा यह हुआ कि कौवे अगले ही दिन मक्की के वे दाने भी वापस ले आए, जो वे पिछले साल लेकर गए थे।

15. रजनीकांत की एक मात्र पर्सनल ई-मेल आईडी है "gmail@rajanikanth.com।"

16. जिस दिन रजनीकांत की रोबोट फिल्म रिलीज हुई थी, उस दिन टाइम्स आफ इंडिया को रजनीकांत ने 4 स्टार रेटिंग दी थी.


17. बिग बॉस सीजन 4 के दौरान एक दिन के लिए रजनीकांत बिग बॉस के घर गया था. नेक्स्ट डे बिग बॉस के घर में एकाउंसमेंट हुआ ‘रजनीकांत चाहते हैं कि बिग बॉस कन्फेशन रूम में आ जाएं’.

18. जब भी भगवान हैरान होते हैं तो ·हते हैं, ‘ओह मॉय रजनीकांत’.

19. रजनीकांत ·क्रिकेट भी अच्छा खेलता है. रणजी के एक मैच में अंतिम बाल पर जीत के लिए 10 रनों की जरुरत थी. रजनीकांत स्ट्राइक पर थे. बॉलर ने जब बॉल फेंकी, रजनीकांत ने बैट से उसे हवा में उछाल उसके दो टुकड़े कर दिये. एक टुकड़े को छक्के की ओर उछाला और दूसरे को बाउण्ड्री की ओर भेज दिया.


20. क्या आपको पता है कि गणपति जी के घर पर दस दिन के लिए रजनीकांत की प्रतिमा विराजित की जाती है?

Sunday, May 15, 2011

संकल्प ने बनाया आईएएस टॉपर

आईएएस टॉपर एस. दिव्यदर्शिनी को भरोसा था कि उनका चयन आईएएस के लिए हो जाएगा, लेकिन वे टॉप पर रहेंगी, इसकी कल्पना भी नहीं थी. एस. दिव्यदर्शिनी की इस महत्वपूर्ण सफलता के कुछ सूत्र :


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संकल्प ने बनाया आईएएस टॉपर


चेन्नई की 24 साल की एस. दिव्यदर्शिनी यूपीएससी की प्रशासकीय नौकरी की परीक्षा में टॉप पर रहीं. इसके पहले भी वे इस परीक्षा में बैठीं थीं, पर नाकामयाब रहीं. मध्यमवर्गीय परिवार की दिव्यदर्शिनी इसके बाद भारतीय स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी अधिकारी के लिए चुनी गयीं लेकिन उन्होंने अपनी यूपीएससी परीक्षा की तैयारी भी जारी रखी. उन्हें भरोसा था कि उनका चयन आईएएस के लिए हो जाएगा, लेकिन वे टॉप पर रहेंगी, इसकी कल्पना भी नहीं थी. 2009 की परीक्षा देते वक्त वे अपनी लॉ की डिग्री के लिए भी पढ़ाई कर रही थीं. इस बार उन्होंने कोई भी मौका नहीं छोड़ा. चेन्नई में आईएएस के लिए उन्होंने कोचिंग क्लास जाना शुरू किया ताकि सही मार्गदर्शन मिल सके. एस. दिव्यदर्शिनी की इस महत्वपूर्ण सफलता के कुछ सूत्र :

कामयाबी का कोई शॉर्टकट नहीं

बड़े लक्ष्य को पाना हो तो कोई शॉर्टकट नहीं चलता. आर्ट्स में डिग्री लेने के बाद लॉ की डिग्री के लिए भी पढ़ाई के दौरान यूपीएससी की भी तैयारी करनेवाली दिव्यदर्शिनी मानती हैं कि जीवन में किसी भी क्षेत्र में कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है. नियमित पढाई हो या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी, केवल और केवल कड़ी मेहनत कामयाबी पाने की पहली सीढ़ी है. कामयाबी के लिए और भी कई बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है लेकिन कड़ी मेहनत के बिना वे सब बातें बेकार हो जाती हैं. शॉर्टकट के जरिये अगर कामयाब होने का सपना देख रहे हों तो उसे भूल जाइए.

उचित मार्गदर्शन प्राप्त करें
बिना मार्गदर्शन के भी कामयाबी मिल सकती है लेकिन इसमें आपका सफ़र लम्बा और दुश्वार हो सकता है. 2009 में पहली बार यूपीएससी की परीक्षा देने के बाद मुझे यही महसूस हुआ. हर परीक्षा का कोई ना कोई पैटर्न होता है. अगर आप को उसकी जानकारी हो तो वह मदद मिल जाती है. मैंने जब इस परीक्षा की कोचिंग लेना शुरू की तो कई लोगों ने यह भी कहा कि आप तो पहले ही यह परीक्षा दे चुकी हैं, कोचिंग की क्या ज़रुरत? लेकिन आज मैं यह स्वीकार करती हूँ कि अगर मैंने कोचिंग नहीं ली होती तो टॉप में आना तो दूर, शायद सफल ही नहीं हो पाती.

योजनाबद्ध होकर पढ़ाई करें
यदि आपको भी इस या ऐसी ही कोई परीक्षा में बैठना है तो कोचिंग जाना और कड़ी मेहनत करना ही काफी नहीं है. उससे बढ़कर आपको पूरी योजना बनकर पढ़ाई करनी चाहिए. इसके लिए आपको हर एक विषय में अध्ययन की रणनीति बनानी होगी. हर विषय के लिए अलग रणनीति होना चाहिए क्योंकि कुछ विषयों में आपकी ख़ास दिलचस्पी हो सकती है, कुछ में नहीं. लेकिन पढ़ाई तो आपको सभी की करना होगी. बोरियत भरे विषयों में भी दिलचस्पी लें. मेरा अनुभव यही है कि जैसे जैसे हम किसी विषय के बारे में जानने लगते हैं, हमारी दिलचस्पी उसमें बढ़ती जाती है.

हताशा से बचें

मुझे दसवीं में आये नंबरों से बड़ी निराशा हुई थी. मुझे रिजल्ट में विशेष योग्यता की आशा थी, लेकिन मैं 74 प्रतिशत ही ला सकी. निराशा के वक्त मेरे माता पिता ने बहुत प्रेरणा दी. मैंने अगले साल नए सिरे से पढ़ाई शुरू की और बारहवीं की परीक्षा में 86 प्रतिशत नंबर लाकर अपना खोया आत्मविश्वास फिर हासिल कर लिया. मैंने कॉलेज में आते ही प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का मन बना लिया था. मेरी दिलचस्पी मैनेजमेंट और कम्प्यूटर्स के बजाय कानून में ज्यादा थी. साथ ही यह स्कोअर्रिंग विषय भी है. यदि आप परफेक्ट हैं तो अच्छे नंबर पा सकते हैं. यूपीएससी में पहली नाकामी को मैंने यह सोचकर टाल दिया था कि मैंने कॉलेज में लॉ के साथ यह परीक्षा दी थी.

हर विषय पढ़ें
आपकी दिलचस्पी चाहे जिस में हो, पढ़ाई हर विषय की करते रहे. ध्यान रखिये कि केवल कॉलेज या प्रतियोगी परीक्षा के विषय पढ़ना ही काफी नहीं हैं. यह पढ़ाई आपको इंटरव्यू में तो मदद करेगी ही आपको एक बेहतर, मुकम्मल इंसान बनाने का रास्ता भी खोलेगी. आगे जाकर आप पाएंगे कि हर विषय की पढ़ाई से आपने जो भी सीखा है, वह बहुत ही काम का है और तब आपको खुशी होगी.

टाइम किलिंग मशीनों से सावधान

टीवी और फ़िल्में देखना, ड्राइविंग करना, चेटिंग करना, मोबाइल पर गप्पें लड़ाना किसे अच्छा नहीं लगता, लेकिन ये सभी टाइम किलिंग डिवाइसेस हैं. इनका उपयोग सावधानी से और ज़रुरत के हिसाब से ही करें. ये वक्त तो बर्बाद करती ही हैं, हमें अपने लक्ष्य से भी भटका सकती हैं. अगर आप स्मार्ट हैं तो इनका उपयोग अपने लक्ष्य को पाने में सहयोगी उपकरण के तौर पर कर सकते हैं, लेकिन यह आसान नहीं है. इन सब चीजों के लिए तो ज़िंदगी पड़ी है, वक्त के महत्त्व को समझें.

लक्ष्य के लिए समझौता नहीं
अपने लक्ष्य को पाने के लिए कभी भी समझौते न करें. जो लक्ष्य तय किया है उसे न केवल प्राप्त करें बल्कि पूरी तरह से सही रास्ते पर चलकर ही हासिल करें. यह बात बेहद किताबी लगती है, लेकिन कामयाबी का असली मज़ा तभी है जब कि उसे पाने के लिए आपने कोई समझौता नहीं किया हो. मैंने यूपीएससी में पहली बार नाकाम होने पर बैंक की नौकरी को हाँ कह दी और वहां काम भी शुरू कर दिया लेकिन मुझे लगता रहा कि मैं अपने लक्ष्य से भटक गयी हूँ. बैंक की नौकरी में शायद तनाव काम होंगे लेकिन मेरा लक्ष्य प्रशासकीय नौकरी ही था, और मैं यहीं खुश हूँ.

व्यवस्था को बदलो

मुझे देश में फैले भ्रष्टाचार से नफ़रत है और मैं उसे मिटाना चाहती हूँ. अब हर जगह भ्रष्टाचार की बार करने, गलियां देने और कुंठित होने के बजाय भ्रष्टाचार से लड़ने का सही तरीका मुझे यही लगता है कि मैं ऐसी पोजीशन में पहुँच जाऊं, जहाँ मैं भ्रष्टाचार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकूं. आईएएस अधिकारी के रूप में मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी जंग को महत्वपूर्ण मुकाम तक पहुंचा सकूंगी.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 15 मई 2011

Friday, May 06, 2011

हर सफ़र का अपना मज़ा है

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम




यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है.


सफलता के सूत्र / नारायण मूर्ति

हर सफ़र का अपना मज़ा है

तीस साल पहले 1981 में छह मित्रों और केवल दस हज़ार रुपये की पूंजी से एन आर नारायण मूर्ति ने जिस इन्फोसिस कंपनी की स्थापना की थी, उसका कारोबार बीते साल करीब 30 ,000 करोड़ रुपये था. उन्होंने एक ऐसी कंपनी की नींव डाली, जिसे दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में माना जाता है. 33 देशों में सवा लाख से भी ज्यादा लोग उनके साथ काम करते हैं. उनकी कंपनी को सर्वश्रेष्ठ नियोक्ता सहित अनेक सम्मान मिल चुके हैं. एक अरब डॉलर कारोबार का आंकड़ा छूनेवाली यह पहली साफ्टवेयर कंपनी रही है. नारायण मूर्ति की तारीफ अमेरिका के राष्ट्रपति सहित अनेक दिग्गज कर चुके हैं.देश - विदेश में अनेक सम्मान पा चुके नारायण मूर्ति पहले पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण से नवाजे जा चुके हैं. दुनियाभर के आई टी क्षेत्र में भारत की छवि चमकानेवाले नारायण मूर्ति की सफलता के कुछ सूत्र :

अनुभव से सीखने का महत्त्व
आप कोई भी बात कैसे सीखते हैं? अपने खुद के अनुभव से या किसी और से? आप कहाँ से और किस से सीखते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि आपने क्या सीखा और कैसे सीखा. अगर आप अपनी नाकामयाबी से सीखते हैं तो यह आसान है. सफलता से शिक्षा लेना आसान नहीं होता क्योंकि हमारी हर सफलता हमारे कई पुराने फैसलों के पुष्टि करती है. अगर आपमें नया सीखने की कला है, जल्दी से नए विचार अपना लेते हैं और उसे काम में अपना लेते हैं तभी सफल हो सकते हैं.

परिवर्तन को स्वीकारें
हमें सफल होने के लिए नए बदलावों को स्वीकार करने की आदत होनी चाहिए. मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढाई के बाद किसी हायड्रो पॉवर प्लांट में नौकरी की कल्पना की थी. पढाई के दौरान एक वक्ता के भाषण ने मेरी जिन्दगी बदल दी जिन्होंने कंप्यूटर और आई टी क्षेत्र को भविष्य बताया था. मैंने मैसूर में इंजीनियरिंग की पढाई की. फिर आईआईटी कानपुर में पीजी किया. आईआईएम अहमदाबाद में चीफ सिस्टम्स प्रोग्रामर के नौकरी की. पेरिस में नौकरी की और पुणे में इन्फोसिस की स्थापना की. बंगलुरु में कंपनी का कारोबार बढाया. जो जगह जहाँ मुफीद लगे, वहीं काम में जुट जाओ.

संकट की घड़ी को समझें
कभी कभी संकट सौभाग्य नज़र आता है. ऐसे में धीरज ना खोएं. आपकी कामयाबी इस बात में भी छुपी है कि ऐसा वक्त आने पर आप कैसे अपनी प्रतिक्रिया देते हैं? इन्फोसिस की स्थापना १९८१ में हम सात लोगों ने की थी और १९९० में मेरे सभी साथी चाहते थे कि हम यह कंपनी बेच दें क्योंकि ९ साल की मेहनत के हमें दस लाख डॉलर मिल रहे थे. यह मेरे लिए सौभाग्य नहीं, संकट था. मैं इस कंपनी का भविष्य जानता था. तब मैंने और केवल मैंने अपने साथियों को संभाला था और इन्फोसिस को बेचने से रोका था.

संसाधनों से बड़ा होता है जज्बा

इन्फोसिस के भी 5 साल पहले नारायण मूर्ति ने आई टी में देशी ग्राहकों को ध्यान में रखकर सॉफ्ट्रानिक्स नाम की कंपनी खोली थी, जो बंद कर देनी पड़ी. 2 जुलाई 1981 को इन्फोसिस रजिस्टर्ड हुई लेकिन उनके पास कंप्यूटर तो दूर, टेलीफोन तक नहीं था. उन दिनों टेलीफोन के लिए लम्बी लाइन लगती थी. कंपनी शुरू करने के एक साल बाद उन्हें टेलीफोन और दो साल बाद कंप्यूटर उपलब्ध हो सका था. जब इन्फोसिस अपना आईपीओ लेकर आई तब भी उसे बाज़ार में अच्छा रेस्पांस नहीं मिला था. पहला इश्यु केवल एक रुपये के प्रीमियम पर यानी ग्यारह रुपये प्रति शेयर जारी हुआ था. मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों के बाद १९९३ में इन्फोसिस का शेयर ८६ रुपये के प्रीमियम पर बिका.

किसी एक के भरोसे मत रहो

1995 में इन्फोसिस के सामने एक बड़ा संकट पैदा हो गया था जब एक ऐसी विदेशी कंपनी ने उनकी सेवाओं का मोलभाव एकदम कम करने का फैसला किया. वह ग्राहक इन्फोसिस का करीब 25 प्रतिशत बिजनेस देता था. उसकी शर्तें मानना कठिन था क्योंकि जिस कीमत पर वह सेवा चाहता था, वह बहुत ही कम थी और उस ग्राहक को खोने का सीधा मतलब था, अपना एक चौथाई बिजनेस खो देना. तभी तय किया गया कि बात चाहे टेक्नॉलॉजी की हो या अप्लीकेशन एरिया की, किसी भी देश की हो या एम्प्लाई की, कभी भी किसी एक बड़े ग्राहक पर निर्भर कभी भी मत रहो. आपका कामकाज इतना फैला हो कि कोई भी आप को आदेश ना दे सके.

आप केवल कस्टोडियन हैं
जो भी सम्पदा आपके पास है वह केवल आपकी देखरेख के लिए हैं. आप उसके अभिरक्षक हैं. वह भी अस्थायी तौर पर. बस. यह ना मानें कि वह सारी सम्पदा केवल आप और आप ही भोगेंगे. किसी भी सम्पदा का असली आनंद आप तभी उठा सकते हैं जब उसका उपभोग पूरा समाज करे.यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है.

कुर्सी से ना चिपके रहें

साठ साल के होते ही नारायण मूर्ति ने अपनी कंपनी के चेयरमैन का पद छोड़ दिया और नॉन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बन गए. आम तौर पर कर्मचारियों को तो साठ साल में रिटायर कर दिया जाता है लेकिन डायरेक्टर अपने पद पर डटे रहते हैं. नारायण मूर्ति ने सभी को यह सन्देश दिया कि अगर किसी भी कंपनी को लगातार आगे बढ़ाना है तो उसमें नए खून की निर्णायक भूमिका रहनी चाहिए. नए खून में ही नयी बातों को स्वीकार करने की हिम्मत होती है और नए आइडियाज़ अपनाने में युवाओं को कोई हिचक नहीं होती.

मंजिल से ज्यादा मज़ा सफ़र में
जीवन में कोई भी लक्ष्य पा लेने में बहुत मज़ा आता है. हमें संतोष मिलता है कि हमने यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया. लेकिन जीवन जीना हो तो उसका असली मज़ा सफ़र जारे रखने में है. कभी भी जीवन में संतुष्ट होकर ना बैठ जाएँ कि बस, बहुत हो चुका. जब आप एक मैच जीत जाते हैं तो अगले मैच की तैयारी शुरू कर देते हैं. कोई भी मैच जीतने की अपनी खुशी होती है और खेलने का अपना मज़ा है. सागर में चलते रहना और खेल में खेलते रहना बहुत मजेदार होता है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी


हिन्दुस्तान
8 मई 2011

Friday, April 29, 2011

बेहतर प्रबंधन से बने बेमिसाल





फ़ोर्ब्स की अरबपतियों की सूची में रतन टाटा का नाम इसलिए नहीं आता कि टाटा की 28 प्रमुख कम्पनियाँ अलग-अलग स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हैं. फ्लेगशिप कंपनी टाटा सन्स में रतन टाटा का व्यक्तिगत शेयर 65 फीसदी बताया जाता है, लेकिन रतन टाटा की व्यक्तिगत संपत्ति को कंपनी अलग से नहीं दिखाती. कह सकते हैं कि रतन टाटा जितनी संपत्ति पर नियंत्रण रखते हैं वह फ़ोर्ब्स सूची में आने के लिए काफी है.



बेहतर प्रबंधन से बने बेमिसाल

रतन टाटा, ऐसे भारतीय उद्योगपति हैं जिनका दुनिया में बहुत सम्मान है. रतन टाटा के नेतृत्व में टाटा ग्रुप ने वेल्थ क्रियेशन में दुनिया की टॉप 50 बिजनेस ग्रुप में जगह बनाई है. टाटा ग्रुप पूरी दुनिया में 96 तरह के बिजनेस करता है. माना जाता है कि रतन टाटा की संपत्ति बिल गेट्स और वारेन बफेट से भी ज्यादा है लेकिन फिर भी फ़ोर्ब्स पत्रिका की अरबपतियों की सूची में रतन टाटा का नाम इसलिए नहीं आता कि टाटा की 28 प्रमुख कम्पनियाँ अलग-अलग स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हैं. फ्लेगशिप कंपनी टाटा सन्स में रतन टाटा का व्यक्तिगत शेयर 65 फीसदी बताया जाता है, लेकिन रतन टाटा की व्यक्तिगत संपत्ति को कंपनी अलग से नहीं दिखाती. कह सकते हैं कि रतन टाटा जितनी संपत्ति पर नियंत्रण रखते हैं वह फ़ोर्ब्स सूची में आने के लिए काफी है. भारत के बाहर ब्रिटेन, यूएसए, चीन, थाईलैंड, स्पेन, दक्षिण अफ्रीका, मोरक्को, नीदरलैंड, इटली सहित करीब 56 देशों में टाटा का साम्राज्य खड़ा है. स्टील, कोयला, संचार, बीमा, आईटी, ऑटोमोबाइल, केमिकल जैसे बुनियादी क्षेत्रों के अलावा टाटा का साम्राज्य होटल, शीतल और गर्म पेय, कास्मेटिक, नमक कंस्ट्रक्शन, कलपुर्जे, लेदर गुड्स, कपड़ा आदि तमाम क्षेत्रों में भी है. टाटा ने बीते दशक में 18 अरब डॉलर लगाकर कोरस, जगुआर, लैंड रोवर, टेटली, देवू, पियाजियो एयरो इंडस्ट्री, रिट्ज़ कार्लटन (बोस्टन) जैसी अनेक विश्व विख्यात कंपनियों पर आधिपत्य किया और दुनिया भर में धाक जमा दी. इसके बावजूद जो बात रतन टाटा में दूसरे अरबपतियों से अलग है वह है सामाजिक जवाबदेही. कार्पोरेट सोशल रेस्पंसीबिलिटी (सीएसआर) को टाटा ने नए मायने दिए हैं. तमाम आरोपों और आपत्तियों के बावजूद रतन टाटा ने दुनिया में ख़ास जगह बनाई है, क्या है उनकी खासियत और क्या रहे उनकी सफलता के कुछ सूत्र :

हर नाकामी से सीखो

1937 में जन्मे रतन टाटा ने कार्नेल और हार्वर्ड से आर्किटेक्चर और हार्वर्ड से मैनेजमेंट की में डिग्री लेने के बाद २५ साल की उम्र में फेमिली बिजनेस में कदम रखा. उन्होंने जमशेदपुर के स्टील प्लांट में हजारों मजदूरों के साथ शॉप फ्लोर पर भी काम लिया. उनका पहला बड़ा प्रोजेक्ट नेल्को (नेशनल रेडियो एंड इलेक्ट्रानिक्स) था, जो 40 फीसदी घाटे में थी और मार्केट शेयर केवल 2 फीसदी. रतन टाटा नेल्को नहीं चला पाए. उन्हें मुंबई की इम्प्रेस मिल्स का काम सौंपा गया, जो बंद करनी पड़ी. इंडिका कार परियोजना की लागत 500 करोड़ आंकी गयी थी जो 1700 करोड़ तक पहुँच गयी थी. रतन टाटा ने हर नाकामी से सबक लिया और यही उनके प्रबंधन में झलकता है.

नयी टेक्नॉलॉजी से दोस्ती करो

एकाधिकार जमाकर, सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार के बीज बोकर, फायनांस की फर्जी कम्पनियाँ बनाकर येन केन मुनाफा कमाना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए. नयी टेक्नॉलॉजी को तो केवल प्रोडक्शन में ही महत्त्व नहीं दिया गया, बल्कि नए प्रोडक्ट चुनने में भी रतन टाटा ने हाई टेक बिजनेस चुने. टाटा टेलीकाम, टाटा फायनांस, टाटा केल्ट्रॉन, टाटा हनीवेल, टाटा हाईटेक ड्रिलिंग, टाटा एलेक्सी, प्लंटेक जैसी कम्पनियाँ रतन टाटा की दें हैं. रतन टाटा ने टोम्को बंद कर दी और फार्मा, सीमेंट, कपड़ा, कोस्मेटिक के कारोबार से हाथ खींच लिए. इस सब का असर अच्छा हुआ और ग्रुप का कारोबार तेजी से बढ़ा.

हर सोच बड़ी हो

रतन टाटा का फार्मूला है कि हर सोच बड़ी रखो. छोटी सोच रखनेवाला 1200 करोड़ डॉलर के खर्च से कोरस स्टील कंपनी का अधिग्रहण नहीं कर सकता था. इसमें खतरे भी थे, लोगों ने कहा था कि टाटा ग्रुप बरबाद हो जाएगा, पर एक ही दिन में टाटा के शेयर ग्यारह प्रतिशत चढ़ गए. जब उन्होंने जगुआर और लैंड रोवर डील की, तब भी ऐसी ही बातें हुई थीं. जब उन्होंने न्यूयॉर्क में पीयरे व बोस्टन में रिट्ज़ कार्लटन होटल खरीदा और टेटली की डील की तब भी लोगों ने शक की निगाह से देखा था. बड़ी सोच के कारण ही टाटा ग्रुप वैश्विक हो सका है.

भारतीय उपभोक्ता का महत्त्व
रतन टाटा इस बात की अहमियत जानते हैं कि भारतीय उपभोक्ता भी बहुत महत्वपूर्ण है. आप 121 करोड़ लोगों को अनदेखा कैसे कर सकते हैं जो आप के ग्राहक होने की क्षमता रखते हैं. टाटा ने सोडियम युक्त नमक बेचना शुरू किया तो कई और कम्पनियाँ बाजार में आ कूदीं. टाटा अगर मुंबई में ताज, न्यूयॉर्क में पीयरे व बोस्टन में रिट्ज़ कार्लटन होटल चलाता है तो देश भर में जिंजर नामक दर्जनों बजट होटल भी. अगर वह करोड़ रूपये से भी महंगी जगुआर और लैंड रोवर बनता है तो दुनिया की सबसे सस्ती नेनो भी. घर में या घर से निकलते ही कोई न कोई टाटा प्रोडक्ट आपको दिख ही जाएगा.

विवादों में शक्ति मत गँवाओ

रतन टाटा जैसी शख्सियत विवादों में न हो यह संभव नहीं, उनकी पहली कोशिश विवाद को टालने की ही रहती है. अगर विवाद गले पद ही जाए तो उस से जल्द से जल्द बाहर निकलकर काम में जुट जाना ही अक्लमंदी है. चाहे 25 साल इम्प्रेस मिल्स में दत्ता सामंत की यूनियन की हड़ताल हो या सिंगूर में नेनो प्लांट की भूमि का मामला, हाल ही में नीरा रादिया टेप कांड में जिक्र आने के बाद रतन टाटा की छवि को धक्का लगा है लेकिन अपने कारोबार पर से उनका ध्यान हटा नहीं है. नेताओं से अपने संपर्कों को वे प्रचारित नहीं होने देते और मीडिया से दूरी रखते हैं.

मानव संसाधन को प्राथमिकता

टाटा समूह को दुनियाभर में अच्छा नियोक्ता माना जाता है. रतन टाटा का मानना है कि हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारे लोग ही हैं. जब देश में श्रम कानून बने भी नहीं थे, तब से टाटा समूह ने काम के घंटे, साप्ताहिक अवकाश आदि के नियम बनाये थे, उनमें से कई नियम आगे जाकर कानून बने. मुंबई में ताज होटल पर हुए आतंकी हमले के बाद रतन टाटा ने जिस तरह हर एक कर्मचारी की मदद की, चाहे वह एक दिन आनेवाला अस्थायी कर्मचारी ही क्यों ना हो, वह पूरे कार्पोरेट जगत के लिए आदर्श है. टाटा समूह के अस्पताल, शिक्षा और खेल संस्थान अपनी अलग पहचान रखते हैं.

क्वालिटी का पर्याय

रतन टाटा ने ब्रांड टाटा को क्वालिटी का पर्याय बनाने की जिद में पूरे ग्रुप को ही फिर से डिजाइन किया, इसके लिए कंपनियों के विलय और अधिग्रहण को हथियार बनाया गया. आगे की योजनाएं, ग्राहकों का रुझान, वित्तीय संरचना पर फोकस किया गया. ग्रुप में से भाई भतीजावाद को ख़त्म कर प्रतिभों को आगे लाया गया, निवेशकों को रिझाने में वे कामयाब रहे. अपनी प्रतिभा और मेहनत के बूते पर टाटा समूह के प्रमुख बीते १४ साल से उत्तराधिकारी तलाश रहे हैं और अब उनका भरोसा है कि दिसंबर २०१२ तक वे यह जिम्मेदारी किसी और को सौंप देंगे.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
1 मई 2011 को प्रकाशित

Friday, April 22, 2011

सचिन तेंदुलकर (38)




सचिन जुबान कम और बल्ला ज्यादा चलाने में यकीन करते हैं. सचिन किसी को भी शब्दों से जवाब नहीं देते, उनका हर जवाब बल्ला देता है सवाल चाहे उनकी फिटनेस पर हो या फ़ार्म पर, रिटायरमेंट पर हो या उम्र पर.



अनोखे सचिन की अनोखी बातें

सचिन तेंदुलकर महानतम क्रिकेटर हैं. उनकी किसी से भी तुलना उनका अपमान होगा. कहा जाता है कि उनके बनाये और तोड़े गए रेकार्ड्स पर कोई भी किताब सही नहीं होती क्योंकि जब तक किताब छपकर आती है, सचिन के नाम और भी नए रेकार्ड्स हो जाते हैं. अनेक पुरस्कारों और सम्मानों के अलावा उन्हें भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्मविभूषण' दिया जा चुका है पर लोग उन्हें 'भारत रत्न' से कम नहीं समझते. कोई भी दौलत, शोहरत, सम्मान और प्रशंसा उनके लिए मामूली है. कैटरीना कैफ उनकी फैन हैं और धोनी ने किसी क्रिकेटर का ऑटोग्रॉफ नहीं लिया लेकिन वे सचिन का ऑटोग्रॉफ संभालकर रखना चाहते हैं.

सचिन के पास अरबों की संपत्ति है लेकिन उनके पास एक-एक रुपये के वे 13 सिक्के भी हैं जो उन्होंने सबसे पहले जीते थे. उनके गुरु रमाकांत आचरेकर प्रैक्टिस के दौरान स्टंप पर एक रुपये का सिक्का रख देते थे, जो गेंदबाज सचिन का स्टंप उड़ा देता, सिक्का जीत जाता और अगर सचिन नाबाद रहते तो सिक्का सचिन जीत जाते. 24 अप्रैल 1973 को जन्मे सचिन 1987 में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में भारत जिम्बाब्वे मैच में बॉल बॉय थे. सुनील गावस्कर ने अपने अल्ट्रा लाइट पैड और दिलीप वेंगसरकर ने इंग्लिश विलो का अपना क्रिकेट बैट सचिन को गिफ्ट किये थे, जो आज भी उनके लिए अनमोल हैं. सचिन के पिता रमेश तेंदुलकर मराठी साहित्यकार थे और संगीतकार सचिन देव बर्मन के फैन, इसीलिये उन्होंने अपने बेटे का नाम सचिन रखा. मुंबई के बांद्रा पूर्व में सचिन का परिवार डॉ धर्मवीर भारती का पड़ोसी था और सचिन के बल्ले से टकराकर जब घरों की खिड़कियों के कांच टूटते तो सचिन के पिता उन्हें डांटने के बजाय इनाम देते. बड़े भाई अजीत ने सचिन के भाई, दोस्त, गाइड और क्रिकेट-अभिभावक की भूमिका निभाई और खुद क्रिकेट प्रेमी होते हुए भी अपनी पूरी जवानी छोटे भाई के लिए समर्पित कर दी. आज लोग सचिन को क्रिकेट का भगवान तक कहते हैं लेकिन सचिन की सफलता का यह सफ़र आसान नहीं रहा. मेहनती, अनुशासित और ईमानदार खिलाड़ी सचिन की महान कामयाबी के कुछ सूत्र :

एक्शन स्पीक्स लाउडर देन वर्ड्स
सचिन जुबान कम और बल्ला ज्यादा चलाने में यकीन करते हैं. हर महान खिलाड़ी की तरह उनके भी अनेक आलोचक हैं लेकिन सचिन किसी को भी शब्दों से जवाब नहीं देते, उनका हर जवाब बल्ला देता है सवाल चाहे उनकी फिटनेस पर हो या फ़ार्म पर, रिटायरमेंट पर हो या उम्र पर. खुद पर उठी हर अंगुली का जवाब वे गरजते बल्ले से देते हैं. हर आरोप का खंडन एक्शन से, हर सवाल का जवाब बेहतर से बेहतरीन होता परफार्मेंस. जब-जब आलोचकों को लगता था कि अब सचिन का खेल ख़त्म, तब-तब सचिन फीनिक्स की तरह उभरकर सामने आये हैं.

बिना अभ्यास के मत खेलो
जिन्दगी में क्रिकेट हो या कुछ और, अभ्यास ज़रूरी है. आपने कितनी भी सेंचुरी मारी हो, कितने भी रेकार्ड्स बनाये हों, हर मैच के पहले उस मैदान पर प्रैक्टिस ज़रूर ज़रूर करो, जहाँ अगला मैच खेला जाना है. सामने आते हुई हर गेंद वही और वैसी गेंद नहीं होगी, जैसी पिछली थी. ध्यान रहे कि हर परीक्षा आखिर परीक्षा ही है, हर प्रोजेक्ट नया प्रोजेक्ट ही है, हर कंज्यूमर नया ही कुछ चाहता है. बिना अभ्यास के मैदान में जाना खतरे से खाली नहीं. हर खतरे से संघर्ष की पूरी तैयारी रखो.

सही वक़्त पर रिस्क लो
हर जगह नयी रणनीति होना चाहिए. जो शाट टेस्ट मैच में रिस्क हो सकता है, वन डे में ज़रुरत और टी 20 में अनिवार्यता हो सकती है. हर पारी की शुरूआत सावधानी से करना चाहिए. बगैर रिस्क उठाये तो कुछ नहीं हो सकता. लेकिन रिस्क कब उठाना है, तय करो. मैदान में जाते ही खतरनाक गेंदों पर रिस्क मत लो. पहले मैदान पकड़ो, फिर बहादुरी दिखाओ. रिस्क तो लेनी ही है, पर पहले आसान सवालों के जवाब देना ठीक होता है. रिस्क कहाँ लेना है, हर खतरा सोच समझकर उठाना ही अक्लमंदी है.

टीम की तरह खेलो
हर मैच में खेलते तो खिलाड़ी हैं, लेकिन जीतती या हारती टीम है. हमेशा टीम भावना से खेलो. अपनी सेंचुरी से ज्यादा टीम की जीत ज़रूरी होती है. काम ऐसा करो कि आपकी मौजूदगी से टीम का हौसला बढ़े और जीत करीब आने लगे. याद रखो, एक टीम में कैप्टन एक ही हो सकता है, इसलिए कैप्टन को जीत में मदद करो. यह भी मत भूलो कि हर मैच मैदान में ही नहीं खेला जाता, वह ड्रेसिंग रूम में और मीडिया में भी खेला जाता है.

ईमानदार रहो
ईमानदारी कभी भी ना छोड़ो, चाहे सौवीं सेंचुरी से ही क्यों ना चूक रहे हों. 450 वें वनडे में 20 मार्च 2011 को सचिन चार गेंदों पर दो रन बना कर आउट हो गए. हजारों दर्शक, करोड़ों फैन्स उनकी सौवीं सेंचुरी का इंतज़ार कर रहे थे. सचिन वेस्ट इंडीज़ के फ़ास्ट बॉलर रवि रामपाल की शॉट पर खेलने से चूक गए थे और बॉल सचिन के बैट से किनारा करते हुए विकेटकीपर ड्वेन थॉमस के हाथों में जा चुकी थी लेकिन अम्पायर स्टीव डेविस ने उन्हें नॉट आउट करार दे दिया था लेकिन फिर भी सचिन एक पल भी गवांये बिना पैवेलियन लौटने लगे और खुद को कैच आउट होने दिया. .... हो सकता था सचिन सौवीं सेंचुरी बना लेते, लेकिन क्रिकेट प्रेमियों के दिल में जो जगह उन्होंने बनाई है, वह बहुत बड़ी बात है.

सही तरीके से खूब कमाओ
पैसा हमारी ज़रुरत है, खूब कमाओ, लेकिन सही तरीके से. सचिन ने वर्ल्डटेल से 1995 में 30 करोड़ और 2001 में 80 करोड़ के विज्ञापन करार किये थे. 2006 में साची एंड साची से यही करार 180 करोड़ में किया. उन्होंने टूथ पेस्ट से लेकर टायर तक का विज्ञापन किया लेकिन कभी भी शराब या तम्बाखू उत्पादों के सरोगेट (छद्म) विज्ञापन नहीं किये. कैंसर और एड्स जैसी बीमारियों के प्रति जागरूकता के विज्ञापन उन्होंने आगे बढ़कर किये. मुंबई और बंगलुरु में उनके तीन रेस्टोरेंट्स हैं और फ्यूचर ग्रुप के साथ वे हेल्थ प्रोडक्ट्स सेक्टर में आ रहे हैं.

दूसरों की मदद करो
सचिन हर साल 200 बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते रहे हैं और अब इनकी संख्या 400 करने जा रहे हैं. कैंसर पीड़ितों के लिए उनके अभियान में एक करोड़ रुपयों से भी ज्यादा धनराशि इकट्ठा की गयी. चंदा इकठ्ठा करने के लिए सचिन ने बच्चों को क्रिकेट की कोचिंग की और ट्विटर पर अभियान चलाया. उनकी चौदह साल की बेटी सारा की प्रेरणा और मदद इन सब कामों में रहती है.

जो सही लगे, वही करो
सचिन को निजी जीवन में भी जो सही लगता है वही करते हैं. एक मानद डॉक्टरेट की उपाधि उन्होंने विनम्रता से नामंजूर कर दी, लेकिन इंडियन एयर फ़ोर्स में मानद ग्रुप कैप्टन का प्रस्ताव मान लिया. 1995 में जब सचिन 22 साल के थे, तब उन्होंने अपने से उम्र में 6 साल बड़ी डॉ अंजलि मेहता से शादी की थी, कई लोगों को यह जोड़ी बेमेल लगी लेकिन सचिन ने किसी की परवाह नहीं की. उनके साथी खिलाड़ियों ने कई बार उन पर ताने भी कसे लेकिन सचिन ने उन्हें नज़रंदाज़ कर दिया. विनोद काम्बली और अज़हरुद्दीन के बयानों पर वे चुप रहे. क्लबों में जाकर हंगामा करना, डांस करना उन्हें कभी भी पसंद नहीं रहा.

परिवार पर ध्यान ज़रूरी
सचिन पारिवारिक व्यक्ति हैं. वर्ल्ड कप जीतने के बाद टीम के साथ जश्न मनाते वक़्त स्टेडियम में उनके साथ बेटी सारा और बेटा अर्जुन भी टीवी पर नज़र आ रहे थे. सेलेब्रिटी होने के कारण वे परिवार के साथ कहीं भी आराम से नहीं जा सकते इसलिए कभी-कभी वे देर रात अपने ड्राइविंग के शौक को पूरा करते हैं. अपनी बीवी के साथ एक बार वे विग लगाकर वरली के सत्यम थियेटर में फ़िल्म देखने भी जा चुके हैं, लेकिन फिर भी इंटरवल के बाद पहचान लिए गए और वापस लौटना पड़ा. परिवार या मेहमानों के लिए वे खुद ही चाय बनाना पसंद करते हैं और कभी-कभी उनके परिवार को उनके हाथों का बना बैंगन का भुरता भी खाना पड़ता है !

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 24 april 2011

Thursday, April 14, 2011

कामयाबी यों ही नहीं मिलती



सालाना निजी कमाई (वेतन और निवेश से)करीब 8 अरब डॉलर है यानी रोजाना दो करोड़ डॉलर से ज्यादा,हर मिनिट 16 हजार और हर सेकण्ड 250 डॉलर से भी ज्यादा! बिल गेट्स अपने तीन बच्चों के लिए सारी जायजाद छोड़कर नहीं जाना चाहते, उनका मानना है कि अगर मैं अपनी संपत्ति का एक प्रतिशत भी उनके लिए छोड़ दूं तो वह काफी होगा.



बिल गेट्स और उनके सफलता - सूत्र

बिल गेट्स दुनिया के सबसे अमीर लोगों में हैं. वे महादानी भी हैं. 28 अक्टूबर 1955 को उनका जन्म हुआ था लेकिन 32 साल पूरे होने के पहले ही 1987 में उनका नाम फ़ोर्ब्स की अरबपतियों की लिस्ट में आ गया और कई साल तक वे इस लिस्ट में नंबर वन पर भी रहे. 2007 में उन्होंने 40 अरब डॉलर (176 अरब रुपये) का दान दे दिया. वे माइक्रोसाफ्ट के चैयरमैन हैं, जिसका 2010 का कारोबार 63 अरब और मुनाफा करीब 19 अरब डॉलर का था. उनकी सालाना निजी कमाई (वेतन और निवेश से) करीब 8 अरब डॉलर है यानी रोजाना दो करोड़ डॉलर से ज्यादा, हर मिनिट 16 हजार और हर सेकण्ड 250 डॉलर से भी ज्यादा !

उच्च जीवन, उच्च विचार :

बिल गेट्स खाते-पीते घर के हैं. स्कूल में उन्होंने 1600 में से 1590 नंबर पाए थे, पढाई के दौरान ही कंप्यूटर प्रोग्राम बनाकर 4200 डॉलर कमाए और टीचर से कहा कि मैं 30 की उम्र में करोड़पति बनकर दिखाऊंगा, सो पहले ही दिखा दिया और 31 की उम्र में वे अरबपति बन गए. बिल गेट्स को दिखावे का शौक नहीं है, वे विलासितापूर्वक नहीं रहते, लेकिन वे व्यवस्थित, शानदार जीवन जीते हैं. डेढ़ एकड़ के उनके बंगले में सात बेडरूम, जिम, स्विमिंग पूल, थियेटर आदि हैं. पंद्रह साल पहले उसे करीब ६० लाख डॉलर में करीदा गया था. उन्होंने लियोनार्दो ला विन्ची के पत्रों / लेखों को तीन करोड़ डॉलर में खरीदा था. ब्रिज, टेनिस और गोल्फ के खिलाड़ी बिल गेट्स अपने तीन बच्चों के लिए सारी जायजाद छोड़कर नहीं जाना चाहते, क्योंकि उनका मानना है कि अगर मैं अपनी संपत्ति का एक प्रतिशत भी उनके लिए छोड़ दूं तो वह काफी होगा. उन्होंने दो चर्चित किताबें भी लिखीं हैं -- दी रोड अहेड और बिजनेस@ स्पीड ऑफ़ थोट्स.1994 में उन्होंने अपने काफी शेयर्स बेच दिए और एक ट्रस्ट बना दिया. 2000 में उन्होंने अपने तीन ट्रस्टों को एक कर दिया और पूरी पारदर्शिता से दुनिया भर के लोगों की मदद करने लगे. बिल गेट्स की कमाई, एकाधिकारी व्यावसायिक नीति और प्रतिस्पर्धा उन्हें बार बार विवादों में भी धकेलती रही है. 16 साल तक फ़ोर्ब्स की अरबपतियों की लिस्ट में नंबर वन रह चुके बिल गेट्स ने अपनी कामयाबी के सूत्र इस तरह बताते हैं:

दुनिया बदलो या घर बैठो :

क्या आपमें है कुछ कर गुजरने की तमन्ना? क्या आप के पास है कोई मक़सद, कोई विजन, कोई आइडिया, कोई इन्नोवेशन ? यदि कोई ऐसा लक्ष्य नहीं है तो घर बैठिये और अगर जवाब हाँ है तो अपनी योग्यता को आंकिये और अपने काम में जुट जाइए.

रास्ते खुद बनाओ :
आज जो भी रास्ते हैं वे हमेशा से नहीं थे. किसी ना किसी ने तो उन्हें बनाया ही है. नए रास्ते बनाने की कोशिश पर हो सकता लोग आपको सनकी कहें, पर आप डिगें नहीं. जब मैंने हर डेस्क और हर घर में कंप्यूटर होने की कल्पना की थी तब किसी को इस बात की कल्पना नहीं थी. मुझे भरोसा था कि कंप्यूटर हम सब की जिन्दगी को बदलकर रख देंगे.

उसूलों पर डटे रहो :
कभी भी अपने उसूलों से ना डिगो. याद रखो, सभी लोग केवल धन के लिए काम नहीं करते. मेरे साथ जितने भी लोगों ने काम शुरू किया था वे सब जानते थे कि वे धन कमाने के लिए नहीं, लोगों की जिन्दगी बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे हैं. हम टेक्नोलोजी की मदद से लोगों का जीवन आसान बनाना चाहते थे, और वह हमने कर दिखाया जो धन कमाने से ज्यादा बड़ा काम है. उनकी हमेशा मदद करो जो संसाधनों से वंचित हैं.

हमेशा आगे की सोचो :

दुनिया तेज़ी से बदल रही है, अगर आप आगे की नहीं सोच सकते तो पिछड़ जायेंगे. आपको संभलने का वक़्त ही नहीं मिल पायेगा. आप को खेल में आगे आने के लिए और यहाँ तक कि खेल में बने रहने के लिए भी आगे की बातें सोचना ज़रूरी है. इसके लिए कड़ी मेहनत के साथ ही नवाचार (इन्नोवेशन) ज़रूरी है. बाज़ार की ज़रूरते क्या क्या रहेंगी यह जानना आवश्यक है.
आपका सर्वश्रेष्ठ तभी, जब सही लोग हों :
कोई भी प्रतिभा तभी किसी कार्य को सही अंजाम तभी दे सकती है, जब उसे सही लोगों का साथ मिले. अगर आप में बहुत प्रतिभा है लेकिन सहकर्मी और नियोक्ता आपका साथ ना दें तो? उच्च लक्ष्य को लेकर सर्वश्रेष्ठ योग्यता से काम करनेवाले लोग ही कामयाबी पा सकते है. अगर मेरे साथ पॉल एलेन और स्टीव बाल्मेर जैसे प्रतिभाशाली और चमकदार मित्र और सहकर्मी नहीं होते जो मेरी कमियों को दूर कर देते थे तो आज मैं इस जगह नहीं पहुँच पाता.

सिस्टम बनाओ :
कोई भी काम करने के लिए एक सिस्टम ज़रूरी है जिससे कि सारे काम आसानी हो सके. यह सिस्टम माइक्रो या मेक्रो हो सकता है. जरूरी नहीं कि आप ही सिस्टम बनायें, आप कोई भी अच्छा सिस्टम अपना सकते हैं. सिस्टम के चक्र उर लीवर का लाभ आपको मिल जाएगा, लेकिन ये ध्यान रखिये कि कहीं यह सिस्टम अनुत्पादकता और निकम्मेपन को तो नहीं बढ़ा रहा? अक्सर लोग सिस्टम अपनाकर उसे भूल जाते हैं और वही सिस्टम घुन बनकर संस्था को बर्बाद कर देता है.

समस्या को समझो और टुकड़ों में हल करो :

किसी भी समस्या को दूर करने के लिए उसे बारीकी से समझना ज़रूरी है. हो सकता है कि वह समस्या एक झटके में दूर ना हो सके, ऐसे में उसे टुकड़ों में बांटकर हाल किया जा सकता है. इस तरीके से बड़ी से बड़ी और तात्कालिक समस्याओं से भी पार पाया जा सकता है.

नाकामी को भी मत भूलो :
अपनी हर कामयाबी का जश्न ज़रूर मनाओ, जिससे आपको अपनी कामयाबी पर नाज हो और आप हर कामयाबी को पाना चाहें, लेकिन कभी भी अपनी नाकामी को भी मत भूलो. अपनी नाकामी से सबक सीखो और उसे रिपीट मत होने दो.

अपने लोगों का ध्यान रखो :
याद रखो टेक्नोलॉजी केवल एक टूल है, काम लोग ही करते हैं, इसलिए अपने सभी सहकर्मियों का ध्यान रखना ज़रूरी है. उन्हें कुछ और अधिकार देकर आप और ज्यादा ज़िम्मेदार भी बना सकते हैं. आपका व्यवहार न केवल सहकर्मियों के साथ, बल्कि सभी के साथ अच्छा होना चाहिए, हो सकता है कि उन्हीं में से किसी के लिए आप को काम करना पड़ जाए.

संतोष और धन :

कॉलेज से बाहर आते ही अपने बहुत धन नहीं कमाया, कोई बात नहीं, आपकी जो इनकम होनी चाहिए थी, नहीं है? कोई बात नहीं.क्या आपने अपने काम के लिए कड़ी मेहनत की? क्या आपको उस मेहनत से संतोष प्राप्त हुआ? आपने कितना कमाया यह किसी और का चर्चा का मुद्दा क्यों हो अगर आप किसी के लिए बोझ नहीं हैं तो?
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 17 अप्रैल 2011

Friday, April 08, 2011

खिलाड़ियों का खिलाड़ी -- गैरी कर्स्टन




क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने का जितना श्रेय खिलाड़ियों को है, उतना ही 'पत्थरों को मील का पत्थर' बनानेवाले कोच गैरी कर्स्टन को भी है तभी तो वर्ल्ड कप जीतने के बाद खिलाड़ियों ने सचिन को तो कंधे पर उठाया ही था गैरी कर्स्टन को भी यह इज्ज़त बख्शी थी.


गरिमामय गुरु और कमाल के कोच -- गैरी कर्स्टन
क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने का जितना श्रेय खिलाड़ियों को है, उतना ही 'पत्थरों को मील का पत्थर' बनानेवाले कोच गैरी कर्स्टन को भी है तभी तो वर्ल्ड कप जीतने के बाद खिलाड़ियों ने सचिन को तो कंधे पर उठाया ही था गैरी कर्स्टन को भी यह इज्ज़त बख्शी थी. गैरी कर्स्टन अब अपने वतन दक्षिण अफ्रीका चले गए हैं और वहां अपनी बीवी-बच्चों के साथ वक़्त बिता रहे हैं. वर्ल्ड कप जिताने के बाद अब उनके पास एक से बढ़कर एक ऑफर्स आ रहे हैं, इनमें उनके अपने देश की टीम का कोच बनाने से लेकर सिडनी सिक्सर्स और सिडनी थंडर्स के नाम प्रमुख हैं. वर्ल्ड कप जिताने के लिए कोच ने केवल मैदान में ही मेहनत नहीं की, बल्कि ड्रेसिंग रूम और होटलों के कमरों तक को क्रिकेट का रण बना दिया. कोच के रूप में गैरी कर्स्टन ने खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को जगाया और खिलाड़ियों को 'थॉटफुल मैनर्स' में ड्रेसिंग रूम के विवादों से भी बचाया. उन्होंने सचिन को रोल मॉडल के रूप में आगे बढ़ाया और धोनी को श्रेष्ठतम कैप्टन के रूप में. गौतम गंभीर उन्हें चमत्कारिक प्रयोगों के लिए क्रेडिट देते हैं और भज्जी बल्लेबाजी में सुधार के लिए. पठान और रैना उन्हें अपने परिवार का वरिष्ठ मानते हैं. नेहरा और श्रीसंत अपने खेल में सुधार के लिए उनके प्रति आभार मान रहे हैं.

गैरी कर्स्टन ने टीम इण्डिया को सही समय पर अलविदा कहा है. कोई पर्वतारोही एवरेस्ट पर फतह कर ले तो उसके पास फतह करने को बचता ही क्या है? गैरी ने भारतीय टीम की जीत की डिजाइन बड़ी शिद्दत से बनाई और उस पर अमल कराया. वर्ल्ड कप के पहले उन्होंने सौ से ज्यादा पेज का एक ब्ल्यू प्रिंट तैयार किया था, जिसके मुताबिक़ खिलाड़ियों के ड्रेसिंग रूम में बॉक्सर मोहम्मद अली और साइकिलिस्ट आर्मस्ट्रॉंग की तस्वीरें लगाईं गयीं थी. खिलाड़ियों को सलाह थी कि वे अपने आप पर नियत्रण रखें और मीडिया से पूरी तरह दूर रहें. होटलों के कमरों से टीवी हटवा दिए जाते थे और अखबार पढ़ने को दिए ही नहीं जाते थे ताकि खेल समीक्षा से बचा जा सके. हर खिलाड़ी के लिए अलग अलग हालात में अलग भूमिका तैयार होती थी, जो दोहराई नहीं जाती. हर मैच की रणनीति अलग. अलग अलग देशों की टीम के अलग नाम थे जैसे बांग्ला देश की टीम डेंजरस फ्लोटर्स के नाम से, दक्षिण अफ्रीका टीम डेंजरस चोकर्स (खरनाक मगर चूकनेवाले), आयरलैंड टीम इजी मीट नाम से पुकारी जाती थी. इन नामों को दोहराने भर से टीम इण्डिया के अवचेतन मन में आ जाता था कि अब उन्हें किस तरह की टीम से मुकाबला करना है.

गैरी कर्स्टन ने अपने करीब तीन साल के कार्यकाल में सबका दिल जीत लिया. विदेशी होने के बावजूद टीम इण्डिया का प्यार पाना बहुत मायने रखता था. टीम के हर सदस्य ने उनकी विदाई के वक़्त कसीदे पढ़े. पूर्व टीम सदस्यों ने भी उन्हें बेमिसाल कोच कहा था. खिलाड़ी उन्हें अपना समझते थे, यह भावना पैदा करने में ही उनकी कामयाबी थी.

गैरी कर्स्टन ने अपने देश दक्षिण अफ्रीका के लिए 101 टेस्ट और 185 वन डे खेले हैं. सलामी बल्लेबाज़ के तौर पर उन्होंने कई यादगार पारियां खेली थीं. वे विश्वसनीय फिल्डर भी रहे. इंग्लैण्ड के खिलाफ एक टेस्ट में उन्होंने साढ़े 14 घंटे खेलते हुए 275 रन बनाए थे. 2004 में रिटायर होने के तीन साल बाद उन्होंने दो मित्रों के साथ केप टाउन में परफार्मेंस ज़ोन नामक कंपनी बनायी थी जो उनके भारत आने के बाद भी कामकाज करती रही. 23 नवम्बर 1967 को जन्मे गैरी कर्स्टन के दो बेटे हैं.
प्रकाश हिन्दुस्तानी


हिन्दुस्तान
10 april 2011

Saturday, April 02, 2011





महेंद्र सिंह धोनी खुद अपने अनुभव और विवेक से साहसिक फैसले लेते हैं और कामयाबी या नाकामी दोनों की ज़िम्मेदारी कबूलते हैं. पूरी टीम को साथ लेकर चलाना, टीम की हर कमी और खूबी से वाकिफ रहना, हर खिलाड़ी को आगे बढ़ाने का मौका देना, टीम में आपस में विश्वास को बनाये रखना, मौके और माहौल को देख रणनीति बनाना और उसे बदलना और इस सब से बढ़कर हार या जीत के बाद भी उससे अपने व्यक्तित्व को प्रभावित नहीं होने देना निश्चित ही एक अच्छे कप्तान की खूबी है.


कूल कप्तान और कार्पोरेट लीडर : महेंद्र सिंह धोनी

आईआईएम इंदौर के स्ट्रेटेजिक मैनेजमेंट के प्रोफ़ेसर प्रशांत कुलकर्णी की टीम की स्टडी बताती है कि महेंद्र सिंह धोनी में सफल कप्तान के साथ-साथ सफल कार्पोरेट लीडर के गुण भी हैं. टीम की हार-जीत तो लगी ही रहती है, लेकिन कामयाब लीडर उसे ज्यादा गरिमामय बना देता है. धोनी केवल अपने लिए नहीं, पूरी टीम इण्डिया के लिए खेलते हैं. पूर्व कप्तान कपिल देव का मानना है कि धोनी एक ग्रेट गेम्बलर हैं जो खेल के हर दांव को खेलने में माहिर हैं. धोनी की लीडरशिप में ही टीम इन्डिया टी-20 सिरमौर बनी. सीबी सीरिज, बोर्डर-गावसकर ट्राफी और आई पी एल 2010 में चेन्नई सुपर किंग की जीत हुई. हालात को सूंघने और बेबाक निर्णय लेने की उनकी कला जगजाहिर है.

धोनी ने मीडिया को कभी तवज्जो नहीं दी, फिर भी वे मीडिया के प्रिय सितारे हैं. धोने को दिखाते हैं तो टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ जाती है. पर लगता है कि उन्हें टीवी वालों से एलर्जी है. अपनी शादी के वक्त रिरियाने- गिड़गिड़ाने के बावजूद उन्होंने फूटेज नहीं लेने दी और बेचारे न्यूज चैनलवालों को धोनी की शादी के घोडीवाले से बात करके ही संतोष करना पड़ा था. टीम इण्डिया में धोनी से भी वरिष्ठ खिलाड़ी भी हैं और वे भी धोनी के फैसलों को गंभीरता से स्वीकार करते हैं. टीम इण्डिया को इस मुकाम तक लाने में धोनी का योगदान बहुत ज्यादा है. वे खुद अपने अनुभव और विवेक से साहसिक फैसले लेते हैं और कामयाबी या नाकामी दोनों की ज़िम्मेदारी कबूलते हैं. पूरी टीम को साथ लेकर चलाना, टीम की हर कमी और खूबी से वाकिफ रहना, हर खिलाड़ी को आगे बढ़ाने का मौका देना, टीम में आपस में विश्वास को बनाये रखना, मौके और माहौल को देख रणनीति बनाना और उसे बदलना और इस सब से बढ़कर हार या जीत के बाद भी उससे अपने व्यक्तित्व को प्रभावित नहीं होने देना निश्चित ही एक अच्छे कप्तान की खूबी है.

2005 के उस धोनी को याद कीजिये जिसने पाकिस्तान के खिलाफ वन डे में 148 और श्रीलंका के खिलाफ 183 रन बनाये थे और आईसीसी ओडीआई रेटिंग में नंबर वन बने थे. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने उनकी लहराती जुल्फों की तारीफ के थी, लेकिन उप कप्तान बनते ही उन्होंने अपनी जुल्फें कटवा दीं और खेलने का तौर तरीका भी बदला. जब उन्हें कप्तानी मिली तब उनके व्यवहार में एक अलग ही तब्दीली थी. वे धोनी से 'मि. केप्टन कूल' हो चुके थे. उनकी आक्रामकता उनके फैसलों में नज़र आने लगी, हाव भाव में नहीं. टी-20 में सिरमौर बनने के जश्न में युवी और श्रीसंत डांस कर रहे थे, लेकिन धोनी शांत थे. ट्राफी मिलते ही उन्होंने अपने युवा साथियों को सौपकर यह सन्देश दिया कि यह आप सबकी है. क्रिकेट के तथाकथित विशेषज्ञ धोनी से इसलिए दुखी रहने लगे कि धोनी अपने दिमाग का इस्तेमाल बाखूबी करने लगे हैं.

धोनी फिटनेस के लिए जिम के बजाय बेडमिन्टन और फ़ुटबाल खेलने में ज्यादा यकीन रखते हैं. वे छात्र जीवन में फ़ुटबाल टीम के गोलकीपर रहे हैं. उत्तराखंड के रहनेवाले धोनी के पिता नौकरी की खातिर रांची गए और वहीँ के हो गए. वे पिछले आईपीएल में सबसे महंगे खिलाड़ी थे. विज्ञापनों से कमाई के मामले में शाहरुख़ खान के बाद धोनी ही हैं, उनकी एक विज्ञापन की तीन साल की डील ही २१० करोड़ रूपए की है. महिलाओं में उनकी लोकप्रियता गज़ब की है और हाल यह है कि उनसे धोनी को बचाने के लिए अलग महिला बॉडीगार्ड्स की जरूरत पड़ती है!

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
03 अप्रैल 2011 को प्रकाशित

Friday, April 01, 2011

छवि राजावत, एमबीए, सरपंच बाई सा.









मॉडर्न ख्यालों की, टेक्नॉलॉजी-सेवी, अंग्रेज़ीदां, हॉर्स राइडर, एसयूवी ड्राइवर, शेक्सपीयर से लेकर होटल मैनेजमेंट तक पर बहस कर सकनेवाली छवि नरेगा की बैठकों में गाँव के हालात पर बोलती तो अच्छे अच्छों की बोलती बंद हो जाती.



छवि राजावत, एमबीए, सरपंच बाई सा.

नाम - छवि राजावत,
उम्र - 30 साल,
शिक्षा - एमबीए,
शौक - घुड़सवारी,
प्रिय पहनावा - जींस टी शर्ट,
पद - सरपंच ग्राम पंचायत सोडा, (राजस्थान),
ताजा उपलब्धि - संयुक्त राष्ट्र में बीते दिनों हुए इन्फार्मेशन पावर्टी वर्ल्ड कांफ्रेंस में भारत की नुमाइंदगी.
लक्ष्य - अपनी ग्राम पंचायत के सभी लोगों के लिए शुद्ध पेयजल, सड़क, बिजली शौचालय और रोजगार मुहैया करना.

छवि को देखकर कई लोगों को लगता है कि शायद वह बॉलीवुड की कोई हीरोइन हैं या फिर मॉडल. फरवरी 2010 में ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के पहले छवि ने लाखों के टेलीकॉम कंपनी के जॉब को छोड़ा और अपने गाँव आकर पर्चा भरा. सरपंच का पद महिला आरक्षण कोटे में आने के बाद दर्जनभर से ज्यादा महिलायें दावा कर रही थीं, लेकिन छवि के पर्चा भरते ही केवल दो दावेदार बचीं. छवि के चुनाव ने यह बात गलत साबित की कि पंचायत चुनाव में जाति या धर्म का कोई रोल होता है. छवि को जिताने के लिए लोगों ने जाति, धर्म, क्षेत्र, जेंडर और यहाँ तक कि रिश्तेदारी तक को भूलकर वोटिंग की. छवि ने कहा कि जो काम 63 साल में नहीं हुए, तीन साल में करके दिखाना है. शुरूआत हो गयी और विकास के परंपरागत तरीकों के साथ ही अनेक एनजीओ और कार्पोरेट्स भी छवि की मदद करने में जुट गए. विकास में तेजी भी आई. उन लोगों का मुंह बंद हो गया जो कहते थे कि सरपंच बनने से क्या होगा? मीडिया की यह धारणा भी बदल गयी कि राजस्थान में महिला सरपंच यानी घूँघटधारी अंगूठाछाप स्त्री ! मॉडर्न ख्यालों की, टेक्नॉलॉजी-सेवी, अंग्रेज़ीदां, हॉर्स राइडर, एसयूवी ड्राइवर, शेक्सपीयर से लेकर होटल मैनेजमेंट तक पर बहस कर सकनेवाली छवि नरेगा की बैठकों में गाँव के हालात पर बोलती तो अच्छे अच्छों की बोलती बंद हो जाती.

सरपंच पद संभालते ही छवि टीवी चैनलों के लिए भी आकर्षण बन गयीं. फेसबुक पर छवि के सैकड़ों प्रशंसकों ने उनके काम को सराहा. अनेक एनजीओ मदद की पहल करने लगे. कोई माँ उनसे बायोडाटा मांगने लगी कि मेरी बेटी आप पर निबंध लिखना चाहती है तो कोई उन्हें कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनने की जिद करता है, कोई मिलने का वक्त चाहता है तो कोई उन पर डाक्युमेंटरी बनने की तमन्ना रखता है. एक साल में ही छवि आइकॉन बन चुकी हैं. लोग कहते हैं कि आप को गाँव की औरतों के साथ घुलना मिलना पसंद कैसे आता है? इस पर छवि का जवाब होता है मैं भी इसी गाँव की बेटी हूँ, ये सब मेरी बचपन की सहेलियां हैं. मुझे पढ़ाई के लिए अच्छा मौका मिला गया, बस.

छवि फौजियों के खानदान की हैं. उनके पिता को छोड़ दादा, परदादा, चाचा, बाबा सब फ़ौज में रहे. दादा रघुवीर सिंह ब्रिगेडियर थे. रिटायर होकर सोडा गाँव आ गए और गाँव का नक्शा बदलने में जुटे. लगातार तीन बार सरपंच चुने गए. छवि के परदादा सेना में कर्नल थे और आजाद भारत में सोडा के पहले सरपंच बने थे. दादा की जिद पर छवि को नो एक्जाम,नो यूनीफार्म वाले ऋषि वैली स्कूल भेजा गया, फिर अजमेर के मेयो और फिर दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज. पुणे के बालाजी मैनेजमेंट संस्थान से एमबीए के बाद छवि जयपुर में अपनी माँ के पास (जिनका अपना होटल बिजनेस है) आयीं थीं कि सोडा के लोग बस में भरकर आ गए और उनसे सरपंच का चुनाव लड़ने की मांग करने लगे. गांववालों के आगे तो छवि को झुकना पड़ा लेकिन अपने काम और इरादों से छवि ने पूरी दुनिया को अपने आगे झुका दिया है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

नईदुनिया
10 अप्रैल 2011

Friday, March 25, 2011

तुरुप का पत्ता युवराज सिंह





तुरुप का पत्ता युवराज सिंह



युवराज की क्रिकेट से पहली कमाई 500 रुपये थी जो पंजाब क्रिकेट असोसिएशन ने उन्हें दिया था. आजकल कमाई के मामले में धोनी और सचिन के बाद युवराज ही हैं. 2009 में उनकी विज्ञापनों से आय करीब 25करोड़ थी



कहाँ तो युवराज सिंह पिछले साल इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास लेने की सोच रहे थे, जब उन्हें एशिया कप और आस्ट्रेलिया के खिलाफ
वनडे टीम से बाहर कर दिया गया था, वहां चयनकर्ताओं उन्हें तुरुप का पत्ता कह रहे हैं. कहा जा रहा है अगर युवराज और अन्य फार्म में रहे तो भारत वर्ल्ड कप जीत सकता है. अब निगाहें मोहाली में होनेवाले सेमी फायनल पर होगी जो पाकिस्तान के खिलाफ खेला जाना है. टीम को यहाँ तक लाने का श्रेय युवराज को है, जो क्वार्टर फायनल में 'मैन ऑफ़ दी मैच' थे.

एक लाईन में उनका परिचय है,ये वही युवराज सिंह हैं, जिन्होंने 10दिसंबर 2007 को टी-20 मैच में इंग्लैण्ड के खिलाफ स्टुअर्ड ब्राट के
एक ओवर में 6 छक्के मारकर इतिहास बनाया था. पहला सिक्सर टी-20 के इतिहास का सबसे लम्बा सिक्सर था, दूसरा स्क्वेयर, तीसरा लांग ऑफ, चौथा ओवर प्वाइंट, पांचवां मिडविकेट पर मिस हिट और छठा लांग.
युवराज सिंह यानी भारतीय क्रिकेट टीम के मध्यक्रम के बल्लेबाज़, लेफ्ट आर्म स्पिनर, टीम इण्डिया, एशिया इलेवन, किंग्स इलेवन पंजाब, पंजाब योर्कशायर आदि टीम के स्टार खिलाड़ी. जिन्होंने पहला गोल्ड मैडल स्केटिंग में जीता था, और उसे उनके पिता योगराज सिंह ने चलती कार से बाहर फैंक दिया था और कहा था कि तुम्हें तो क्रिकेट, सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट ही खेलना है. चंडीगढ़ में ऐशो आराम से रहनेवाले युवराज के पिता ने 14 साल के बेटे को मुंबई की क्रिकेट अकेडमी में भर्ती करा दिया. युवराज अंधेरी में रहते थे और भीड़भरी लोकल ट्रेन से रोज़ चर्चगेट आते और ओवल मैदान में प्रेक्टिस करते. बरसों उन्होंने मुंबई की लोकल ट्रेन में अपना किटबैग ढोया. पंजाब की अंडर 19 टीम के कप्तान के रूप में वे सबसे पहले लाइम लाईट में आये जब उन्होंने 358 रन बनाये थे. सन 2000 में उन्हें श्रीलंका के खिलाफ अंडर 19 टीम में मौका मिला और फिर नेशनल क्रिकेट अकेडमी में उनकी जगह पक्की हो गई. उसके बाद तो उन्होंने केवल इतिहास ही बनाया है. उनका बल्ला, गेंदबाजी और फुर्तीली फील्डिंग टीम को जिताने में कोई कसर नहीं छोड़ती.

युवराज की क्रिकेट से पहली कमाई 500 रुपये थी जो पंजाब क्रिकेट असोसिएशन ने उन्हें दिया था. आजकल कमाई के मामले में धोनी और सचिन के बाद युवराज ही हैं. 2009 में उनकी विज्ञापनों से आय करीब 25करोड़ थी जो 2010 में घटकर करीब 16 करोड़ हो गई थी. इनकम टैक्स के अलावा सर्विस टैक्स के रूप में भी करोड़ों रुपये चुकाते हैं. वर्ल्ड कप जीत गए तो टीम को 18 करोड़ रुपये इनाम में मिलेंगे यानी हर खिलाड़ी को एक करोड़ से भी ज्यादा. 1983 में वर्ल्ड कप जीतने पर टीम इण्डिया को केवल पंद्रह लाख के करीब मिले थे.

विवादों का युवराज से पुराना दोस्ताना है. कभी उन पर टैक्स कम देने का इलजाम लगता है तो कभी लन्दन का आब्जर्वर उन्हें टॉप टेन घमंडी लोगों में शुमार करता है. कभी अभिनेत्री अनुषा दांडेकर से उनका नाम जुड़ता है तो कभी किम शर्मा से, कभी वे दीपिका पादुकोण के साथ बर्थडे मनाते है तो कभी मिनीषा लाम्बा के साथ उनके लिप लाक की चर्चा होती है. कभी माडल शमिता सिन्हा, कभी साउथ की करिश्मा कोटक और कभी कन्नड़ हीरोइन जेनिफर कोतवाल से उनके संबंधों की खबरें आती हैं. वे कई के साथ दोस्ती मानते हैं और यह भी कहते हैं कि दीपिका पादुकोण ने मेरा दिल तोड़ दिया.

सचिन युवराज के प्रिय खिलाड़ी हैं और अपनी जिन्दगी में पहला आटोग्राफ उन्होंने सचिन का ही लिया था. उनका कहना है कि मैं वर्ल्ड कप जीतने के लिए कुछ भी कर सकता हूँ. मैं वर्ल्ड कप जीतकर सचिन के हाथों में देखना चाहता हूँ. यह मेरे लिए एक सपने जैसा है.
प्रकाश हिन्दुस्तानी


हिन्दुस्तान
27 march 2011

Sunday, March 20, 2011

दिल तो बच्चा है जी : मि. बीन







मि. बीन का कहना है कि मैं बहुत बोर किस्म का आदमी हूँ. जिन्दगी क्लोज़ अप में ट्रेजेडी लगती है लेकिन लॉन्ग शॉट में वह है कोमेडी ही.


कॉमेडियन की ज़िंदगी का लाँग शॉट : मिस्टर बिन

मि. बीन यानी रोवन सेबेस्टियन एटकिंसन के लिए पूरी दुनिया रंग रंगीली है. नौजवान शरीर में बच्चा ! विचार और हरकतें बच्चों जैसी. मिस्टर बीन का नाम लेते ही मुस्कान आ जाती है. 'आब्जर्वर' ने उन्हें दुनिया के टॉप टेन कॉमेडियन में शुमार किया है. कॉमेडी में उनका जवाब नहीं. चार्ली चेप्लिन और पीटर सेलर्स से प्रभावित मि. बीन फिजिकल कॉमेडी करते हैं और डॉयलाग की जगह फेस एक्सप्रेशन से ज्यादा बात कह जाते हैं. यही कारण है कि उनके प्रोग्राम हर भाषा में लोकप्रिय हैं. वह हैं तो ब्रिटिश, लेकिन भारत, मिस्र, फ़्रांस, स्पेन, हंगरी, इटली जैसे देशों में भी उनकी लोकप्रियता काफी है. मंच, रेडियो, टीवी, फ़िल्म माध्यमों से वे लोगों को गुदगुदाते हैं. स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी मुस्कराहट की गारंटी होती है. वे स्क्रीन पर कभी मोनालिसा बन मुस्कराते हैं तो कभी लादेन, कभी ओबामा और कभी जेम्स बॉन्ड. मि. बीन कुछ भी करें, व्यूअर्स को मज़ा आ जाता है. उनकी तकलीफ लोगों को खिलखिलाती है. वे शहर में जाते हैं तो मज़ाक, अपना काम खुद करते हैं तो हंसी. उनका कपड़े बदलना, यात्रा करना, चर्च जाना, कार चलाना सब कुछ कॉमेडी हो जाता है.

मि. बीन के शो टीवी पर ज़बरदस्त लोकप्रिय हैं. उन पर आधारित एनीमेशन कैरेक्टर की भी धूम है. फेसबुक पर उनके चाहनेवालों की तादाद 70 लाख से भी ज्यादा है. यू ट्यूब पर भी उनके वीडियो क्लिपिंग्स खूब देखे आते हैं. उनके स्टैंडअप कॉमेडी आम तौर पर मोनोलॉग ज्यादा होती है. टीवी की दुनिया में उनका सबसे बड़ा धमाका 'नॉट दी नाइन ओ क्लॉक न्यूज़' माना जाता है और मि. बीन के नाम से बने सभी सीरियल पसंद किये गए. अब तो लोग उनका असली नाम लेना ही भूलते जा रहे हैं. मि. बीन के कार्टून कैरेक्टर बच्चों से साथ ही बड़ों में भी लोकप्रिय हैं.

मि. बीन ने सभी तरह की फ़िल्में भी की हैं जेम्स बॉन्ड जैसी जासूसी कथा हो, या प्यार मोहब्बत, वोल्ट डिस्नी के कैरेक्टर हों या कॉमेडी. 'नेवर से नेवर अगेन', 'फोर वेविंग एंड ए फ्यूनरल', दी लायन किंग', 'रेट रेस..' 'दी विचेस' जैसी करीब बीस मशहूर फिल्मों में भी काम किया है. एक्टिंग का शौक उन्हें पढ़ाई के दौरान 1976 में लगा. 1978 में उन्होंने बीबीसी रेडियो थ्री पर एटकिंसन पीपुल नामक शो भी किया लेकिन लाइमलाइट में आये 1990 में, जब टीवी पर 'नॉट दी नाइन ओ क्लॉक न्यूज़' शो पेश किया.

6 जनवरी 1955 को जन्मे मि. बीन ना केवल वाइड रेंज ऑफ़ ह्यूमरस चेहरे के मालिक हैं, बल्कि कारों के भी शौकीन है. एक पत्रिका में उन्होंने कारों - रिव्यू कॉलम भी लिखा है. स्कूल में टोनी ब्लेयर के सहपाठी रहे, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढाई करनेवाले मि. बीन का कहना है कि मैं बहुत बोर किस्म का आदमी हूँ. 1980 में उनके मुलाक़ात बीबीसी की मेकअप आर्टिस्ट सुनेत्रा शास्त्री से हुई थी, जो दस साल बाद शादी में तब्दील हुई और आज उनके दो बच्चे हैं. मि. बीन का कहना है कि जिन्दगी क्लोज़ अप में ट्रेजेडी लगती है लेकिन लॉन्ग शॉट में वह है कॉमेडी ही.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
20 मार्च 2011

Sunday, March 13, 2011



क्रिकेट के अलावा टीवी रियल्टी शो भी सट्टे के शिकार हो रहे हैं. 'झलक दिखला जा' पर करोड़ों का सट्टा खेला गया और सटोरियों ने मियांग चांग की जीत पर वारा-न्यारा किया.


रियल्टी शो में करोड़ों का सट्टा

अब तक यह बीमारी क्रिकेट में ही थी पर अब टीवी के रियल्टी शो भी इसकी जद में आ चुके हैं. j खबर है कि डांसिंग विथ स्टार्स के भारतीय संस्करण 'झलक दिखला जा' में विजेता को लेकर एक सप्ताह में करीब दो सौ करोड़ रुपये का सट्टा लगा. जिन लोगों ने मईयांग चंग की जीत पर सट्टा लगाया था उनके वारे न्यारे हो गए क्योंकि चंग बहुत दमदार डांसर नहीं माने जाते थे क्योंकि वे पेशे से डेंटिस्ट और शौकिया गायक रहे हैं जिन्होंने इंडियन आयडल थ्री में विजेता होने के बाद स्टेज शो की एंकरिंग और एक्टिंग भी शुरू कर दी है और बदमाश कंपनी फ़िल्म में शाहिद कपूर के मित्र का रोल कर चुके हैं. प्रीतीश नंदी की आनेवाली फ़िल्म सेवेंतींस में भी वह आनेवाले हैं.

'झलक दिखला जा' प्रोग्राम शुरूआत से ही बहुत चर्चित हो गया था क्योंकि इसमें शामिल होने वाले भी ख़ास थे और इसके जज भी. डांस की झलक दिखलानेवालों में 'बाबूजी ज़रा धीरे चलो' फेम याना गुप्ता भी थीं और रेणुका शहाने, शेखर सुमन, सलमान, अनुष्का मनचंदा, रागिनी खन्ना, माही विज, अंकिता लोखंडे, दयानंद शेट्टी जैसे कलाकारों के अलावा बाक्सर अखिल कुमार ने भी अपनी कला को आजमाया. सुशांत सिंह राजपूत और याना गुप्ता में से ही किसी को विजेता माना जा रहा था पर जीत मिली मईयांग चंग को. आख़िरी दौर में मईयांग चंग को सबसे ज्यादा एसएमएस मिले, जिसके आधार पर उन्हें विजेता करार दिया गया. इस मशहूर शो के होस्ट थे मोना सिंह (जस्सी) और सुमीत राघवन. यह शो इसलिए ही चर्चा में रहा कि 'धक् धक् गर्ल' माधुरी दीक्षित इसके तीन जजों में से प्रमुख थीं. मलाईका अरोरा खान और रेमो डिसूजा अन्य जज थे. इस पूरे शो के दौरान अनेक फ़िल्मी सितारों ने भी हाजिरी दर्ज कराई और डांसर्स का हौसला बढ़ाया.

झलक दिखला जा की शुरूआत ही धमाकेदार हुई थी. पहले शो में ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी और कैबरे क्वीन हेलेन के साथ ही गोविंदा, धर्मेन्द्र आदि ने प्रोग्राम में आकर झलकियाँ दिखाई थी. बाद में प्रियका चोपड़ा, रानी मुखर्जी, रितेश देशमुख आदि भी प्रतिभागियों का हौसला बढ़ाने और अपनी आनेवाली फिल्मों का प्रचार करने आ गए थे. इस डांस शो में प्रतिभागियों को सभी तरह के डांस करने थे जिनमें जाज़, साम्बा, चा चा, साल्सा, टेंगो, फोक, क्लासिकल, लोकिंग एंड पोपिंग, हिप हाप सभी तरह के डांस करने थे. हरेक के साथ एक एक जोडीदार भी था जो आम तौर पर डांस डायरेक्टर था. तेरह हफ्ते के इस प्रोग्राम में हार हफ्ते एक एक टीम आउट होती गयी. अंत तक बची मईयांग चंग, याना गुप्ता और सुशांत सिंह राजपूत की जोड़ी और फैसला होना था जनता के एस एम एस से मिले वोटों के आधार पर. यह माना जा रहा था कि मईयांग चंग मूलत: डांसर नहीं हैं इसलिए यह जीत किसी डांसर की ही होगी. कौन जीतेगा सट्टा इसी बात पर था और सटोरियों ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की होगी कि वे सट्टे में भारी मुनाफा कमायें, जिसके लिए बड़ी संख्या में एसएमएस भेजे और भिजवाये गए होंगे. मईयांग चंग पहले इंडियन आयडल थ्री के विजेता रह चुके हैं लेकिन यहाँ मामला गायन का नहीं, डांस का था और चीनी मूल के भारतीय डेंटिस्ट चंग को वोट देनेवालों की तादाद का भी अंदाज़ शायद ही था. सट्टे बाज़ार कि मज़बूरी होती है कि अगर किसी एक प्रतियोगी की जीत का बड़ा सट्टा अगर खा लिया जाए तो वह उसे हराने और मुनाफा कमाने के लिए जुट जाता है. अमेरिका में रियल्टी शो में यह आम बात है और दुनिया के कई देशों में तो सट्टा भी गैरकानूनी नहीं माना जाता.

जिस तरह क्रिकेट में होनेवाल सट्टा खेल को प्रभावित करता है वैसे ही यहाँ भी सटोरियों की वोटिंग से सही प्रतियोगियों का हौसला पस्त होता है लेकिन यहाँ बात डांस की नहीं, धंधे की है. विजेता टीम को भले ही पचास लाख रुपये मिलें, सटोरियों के तो करोड़ों रुपये लगे होते हैं. ऐसे सट्टेबाजों के बीच कलाकारों पर क्या गुजराती होगी, यह तो वे ही बता सकते हैं!
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
13 मार्च 2011

Friday, March 11, 2011





दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति का कहना है कि मैं दूसरों के लिए नहीं जीता. अगर कोई आदमी यह सोचकर ही काम करे कि दूसरे क्या सोचेंगे तो मैं ऐसे आदमी को मरा हुआ मानूंगा.... मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरी मौत के बाद लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे!


दुनिया का सबसे धनी कार्लोस स्लिम

नाम : कार्लोस स्लिम (सही नाम सेलिम, जो अरबी के सलीम से बना है).
पोजीशन : 'फ़ोर्ब्स' के मुताबिक़ दुनिया के सबसे धनवान व्यक्ति.
व्यवसाय : मेक्सिको और 11 लातिन अमेरिकी देशों में टेली कम्युनिकेशन इंडस्ट्री के सिरमौर.
संपत्ति : 7400 करोड़ डॉलर के आपपास, जो हर मिनिट बढ़ती रहती है.
पसंदीदा वाक्य : बगैर हिंसा के दूसरों की जेब से पैसा निकलना ही बिजनेस है!


16 साल बाद 'फ़ोर्ब्स' की सूची में कोई गैर अमेरिकी धन के मामले में सबसे ऊपर आया है. बिल गेट्स और वारेन बफेट को पीछे छोड़नेवाले कार्लोस मेक्सिको में रहते हैं जहाँ की अर्थ व्यवस्था पहले ही बर्बादी के कगार पर है और वहां की करीब 20 फीसदी गरीबी रेखा से नीचे रहती है. टेलीकॉम इंडस्ट्री में कार्लोस की कंपनी टेलमेक्स की हिस्सेदारी ९० फीसदी है. दुनिया की सबसे महंगी टेलीकॉम सेवा मेक्सिको में है.
गरीबों के देश की सबसे महंगी सेवा की मोनोपोली के मालिक का मानना है कि दान देने से गरीबी दूर नहीं हो सकती. फिर ही उन्होंने अपनी अकूत सम्पदा में से करीब 6 प्रतिशत दान देने की योजना बनाई है.

कार्लोस को दिखावे का ज्यादा शौक नहीं. चालीस साल से उसी घर में रह रहे हैं. शौक है कलाकृतियाँ इकट्ठी करने का. हाल ही में अपने आर्किटेक्ट दामाद के साथ मिलकर आर्ट म्यूजियम खोलने जा रहे हैं जिसमें उनकी खरीदी हुई दो हज़ार से ज्यादा कलाकृतियों को प्रदर्शित किया जाएगा. इनमें पाब्लो पिकासो, सल्वाडोर डाली, दियेगा रिवेरा आदि की कृतियाँ मुख्य होंगी. कार्लोस खुद बहुत टेक्नो सेवी नहीं हैं. उनके पास एक लेपटॉप भी है, लेकिन वे कागजों पर लिखना पसंद करते है. उनका कहना है कि मैं 'पेपर मैन' हूँ. उनका खयाल है कि इन्टरनेट नए सिविलाइजेशन का हार्ट है, लेकिन टेलीकम्युनिकेशन उसका नर्वस सिस्टम है.

दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति का कहना है कि मैं दूसरों के लिए नहीं जीता. अगर कोई आदमी यह सोचकर ही काम करे कि दूसरे क्या सोचेंगे तो मैं ऐसे आदमी को मरा हुआ मानूंगा.... मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरी मौत के बाद लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे! ...''दुनिया में ई कॉमर्स कितना भी बढ़ जाए, पुरानी चीज़ों का महत्त्व भी रहेगा ही. मकान बनाना हो तो ईंटें भी लगेगी ही.... मैं अपने पेड़ के फल शेयर करना पसंद करता हूँ, पेड़ को नहीं. इन बातों से कार्लोस का नजरिया समझा जा सका है.

28 जनवरी 1940 को जन्मे कार्लोस लेबनान के हैं और 14 साल कि उम्र में ही मेक्सिको आ गए थे. जहां उनके पिता 38 साल पहले बस गए थे. कार्लोस के पिता व्यवसायी थे और नहीं चाहते थे कि लेबनानी क़ानून के अनुसार 15 का होते ही उनका बेटा अनिवार्य फौजी सेवा में जाए. पिता से धंधे के गुर सीखनेवाले कार्लोस ने पहले रियल स्टेट और अन्य व्यवसाय किये और मेक्सिको की बदहाली के दिनों में विनिवेश होती कंपनियों को खरीदकर बहुत दौलत कमाई. वे मानते है कि शेयर बाजार में आज कोई ऊपर है तो कल नीचे हो सकता है लेकिन उनका लक्ष्य साफ है--सबसे धनी व्यक्ति होना, सबसे ज्यादा सम्मानित धनी होने को वे कोई पैमाना नहीं मानते.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
13 मार्च 2011

Friday, March 04, 2011




गायिका आशा भोसले अब हिंदी फ़िल्म 'माई' में लीड रोल करने जा रही हैं. वे हैं तो केवल 78 की, लेकिन जोश 23 साल की यौवना से भी कहीं ज्यादा है. कोई बहरा इंसान ही होगा जो उनके गीतों का फैन ना हो. मस्त, जिंदादिल, मेहनती, उत्साह से लबरेज़ आशा को हर तरह के गाने पसंद हैं. न तो मुन्नी की बदनामी से एलर्जी है, न शीला की जवानी से.



'जवान' आशा भोसले का नया रोल

इंटरप्रेन्योर, शेफ, होटेलियर, इंटीरियर डिजाइनर, गृहिणी और गायिका आशा भोसले अब हिंदी फ़िल्म 'माई' में लीड रोल करने जा रही हैं. वे हैं तो केवल 78 की, लेकिन जोश 23 साल की यौवना से भी कहीं ज्यादा है. कोई बहरा इंसान ही होगा जो उनके गीतों का फैन ना हो. मस्त, जिंदादिल, मेहनती, उत्साह से लबरेज़ आशा को हर तरह के गाने पसंद हैं. न तो मुन्नी की बदनामी से एलर्जी है, न शीला की जवानी से. उन्होंने अपने दादा की उम्र के संगीतकारों के साथ भी काम किया है और अपने पोतों की उम्र वालों के साथ भी. उन्होंने रवि शंकर के गुरु उस्ताद अली अकबर खान के साथ भी बंदिशें गाई थीं और हाल ही उनका एक अलबम सुनिधि चौहान के साथ भी आया है.

आशा भोसले ने दस साल की उम्र में फिल्मों में गाना शुरू किया था, पहला सोलो उन्होंने ग्यारह की उम्र में गया था. जब वे 16 साल की थीं, तब अपने सचिव गणपतराव भोसले से शादी कर ली थी, जो उनसे पंद्रह साल बड़े थे. लता और परिवार के दूसरे लोगों को यह पसंद नहीं था और इस कारण उनकी बोलचाल बंद हो गयी. इस शादी के करीब 12 साल बाद वे अपने पति का घर छोड़ वापस आयीं तब दो बच्चे गोद में और एक गर्भ में था. अपने सपने को जीने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की. वह दौर शमसाद बेगम, गीता दत्त और लता मंगेशकर का था. ये जो गीत ठुकराते, वही आशा झपट लेतीं. पर यह सब भी आसान नहीं था. जो गाने मिलते, वही गातीं. हेलन की आवाज़ वे बन चुकी थी. कैबरे - गीतों की सरताज. संगीतकार ओ पी नय्यर से नज़दीकी बड़ी तो लता फिर नाराज़ हो गयीं आशा और नय्यर दोनों से. 1980 में उन्होंने संगीतकार राहुलदेव बर्मन से ब्याह रचाया. राहुलदेव बर्मन और आशा ने अनेक यादगार गाने दिए हैं, जिनमें दम मारो दम (हरे राम हरे कृष्णा), महबूबा महबूबा (शोले), पिया तू अब तो आजा (कारवां), चुरा लिया है तुमने जो दिल (यादों की बरात), मेरा कुछ सामान (इजाज़त) कुछ नमूने हैं. उन्होंने बिमल रॉय की परिणीता, राज कपूर की बूट पॉलिश और बीआर चोपड़ा की फ़िल्म नया दौर में भी गाने गाये, लेकिन राष्ट्रीय पुरस्कार मिला मुजफ्फर अली की उमराव जान के गानों के बाद.

आशा भोसले वर्सेटाइल गायिका हैं. क्लासिकल, फोक, ग़ज़ल, कव्वाली, रवींद्र संगीत सभी कुछ गया है. उनके गाने में क्वालिटी भी है और क्वान्टिटी भी. वे मोस्ट रिकार्डेड गायिका हैं और करीब एक हजार फिल्मों के अलावा उन्होंने दुनिया भर में सैकड़ों स्टेज शो और अलबम्स के लिए भी गाया है. कोई बड़ा संगीतकार या गायक नहीं है, जिसके साथ उन्होंने गाया न हो. उन्होंने हिंदी, मराठी, बांग्ला, असमिया, उर्दू, तमिल, तेलुगु, नेपाली, रशियन, चेक, मलय आदि में गाने गाये हैं. भारतीय गायकों के अलावा बॉय जार्ज, माइकेल स्टिप और क्रिकेटर ब्रेट ली के साथ भी गाने गाये हैं.

1933 में जन्मीं आशा अपनी निजी ज़िंदगी में भी वर्सेटाइल हैं. दुबई, दोहा, अबू धाबी, कुवैत में उनके रेस्टोरेंट हैं. रस्सेल स्कॉट के साथ वे अगले पांच साल में 40 और रेस्टोरेंट खोलने जा रही हैं. वे लाजवाब कुक हैं और कढाई गोष्ट, बिरयानी,पाया करी, गोवन फिश करी, दाल आदि बनने में एक्सपर्ट हैं. शेफ को खुद ट्रेनिंग देती हैं. हर साल अपने घर का पूरा इंटीरियर खुद बदलती है. सफ़ेद साड़ी पर चमकीली अम्ब्रायड्री, गले में मोटी और हीरे के जेवरों के साथ ही टेनिस शू पहनना उन्हें प्रिय है. हाल ही एक बयान में उन्होंने मुंबई पुलिस को असभ्य कहा था, जिसे प्रशासन ने गंभीरता से लिया और पुलिसकर्मियों की ट्रेनिंग शुरू कर दी गयी. अब माई के रोल में उनकी भूमिका का इंतज़ार है.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
6 मार्च 2011

Friday, February 25, 2011





योग साम्राज्य का संन्यासी बाबा रामदेव


आज बाबा के समर्थक करोड़ों में हैं और उनके विरोधी भी बड़ी संख्या में हैं. उनकी हस्ती ही ऐसी है कि लोग उन्हें पसंद कर सकते हैं, नफरत कर सकते हैं या ईर्ष्या कर सकते हैं, पर नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते.




नाम : रामकृष्ण यादव उर्फ़ बाबा रामदेव.
उम्र : ४६ साल.
शिक्षा : आठवीं पास लेकिन गुरुकुल में संस्कृत और योग की पढ़ाई, तीन मानद डॉक्टरेट.
पेशा : टीवी पर प्रोग्राम देना व योग के 'इवेंट' करना.
व्यवसाय : योग के कैसेट,ऑडियो सीडी, वीसीडी, डीवीडी, एमपी थ्री, रिंग टोन का विक्रय, योग चिकित्सा व शिक्षा के अलावा जुकाम से लेकर शिश्न बड़ा करने से वक्ष सुडौल करने तक की दवाएं बेचना.
खुद की संपत्ति : शून्य.
ट्रस्टों की संपत्ति : कोई हिसाब नहीं. खुद का बैंक खाता नहीं है.
ट्रस्टों का कारोबार 1100 करोड़ से ज्यादा.
उपलब्धि : दुनिया में योग का डंका बजाना, स्वास्थ्य चेतना जगाना,
अन्य कार्य : भारत स्वाभिमान पार्टी के जनक.
दावा : मैं प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं.
पता : पतंजलि योग पीठ, हरिद्वार.


लालू यादव की बात मान बाबा रामदेव राजनीति से दूर ही रहते तो इतने विवादों में नहीं पड़ते. यों भी दूसरे संन्यासियों, नेताओं, टीवी कलाकारों को उनसे कोई कम ईर्ष्या नहीं थी. आये दिन उनकी योग चिकित्सा को चुनौतियाँ मिलती ही रहती थीं, दिव्य योग मंदिर में कम वेतन, दवा में हड्डी का अंश, कैंसर और एड्स के इलाज के दावे पर सवाल, समलैंगिकता को मानसिक बीमारी कहने पर विरोध, वन्दे मातरम विवाद पर उनकी टीका, उड़ान फेम कविता चौधरी की योग यात्रा नामक फ़िल्म में एक्टिंग, स्कॉटलैंड में दान में मिला द्वीप,...ऐसे मुद्दे हैं, जिनके कारण बाबा सुर्ख़ियों के शहंशाह बनते रहे हैं. अब सबसे बड़ा मुद्दा उन्होंने काले धन को लेकर उछाला है. वे जिस भारत स्वाभिमान पार्टी के नेता हैं, उसमें एक से दस नंबर तक वे ही सर्वेसर्वा हैं.

बाबा अन्नत्यागी हैं. दो साल से केवल फल और दूध सेवन कर रहे हैं. फिलवक्त देश में घूम-घूम कर काले धन के खिलाफ अभियान चला रहे हैं. दो साल का कार्यक्रम फिक्स है. बाबा का ही कमाल था कि लोग कोल्ड ड्रिंक्स पीने के बजाय उससे टायलेट्स साफ़ करने लगे थे जिससे गर्मी में भी कोल्ड ड्रिंक्स की खपत कम हुई और लाखों वेतन पानेवालों को नौकरी के लाले पड़ गए. करोड़ों लोगों ने योग को अपनाया और लाभान्वित हुए. अब उनका पांच सूत्री अभियान है भ्रष्टाचार मिटाना,स्वास्थ्य सेवा दिलाना, मुफ्त शिक्षा, स्वच्छता आन्दोलन और भाषाई एकता.

लिबरलाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन और प्राईवेटाइजेशन जैसे शब्दों से बाबा को नफ़रत है और नेहरू खानदान को छोड़ सभी महान नेता उनके आदर्श हैं, चाहे विवेकानंद हों या सुभाष, भगतसिंह हों या विनोबा, गांधी हों या सुभाष. उनका फलसफा है कि 99 फीसद लोग ईमानदार हैं, 100 फीसद लोग परोक्ष रूप से टैक्स देते हैं, भ्रष्टाचार ज़हर है जो देश को खा रहा है, विकास के लिए विदेशी पूंजी गैरज़रूरी है. बाबा के समर्थक मानते हैं कि काले धन वाले नेता, विदेशी पूंजी के दलाल और पेस्टिसाइड लॉबी उनके खिलाफ अभियान चला रही हैं.

कभी साइकिल से गली-गली जाकर आयुर्वेदिक दवा बेचनेवाले रामकृष्ण यादव की कहानी फ़िल्मी लगती है. 1995 में उन्होंने कर्मवीर महाराज और आचार्य बालकृष्ण के साथ ट्रस्ट बनाया था और पीछे नहीं देखा. 6 अगस्त 2006 को पतंजलि योगपीठ की स्थापना की. उसके बाद उन्होंने अपनी भूमिका बार बार बदली. आज बाबा के समर्थक करोड़ों में हैं और उनके विरोधी भी बड़ी संख्या में हैं. उनकी हस्ती ही ऐसी है कि लोग उन्हें पसंद कर सकते हैं, नफरत कर सकते हैं या ईर्ष्या कर सकते हैं, पर नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
27 फ़रवरी 2011

Friday, February 18, 2011






नकद राग का बंदी ख़याल


''मैं तो केवल पांचवीं तक पढ़ा हूँ, मुझे भारतीय कानूनों का क्या पता?'' यह बात कही थी पाकिस्तानी गायक राहत फ़तेह अली खान ने दिल्ली एयरपोर्ट पर पकड़े जाने के बाद. जयपुर में एडमैन अजय चोपड़ा के बेटे विरल कि शादी में गाना बजाना करके वे दुबई होकर कराची जानेवाले विमान में जाने को थे कि वे गैरकानूनी रूप से 124000 डॉलर नकद और 18600 डॉलर के डीडी के साथ पकड़े गए थे. ज्यादा पूछताछ की गयी तो रोने लगे. उन्हें कोर्ट में पेश किया जाता इसके पहले ही पकिस्तान का विदेश मंत्रालय सक्रिय हो गया और उन्हें छोड़ दिया गया. इसी चक्कर में उनकी वीसा की मियाद बढ़ा दी गयी.

बेशक, राहत बहुत बड़े गायक हैं. एक परफार्मेंस का कम से कम 30 लाख लेते हैं, वह भी भारतीय रुपये, चेक या डीडी में नहीं, अमेरिकी डॉलर में. तीन दर्ज़न से ज्यादा बॉलीवुड फिल्मों में संगीत दे चुके हैं, हॉलीवुड में भी संगीत देते हैं. एडी वेद्डर (Eddie Veddar) के साथ हॉलीवुड की 'डेड मेन वाकिंग' में गा चुके हैं और पश्चिम के पॉप ग्रुप के साथ अनेक अलबम आ चुके हैं. भारत और ब्रिटेन में कई सम्मान पा चुके हैं और एशियाई संगीत के स्टार हैं. पकिस्तान में उनका 'धरती-धरती' और 'हम पकिस्तान' बच्चे बच्चे की जुबां पर है और हमारे संगीतप्रेमियों के हरदिल-अज़ीज़ हैं. उनकी कव्वाली, गज़लें, शास्त्रीय गायन और सूफी संगीत की तूती बोलती है. वे छोटे उस्ताद-टू और जुनून-कुछ कर दिखाना है नामक टीवी शो के जज भी रहे हैं, जिनका मेहनताना करोड़ों में था. उनकी हरकतों पर पकिस्तान के कानून मंत्री बाबर अवान ने कहा है कि जो लोग सीमा पर प्यार के नग्मे गाते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि पकिस्तान का वजूद और गरिमा दो राष्ट्रों के सिद्धांत में ही है और मोहब्बत के तराने केवल मनोरंजन के लिए !

तेरे मस्त मस्त दो नैन(दबंग), जिया धड़क धड़क(कलयुग), नैना(ओंकारा), बोल ना हल्के हल्के(झूम बराबर), जग सूना सूना लागे(ओम शांति ओम), सजदा (माय नेम इज़ खान), ख़्वाब जो(लन्दन ड्रीम्स), मैं जहाँ रहूँ (नमस्ते लन्दन), सुरीली अंखियोंवाले (वीर), दिल ओ बच्चा है जी (इश्किया), आस पास खुदा (अंजाना अंजानी) जैसे अनेक गाने उन्होंने गाये हैं और इनमे से कई को अवार्ड मिल चुके हैं आजा नचले में गाये ओ रे पिया को तो मलयेशिया कि फ़िल्म में भी लिया गया था.

राहत का खानदान बीते 600 साल से संगीत सेवा में जुटा है. पकिस्तान के पंजाब में लायलपुर ( अब फैसलाबाद) में 1974 को जन्मे राहत के पिता फारुख अली हैं. और नुसरत अली उनके चाचा और गुरु दोनों ही थे. उनके दादा उस्ताद फ़तेह अली खान जाने माने ख़याल गायक थे (फ़तेह अली की अपने बड़े भाई अमानत अली के साथ मशहूर जोड़ी थी जो 1974 में अमानत अली के इंतकाल से टूट गयी) और परदादा अख्तर हुसैन खान भी. अख्तर हुसैन के पिता अलीबख्श जरनैल अविभाजित भारत में पटियाला घराने के गायक थे. छह साल की उम्र से राहत ने संगीत की तालीम लेना शुरू की थी और 11 साल की उम्र में उन्होंने पहला सोलो परफार्म किया था. ऐसे में राहत जैसे गायक के लिए कूटनीति तो बीच में आनी ही थी वरना उन्हें भी तिहाड़ में जग सूना सूना लागे जैसे गीत गाने पड़ते.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
20 फ़रवरी 2011

Friday, February 11, 2011





राजनीतिक मेगास्टार बनने की चाह में चिरंजीवी


वे शाहरुख़ की तरह मेहनताना लेते हैं, अमिताभ की तरह वक़्त के पाबन्द हैं, गोविंदा की तरह कॉमेडी करते हैं, रजनीकांत की तरह डांस और फाइट के सीन फिल्माते हैं, सलमान की तरह कसरत करते है, मल्लिका सहरावत की तरह फ़िल्मी नाम बदल चुके हैं, अदनान सामी की तरह वजन घटा चुके हैं, राखी सावंत की तरह लिपोसक्शन करा कर अपनी ठोडी सुन्दर बना चुके हैं, उनके बेटे, भाई, जीजा, भतीजे आदि सभी फिल्मों से जुड़े रहे हैं और अब ये सभी राजनीति के खिलाड़ी हैं. मुन्नाभाई एमबीबीएस के तेलुगु रीमेक शंकर दादा एमबीबीएस में वे ही हीरो थे. वे 149 फिल्मों में काम कर चुके हैं और अब 150 वीं की तैयारी कर रहे हैं, जो पानी के संकट को लेकर होगी. ये हैं तेलुगु फिल्मों के मेगास्टार चिरंजीवी. लोग कहते हैं कि उनकी 150 वीं फ़िल्म तो प्रजाराज्यम पार्टी ही है, जिसका प्रीमियर तिरुपति सम्मलेन के रूप में था और अब काँग्रेस में विलय के बाद वे ठुमके लगाने का काम आँध्रप्रदेश के काँग्रेस और तेलुगु देशम पार्टी नेताओं से कराएँगे.

यदि एन टी रामाराव, लालू यादव, शरद पवार, प्रमोद महाजन और जयललिता की राजनीति का कॉकटेल बनाया जाये तो उसका नाम चिरंजीवी रखा जा सकता है. वे सिद्धांतों की बातें और जाति की राजनीति करना चाहते हैं. गरीबों का नारा और कुटुंब का गणित. लक्ष्य है सत्ता और किताब में उसूल. बेमिसाल लोकप्रियता का दावा करनेवाले चिरंजीवी 2009 में दो जगहों से विधानसभा चुनाव लड़े और गृह नगर पलाकोल्लू में हारकर तिरुपति से जीते. कान्ग्रेस में विलय की बात पर उन्होंने दावा किया था कि मैं कभी भी इस बारे में सोच भी नहीं सकता. लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने शरद पवार को प्रधानमंत्री बनने के मुद्दे पर समर्थन की बात कही थी और बाद में मनमोहन की प्रशंसा में जुट गए. आन्ध्र से काटकर अलग तेलंगाना राज्य की मांग का वे समर्थन कर रहे थे, फिर कहने लगे कि विघटन से राज्य का विकास थम जायेगा. वे कहते हैं कि मैं मदर टेरेसा और एपीजे कलाम की प्रेरणा से राजनीति में आया, लेकिन मौका मिला तो अमरसिंह से गलबहियां करने में भी नहीं हिचकिचाए. वे खुद हैदराबाद के पॉश जुबली हिल्स इलाके में रहते हैं और दफ्तर खोला है खादी कोलोनी में. चिरंजीवी ने लेखक-कार्यकर्त्ता पदम् राव के ना चाहने पर भी उनकी बेटी के अंतरजातीय विवाह में जाकर आशीर्वाद दिया था, लेकिन जन उनकी अपनी बेटी श्रीजा ने अपने प्रेमी शिरीष से आर्य समाज मंदिर में विवाह किया तब चिरंजीवी के घर का कोई भी सदस्य वहां नहीं गया. कई दिनों तक नवयुगल को कोर्ट की शरण में रहना पड़ा था.

चिरंजीवी को तेलुगु फिल्मों में मेगास्टार के नाम से पहचाना जाता है, और अब वे राजनीति के मेगास्टार बनना चाहते हैं. फिल्मों की चकाचौंध से ऊब चुके चिरंजीवी को राजनीति जलवा देखना है. 2009 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को 294 में से 18 सीटें ही मिली थीं, जबकि वे त्रिशंकु विधानसभा की आस में निर्णायक भूमिका के इंतज़ार में थे. लोकसभा में भी उनकी पार्टी के चार सदस्य ही जा सके हैं. अब उन्हें लगता है कि खम्मम, रेड्डी और ब्राह्मणों के प्रभाववाले आन्ध्र प्रदेश में उनकी काप्पू जाति का भी बोलबाल हो सकता है क्योंकि उत्तर और पूर्वी गोदावरी,श्रीकाकुलम, विशाखापतनम, विजयनगरम आदि जोलों में काप्पू जाति के लोग बड़ी संख्या में हैं.

चिरंजीवी ने 8 हिंदी फिल्मों में भी काम किया है. जूही चावला के साथ 'प्रतिबन्ध', श्रीदेवी के साथ 'मैं हूँ रखवाला' और 'जुल्म की जंजीर', के अलावा इन्द्र दी टाइगर, जेंटलमैन, दुश्मनों का दुश्मन, कानून और सजा में वे हीरो थे. 1955 में जन्में चिरंजीवी ने 1977 से फिल्मों में काम शुरू किया और शुरुआती 60 फिल्मों में उन्हें छोटे-मोटे रोल में ही संतोष करना पड़ा. वे अनेक फिल्मफेयर सम्मान और पद्मभूषण से सम्मानित हो चुके है. केनिदेला शिव शंकर उनका असली नाम है और उनका दावा है कि एक रात सपने में उन्हें हनुमानजी ने दर्शन दिए और चिरंजीवी नाम से संबोधित किया. अपनी माँ के कहने पर उन्होंने चिरंजीवी नाम से काम शुरू किया और तभी से लोग उन्हें चिरंजीवी के रूप में जानते हैं.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान
13 फ़रवरी 2011