रविवासरीय हिन्दुस्तान (11 - 12- 2011) के एडिट पेज पर मेरा कॉलम
सिखाती तो नाकामी ही है
इन्फोसिस के जनक एन आर नारायण मूर्ति अब रिटायर हो गए हैं, लेकिन शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों के कारण वे लगातार चर्चा में हैं. उन्होंने तीस साल पहले, 1981 में दस हज़ार रुपये की पूंजी से इन्फोसिस शुरू की थी, जिसका टर्नओवर आज तीस हज़ार करोड़ रुपये से भी अधिक है. किंवदंती बन चुके नारायण मूर्ति हमेशा ही कुछ नया करने, अपने जीवन में मूल्यों को महत्व देने, गांधीवाद को अपनाने और सही वक़्त पर पद छोड़ने के पैरोकार रहे हैं. उन्हें शीर्ष शिक्षा संस्थान विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देने के लिए बुलाते हैं, जहाँ वे अपने अनुभवों को बाँटते हैं.
नारायण मूर्ति के प्रमुख भाषणों में से यह भाषण भी है जिसमें उन्होंने युवाओं से कहा था -- अपने कर्म से प्रेम करो, कंपनी से नहीं; क्योंकि आप यह नहीं जानते कि कंपनी कब आपसे प्रेम करना बंद कर देगी!
आराम भी ज़रूरी है, काम की तरह
''मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ, जो सप्ताह में छह दिन रोजाना 12 घंटे या उससे भी ज्यादा कार्य करते हैं, क्योंकि इमर्जेन्सी में उन्हें यह करना पड़ता है. यह कुछ ही दिनों के लिए होता है. ऐसे लोग भी होते हैं जो इतने या इससे भी ज्यादा समय कार्यालय में बिताते हैं...यह कोई अच्छी बात नहीं है. जब कार्यालयों में लोग लम्बे समय तक रहते है, वे ज्यादा गलतियाँ करते हैं और फिर उन्हें सुधारने में ही काफी वक़्त लग जाता है. वे लोग आपस में शिकायतें करते हैं, जिसका कोई अच्छा नतीजा नहीं निकलता.
मेरी सलाह है कि हमें अपने जीवन में संतुलन बनाये रखना चाहिए. मेरी राय में यह दिनचर्या लाभदायक हो सकती है : (1 ) सुबह उठो, तैयार होओ, अच्छा नाश्ता करो और ड्यूटी पर जाओ. (2 ) ड्यूटी पर आठ या नौ घंटे जमकर, स्मार्ट तरीके से कार्य करो. (3 ). घर वक़्त पर पहुँचो. (4 ). परिवार को समय डॉ, बच्चों से खोलो, किताबें पढ़ो. टीवी देखो वगैरह वगैरह. (5 ). अच्छी तरह भोजन करो और बढ़िया नींद लो.
याद रखो -- जो लोग ऊपर लिखे पहले, तीसरे, चौथे या पांचवे कार्य को ठीक से नहीं कर पाते, वे दूसरे कार्य यानी ड्यूटी ठीक से नहीं कर पाते.
जो लोग देरी से घर पहुंचाते हैं, उनका परिवार इसकी कीमत अदा करता है.
कई लोगों को लगता है कि अगर वे ऑफिस में ना रहें तो कुछ अनहोनी हो जाएगी. ...और उन्हें यह लगता ही रहता है, ऐसी अनहोनी कभी नहीं होती.
बेहतर है कि आप आराम के वक़्त आराम और काम के वक़्त काम करें. आपका आराम भी ज़रूरी है. आप आराम करेंगे, तभी बेहतर कार्य कर सकेंगे. इसीलिये मैं यह कहता हूँ कि अपने कर्म से प्रेम करो,कंपनी से नहीं; क्योंकि आप यह नहीं जानते कि कंपनी कब आपसे प्रेम करना बंद कर देगी!
खुद के अनुभव से सीखें
नारायण मूर्ति ने अपने खुद के अनुभव से सीखने को बेहद महत्वपूर्ण करार दिया है. न्यू यॉर्क विश्वविद्यालय में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था --''आप कैसे और क्या सीखते हैं यह महत्वपूर्ण है, यह नहीं कि आपने कहाँ सीखा? अगर सीखने की क्षमता और गुणवत्ता अच्छी है तो यह बात ज्यादा फायदे की है.'' इसी भाषण में उन्होंने कहा --''सफलताओं से सीखना ज्यादा कठिन है, बनिस्बत असफलताओं के. क्योंकि जब भी हम नाकाम होते हैं, हम उसके बारे में गहनता से सोचते हैं. कामयाबी मिलने पर प्राय: ऐसा नहीं होता.'' असफलता हमारे विचारों को उद्वेलित कर देती है और सफलता हमारे सभी पुराने फैसलों को सही ठहराते हुए आगे बढ़ने को प्रेरित करती है.
दरअसल हमारा दिमाग इस तरह से विकसित होता है कि अगर हमारे सामने कोई चुनौती आये तो हम उसे टालने का यत्न करेंगे. हम हमेशा उपयोगी लेकिन नकारात्मक सलाहों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. जो लोग चुनौतियों और अपनी आलोचनाओं से सीखना जानते हैं वे ही कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ पाते हैं. याद रखिये, हमारे जीवन कि सबसे बड़ी, महत्वपूर्ण और निर्णायक घटना यही होती है कि हम संकट के पलों में प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त करते है? हमारी यही भूमिका सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण है.
भारतीय परंपरा का महत्व
नारायण मूर्ति भारतीय परंपरा को बहुत महत्व देते हैं. हमारी परंपरा आत्म ज्ञान की है. यही ज्ञान का सबसे बड़ा प्रकार है. आत्म ज्ञान है क्या? यह है अपने बारे में जानना है. यह अपने आप को भीतर तक जाकर समझना है. आप अपने आप में कितना यकीन करते हैं? आपमें हौसला है क्या? और इस सबसे ऊपर यह कि मानवता का कितना अंश आपमें जीवित है? अगर आपमें मानवता का अंश नहीं बचा है तो आप कभी भी अपनी सफलता को गरिमामाय तरीके से प्राप्त नहीं कर पाएंगे. मैं अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता हूँ कि अनुभवों से सीखना इस बात पर निर्भर है कि आप अपने दिमाग को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं? आप में अपने आप को बदलने की कितनी इच्छा और कूवत है? घटनाओं पर आप के दिमाग में कब, कौन सी और कितनी तेज़ प्रतिक्रियाओं की बिजली कौंधती है?
कुछ साल पहले मैं शून्य था. आज मैं कामयाब हूँ.. मेरे जीवन में आनेवाले हर रोड़े ने, रास्ते के हर पत्थर ने मुझे सफलता की राह सुझाई है. यही रुकावटें थीं कि मैं आज सफल हो सका. मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि हमारा भवितव्य पहले से तय होता है. हम क्या करेंगे, क्या बनेंगे यह हम ही तय करते हैं. क्या आप यह मानते हैं कि आपका भविष्य लिखा जा चुका है या आप यह मानते हैं कि उसे अभी लिखा जाना है और भविष्य क्या होगा यह तय करेंगे कुछ हालात? क्या आप यह मानते हैं कि वे हालात आपके जीवन में निर्णायक घडी होंगे? क्या आपको लगता है कि आप अपनी कामयाबी की किताब खुद, स्वर्णाक्षरों में लिख सकते हैं? आप उस किताब को और भी सुन्दर, यादगार और महान बना सकते हैं? मैं यह मानता हूँ कि आप यह समझते हैं कि आपका भविष्य अनेक निर्णायक मोड़ों और शिक्षाप्रद संभावनाओं के मध्य से गुजरेगा. मैं इसी रास्ते से होकर गुजरा हूँ. यह बड़ा ही सुखकर रास्ता है, बड़ा ही दिलचस्प और उम्मीदों से भरा.
आपके निशां होंगे ज़माने पर
नारायण मूर्ति युवाओं के लिए आश्वस्त हैं उन्हें भरोसा है कि युवा वक़्त की रेत पर अपने निशां ज़रूर छोड़ेंगे. आप सब यह बात ज़रूर याद रखिये कि हम सब अपनी आनेवाली पीढ़ी के लिए अभिरक्षक या रखवाली करनेवाले हैं. हम चाहे कुछ भी उपलब्धि प्राप्त कर लें, कोई भी संपत्ति बना लें या साम्राज्य ही क्यों न खड़ा कर लें, चाहे वह आर्थिक, बौद्धिक, भावनात्मक उपलब्धि ही क्यों न हो, हम होंगे तो उसके कस्टोडियन या अभिरक्षक ही. आपके पास जो भी सम्पदा हो, उसका सर्वोत्तम उपयोग यही है कि आप उसे उन लोगों के साथ बाँटें जो कम सौभाग्यशाली हैं. मैं यकीन करता हूँ कि आप इस बात से वाकिफ हैं कि हम जो फल आज खा रहे हैं, उसे देने वाले पेड़ हमने नहीं लगाये. उनके पौधे हमने नहीं रोपे. उनके बीजों को हमने अंकुरित नहीं किया. अब यह हमारी बारी है कि हम उन पेड़ों को लगाने की तैयारी करें, जिनके फल शायद हम जीते जी नहीं खा पाएंगे, लेकिन व्यापक रूप में हमारी आनेवाली नस्लें उसका फायदा ले पाएगी. ऐसे पेड़ों को अंकुरित करना, रोपना और बड़ा करना हमारी पद्मपावन जवाबदारी है.
नारायण मूर्ति हमेशा यही कहते हैं कि मैं एक साधारण इंसान हूँ और मैंने भी कई गलतियाँ की हैं, मैं भी नाकाम हुआ हूँ, लेकिन मैं हर बार संभाला हूँ और कुछ नया, बेहतर और उपयोगी करने की कोशिश करता रहा हूँ.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
दैनिक हिन्दुस्तान 11- 12- 2011 के अंक में प्रकाशित
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Sunday, December 11, 2011
Friday, May 06, 2011
हर सफ़र का अपना मज़ा है
रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम
सफलता के सूत्र / नारायण मूर्ति
हर सफ़र का अपना मज़ा है
तीस साल पहले 1981 में छह मित्रों और केवल दस हज़ार रुपये की पूंजी से एन आर नारायण मूर्ति ने जिस इन्फोसिस कंपनी की स्थापना की थी, उसका कारोबार बीते साल करीब 30 ,000 करोड़ रुपये था. उन्होंने एक ऐसी कंपनी की नींव डाली, जिसे दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में माना जाता है. 33 देशों में सवा लाख से भी ज्यादा लोग उनके साथ काम करते हैं. उनकी कंपनी को सर्वश्रेष्ठ नियोक्ता सहित अनेक सम्मान मिल चुके हैं. एक अरब डॉलर कारोबार का आंकड़ा छूनेवाली यह पहली साफ्टवेयर कंपनी रही है. नारायण मूर्ति की तारीफ अमेरिका के राष्ट्रपति सहित अनेक दिग्गज कर चुके हैं.देश - विदेश में अनेक सम्मान पा चुके नारायण मूर्ति पहले पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण से नवाजे जा चुके हैं. दुनियाभर के आई टी क्षेत्र में भारत की छवि चमकानेवाले नारायण मूर्ति की सफलता के कुछ सूत्र :
अनुभव से सीखने का महत्त्व
आप कोई भी बात कैसे सीखते हैं? अपने खुद के अनुभव से या किसी और से? आप कहाँ से और किस से सीखते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि आपने क्या सीखा और कैसे सीखा. अगर आप अपनी नाकामयाबी से सीखते हैं तो यह आसान है. सफलता से शिक्षा लेना आसान नहीं होता क्योंकि हमारी हर सफलता हमारे कई पुराने फैसलों के पुष्टि करती है. अगर आपमें नया सीखने की कला है, जल्दी से नए विचार अपना लेते हैं और उसे काम में अपना लेते हैं तभी सफल हो सकते हैं.
परिवर्तन को स्वीकारें
हमें सफल होने के लिए नए बदलावों को स्वीकार करने की आदत होनी चाहिए. मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढाई के बाद किसी हायड्रो पॉवर प्लांट में नौकरी की कल्पना की थी. पढाई के दौरान एक वक्ता के भाषण ने मेरी जिन्दगी बदल दी जिन्होंने कंप्यूटर और आई टी क्षेत्र को भविष्य बताया था. मैंने मैसूर में इंजीनियरिंग की पढाई की. फिर आईआईटी कानपुर में पीजी किया. आईआईएम अहमदाबाद में चीफ सिस्टम्स प्रोग्रामर के नौकरी की. पेरिस में नौकरी की और पुणे में इन्फोसिस की स्थापना की. बंगलुरु में कंपनी का कारोबार बढाया. जो जगह जहाँ मुफीद लगे, वहीं काम में जुट जाओ.
संकट की घड़ी को समझें
कभी कभी संकट सौभाग्य नज़र आता है. ऐसे में धीरज ना खोएं. आपकी कामयाबी इस बात में भी छुपी है कि ऐसा वक्त आने पर आप कैसे अपनी प्रतिक्रिया देते हैं? इन्फोसिस की स्थापना १९८१ में हम सात लोगों ने की थी और १९९० में मेरे सभी साथी चाहते थे कि हम यह कंपनी बेच दें क्योंकि ९ साल की मेहनत के हमें दस लाख डॉलर मिल रहे थे. यह मेरे लिए सौभाग्य नहीं, संकट था. मैं इस कंपनी का भविष्य जानता था. तब मैंने और केवल मैंने अपने साथियों को संभाला था और इन्फोसिस को बेचने से रोका था.
संसाधनों से बड़ा होता है जज्बा
इन्फोसिस के भी 5 साल पहले नारायण मूर्ति ने आई टी में देशी ग्राहकों को ध्यान में रखकर सॉफ्ट्रानिक्स नाम की कंपनी खोली थी, जो बंद कर देनी पड़ी. 2 जुलाई 1981 को इन्फोसिस रजिस्टर्ड हुई लेकिन उनके पास कंप्यूटर तो दूर, टेलीफोन तक नहीं था. उन दिनों टेलीफोन के लिए लम्बी लाइन लगती थी. कंपनी शुरू करने के एक साल बाद उन्हें टेलीफोन और दो साल बाद कंप्यूटर उपलब्ध हो सका था. जब इन्फोसिस अपना आईपीओ लेकर आई तब भी उसे बाज़ार में अच्छा रेस्पांस नहीं मिला था. पहला इश्यु केवल एक रुपये के प्रीमियम पर यानी ग्यारह रुपये प्रति शेयर जारी हुआ था. मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों के बाद १९९३ में इन्फोसिस का शेयर ८६ रुपये के प्रीमियम पर बिका.
किसी एक के भरोसे मत रहो
1995 में इन्फोसिस के सामने एक बड़ा संकट पैदा हो गया था जब एक ऐसी विदेशी कंपनी ने उनकी सेवाओं का मोलभाव एकदम कम करने का फैसला किया. वह ग्राहक इन्फोसिस का करीब 25 प्रतिशत बिजनेस देता था. उसकी शर्तें मानना कठिन था क्योंकि जिस कीमत पर वह सेवा चाहता था, वह बहुत ही कम थी और उस ग्राहक को खोने का सीधा मतलब था, अपना एक चौथाई बिजनेस खो देना. तभी तय किया गया कि बात चाहे टेक्नॉलॉजी की हो या अप्लीकेशन एरिया की, किसी भी देश की हो या एम्प्लाई की, कभी भी किसी एक बड़े ग्राहक पर निर्भर कभी भी मत रहो. आपका कामकाज इतना फैला हो कि कोई भी आप को आदेश ना दे सके.
आप केवल कस्टोडियन हैं
जो भी सम्पदा आपके पास है वह केवल आपकी देखरेख के लिए हैं. आप उसके अभिरक्षक हैं. वह भी अस्थायी तौर पर. बस. यह ना मानें कि वह सारी सम्पदा केवल आप और आप ही भोगेंगे. किसी भी सम्पदा का असली आनंद आप तभी उठा सकते हैं जब उसका उपभोग पूरा समाज करे.यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है.
कुर्सी से ना चिपके रहें
साठ साल के होते ही नारायण मूर्ति ने अपनी कंपनी के चेयरमैन का पद छोड़ दिया और नॉन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बन गए. आम तौर पर कर्मचारियों को तो साठ साल में रिटायर कर दिया जाता है लेकिन डायरेक्टर अपने पद पर डटे रहते हैं. नारायण मूर्ति ने सभी को यह सन्देश दिया कि अगर किसी भी कंपनी को लगातार आगे बढ़ाना है तो उसमें नए खून की निर्णायक भूमिका रहनी चाहिए. नए खून में ही नयी बातों को स्वीकार करने की हिम्मत होती है और नए आइडियाज़ अपनाने में युवाओं को कोई हिचक नहीं होती.
मंजिल से ज्यादा मज़ा सफ़र में
जीवन में कोई भी लक्ष्य पा लेने में बहुत मज़ा आता है. हमें संतोष मिलता है कि हमने यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया. लेकिन जीवन जीना हो तो उसका असली मज़ा सफ़र जारे रखने में है. कभी भी जीवन में संतुष्ट होकर ना बैठ जाएँ कि बस, बहुत हो चुका. जब आप एक मैच जीत जाते हैं तो अगले मैच की तैयारी शुरू कर देते हैं. कोई भी मैच जीतने की अपनी खुशी होती है और खेलने का अपना मज़ा है. सागर में चलते रहना और खेल में खेलते रहना बहुत मजेदार होता है.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
हिन्दुस्तान
8 मई 2011
| यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है. |
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सफलता के सूत्र / नारायण मूर्ति
हर सफ़र का अपना मज़ा है
तीस साल पहले 1981 में छह मित्रों और केवल दस हज़ार रुपये की पूंजी से एन आर नारायण मूर्ति ने जिस इन्फोसिस कंपनी की स्थापना की थी, उसका कारोबार बीते साल करीब 30 ,000 करोड़ रुपये था. उन्होंने एक ऐसी कंपनी की नींव डाली, जिसे दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में माना जाता है. 33 देशों में सवा लाख से भी ज्यादा लोग उनके साथ काम करते हैं. उनकी कंपनी को सर्वश्रेष्ठ नियोक्ता सहित अनेक सम्मान मिल चुके हैं. एक अरब डॉलर कारोबार का आंकड़ा छूनेवाली यह पहली साफ्टवेयर कंपनी रही है. नारायण मूर्ति की तारीफ अमेरिका के राष्ट्रपति सहित अनेक दिग्गज कर चुके हैं.देश - विदेश में अनेक सम्मान पा चुके नारायण मूर्ति पहले पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण से नवाजे जा चुके हैं. दुनियाभर के आई टी क्षेत्र में भारत की छवि चमकानेवाले नारायण मूर्ति की सफलता के कुछ सूत्र :
अनुभव से सीखने का महत्त्व
आप कोई भी बात कैसे सीखते हैं? अपने खुद के अनुभव से या किसी और से? आप कहाँ से और किस से सीखते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि आपने क्या सीखा और कैसे सीखा. अगर आप अपनी नाकामयाबी से सीखते हैं तो यह आसान है. सफलता से शिक्षा लेना आसान नहीं होता क्योंकि हमारी हर सफलता हमारे कई पुराने फैसलों के पुष्टि करती है. अगर आपमें नया सीखने की कला है, जल्दी से नए विचार अपना लेते हैं और उसे काम में अपना लेते हैं तभी सफल हो सकते हैं.
परिवर्तन को स्वीकारें
हमें सफल होने के लिए नए बदलावों को स्वीकार करने की आदत होनी चाहिए. मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढाई के बाद किसी हायड्रो पॉवर प्लांट में नौकरी की कल्पना की थी. पढाई के दौरान एक वक्ता के भाषण ने मेरी जिन्दगी बदल दी जिन्होंने कंप्यूटर और आई टी क्षेत्र को भविष्य बताया था. मैंने मैसूर में इंजीनियरिंग की पढाई की. फिर आईआईटी कानपुर में पीजी किया. आईआईएम अहमदाबाद में चीफ सिस्टम्स प्रोग्रामर के नौकरी की. पेरिस में नौकरी की और पुणे में इन्फोसिस की स्थापना की. बंगलुरु में कंपनी का कारोबार बढाया. जो जगह जहाँ मुफीद लगे, वहीं काम में जुट जाओ.
संकट की घड़ी को समझें
कभी कभी संकट सौभाग्य नज़र आता है. ऐसे में धीरज ना खोएं. आपकी कामयाबी इस बात में भी छुपी है कि ऐसा वक्त आने पर आप कैसे अपनी प्रतिक्रिया देते हैं? इन्फोसिस की स्थापना १९८१ में हम सात लोगों ने की थी और १९९० में मेरे सभी साथी चाहते थे कि हम यह कंपनी बेच दें क्योंकि ९ साल की मेहनत के हमें दस लाख डॉलर मिल रहे थे. यह मेरे लिए सौभाग्य नहीं, संकट था. मैं इस कंपनी का भविष्य जानता था. तब मैंने और केवल मैंने अपने साथियों को संभाला था और इन्फोसिस को बेचने से रोका था.
संसाधनों से बड़ा होता है जज्बा
इन्फोसिस के भी 5 साल पहले नारायण मूर्ति ने आई टी में देशी ग्राहकों को ध्यान में रखकर सॉफ्ट्रानिक्स नाम की कंपनी खोली थी, जो बंद कर देनी पड़ी. 2 जुलाई 1981 को इन्फोसिस रजिस्टर्ड हुई लेकिन उनके पास कंप्यूटर तो दूर, टेलीफोन तक नहीं था. उन दिनों टेलीफोन के लिए लम्बी लाइन लगती थी. कंपनी शुरू करने के एक साल बाद उन्हें टेलीफोन और दो साल बाद कंप्यूटर उपलब्ध हो सका था. जब इन्फोसिस अपना आईपीओ लेकर आई तब भी उसे बाज़ार में अच्छा रेस्पांस नहीं मिला था. पहला इश्यु केवल एक रुपये के प्रीमियम पर यानी ग्यारह रुपये प्रति शेयर जारी हुआ था. मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों के बाद १९९३ में इन्फोसिस का शेयर ८६ रुपये के प्रीमियम पर बिका.
किसी एक के भरोसे मत रहो
1995 में इन्फोसिस के सामने एक बड़ा संकट पैदा हो गया था जब एक ऐसी विदेशी कंपनी ने उनकी सेवाओं का मोलभाव एकदम कम करने का फैसला किया. वह ग्राहक इन्फोसिस का करीब 25 प्रतिशत बिजनेस देता था. उसकी शर्तें मानना कठिन था क्योंकि जिस कीमत पर वह सेवा चाहता था, वह बहुत ही कम थी और उस ग्राहक को खोने का सीधा मतलब था, अपना एक चौथाई बिजनेस खो देना. तभी तय किया गया कि बात चाहे टेक्नॉलॉजी की हो या अप्लीकेशन एरिया की, किसी भी देश की हो या एम्प्लाई की, कभी भी किसी एक बड़े ग्राहक पर निर्भर कभी भी मत रहो. आपका कामकाज इतना फैला हो कि कोई भी आप को आदेश ना दे सके.
आप केवल कस्टोडियन हैं
जो भी सम्पदा आपके पास है वह केवल आपकी देखरेख के लिए हैं. आप उसके अभिरक्षक हैं. वह भी अस्थायी तौर पर. बस. यह ना मानें कि वह सारी सम्पदा केवल आप और आप ही भोगेंगे. किसी भी सम्पदा का असली आनंद आप तभी उठा सकते हैं जब उसका उपभोग पूरा समाज करे.यदि आपने बहुत दौलत कम भी ली है और उसका मज़ा लेना चाहते हैं तो उसे किसी के साथ शेयर करे. ये लोग आपके कर्मचारी, शेयर होल्डर, समाज के दूसरे लोग -- कोई भी हो सकते हैं. यही हमारा धर्म और दर्शन भी है.
कुर्सी से ना चिपके रहें
साठ साल के होते ही नारायण मूर्ति ने अपनी कंपनी के चेयरमैन का पद छोड़ दिया और नॉन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बन गए. आम तौर पर कर्मचारियों को तो साठ साल में रिटायर कर दिया जाता है लेकिन डायरेक्टर अपने पद पर डटे रहते हैं. नारायण मूर्ति ने सभी को यह सन्देश दिया कि अगर किसी भी कंपनी को लगातार आगे बढ़ाना है तो उसमें नए खून की निर्णायक भूमिका रहनी चाहिए. नए खून में ही नयी बातों को स्वीकार करने की हिम्मत होती है और नए आइडियाज़ अपनाने में युवाओं को कोई हिचक नहीं होती.
मंजिल से ज्यादा मज़ा सफ़र में
जीवन में कोई भी लक्ष्य पा लेने में बहुत मज़ा आता है. हमें संतोष मिलता है कि हमने यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया. लेकिन जीवन जीना हो तो उसका असली मज़ा सफ़र जारे रखने में है. कभी भी जीवन में संतुष्ट होकर ना बैठ जाएँ कि बस, बहुत हो चुका. जब आप एक मैच जीत जाते हैं तो अगले मैच की तैयारी शुरू कर देते हैं. कोई भी मैच जीतने की अपनी खुशी होती है और खेलने का अपना मज़ा है. सागर में चलते रहना और खेल में खेलते रहना बहुत मजेदार होता है.
प्रकाश हिन्दुस्तानी
हिन्दुस्तान
8 मई 2011
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