Sunday, September 11, 2011

दस साल बाद 9 / 11 की याद

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर 11 सितम्बर 2011 को प्रकाशित मेरा कॉलम




फौलादी इरादों की कामयाबी

रूडी (रुडोल्फ विलियम लुइस) गुलियानी ने न्यूयॉर्क के मेयर रहते हुए 11 सितम्बर 2001 के बाद हालात को अच्छी तरह से संभाला, वरना न्यू यॉर्क शहर की मुश्किलें और बढ़ जातीं. उन्होंने आतंकी हमले से सहमे शहर के जख्मों पर मरहम और इरादों को फौलाद की परत दी. उन्होंने मेयर के सीमित अधिकारों और असीमित हौसलों से काम किया. उससे उनका कद बढ़ गया और वे राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे. न्यूयॉर्क पर हमले के पहले अप्रैल 2000 में 55 वर्षीय गुलियानी को पता चला कि उन्हें प्रारंभिक अवस्था का प्रोस्टेट कैंसर है और उन्हें नेओअडजुवेंट लुप्रोनहार्मोनल थैरेपी और फिर एक्सटर्नल बीम रेडियोथैरेपी लेनी होगी. वे अपने कैंसर का इलाज करा रहे थे, तभी आतंकवाद के कैंसर ने न्यू यार्क शहर पर हमला कर दिया. उन्होंने अपनी बीमारी और न्यूयार्क शहर के जख्मों से राहत दिलाने की मज़बूत कोशिश की. रूडी गुलियानी के हौसले और सफलता के कुछ सूत्र :
'मेयर ऑफ़ द वर्ल्ड'
जिस दिन न्यूयॉर्क पर आतंकी हमला हुआ, गुलियानी अपनी कैंसर की बीमारी से पूरी तरह उबरे नहीं थे और परिवार के मोर्चे पर वे तनावग्रस्त थे. न्यू यॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद वे अपने स्टाफ,दमकलों, नागरिकों और पत्रकारों के साथ तत्काल पीड़ितों की मदद करने पहुंचे. उस वक़्त वहां धुल और धुंएँ के गुबार उठ रहे थे, वे जलती हुई बिल्डिंग के अंदर घायलों की मदद के लिए पहुंचे और वहां पर पूरे दिन और पूरी रात डटे रहे, एक मिनिट के लिए भी आराम करने नहीं रुके.मौके पर ही सुरक्षा और बचाव के सैकड़ों फैसले लेने थे, उन्होंने तत्काल फैसले किये और राहत कार्य शुरू किये. 'टाइम' पत्रिका ने उन्हें २००१ का 'पर्सन ऑफ़ द ईयर' चुना और शीर्षक दिया 'मेयर ऑफ़ द वर्ल्ड'.
त्वरित मदद की तैयारी
न्यूयॉर्क पर आतंकी हमले के बाद अगले दिन सुबह करीब तीन बजे पहली बार टीवी देखा. उन्होंने टीवी यह सोचकर चालू रखा कि कहीं कोई और आतंकी हमला ना हो जाए. जब जागना असंभव हो गया तब वे धूल और कीचड़ से सने जूते अपने बिस्तर के पास ही रखकर लेटे, इस तैयारी से कि अगर ज़रुरत पड़े तो मिनट भर में ही मदद के लिए दौड़ सकें. मुश्किल दौर में उन्हें नींद नहीं आई तो उन्होंने राय जेन्किन्स की लिखी चर्ची की जीवनी में दूसरे विश्वयुद्ध से सम्बंधित अध्याय पढ़ना शुरू कर दिया. जिस बात ने उन्हें प्रभावित किया, वह थी चर्चिल का भाषण --मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है सिवाय खून, आंसू और पसीने के. गुलियानी ने उस वक़्त की तुलना विश्व युद्ध के दिनों से करते हुए अपनी तैयारी कर ली थी.
पुनर्निर्माण का हौसला
गुलियानी ने १९४० के लन्दन को याद किया, जब युद्ध की विभीषिका के बीच वहां पुनर्निर्माण का दौर शुरू हुआ था. बर्बादी के उस मंज़र में उन्होंने कल्पना कर ली कि न्यूयॉर्क को फिर से उसके उसी दौर में कैसे लौटाया जाए. लोगों के हौसलों को बनाये रखने में क्या क्या मददगार हो सकता है. उनके हर वाक्य ने लोगों को हौसला दिया -- ''हमें कोई भी हमला आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता...हम फिर नया न्यूयॉर्क बनायेंगे, जो पहले से भी ज्यादा मज़बूत और शानदार होगा...हम दुनिया को बता देंगे कि हमारे हौसलों को कोई तोड़ नहीं सकता...हम दुनिया के सामने मिसाल रखेंगे.'' उनकी इस हौसला अफजाई का एक एक लफ्ज़ लोगों के दिलों पर राज करने लगा और लोगों ने गुलियानी को अपना असली नेता माना.
हर दिन उत्साह बरकरार
11 सितम्बर 2001 गुलियानी के लिए फिसलन का दौर शुरू होने का दिन था जो उनके लिए शीर्ष पर जाने का दिन बना. दो बार मेयर रहने के बाद 11 सितम्बर को ही न्यूयॉर्क में नए मेयर के चुनाव के लिए प्रारम्भिक वोट डलने थे और गुलियानी भूतपूर्व मेयर होने की कगार पर थे, लेकिन उन्होंने अपने काम से 'भूतपूर्व' को 'अभूतपूर्व' में तब्दील कर दिया. मेयर के पद पर वे हर दिन संघर्ष करते रहे, कभी अपने राजनैतिक विरोधियों से, कभी खुद के अधीनस्थ सहयोगियों से, कभी मीडिया से, कभी सडकों पर कब्ज़ा जमाये लोगों से. मेयर के रूप में उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि अब वे इस पद से हटने ही वाले हैं.
प्रशासन पर पकड़
मेयर के रूप में गुलियानी की प्रशासन पर मज़बूत पकड़ रही. उनके कार्यकाल में पुलिस की व्यवस्था चक चौबंद रही. अपराधों में एक -तिहाई कमी हुई. आर्थिक सुधार के लिए उन्होंने ऐसे करीब सात लाख लोगों की पहचान की जो हकदार नहीं होते हुए भी सरकारी सेवा का लाभ ले रहे थे. अपराधों में कमी और सेवा में सुधार से न्यूयॉर्क में संपत्तियों के दाम बढ़ गए थे.जनता कि शिकायतों पर तत्काल ध्यान दिया जाने लगा था और लोगों में यह भाव वापस आने लगा था कि वे एक 'वैश्विक शहर' के बाशिंदे है.
सिद्धातों से समझौता नहीं
अपने सिद्धांतों से समझौता गुलियानी को मंज़ूर नहीं रहा. न्यूयॉर्क के पुनर्निर्माण के लिए सउदी अरब के प्रिंस वालिद बिल तलाल का एक करोड़ डॉलर का चेक उन्होंने इस बात पर लौटा दिया कि प्रिंस ने इस्राईल का समर्थन नहीं करने की शर्त रख दी थी. अपने सिद्धांतों पर अड़े रहने के कारण उन्होंने मेयर रहते कई अफसरों को हटा दिया था. उनका कहना है कि आज का न्यूयॉर्क दस साल पुराने शहर से ज्यादा सशक्त और गरिमामय है. वे मानते हैं कि अगर लोगों को बराक ओबामा और उनके बीच चुनाव करना हो तो लोग ओबामा की जगह उन्हें चुनना पसंद करेंगे. अपनी सेहत, ख़राब वैवाहिक रिश्ते, बच्चों के कारण विवादों में रहने के बावजूद गुलियानी आम तौर पर शांत रहते हैं और यह बात पादरी पर छोड़ते हैं कि मैं कैसा कैथलिक हूँ.
प्रकाश हिन्दुस्तानी


(दैनिक हिंदुस्तान के एडिट पेज पर 11 सितम्बर 2011 को प्रकाशित)

Sunday, September 04, 2011

कलात्मक खेल ने बनाया स्टार



रविवासरीय हिन्दुस्तान, ४ सितंबर २०११ के एडिट पेज पर मेरा कॉलम



कलात्मक खेल ने बनाया स्टार

लियोनेल आंद्रेस मेसी अर्जेंटीना फ़ुटबाल टीम के स्टार स्ट्राइकर हैं, जर्सी नबर टेन. उम्र 24 साल, लेकिन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फुटबाल खिलाड़ियों में नाम शुमार है. 21 की उम्र में ही वे 'फीफा वर्ल्ड प्लेयर ऑफ़ ईयर' का ख़िताब पा चुके हैं. डिएगो मेराडोना उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुके हैं. फुटबालप्रेमियों का एक बड़ा वर्ग उन्हें पेले से बेहतर खिलाड़ी मानता है.फुटबाल के दीवाने कहते हैं कि मेसी खिलाड़ी नहीं,कलाकार हैं; क्योंकि वे फुटबाल खेलते नहीं, बल्कि मैदान में फ़ुटबाल से कविता लिखते हैं, चित्रकारी करते हैं, या संगीत की तान छेड़ते लगते हैं. उनके खेल में नशा पैदा करने की ताकत है. वे फ़ुटबाल मैदान के जादूगर हैं और वे मैदान में दर्शकों और साथी खिलाड़ियों को भी अपने खेल से विस्मित कर देते है.भारत भी उनके दीवानों का बड़ा वर्ग है. फेसबुक पर जब उनके नाम का अधिकारिक पेज बनाया गया तो केवल एक दिन में सत्तर लाख लोग उस से जुड़े, जो एक रिकार्ड है. मैसी के जादू और उनकी सफलता के कुछ सूत्र :
तकदीर से मुकाबला
मेसी अपनी तकदीर से मुकाबला करके इस मुकाम पर पहुंचे हैं. अर्जेंटीना के स्टील मिल मजदूर और सफाईकर्मी मां की चार संतानों में से एक मेसी ने पाँच साल के होते ही फुटबाल का खेल सीखना शुरू कर दिया था. 11 की उम्र में वे ग्रंडोली क्लब की तरफ से खेलने लगे थे लेकिन उनके पिता को पता चला कि मेसी को ग्रोथ हार्मोन डिफिशियंसी है और इलाज का खर्च है करीब 900 डॉलर हर माह. एक फुटबाल क्लब के संचालक मैसी की प्रतिभा से वाकिफ थे, उन्होंने मदद के पहले मैसी का खेल देखा और कलब की तरफ से एक एग्रीमेंट तैयार किया. उस एग्रीमेंट का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि वह टॉयलेट पेपर पर लिखा गया था. इस तरह अपनी तकदीर से मैसी की पहले जंग शुरू हुई.
फुटबाल ही इबादत है
मेसी के रोम रोम में फुटबाल है. लगभग सभी महान खिलाड़ी केवल अपने पैरों से नहीं, अपने रोम रोम से फुटबाल खेलते हैं. पैर, टखना, घुटना, सिर सब फुटबाल के लिए होता है, लेकिन मेसी के खेल में खास बात होती है बिजली की तेज़ी से कौंधता उनका दिमाग और उससे संचालित उनका शरीर जो अनपेक्षित को अपेक्षित कर दिखता है और मैदान में मौजूद हजारों लोग बार बार जोश और जुनून से भर जाते हैं. फुटबाल के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता देखने के मौके बिरले ही मिल पाते है.
ख़ास ट्रिक्स का इस्तेमाल
हर खिलाड़ी की अपनी ख़ास ट्रिक्स होती है, इसमें रचनात्मकता, अलग अंदाज़ और मनोरंजन का पुट भी होता है और सबसे अहम् बात है यह खेल की जीत में बड़ा योगदान देती हैं. दूसरे खिलाड़ियों की ट्रिक्स को समझकर उन्हें उलझाना और अपनी खास ट्रिक्स के जरिये संकट के दौर में बाहर आ जाने की यह कला ही फ़ुटबाल को कलात्मक बना देती है. होपिंग, अल्टरनेटिव होपिंग, नी लेमंस, नी होपिंग, फ्लिप, नो टच बेक, नी अल्टरनेटिव जैसी ट्रिक्स की भी दर्ज़नों शैलियाँ मैसी ने विकसित कर ली हैं, जिन्हें केवल देखकर मज़ा लिया जा सकता है, लिखा नहीं जा सकता.
परिपूर्णता के साथ खेलें
मैसी की जर्सी का नंबर दस है और वे खेल में भी परफैक्ट टेन हैं. किसी भी खिलाड़ी के लिए यह ग्रेड पाना आसान नहीं होता. मैदान में उनका फुटबाल पास करने का तरीका बहुत तेज़ होता है. वे आम तौर पर इतनी तेजी से पास देते हैं कि सामनेवाली टीम का खिलाड़ी उसे रोक ही नहीं पाता. विरोधी टीम का खिलाड़ी फुटबाल को लेकर किस किस तरफ जा सकता है, इसका अंदाज़ वे लगा लेते हैं और आगे की रणनीति बना लेते हैं, यह सब इतनी तेज़ी से होता है कि सामनेवाला खिलाड़ी भौंचक रह जाता है. उन्हें अपनी प्रतिभा पर तो भरोसा होता ही है, स्पर्धी खिलाड़ी की गलतियों का लाभ लेने की कला पर भी विश्वास रहता है.
छोटा कद, बड़े इरादे
मैसी केवल पांच फुट सात इंच ऊँचे है. जापान की फुटबाल टीम में भी इस कद से लम्बे खिलाड़ी हैं. छोटे कद को उन्होंने अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया और अपनी बिजली की गति और खेल कौशल से इस प्राकृतिक कमी को छुपा लिया. वे हमेश इसी कोशिश में रहते हैं कि भले ही उनका रिकार्ड ना बने, लेकिन टीम जीतना चाहिए. गोल के पास जाने के बाद भी वे खुद गोल मारने का लालच नहीं करते और निर्णायक गोल बनने के लिए पास देने से नहीं चूकते. बीते साल फीफा वर्ल्ड कप के चार मैचों में वे खुद एक भी गोल नहीं मार सके, लेकिन उनके निर्णायक पास के कारण उनकी टीम के दूसरे खिलाड़ियों को गोल बनाने के मौके मिले.
अच्छा खेलकर जीतें
मैसी का लक्ष्य केवल जीतना नहीं, अच्छा खेलना और अच्छा जीतना होता है. वे जानते है कि फ़ुटबाल टीम का खेल है और इसीलिये वे अपनी टीम के सदस्यों को पूरा तवज्जो देते हैं. अर्जेन्टीना की टीम में मैसी के अलावा जेवियर मैस्केरानो, एजेंलो डी मारिया, कार्लोस तेवेज भी अच्छे खिलाड़ी माने जाते हैं और ये चरों खिलाड़ी किसी भी टीम की नक् में दम करने के लिए बड़ी शक्ति हैं. इंटरपासिंग के मामले में अर्जेंटीना दुनिया की नंबर एक टीम है। टीम का मिडफील्ड ताकतवर है और मैसी सबसे जानदार खिलाड़ी
नेतृत्व क्षमता विकसित करें
मैसी ने अपने भीतर नेतृत्व के ऐसे गुण विकसित कर लिए हैं कि कई बार टीम के कोच की बजाय उनकी बातें सुनने को ज्यादा पसंद करती है. उनके साथी खिलाड़ियों को विश्वास में लेने की कला उनमें खूब है. मैसी को ड्रिब्लिंग में उस्तादी है जो उन्होंने अपने साथी खिलाड़ियों को भी सिखाने में सफलता पाई है. स्ट्राइकर के वे रूप में बेहद आक्रामक खिलाड़ी हैं और उनका गज़ब का फुटवर्क है. वे पास लेने और देने में माहिर हैं और निशाने पर गोल साधने में चुस्त. वे अपना हर हुनर साथी खिलाड़ियों के साथ शेयर करना टीम के हित में मानते हैं.
सामाजिक कार्य भी ज़रूरी
मैसी ने 2007 में लियो मैसी फाउंडेशन की स्थापना की थी जिसका मकसद है जरूरतमंद बच्चों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना.उनका कहना है कि अगर आप मशहूर हैं तो दूसरों की मदद करना आसान हो जाता है. यह एक जरिया है जिससे आप उपकार का बदला चुकाने की कोशिश करते हैं. मैसी यूनीसेफ के सद्भावना राजदूत के रूप में भी कार्य कर रहे हैं. प्रो इव्योल्युशन सॉकर के वीडियो गेम में उनकी तस्वीर कवर पर ली गयी है और उनके खेलतर कार्यों में फुटबाल का खेल प्रोत्साहित करना शामिल है. अपने आभामंडल से उन्होंने साबित कर दिया कि भारत में क्रिकेट ही नहीं, फुटबाल का जादू भी चलता है.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

(हिन्दुस्तान, ४ सितंबर २०११ को प्रकाशित)

Sunday, August 28, 2011

जीने की कला ने पहुंचाया शीर्ष पर


रविवासरीय हिन्दुस्तान (28 अगस्त 2011) के एडिट पेज पर मेरा कॉलम


जीने की कला ने पहुंचाया शीर्ष पर


रवि शंकर रत्नम अन्ना हजारे के समर्थक और सहयोगी हैं. वे महर्षि महेश योगी के शिष्य थे. उन्होंने २६ साल की उम्र में १९८२ में आर्ट ऑफ़ लिविंग की स्थापना की थी. आज इसकी शाखाएं १५२ देशों में है. २०१० में फ़ोर्ब्स ने उन्हें भारत का पांचवां सबसे प्रभावशाली व्यक्ति लिखा था. उन्होंने दलाईलामा के साथ जेनेवा में भी एक संस्था खोली है जो गरीबों की मदद करती है. सितार वादक रवि शंकर ने उन पर आरोप लगाया था कि योगी रवि शंकर उनकी ख्याति का लाभ उठा रहे हैं, तब उनके शिष्यों ने उन्हें 'श्री श्री रवि शंकर' नाम दिया. अपने शिष्यों में वे 'श्री श्री' नाम से ही पहचाने जाते हैं.लोग कहते हैं कि वे खुद बहुत बड़े 'ब्रांड' हैं. उनकी संस्थाएं करोड़ों रुपये सेवा कार्य पर खर्च करती हैं.गंगा और यमुना के सफाई अभियान में भी वे जुड़े हैं. योग क्रिया 'कपाल भांति' और 'सुदर्शन क्रिया' को आजमाकर उसके माध्यम से लाखों लोगों को प्रभावित करनेवाले 'श्री श्री' की सफलता के कुछ सूत्र :
बचपन मत भूलो
आप कितने भी बड़े हो जाएँ, बचपन को ना भूलें. बचपन की सहजता, मासूमियत और ईमानदारी को कलेजे से लगाये रखें, जिससे कि आप हमेशा तनावमुक्त और अपनत्व से भरे रह सकते हैं. श्री श्री अब भी अपने आप को बच्चा ही कहते हैं, ऐसा बच्चा जो शरीर से बड़ा हो चुका है लेकिन मन से पूरी तरह निश्छल है.अगर बचपन की कोई कटुता मन में है तो उसे निकाल देने में ही भलाई होती है. अपने बचपन को याद करने के अलावा आप अपने आसपास के बच्चों से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं.
सहजता ही अध्यात्म
मैंने जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं किया है जो सहज नहीं है या बनावटी है. बनावटीपन और दिखावा तो बोझ की तरह होते हैं जिन्हें ढोना पड़ता है. मेरे लिए सहज रहना अध्यात्म का ही एक अंग है. यही मेरी जीवनशैली है. मैं सहज और सरल जीवन जीता हूँ और इसी में खुश हूँ. मेरी सलाह पर हजारों लोगों ने जीवन जीने का यही मार्ग चुना है और वे सब इससे खुश है.
यथार्थ को स्वीकारो
सहज-सरल जीने का तरीका यह है कि 'एक्सेप्ट द सिचुएशन एज इट इज़'. इसका मतलब यह नहीं है कि आप गलत बातों का समर्थन करे, बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप गलत बात की तह में जाने की कोशिश करें और उसे दूर करे. अगर आप किसी समस्या में फंस गए हैं तो वहीँ रहना यथार्थ नहीं है, बल्कि आप हालात को समझ कर समस्या से निजात पायें तो आप ज्यादा सहज जीवन जी सकते हैं.
हंसो, पर फंसो मत
हमेशा हंसने यानी खुश रहने की दशा तभी आ सकती है, जब आप कहीं भी फंसे ना हों. हमेशा विवादों से दूर रहने की कोशिश करो. अगर विवाद की दशा आ ही जाए तो जीतनी जल्दी हो सके, बाहर निकालने की कोशिश करो. अपनी ऊर्जा का हमेशा सकारात्मक उपयोग आप तभी कर सकते हैं, जब आप तनावरहित और प्रसन्नचित्त हों.
शाश्वत कुछ भी नहीं
जीवन का कोई भी नियम शाश्वत नहीं. दूध पीना अच्छा होता है, पर हमेशा अच्छा नहीं. कई रोगी दूध पीकर और बड़े रोगी हो सकते हैं. ज़हर किसी की जान ले सकता है, लेकिन ज़हर से ही कई जीवनरक्षक दवाइयाँ बनाती है. डीडीटी का आविष्कार करनेवाले वैज्ञानिक को नोबेल प्राइज़ दिया गया था, आज डीडीटी दुनिया के अधिकांश देशों में प्रतिबंधित है. कोई भी बात हर व्यक्ति और हर काल में अच्छी ही हो, ज़रूरी नहीं होता. इसलिए बात बात पर शोक मनाना अच्छी आदत नहीं.
मुफ्त कुछ भी नहीं
प्रकृति ने हमें हमारी सबसे बहुमूल्य वस्तु मुफ्त में दी है, ऑक्सीजन,लेकिन हम उसका मोल कहाँ समझ पाते हैं? कोई भी वस्तु मुफ्त में दो तो उसका महत्व लोग नहीं समझते, इसलिए शुल्क लेना ज़रूरी है, और उस आय से वही वस्तु उन लोगों को मुफ्त उपलब्ध कराना ज़रूरी है, जिसकी उसे सख्त ज़रुरत हो. यह व्यवसाय नहीं, समाज का हिट करने के लिए है. इसीलिये 'आर्ट ऑफ़ लिविग' के लिए शुल्क रखा गया है.
नयी तकनीक अपनाओ
नयी तकनीक केवल उपकरणों के मामले में ही नहीं, जीवन जीने के बारे में भी अपनानी चाहिए तभी बेहतर जीवन जी सकते हैं. हम नयी तकनीक कार और नयी तकनीक के फोन पर ही अटक जाते हैं और नयी तकनीक से सांस लेने के बारे में सोचने का वक़्त नहीं है. हम दूसरों की ख़ुशी में अपनी खुशी पाने की तकनीक भी खोते जा रहे हैं. जबकि हमें वैसी नयी तकनीक खोजते रहना चाहिए जो हमें सुख प्रदान करे.
संगीत की शक्ति
संगीत में हमें शक्ति देने और नयी ऊर्जा से भर देने की अपार ताकत मौजूद है, लेकिन हमने गाना, बजाना, नृत्य करना कम कर दिया है. मेरी ऊर्जा का एक खास स्रोत संगीत है, और कई तरह का संगीत मैं सुनाता हूँ,जिसमें से कई बार तो मुझे वह समझ में भी नहीं आता, लेकिन फिर भी आनंद देता है. संगीत में एक और शक्ति है, और वह शक्ति है एकात्मकता पैदा करने की.
हमारे जीवन का लक्ष्य है आनंद की प्राप्ति और अहिंसा तथा शांति के बिना वह संभव नहीं है. हमारे पास जो है उससे संतुष्ट हुए बिना हम हर तरीके से साधन जुटाने में लगे हैं. और यह हमारे दुःख का कारण बन जाता है. मैंने तय कर लिया है कि मैं खुश रहूंगा और मैं खुश हूँ. आप भी यह करके देखिये.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान, 28 अगस्त 2011 (संपादकीय पेज)

Sunday, August 21, 2011

बदल डाले सफलता के मायने

रविवासरीय हिन्दुस्तान (21 अगस्त 2011) के एडिट पेज पर मेरा कॉलम



बदल डाले सफलता के मायने

सफलता का अर्थ केवल पद, दौलत और शोहरत ही नहीं होता. सफलता का असली अर्थ है आप जो सही समझते हों, उसे हिम्मत के साथ कर रहे हों. कुछ कुछ ऐसा करना जिससे पूरे समाज को लाभ होता हो, इस तरह अन्ना हजारे के आन्दोलन के प्रमुख रणनीतिकार अरविन्द केजरीवाल ने सफलता के मायने ही बदल डाले. हरियाणा के हिसार में 1968 में जन्मे अरविन्द केजरीवाल में आईआईटी खड़गपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली और कुछ समय जमशेदपुर में टाटा स्टील में काम करने के बाद यूपीएससी के जरिये आईआरएस में चुने गए. दिल्ली में आयकर विभाग में 1992 में नौकरी शुरू की. 2006 में वे एडिशनल कमिश्नर (इनकम टेक्स) के पद से नौकरी छोड़कर 'परिवर्तन' नामक संस्था में काम करने लगे. उन्होंने पीसीआरएफ (पब्लिक काज़ रिसर्च फंड) नामक संस्था भी खादी की. सूचना के अधिकार, जन लोकपाल कानून के पक्ष में और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके संघर्ष उनकी अलग ही पहचान बने, जो आयकर अधिकारी रहते संभव नहीं थी. उन्हें अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिल चुके हैं, जिनमें मैग्सेसे अवार्ड भी है. अरविन्द केजरीवाल की सफलता के कुछ सूत्र :
पद नहीं, कर्म बनाते हैं बड़ा
अरविन्द केजरीवाल अगर अभी भी आयकर विभाग में ही होते तो और भी बड़े पद तक पहुँच जाते. भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात आयकर विभाग में हजारों लोग नौकरी पाने के लिए बड़ी कीमत देने को तैयार रहते हैं, ऐसे में अरविन्द केजरीवाल का नौकरी छोड़ना कई लोगों को अजीब लगा. हिसार और नांगल में पढ़ाई करनेवाले अरविन्द ने साबित किया कि अगर कोई व्यक्ति ठान ले तो फिर कुछ भी करना मुश्किल नहीं होता. वे आज किसी पद पर नहीं है लेकिन अपने रणनीतिक कौशल, ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से उन लोगों को बेनकाब कर दिया जो बड़े बड़े पदों पर काबिज हैं.
सही रणनीति ज़रूरी
अरविन्द केजरीवाल ने अपने आन्दोलनों की सही शुरुआत पर ध्यान रखा. उन्होंने हमेशा सही लोगों को साथ लिया और सही लोगों के साथ ही रहे. उन्होंने अपने अभियान की शुरूआत मज़दूर किसान शक्ति संगठन में अरुणा राय और हर्ष मंदार के साथ की. पानीवाले बाबा संदीप पांडे और शेखर सिंह भी उनके सह-कार्यकर्ता रहे. हर्ष मंदार लोकपाल के मुद्दे पर लोगों की राय बना रहे थे लेकिन अरविंद केजरीवाल यह मुद्दा अपने तरीके से उठाने लगे और अन्ना के खास रणनीतिकार बने. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर एक घंटे बिजली बंद रखने के उनके अनुरोध का भी कई जगह असर पड़ा. उन्होंने जन लोकपाल बिल के बारे में चांदनी चौक इलाके में यह जनमत संग्रह करवाकर कि कपिल सिब्बल के चुनाव क्षेत्र में भी 85 प्रतिशत वोटर जन लोकपाल के पक्ष में हैं, लोगो को चौंका दिया. युवाओं को अन्ना के आन्दोलन से जोड़ने में उनकी प्रमुख भूमिका रही.
आरोपों से ना घबराएँ
अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ लोगों ने आरोपों की झड़ी लगा दी लेकिन वे उससे विचलित नहीं हुए. शासकीय सेवा में उनके वरिष्ठ रहे लोगों ने भी आरोप लगाये. उनकी पत्नी (जो आयकर विभाग में ही प्रमुख पद पर हैं) के तबादले को लेकर भी उन पर आरोप लगाये गए. कॉंग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने भी उन पर आरोप लगाए थे. बिहार में नीतीश कुमार सरकार के लिए लोकायुक्त बिल का खाका बनाने में भी अरविंद केजरीवाल ने मदद की थी, उस पर भी आरोप लगे. अन्ना के आन्दोलन में मुस्लिमों और ओबीसी की भागीदारी को लेकर भी अरविन्द केजरीवाल पर आरोप लगाये गए.
हवा के रुख को पहचानो
अच्छा नाविक वह है जो केवल अपनी पतवार के भरोसे नहीं रहता, बल्कि हवा के रुख को भी पहचानता और उसकी मदद लेता हो. अरविन्द केजरीवाल ने यह बात तभी समझ ली थी जब वे आरटीआई आन्दोलन से जुड़े. उन्होंने पाया कि लोग भ्रष्टाचार से तो सभी लोग पीड़ित हैं लेकिन बहुत कम लोग ही खुलकर सामने आते हैं. छोटी मोटी जनसुविधाओं के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है. भ्रष्टाचार के प्रति लोगों के गुस्से को सामने लाकर कोई भी बड़ा आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है. उन्होंने आरटीआई को भ्रष्टाचार से लड़ाई का हथियार बनाकर इस्तेमाल किया और उसके फायदे को हजारों लोगों तक पहुँचाया. सार्वजानिक वितरण प्रणाली की खामियों की तरफ भी उन्होंने ध्यान दिलवाया, जिससे बड़ी संख्या में लोग उनसे जुड़े.
पारदर्शिता से काम करो
अपने सभी आंदोलनों के लिए अरविन्द केजरीवाल के एनजीओ लोगों से चंदा लेते है और उस चंदे के बारे में एनजीओ की वेबसाइट पर उसकी पूरी जानकारी भी देते हैं. वे वहां पर अपने बारे में कम और अपनी संस्था के काम के बारे में ज्यादा सूचनाएं देते हैं, जिससे यह नहीं लगता कि वे अपने आप को आगे बढ़ा रहे हैं. अपनी किसी भी संस्था में काम करनेवाले सभी सहयोगियों के बारे में भी पूरी जानकारी देते हैं. इण्डिया अगेंस्ट करप्शन की वेबसाइट पर भी इसी तरह की जानकारी मौजूद है. इतना ही नहीं, वे अपनी भावी योजनाओं के बारे में भी खुलकर चर्चा कराते हैं.
लड़ाई जीतना, युद्ध जीतना नहीं
बहुत कम नेता और कार्यकर्ता 'लड़ाई' और 'युद्ध' का अंतर समझ पाते हैं. एक युद्ध जीतने के लिए कई कई लड़ाइयाँ लड़नी होती है. हर लड़ाई युद्ध की जीत में महत्वपूर्ण होती है, लेकिन कई बार कुछ लड़ाई हारकर भी युद्ध जीत लिए जाते हैं. इसके लिए ज़रूरी है अपने हथियारों की धार कराते रहना, जीत का हौसला बुलंद रखना और हर रणनीति सोच समझकर बनाना और सही तरीके से उस पर अमल करना. अन्ना के आन्दोलन के दौरान कई बार लगा कि अब शायद मामला उलटा हो गया है लेकिन वक़्त ने साबित किया कि बात कुछ और ही है.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान, 21/08/2011

Saturday, August 13, 2011

सच और साहस की कामयाबी

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर (14 जुलाई 2011) प्रकाशित मेरा कॉलम






सच और साहस की कामयाबी

ग्लोबल क्रेडिट रेटिंग कंपनी एस एंड पी ( स्टैण्डर्ड एंड पुअर) के अध्यक्ष देवेन शर्मा (मूल नाम देवेन्द्र शर्मा ) ने अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग एक पायदान नीचे कर दुनिया भर की अर्थ व्यवस्था में खलबली मचा दी है. लाखों लोग उन्हें नायक बता रहे हैं तो लाखों लोगों का कहना है कि उन्होंने खलनायक जैसा काम किया है. अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग सर्वोच्च 'एएए' से घटाकर 'एए प्लस' किये जाने के बाद उन पर इसकी सूचना लीक करने जैसे आरोप भी लग रहे हैं. रेटिंग घटने के बाद आ रही मंदी के लिए कोई उन्हें दोषी कह रहा है तो कोई कह रहा है कि इसके दूरगामी परिणाम अच्छे ही होंगे क्योंकि अमेरिका अपनी आर्थिक स्थिति को मज़बूत बनाने में जुट जाएगा और अपनी क्रेडिट रेटिंग में वापस सुधार कर लेगा. देवेन शर्मा के लिए भी ये फैसला कोई आसान नहीं रहा होगा. कोल नगरी धनबाद में जन्मे और धनबाद के 'डे नोबिली' स्कूल के छात्र रहे देवेन ने बिट्स के मेसरा इंस्टीटयूट से मैकेनिकल इंजीनियरिग, अमेरिका के विसकॉन्सिन से उन्होंने मास्टर्स डिग्री और फिर ओहायो से मैनेंजमेंट में पीएच. डी. की डिग्री ली. शुरू में मैन्युफैक्चरिंग कंपनी और बाद में कंसल्टेंसी कंपनी में काम करें लगे २००२ में वे मैक्ग्रा हिल्स में काम शुरू किया. २००७ में वे इरस कंपनी के प्रेसिडेंट बने. क्रेडिट रेटिंग के क्षेत्र में हो रही लगातार आलोचनों के कारण देवेन शर्मा का काम आसान कभी नहीं रहा. झारखण्ड के धनबाद से लेकर मैनहट्टन के ५१ मंजिला मैक्ग्रा हिल्स टॉवर तक उनके सफ़र की सफलता के कुछ सूत्र :
स्पष्ट निगाहें, सही लक्ष्य
देवेन शर्मा ने अपने करीयर में हमेशा ही सही संस्थान चुने. वे शुरू से ही जानते थे कि उन्हें क्या करना है. उन्हें अपने करियर के शुरू में भले ही मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में काम कारण पड़ा हो, लेकिन वे जल्दी ही पसंदीदा कन्सल्टेन्सी इंडस्ट्री में आ गए. जल्दी ही वे अपनी कंपनी बूज एलेन एंड हैमिल्टन में पार्टनर भी बन गए और चौदह साल तक इस कंपनी में रणनीतिकार के साथ ही उसके विस्तार, सेल्स, मार्केटिंग आदि का कार्य करने के बाद 2002 में उन्होंने मैकग्रा हिल्स में काम संभाला और लगातार कंपनी का कारोबार बढाने में जुटे रहे. उन्होंने इस कंपनी के लिए उच्च शिक्षा, वित्तीय सेवाओं, मीडिया और इन्फार्मेशन के क्षेत्र में द्वार खोले और कंपनी को विस्तार दिया. उन्हें लगा कि वे एक बड़े परिदृश्य में बेहतर कार्य कर रहे हैं. ठीक चार साल पहले अगस्त 2007 में वे एस एंड पी के अध्यक्ष बने थे.
सच पर टिकने की हिम्मत
सन 2001 में एनरॉन स्कैंडल के बाद अमेरिकी संसद में रेटिंग कंपनियों में सुधार की बात सामने आ रही थीं. देवेन शर्मा के कंपनी अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने रेटिंग की शैली और तौर तरीका बदलने के साथ ही रेटिंग की विश्वसनीयता पर ध्यान दिया जाने लगा था. अमेरिका की आर्थिक हालात की सच्चाई जानने और उस पर टिके रहने के हौसले ने देवेन शर्मा के ज़मीर को वह ताकत दी कि उनकी कंपनी ने अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग का सही विश्लेषण किया और उसे उजागर किया. बीते कई वर्षों से क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को आलोचना का शिकार होना पड़ रहा था क्योंकि अच्छी रेटिंग वाली कई कम्पनियाँ बाज़ार में दीवाला निकाल चुकी थीं. देवें शर्मा को इस बात का पूरे इल्म था कि इस रेटिंग से बाजार पर क्या प्रभाव पड़ेगा और उन्हें किस तरह की प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ेगा.
आलोचना से डरे नहीं
एस एंड पी ने जब ग्रीस के बारे में रेटिंग 'सीसीसी' से घटाकर 'सीसी' की थी तब भी भारी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था. एस एंड पी से सम्बद्ध 'क्रिसिल' भारत की क्रेडिट रेटिंग करती है. अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग को कमतर करने का फैसला केवल आर्थिक निर्णय नहीं है. इसका मतलब यह है कि अमेरिका की सरकार का प्रभाव, स्थिरता, फैसले लेने का वक्त और तरीका, नीतियां बनाने और उन पर अमल का काम समीक्षा के दायरे में है. इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका बर्बाद हो रहा है, बल्कि यह है कि अब अमेरिका को पुनरावलोकन कर लेना चाहिए. रेटिंग के बारे में फैसला लेते ही एस एंड पी की आलोचना भी शुरू हो गयी. डेमोक्रेट पार्टी के सांसद मेक्सिम वाटर्स ने तो कंपनी को अनैतिक कहते हुए यह भी आरोप लगा दिया कि एस एंड पी ने अपने फैसले की घोषणा के पहले ही इस बात को कुछ वित्तीय संस्थाओं को लीक कर दिया था. एस एंड पी की गणना में दो ट्रिलियन डॉलर की गलती के आरोप भी लगे हैं. देवेन शर्मा के मुताबिक इन आरोपों में कुछ भी अनपेक्षित नहीं था.
विमर्श के बाद ही फैसला
देवेन शर्मा ने अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग को बदलने का फैसला कोई जल्दबाजी में नहीं लिया. ऐसा भी नहीं कि अमेरिकी राष्ट्रपति को इसकी भनक नहीं थी. एस एंड पी ने रेटिंग के बारे में घोषणा से पहले लगातार छह घंटों तक अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यालय से टेलीफोन, ई मेल और वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये चर्चा की थी. यह बात राष्ट्रपति के सामने रख दी गयी थी कि इस रेटिंग के मायने क्या हैं और इसकी ज़रुरत क्यों है? देवेन शर्मा को इस बात का पूरा अंदेसा था कि इस घोषणा के बाद वित्तीय बाजारों के क्या हाल होंगे और उन्हें भरोसा है कि कुछ समय के बाद इसके नतीजे बहुत अच्छे होंगे और अमेरिका अपनी साख रेटिंग को सुधारने में सफल होगा.
स्वतंत्रता और निष्पक्षता
देवेन शर्मा का विश्वास है कि केवल स्वतंत्रता और निष्पक्षता ही हैं जो किसी भी वित्तीय सलाहकार कंपनी के लिए ऑक्सीजन होती है. हमारी कंपनी का मुख्यालय न्यूयार्क में है तो केवल यही कोई कारण नहीं हो सकता कि हम अमेरिका की साख उच्चतम स्तर पर दिखाते रहें. हमारे लिए स्वतंत्रता और निष्पक्षता का अर्थ है अपने कारोबार में ज्यादा ईमानदारी और पारदर्शिता. सच्चाई बताने से तात्कालिक हानि हो सकती है, लेकिन सच्चाई से किसी का बुरा नहीं होता. हमारी जवाबदारी अपने निवेशकों के साथ है और सदैव रहेगी इसीलिये उन्हें निष्पक्ष होकर सलाह देना हमारा दायित्व है.
भविष्य की सोचें
वर्तमान हालात बहुत अच्छे नहीं हो तो भी भविष्य के बारे में सोचना बंद नहीं किया जा सकता. देवेन शर्मा ने अपने फैसले को साफ़ किया कि वित्तीय संस्थाएं भविष्य को देखते हुए ही रेटिंग करती हैं. निवेशकों को नुकसान पहुँचाना हमारा काम नहीं, हमारा काम है उन्हें फायदा पहुँचाना. क्रेडिट के विकास के सन्दर्भ में हम अपने निवेशकों को आगाह कराते हैं कि उन्हें किस तरह की जोखिम उठानी पड़ सकती है, और यही हमारा काम है, जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता.
स्वदेश का महत्व
देवेन शर्मा साल में एक बार भारत ज़रूर आते हैं. वे यहाँ वित्त मंत्रालय ज़रूर जाते हैं और मौका मिले तो भारत आकर यहीं रहना चाहते हैं. उनके पिता रामनाथ शर्मा और भाई झारखण्ड में ही रहते हैं. करीब सत्तर साल पहले उनके दादा पाकिस्तान के लायलपुर से भारत आकर बसे थे. वे भारत को आर्थिक मोर्चे पर मज़बूत देखने के लिए समय समय पर अपने सुझाव वित्त मंत्रालय को देते रहते हैं.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 14 जुलाई 2011को प्रकाशित


Sunday, August 07, 2011

गरिमामय हास्य ने दिलाई पहचान

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम (06/08/2011)



गरिमामय हास्य ने दिलाई पहचान

एकपात्रीय मंचीय कॉमेडी की दुनिया में भारत का नाम रोशन करनेवाले कॉमेडियन पापा सी जे ने वैश्विक मंच पर कॉमेडी को स्थापित किया है. उनके आठ सौ से ज्यादा मंचीय शो को अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और यूरोप में लाखों लोग देख चुके हैं. बीबीसी, एनबीसी,एम टीवी जैसे चैनलों पर वे अपनी कॉमेडी के शो से लोगों का ध्यान खींच चुके हैं. मुकेश अम्बानी से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया तक उनके प्रशंसकों में से हैं. वे अपने कॉमेडी के शो नोकिया, ऑडी, ब्रिटिश कौंसिल जैसे संस्थानों में भी देते रहते हैं. कहा जाता है कि उन्होंने स्टैंड अप कॉमेडी को एक नया मुकाम दिया है और खुद एक कॉर्पोरेट हस्ती बन गए हैं. पापा सी जे नाम से प्रसिद्ध सफलता के शीर्ष पर पहुंचे इस ग्लोबल कॉमेडियन की कामयाबी के कुछ सूत्र :
असली नाम छुपाने का राज़
पापा सी जे उनका असली नाम नहीं है, लेकिन वे अपना असली नाम किसी को भी ना तो बताना चाहते हैं और ना ही बता सकते हैं. असली नाम की बात पर वे यही बात वे लोगों से कहते हैं कि खतरनाक हत्यारों द्वारा की गई एक हत्या के मामले में उन्होंने गवाही दी थी और वे हत्यारे उनके पीछे पड़ गए. ऐसे में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस ने उन्हें विटनेस प्रोटेक्शन प्रोग्राम के तहत अपनी पहचान छुपाकर रखने का आदेश और अनुमति प्रदान की. और इसी कारण वे अपनी असली पहचान छुपाकर जी रहे हैं. वे एक ऐसे नागरिक हैं जो अपनी जान को जोखिम में डालकर भी क़ानून की मदद करने से नहीं चूकता हो.
नया करने का जुनून
ज़िंदगी में कुछ नया करने के जुनून ने पापा सी जे को भीड़ से अलग जाकर नया कुछ करने को मज़बूर किया. १९७७ में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को जन्मे पापा ने शुरुआती २० साल भारत में बिताये. सनावर और कोलकाता में पढ़ाई के बाद वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में एमबीए की डिग्री लेने पहुंचे. उन्होंने पढ़ाई के साथ साथ बहुत से खेत्रों में काम किया और नाम (शोहरत) तथा नामा (दौलत) अर्जित किया. पापा इस बात से असहमत रहते कि जो कुछ चल रहा है, ठीक है. कुछ नया करने का जुनून उन पर सदा सवार रहता है और इसीलिये वे कुछ खास कर सके.
टीवी शो ने बदली दुनिया
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही उन्हें टीवी चैनल पर कॉमेडी के शो में प्रतियोगी के रूप में भाग लेने का मौका मिला. इस शो में ऑडिशन के लिए हजारों लोग आये थे. पापा सी जे ने भी इसमें भाग लिया और उनकी कॉमेडी को लोगों ने पसंद किया. वे इस शो में टॉप टेन प्रतियोगियों तक पहुंचे.लोगों की पसंद को देखते हुए उन्होंने कॉमेडी जारी रखी. लोगों ने उन्हें कार्यक्रमों में बुलाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे उनके शो लोकप्रिय होते चले गए.
अश्लीलता से दूरी
पापा सी जे ने अपने शो को अश्लीलता, फूहड़पन और दो अर्थोंवाले संवादों से मुक्त रखा है. वे जानते हैं यह लोगों को हंसाने का सरल रास्ता है लेकिन यह एक घटिया काम है. उनका मानना है कि यही किसी कॉमेडियन की असली परीक्षा भी है कि वह किस तरीके से अपना काम करता है. पापा सी जे हर बार नए नए तरीके से लोगों को हंसाने की कोशिश करते हैं और इसमें कामयाब भी रहते हैं क्योंकि वे विषय का चयन बहुत सावधानी से करते हैं और तात्कालिक घटनाओं का भी उसमें समावेश करने से नहीं चूकते जो लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं.
मौलिक लेखन
पापा सी जे अपने हर शो में नयापन रखते हैं और हर बार अपनी स्क्रिप्ट खुद लिखते हैं. वे चाहें तो यह काम दूसरे लेखकों से भी लिखवा सकते हैं लेकिन उनका मानना है कि अगर शो की स्क्रिप्ट मेरी अपनी है तो मैं उस शो में अपने हावभाव बेहतर तरीके से व्यक्त कर सकता हूँ. दुनिया के कई देशों में घूम चुके होने से उन्हें लोगों के अलग अलग स्वाभाव का अंदाजा है और इसीलिये उनकी विषयवस्तु हर जगह अलग होती है.
बहुधन्धी व्यक्तित्व
पापा सी जे बहुधन्धी व्यक्तित्व के धनी हैं. वे जाने-पहचाने जाते हैं अपनी स्टैंडअप कॉमेडी की वजह से, जो उन्होंने २७ साल की उम्र में २००४ में शुरू की थी, लेकिन उनके कामों में लन्दन में मैनेजमेंट कंसल्टेंसी देना और प्रोफेशनल वर्कशॉप आयोजित करना भी शामिल रहा है. अब वे अपने काम को नए मुकाम तक पहुँचाना चाहते हैं जिसके तहत उनके शो के डीवीडी बनाकर बेचना और फिल्मों में काम करना शामिल है. वे भारत के सभी प्रमुख शहरों में अपने शो करने की योजना भी बना रहे हैं.
चैरिटी कार्य
पापा सी जे चैरिटी के काम को भी महत्व देते हैं. 'वन चाइल्ड' नाम की एक संस्था का खर्च वे अपने कार्यक्रम की पूरी कमाई देकर उठाते हैं. इस कार्यक्रम के टिकिट पंद्रह पौंड में बेचे जाते हैं और एक धेला भी वे नहीं लेते. इस संस्था द्वारा संसाधनहीन बच्चों की पूरी देखभाल की जाती है, उनकी पढ़ाई से लेकर निवास, भोजन और खेलकूद तक का खर्च यही संस्था उठाती है. इसके अलावा बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य, भारत के ग्रामीण इलाकों में लोगों का जीवन स्तर ऊंचा उठाने के काम में भी वे मदद करते हैं. संस्था के कामों की यजन बनाने से लेकर उन योजनाओं पर अमल करने तक के काम में उनकी भूमिका रहती है.
सौ प्रतिशत भारतीय
पापा सी जे भले ही अंतर्राष्ट्रीय नाम हो गया हो, लेकिन वे अपने आप को सौ प्रतिशत भारतीय ही मानते हैं. वे कहते हैं कि मैं एक पतंग की तरह हो गया हू, जो उड़ती तो ऊपर आसमान में है, लेकिन एक डोर से जुडी होती है. भारतीय भोजन, भारतीय परिधान, हिन्दी और पंजाबी फ़िल्में और उनका संगीत उन्हें भाता है. भारत में वे नए कलाकारों को स्टैंड अप कॉमेडी के लिए प्रशिक्षित भी कराते हैं और उन्हें विविधतापूर्ण कामों के लिए प्रेरित भी करते हैं.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 6 auguest 2011

Wednesday, August 03, 2011

फेसबुक सरकारी होता तो...

ख़ाता खोलने के पहले (पूरा पढ़ें)

1.. फार्म भरो -- नाम, बाप का नाम, उम्र, पता, फ़ोन-मोबाइल नंबर, आय, ईमेल, ब्लड ग्रुप आदि-आदि.

2. उम्र, आय और स्थायी निवासी के प्रमाण पत्र नत्थी करो जो राजपत्रित अधिकारी से प्रमाणित हो.

3. खाता खोलने की ज़रुरत क्यों है, इसका सर्टिफिकेट कलेक्टर से लेकर लगाओ.

4. इनकम टेक्स के फार्म १६ ए की तीन साल की फोटोप्रति

5. जाति का प्रमाण पत्र फलां अफसर से प्रमाणित हो.

6. अजा, अजजा, ओबीसी,एम एल ए-एमपी के लिए फलां प्रतिशत आरक्षण है, कोशिश करेंगे कि आपका खाता खुल जाए.

7. एक शपथपत्र लगाओ कि तुम इसका दुरपयोग नहीं करोगे, अगर १८ साल से कम के हो तो अपने बाप से ऐसा शपथ पत्र बनवाकर लगवाओ और साथ में एक और शपथ पत्र लगवाओ कि वही तुम्हारा बाप है और उसके निवास और पहचानपत्र का प्रमाणपत्र लगवाओ.

............तेरा थैंक यू हो यार मार्क एलियट ज़ुकेरबर्ग, तेरा शुक्रिया , तूने तो भोत सारी माथा-फोड़ी से बचा लिया, वरना अगर ये फेसबुक भारत सरकार की होती तो ये सब तो करना ही पड़ता फिर भी खाता .......

What do you say?

(स्वर्गीय शरद जोशी जी की प्रेरणा से उनकी डाक को आगे बढ़ते हुए )

Sunday, July 31, 2011

सामाजिक सरोकार की कामयाबी


रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम




सामाजिक सरोकार की कामयाबी


इस साल का मैग्सेसे अवार्ड पानेवालों में डॉ हरीश हांडे भी हैं जो सेल्को इण्डिया नामक कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. पेशे से इंजीनियर डॉ हांडे ने आईआईटी से इंजीनियरिंग की डिग्री ली और फिर यूएस के मसाच्चुसेट विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट पायी. लेकिन दूसरे आईआईटी विद्यार्थियों की तरह उन्होंने विदेश में बस जाने की जगह यहीं रहकर कुछ अलग करने की ठानी. उन्होंने सोचा कि इतनी पढ़ाई का क्या मतलब अगर उसका फायदा हमारे अपने लोगों को नहीं मिले. 1995 में उन्होंने सोलर इलेक्ट्रिक लाइट कंपनी (सेल्को) बनाई. और भारत के ही दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में लोगों के घर जगमगाने में जुट गए. उनकी कंपनी अभी तक करीब सवा लाख लोगों को सौर ऊर्जा से बिजली उपलब्ध करा रहे हैं. सौर ऊर्जा से ही किसान अपने खेतों की सब्जियां और फलों को सुखाकर डिब्बाबंद कर रहे हैं और अपनी आय बढ़ा रहे हैं. उनकी कंपनी की 25 शाखाएं हैं जिनमें करीब दो सौ कर्मचारी काम कर रहे हैं.उनकी परियोजना से सैकड़ों बच्चों को पढ़ाई के वक्त रोशनी मिल पा रही है और बंगलुरु के पास गुलाब की खेती करनेवाले किसानों को अलसुबह अँधेरे में गुलाब एकत्र करने में सुविधा हो रही है क्योंकि सेल्को ने ऐसे सोलर लैम्प बनाये हैं जिन्हें टोप की तरह पहना जा सकता है. डॉ हरीश हांडे ने अपनी सफलता की नयी इबारत लिखी है, उनकी सफलता के कुछ सूत्र :

कारोबार के नए नियम
डॉ हरीश हांडे ने कई लोगों के इस भ्रम को तोड़ दिया जो मानते थे कि सौर ऊर्जा जैसी टेक्नोलाजी आम लोगों के लिए नहीं होती है. उन्होंने इसे भी गलत साबित कर दिया कि आम लोग ऐसी टेक्नोलाजी को मेंटेन नहीं कर सकते. उनकी योजनाओं से जुड़े आम लोग ही उनके काम की असली पहचान बन गए हैं. शहरों और कस्बों से दूर बसे गाँवों में भी लोग उनकी कंपनी की योजनाओं का लाभ ले रहे हैं. सौर ऊर्जा की रोशनी के लिए लगे हजारों रुपये के पैनल्स के लिए साधारण लोग ना केवल भुगतान कर रहे हैं, बल्कि उसके मेंटेनेंस का भी ख्याल रख रहे हैं. उन्होंने इसे समझा कि छोटे से छोटे उपभोक्ता के लिए तीन बातें बहुत मायने रखती हैं : (1) टेक्नॉलॉजी (2) वित्तीय व्यवस्था और (3) बिक्री के बाद की सेवा.

डिग्री अचार डालने के लिए नहीं
डॉ हरीश हांडे ने दुनिया के नामी शिक्षण संस्थानों से डिग्री हासिल की और इस बात को समझा कि ये कोई आचार डालने के लिए नहीं, लोगों की मदद के लिए है. आईआईटी के दिनों में ही उन्होंने तय कर लिया था कि अब वे जो कुछ भी करेंगे उसमें गाँवों के लोगों को फायदा होना ही चाहिए. उन्हें इस बात का अहसास था कि वे भी विदेश जाकर लाखों की नौकरी पा सकते हैं और विलासितापूर्ण जीवन जी सकते हैं, लेकिन उनके ज़मीर ने कहा कि उन्हें कोई सार्थक काम करना है. साधु बनना उनका लक्ष्य नहीं था लेकिन उचित भाव से सेवा करना लक्ष्य ज़रूर रहा.

सामाजिक उपक्रम से मुनाफा
अब तक यही समझा जाता रहा है कि अगर कोई उपक्रम सामाजिक मकसद से शुरू किया जाता है तो उसमें घाटा ही घाटा होता है. उन्होंने लोगों को सोचने पर विवश कर दिया कि ऐसा हर बार हो यह जरूरी नहीं. अगर सोच समझकर काम किया जाए, लोगों को इसमें शामिल किया जाए और वे ऐसे उपक्रमों से लाभान्वित हों तो सामाजिक उपक्रम में भी सभी के लिए लाभ का सौदा हो सकते हैं. इस लाभ में सभी की भागीदारी होगी. सेल्को की सारी योजनायें ही इस तरह से बनाई गई थी कि उसमें पैसा डूबने की गुंजाइश नहीं रहे.

पवित्र उद्देश्य का महत्व
अगर आप कोई भी काम पवित्र उद्देश्य से कर रहे हैं तो पीछे ना हटें, हतोत्साह से बचें, क्योंकि पवित्र उद्देश्य को लेकर काम शुरू करनेवाले लोगों की मदद करने भी लोग आ ही जाते हैं. हरीश हांडे ने जब सेल्को की स्थापन की थी तब उनके पास कोई पूंजी नहीं थी, लेकिन साल भर बाद ऐसा नहीं था. उनकी मदद के लिए विनरॉक इंटरनेशनल नाम की संस्था सामने आयी और उन्हें कुछ शर्तों के साथ 150,000 डॉलर का क़र्ज़ मुहैय्या करा दिया, जिसे सेल्को ने चार साल में ही लौटा दिया. आज उनकी कंपनी में पूंजी लगाने के लिए वैश्विक कम्पनियाँ सौ करोड़ रुपये तक का निवेश करने को तैयार हैं.

नि:शुल्क में भी शुल्क है
डॉ. हरीश हांडे की कंपनी की कई सुविधाएँ नि:शुल्क लगती है, लेकिन ऐसा नहीं है. वे कोई भी सुविधा नि:शुल्क उपलब्ध नहीं करा रहे, बल्कि शुल्क वसूल कर रहे हैं. वे अपने सौर ऊर्जा के ग्राहकों से केवल 25 प्रतिशत शुल्क एडवांस में लेते हैं. कई ग्राहक इतनी राशि देने में भी सक्षम नहीं हैं, उन्हें सरकारी क्षेत्र और ग्रामीण सहकारी बैंकों से कम ब्याज दर पर कर्ज उपलब्ध कराते हैं. सरकारी योजनाओं में उनके ग्राहकों को जो भी सब्सिडी मिलती है,वह उनके उपभोक्ताओं तक पहुँचती है.

बिक्री बाद की सेवा
किसी भी सामान की बिक्री के बाद की सेवा केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों का ही दायित्व नहीं है,डॉ. हरीश हांडे ने इस बात को समझते थे. उन्होंने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में आनेवाली इस समस्या का ध्यान रखा कि किस तरह की परेशानियों का सामना ग्राहकों को करना पड़ता है. उन्होंने बिक्री बाद की सेवा के लिए कंपनी में अलग से टीम बनाई और अपने तमाम ग्राहकों से सीधे संपर्क बनकर उन्हें आश्वस्त किया कि वैकल्पिक ऊर्जा अपनाने में उन्हें किसी भी तरह की कोई दिक्कत नहीं होने दी जाएगी.

टेक्नॉलॉजी की ज़रुरत
सेल्को जो काम कर रही है, वही काम देश भर में अनेक संस्थाएं कर रही हैं, लेकिन वे आम जानता का भला नहीं कर रही क्योंकि उनमें से ज़्यादातर भ्रस्टाचार करने के लिए ही बनाई गयी है. सेल्को ने हमेशा इस बात का खयाल रखा कि सौर ऊर्जा केवल बत्ती जलने के लिए नहीं, और भी कई कामों के लिए उपयोग में लाई जा सकती है. उनकी कंपनी सौर ऊर्जा से खाना पकाने, घर को ठंडा रखने, सब्जियों और फलों को सुखाकर स्टोर करने, दो लाख लीटर तक पानी को गरम करने जैसे कामों के लिए ग्राहकों की ज़रुरत के अनुसार उपकरण बनाती और वित्तीय प्रबंधन का कार्य कर रही है

असली कामयाबी का इंतज़ार
डॉ हरीश हांडे को मिले सम्मानों की फेहरिस्त काफी लम्बी है. उन्हें प्रिंस चार्ल्स से लेकर ओबामा तक सम्मानित कर चुके हैं. उन्हें भारत के उन पचास लोगों में गिना गया है जो एक नए भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण रोल निभा रहे हैं, वे अपने कार्य को विकेन्द्रित और ग्राहकोन्मुख बनाने के काम में जुटे हैं. उनका कहना है कि अभी हमें केवल कर्णाटक और गुजरात में ही काम करने का मौका मिला है, हम यह कार्य पूरे देश में फैलाना चहेते हैं. जब हर गाँव में हमारी सेवा पहुँच जाएगी, तभी हम अपने आप को कामयाब पाएंगे.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 31 july 2011

Sunday, July 24, 2011

संघर्ष से थामा कामयाबी का दामन

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम



संघर्ष से थामा कामयाबी का दामन

सेलेब्रिटी के रूप में फ़िल्म स्टार, खिलाड़ी, नेता, उद्योगपति, सामाजिक कार्यकर्ता आदि को तो सभी जानते हैं, लेकिन कोई किसान भी किसी देश में सेलेब्रिटी माना जाने लगे, यह अनोखा काम हरचावरी सिंह चीमा ने कर दिखाया है. उन्होंने यह बात भी गलत साबित कर दी कि ग्लोबल इंडियन केवल आईटी, मैनेजमेंट या फाइनेंस के क्षेत्र में ही मशहूर हो सकते हैं. वे किसान परिवार के है और अब भी मूल रूप से किसान ही हैं. उन्होंने किसान के रूप में ही दौलत और सम्मान हासिल किया और वह भी अफ्रीकी देश घाना में. वे ४० साल पहले अमृतसर से विस्थापित हुए थे. उन्होंने अपनी लगन, मेहनत और दृढ़ता से भारत का नाम रोशन किया. उन्होंने यह मिथक भी तोड़ा कि बड़ा उद्यमी, नेता, अभिनेता या खिलाड़ी बनकर ही भारत का नाम रोशन किया जा सकता है. उन्होंने वहां सुपर मार्केट के मैनेजर के रूप में अपना करीयर शुरू किया था और अब वे घाना के जानेमाने किसानों में से हैं. घाना के राष्ट्रपति उन्हें दो बार सर्वश्रेष्ठ किसान के रूप में सम्मानित कर चुके हैं. कहते हैं कि सिख कौम मेहनती और बहादुर होती है और इसके लोग दुनिया में कहीं भी जाएँ, अपनी मुकम्मल जगह बना ही लेते है. हरचावरी सिंह चीमा की गिनती सफलतम अनिवासी भारतीयों में होती है. हर्चावरी चीमा की सफलता के कुछ सूत्र :
सारे मिथक तोड़ो
हरचावरी सिंह चीमा ने अपनी कामयाबी की दास्तान स्याही से नहीं, पसीने से लिखी है. सारे मिथक तोड़ते हुए वे आगे बढ़ते ही रहे. यूएसए, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों में तो हर कोई जाना चाहता है, लेकिन वे पहुँच गए पश्चिमी अफ्रीका के देश घाना. अनुभव के नाम पर मुंबई की कपड़ा मिल में मज़दूरी का अनुभव था और परिवार खेती किसानी करता था. न कोई बड़ी पूंजी, न कोई रहनुमा, न कोई आईआईएम या आईआईटी की डिग्री. वे कामयाबी की सभी सीढ़ियाँ अपनी मेहनत से चढ़ते चले गए, बिना किसी की मदद के, बिना पूर्व नियोजित लक्ष्यों के.उन्होंने अपनी नयी मंजिल खुद तय की और वहां तक पहुंचे. दुनिया में सभी जगहें अच्छी हैं और ईमानदारी से काम करो तो कामयाबी मिलटी ही है, यही उनका दर्शन रहा.
मूल धंधा मत छोड़ो
हरचावरी सिंह चीमा चालीस साल पहले घाना गए तो थे एक सुपर मार्केट शृंखला के मैनेजर बनकर लेकिन जब वहां मंदी का दौर आया और वह सुपर मार्केट बंद हो गया जहाँ वे नौकरी करते थे. उन्होंने घाना छोड़कर वापस भारत आने के बजाय वहीँ रहने का फैसला किया और खुद का व्यवसाय शुरू करने की सोची. उन्होंने पोल्ट्री फार्म खोला लेकिन उसमें कोई खास कमाई नहीं हुई. अनेक किस्म की परेशानियों के कारण उन्हें मज़बूरन वह व्यवसाय बंद करना पड़ा. घाना जाने के पहले वे मुंबई में एक कपड़ा मिल में काम कर चुके थे, और उन्हें लगा कि अगर कपड़ा बनाने का व्यवसाय शुरू किया जाए तो शायद कामयाबी मिले. उन्होंने एक छोटी सी मेन्युफेक्चरिंग यूनिट खोली लेकिन वहां भी नाकामी ही हाथ लगी. हाल यह था कि उन्हें अपने परिवार के खाने के लिए खुद मक्का की फसल लेनी पड़ती थी. उन्हें लगा कि किसान परिवार का होने के नाते उन्हें खेती को ही अपनाना चाहिए और खेती ही उनका भाग्य बना सकती है. लेकिन वहां भी खेती बारिश पर निर्भर थी और किसानों तक को खाने के लाले पड़ रहे थे. हिम्मत नहीं हारते हुए उन्होंने खेती में अनेक प्रयोग किये. यह महसूस किया कि अगर सब्जियों की पैदावार की जाये और उन्हें यूरोप निर्यात किया जाए तो अच्छी आय हो सकती है. उन्होंने वही किया और कामयाब हुए.
हर काम में विशिष्टता हो
हरचावरी सिंह चीमा का काम करने का अंदाज़ अलग है. घाना में वैसे तो हजारों किसान हैं जो रोज़मर्रा में संघर्ष कर रहे हैं लेकिन चीमा ने अलग राह पकड़ी. उन्होंने शोध किया कि वे घाना में कौन कौन सी फसलें ले सकते हैं और क्या क्या निर्यात कर सकते हैं. उन्होंने 25 तरह की सब्जियों के निर्यात की संभावनाएं खोजी, उनका उत्पादन और निर्यात शुरू किया. वे घाना से यूरोप के देशों को हजारों टन सब्जियां निर्यात कर रहे हैं, जिससे घाना को विदेशी मुद्रा मिल रही है और चीमा को अच्छी कमाई. सब्जियों के उत्पादन और निर्यात के बाद उन्होंने अनाज का उत्पादन शुरू किया और आधुनिक तकनीक अपनाकर अधिक से अधिक उत्पादन शुरू किया. घाना के राष्ट्रपति उन्हें दो बार सम्म्मानित कर चुके हैं.
पूरी मज़दूरी दो, पूरा टैक्स भरो
मज़दूरों को उनका पसीना सूखने से पहले पूरी मज़दूरी मिल जानी चाहिए और सरकार को वक़्त के पहले उसका टैक्स. अगर इस पर अमल हो जाये तो तनाव से तो बचा ही जा सकता है, लोकप्रियता भी पाई जा सकती है. इस व्यवहार से हरचावरी सिंह चीमा अपने मज़दूरों में विवादों से दूर रहते हैं और पसंद किये जाते हैं. सरकारी अफसरों को लगता है कि अगर टैक्स वक़्त पर मिल जाये तो उनका काम आसान हो जाता है. कभी भी मज़दूरों की तरफ से उनकी कोई शिकायत किसी को नहीं मिली. इसका एक और फायदा यह है कि उन्हें जब भी मज़दूरों की ज़रुरत पड़ती, वे उपलब्ध हो जाते हैं. खेती में मजदूरों की उपलब्धता बहुत मायने रखती है.
सारी दुनिया अपना घर
जब हरचावरी सिंह चीमा की नौकरी चली गयी, तब कई लोगों ने उन्हें सलाह दे डाली थी कि अब उन्हें वापस भारत लौट जाना चाहिए. लेकिन उन्होंने इस सुझाव को नहीं माना. उन्होंने अपना घर बदला ज़रूर लेकिन घाना में ही. घाना की राजधानी के घर से वे उपनगर में गए और फिर वहां से बाहरी इलाके में. उनका कहना था कि घाना के लोग बहुत अच्छे हैं और उन्हें कभी भी उनसे कोई दिक्कत नहीं हुई, ऐसे में वे घाना क्यों छोड़ें? वे कहते हैं कि हो सकता है कि मैं कनाडा या यू एस में ज्यादा दौलत कमा लेता लेकिन मेरे लिए सारी दुनिया ही घर है. मैं यहाँ भी जिअतना धन कमा रहा हूँ, मेरे और मेरे परिवार के लिए काफी है.
किसान से उद्यमी
हरचावरी सिंह चीमा आज घाना के नंबर वन किसान हैं जो खाद्यान्न और सब्जियां उत्पादित करते हैं. उनका कहाँ है कि अब नंबर वन के आगे मैं इस क्षेत्र में कहाँ जा सकता हूँ? बेहतर है कि मैं अपने काम को विस्तार दूं. इसी इअरेड से उन्होंने अब पैकेजिंग इंडस्ट्री में कदम रखा है और अपने कारोबार को विस्तार देने में जुटे हैं. उनकी परियोजनों को देखकर दुनिया भर के अनेक उद्यमी घाना में निवेश करने जा रहे हैं और वे मानते हैं कि घाना का विकास सभी के लिए अच्छा रहेगा. वे किसान से आएग बढ़कर कुछ करना चाहते हैं, घाना के लिए भी और अमृतसर के लिए भी.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 24 july2011

Saturday, July 16, 2011

कामयाबी के लिए मौलिकता ज़रूरी

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम


अब सोनू निगम और ब्रिटनी स्पिअर्स की जोड़ी 'आई वान्ना गो' के रिमिक्स में देखने को मिलेगी. पार्श्व गायक, अभिनेता, रेडियो और टीवी कार्यक्रम प्रस्तोता, स्टेज आर्टिस्ट और संगीतकार सोनू निगम इसके पहले माइकल जेक्सन के भाई के साथ आइफा के आयोजन में प्रस्तुति दे चुके हैं. 38 साल के सोनू 35 साल से गाने गा रहे हैं. तीन साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता श्री अगम निगम के साथ एक मंच पर फ़िल्म 'हम किसी से कम नहीं' का मो. रफ़ी का गाना 'क्या हुआ तेरा वादा...' गया था और उसके बाद गायन से उनका रिश्ता अटूट हो गया. 35 साल के गायन में उन्होंने हिंदी के साथ ही अंग्रेज़ी,नेपाली, मराठी, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, बांग्ला, कन्नड़, भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी फिल्मों में भी गाने गाये हैं और दुनिया के लगभग सभी प्रमुख शहरों में स्टेज शो किये हैं. ब्याह-शादी के आयोजनों और होटलों में गायन से शुरुआत करनेवाले सोनू निगम को कामयाबी आसानी से नहीं मिली. सोनू निगम की सफलता के कुछ सूत्र :

कोई मजबूरी स्थायी नहीं
सोनू निगम के घर के हालात बुरे नहीं थे लेकिन आगे बढ़ने की जिद ने सोनू निगम से कई तरह के काम करवाए. सोनू निगम के पिता मंच के कलाकार थे और तीन साल की उम्र में ही उन्होंने पिता के साथ मंच पर आमद दर्ज करा ली थी. उनका लक्ष्य गायन के क्षेत्र में नाम कमाना था वे उनके स्कूल जाने और खेलने के दिन थे लेकिन उन्हें होटलों और शादी ब्याह में मंच की शोभा बढ़ाना पड़ रही थी. उनके पिता और वे जानते थे कि मज़बूरी का यह दौर ख़त्म होगा और हुआ भी. वे हर दिन कुछ न कुछ नया करने के लिए जुटे रहे और असफलताओं को पार करते हुए खुद का मुकाम बनने में कामयाब रहे. उनका संकल्प यही था कि कोई भी काम अगर मज़बूरी में किया जा रहा है या करना पड़ रहा है तो वह दौर कभी भी स्थायी नहीं हो सकता.

हर भूमिका में सर्वश्रेष्ठ
सोनू निगम ने हर तरह की भूमिकाओं को अपने सर्वश्रेष्ठ के साथ जीया है. बाल गायक के रूप में जब उन्होंने गायन स्पर्धाओं में जाना शुरू किया तब लगभग हर बार उन्हें ही पुरस्कार मिलता. स्पर्धा आयोजकों ने उन्हें बाल गायक कलाकार की सूची से ही बाहर कर दिया और उन्हें वयस्क गायकों की सूची में दाल दिया. वहां भी वे जीतते गए तो उन पर रोक लगाने के लिए उन्हें ही स्पर्धाओं का जज बनाया जाने लगा. जब वे अपने पिता के साथ मुंबई शिफ्ट हुए और फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम मिला तो उन्होंने पांच फिल्मों में भूमिकाएं की. जब उन्होंने टी सीरीज के लिए कवर वर्जन गाये तब वे भी बेहतरीन थे और पार्श्व गायन में 'संदेसे आते हैं', 'साथिया...', कल हो न हो'. 'पंछी नदिया..', 'सूरज हुआ मद्धम..'के लिए सर्वश्रेष्ठ पुरुष गायक का फ़िल्मफेयर अवार्ड मिल चुका है. राष्ट्रीय फ़िल्म अवार्ड, जी सिने, आईफा, स्टार स्क्रीन आदि अनेक देशी-विदेशी अवार्ड उनकी झोली में हैं. उन्होंने जो भी किया अपना सर्वश्रेष्ठ करने की कोशिश के साथ.

नकलची ना बनें

सोनू निगम के पिता मो. रफ़ी के भक्त होने की हद तक प्रशंसक थे. वे रफ़ी साहब के नग्मे खूब गाते थे. सोनू ने भी गायन की शुरुआत रफ़ी के नग्मे से ही की थी. हर जगह सोनू रफ़ी के नग्मे गाते. लोग उन्हें दूसरा रफ़ी कहने लगे. 31 जुलाई 1980 को रफ़ी साहब का इंतकाल हो गया और उस दौर में कवर वर्जन खूब चल पड़े थे, जो असली अलबम से काफी सस्ते और सर्वसुलभ थे. टी सीरीज के लिए सोनू ने दर्जनों कवर वर्जन प्रति अलबम पाँच पाँच हजार रुपये में रिकार्ड करवाए. आज पुरानी राहों से...,टूटे हुए ख्वाबों ने..., ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं..., सौ बार जनम लेंगे..., तकदीर का फ़साना...,भरी दुनिया में आखिर दिल...., मिली खाक में मोहब्बत..., रहा गर्दिशों में हरदम मेरे इश्क का सितारा...,अकेले हैं चले आओ..., आपके पहलू में आकर रो दिए...., जैसे दर्जनों गाने सोनू ने गाये जो हू ब हू रफ़ी का स्वर लगते थे. ऐसा लगता था कि अब सोनू का करीयर ख़त्म क्योंकि रफ़ी के डुप्लीकेट की मार्केट में कितनी दिन मांग रहती. सोनू इस स्थिति को समझ चुके थे और अपनी आवाज़ में पार्श्व गायन करने लगे थे.

अलग पहचान की ज़रुरत

सोनू निगम ने संगीत निर्देशिका उषा खन्ना के आशीर्वाद से अमर उत्पल के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'आजा मेरी जान' के लिए पहला गाना रिकार्ड कराया था. लेकिन फ़िल्म में यह गाना नहीं लिया गया. इसे फिर से बाला सुब्रमण्यम से गवाया गया. इस फ़िल्म में उनके पाँच गाने रिकार्ड कराये गए लेकिन एक गाना ही लिया गया. 1995 में टी सीरीज के गुलशन कुमार की फ़िल्म बेवफा सनम के एक गाने 'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का' ने उन्हें एक पहचान दिलवाई. 1 मई 1995 से ही टीवी पर 'सा रे गा मा' शो शुरू हुआ और वे इसके होस्ट थे. यह कार्यक्रम बेहद लोकप्रिय हुआ और अब तक इसके २०० से ज्यादा एपिसोड प्रसारित हो चुके हैं. 1997 में बॉर्डर फ़िल्म में संदेसे आते हैं गीत ने उन्हें डुप्लीकेट रफ़ी की छवि से अलग पहचान को मज़बूत किया.

सही तालीम, सही लक्ष्य अनिवार्य
सोनू केवल बारहवीं कक्षा तक ही स्कूल गए. स्नातक की डिग्री उन्होंने दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से पाई, लेकिन शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली है जिस कारण वे अपने गायन को परिपूर्णता देने में काफी हद तक सफल रहे हैं. सही तालीम के कारण ही वे अपने लिए सही भूमिका चुन सके. बाल कलाकार के रूप में बेताब, कामचोर, तकदीर, हम से है ज़माना, प्यारा दुश्मन, उस्तादी उस्ताद से जैसी फिल्मों में काम करने के बाद वे जानी दुश्मन, काश आप हमारे होते, लव इन नेपाल और मराठी फ़िल्म नवरा माझा नवसाचा में भी काम कर चुके हैं और शांतनु-निखिल के फैशन शो में रैम्प पर भी कदमताल कर चुके हैं, लेकिन वे जानते हैं कि उनका भविष्य एक्टिंग में नहीं, गायन में है. उन्होंने अपने गायन को पार्श्व गायन तक ही सीमित रखने के बजाय लाइव शो, टीवी कार्यक्रम, प्राइवेट अलबम और देश विदेश के कलाकारों के साथ मिलकर काम कर रहे है.

सेहत और सेवा
xसोनू निगम अपने शरीर और लुक्स का ध्यान रखनेवाले शख्स हैं. सेहत के लिए रोज योगासन भी करते हैं. वे ताइक्वान्डो के प्रशिक्षित खिलाड़ी हैं. शादीशुदा, एक बेटे के पिता सोनू अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान भी करते हैं.यह राशि वे उजागर नहीं करते लेकिन कैंसर, दृष्टिबाधित, लेप्रोसी, एड्स जैसी बीमारियों से लड़नेवाले संगठनों की मदद करते रहते हैं. वे आसराहीन बच्चों को अपने बूते पढ़ाते भी हैं. नकद दान के अलावा मुफ्त में शो भी करते हैं. वे कहते हैं कि कामयाबी तभी कामयाबी है, जब उसका फायदा सब को मिले.

प्रकाश हिन्दुस्तानी


हिन्दुस्तान 17 july 2011

Thursday, July 14, 2011

सामान्य ज्ञान का भारतीयकरण भी जरूरी

हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा नजरिया


सामान्य ज्ञान का भारतीयकरण भी जरूरी

यूपीएससी ने फैसला किया है कि अब प्रशासनिक पदों के प्रतियोगी फायनल इंटरव्यू में अपनी मातृभाषा में जवाब दे सकेंगे. अब तक केवल हिन्दी अथवा अंग्रेज़ी में ही इंटरव्यू होता था. यह एक अच्छा फैसला है जिसका लाभ दूसरी भारतीय भाषाओँ के प्रतियोगियों को होगा. वास्तव में यूपीएससी में भाषा के अलावा सामान्य ज्ञान के नाम पर होनेवाली अराजकता भी ख़त्म की जानी चाहिए.
सामान्य ज्ञान के नाम पर विदेशी और शहरी मामलों की जानकारी को ही ज्यादा महत्त्व क्यों दिया जाता है? जिसे सामान्य ज्ञान कहा जाता है वह भी प्रतियोगी रटकर जाते हैं. क्या सामान्य ज्ञान कोई रटने की विषयवस्तु है? आखिर सामान्य ज्ञान में यह क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि कंडे और सरकंडे में क्या अंतर है? क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि विक्रम संवत और शक संवत में क्या अंतर है? ..क्या अंतर है तबले और पखावज में? कार्तिक के बाद कौन सा महीना आता है?...उर्दू का जन्म कहाँ हुआ था?...मुद्राराक्षस कौन था? क्या यह कोई करंसी है? क्या पाला लगाने से गेहूं की फसल बर्बाद हो जाती है? अमीर खुसरो ने किस वाद्य यंत्र का अविष्कार किया था? शतरंज की खोज कहाँ हुई और पानी पूरी भारत के किस शहर की देन है?...रावण हत्था क्या है? यह कोई हथियार है या वाद्य ? वो कौन शख्स था जिसने राष्ट्रपति भवन एक बार, लाल किला दो बार और ताज महल तीन बार बेच डाला था?
वास्तव में हमारे लिए वही सामान्य ज्ञान वास्तव में उपयोगी है जो हमसे सरोकार रखता हो. आज कितने ही आला अधिकारीयों को यह बात पता नहीं है कि पाला गिरने से दूसरी फसलें भले ही चौपट हो जाएँ, गेहूं की फसल को फायदा ही होता है. आज भी करोड़ों भारतीय घरों में काल गणना हिन्दी तिथि के अनुसार ही होती है. विजडन पत्रिका के कवर पेज पर किसकी तस्वीर है या मिकी माउस के जन्मदाता वाल्ट डिज्नी का साथी कौन था जैसे सवालों की जगह भारतीय सन्दर्भ के सवाल हमारे लिए ज्यादा मौजूं हो सकते हैं. हमारे प्रतियोगी के लिए नोकिया कम्पनी के चैयरमैन का नाम जानने से ज्यादा ज़रूरी दादा साहब फाल्के के बारे में जानना हो सकता है. एक हेक्टेयर में चावल की औसत पैदावार कितनी है और मक्का की फसल को कितनी बार सिचाई की ज़रुरत होती है यह जानकारी हमारे विद्यार्थियों को क्यों नहीं होना चाहिए? कुम्भ का मेला कब और कहाँ भरता है और कब ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का उर्स कब होता है और वहां के सेवकों को क्या कहा जाता है जैसे सवालों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
कोई भी प्रतियोगी अपने आसपास के माहौल को कितना समझता है और उससे क्या सीख सकता है, यह बात सामान्य ज्ञान का पैमाना होना चाहिए. 'क्या आप जानते हैं' टाइप रटा रटाया सामान्य ज्ञान हमारे सन्दर्भ में शायद खरा नहीं उतरता हो और न ही ' कौन बनेगा करोड़पति' छाप सामान्य ज्ञान बहुत उपयोगी होगा क्योंकि यहाँ लक्ष्य होता है ज्यादा से ज्यादा एसएमएस मंगवाकर रूपया कमाना, न कि सामान्य ज्ञान का विस्तार करना.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 14 july 2011

Sunday, July 10, 2011

प्रयोगधर्मी गालीबाज़ आमिर

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम
प्रयोगधर्मी गालीबाज़ आमिर




आमिर खान को मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहा जाता है. वे 'मेथड एक्टर' हैं. बॉलीवुड में वन मेन इंडस्ट्री हैं आमिर खान. उनके पुरखे हेरात, अफगानिस्तान से आये थे. वे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और डॉ. जाकिर हुसैन के वंशजों में से हैं और नज्मा हेप्तुलाह उनके करीबी रिश्ते में हैं. 46 साल के आमिर 38 साल से फिल्मों में हैं. 1973 में रिलीज फ़िल्म यादों की बारात में आठ साल का रोल करनेवाले बाल कलाकार आमिर ग्यारह साल बाद केतन मेहता की फ़िल्म होली में आये. आमिर खान अभिनीत 39 फ़िल्में रिलीज़ हो चुकी हैं, और दो बड़ी फ़िल्में धूम-थ्री और धुंआ बन रही है. तारे ज़मीन पर उन्होंने निर्देशित भी की थी और सात फिल्मों के वे निर्माता हैं. दस साल पहले 2001 में उनकी कंपनी की पहली फ़िल्म लगान आई थी, जो सुपर हिट रही और अब आई है डेल्ही बेली, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसने भाषा के कारण आमिर के दस साल के काम पर पानी फेर दिया है. आमिर को पहचान दिलानेवाली क़यामत से क़यामत तक थी और राख फ़िल्म को नेशनल फ़िल्म (स्पेशल जूरी) अवार्ड मिला था. उनको मिले सम्मानों की फेहरिश्त काफी लम्बी है. इस मुकाम तक आने के लिए आमिर खान ने कई तरह के पापड़ बेले और समझौते भी किये है. ज़रूरी नहीं कि आप उनसे इत्तफाक रखें पर ये हैं आमिर की सफलता के कुछ सूत्र :
परफेक्शन पर जोर
आमिर खान को बॉलीवुड में परफेक्शनिस्ट माना जाता है. जो भी करते हैं पूरी लगन और मेहनत से. अभिनय की बारीकी हो या निर्देशन की,फ़िल्म का प्रमोशन हो या विज्ञापन की शूटिंग.फ़िल्म के कलाकारों का एग्रीमेंट हो या फ़िल्म की बजटिंग, वे हर तरफ ध्यान रखते हैं. उनकी कोशिश रहती है कि हर काम पूरी परिपक्वता से हो हो और पूरी तरह से परिपूर्ण हो. थ्री इडियट फ़िल्म का एग्रीमेंट 25 पेज का था जिसमें हर तरह की बारीकी लिखी हुई थी.
बॉक्स ऑफिस पर निगाहें
बॉलीवुड समीक्षकों की नहीं, बॉक्स ऑफिस की ही भाषा जानता है. आमिर खान के लिए भी बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी ही सब कुछ है. इसके लिए वे सब कुछ करने को तैयार रहते हैं. हाल ही में समीक्षकों ने लिखा है कि लगान और तारे ज़मीन पर जैसी फ़िल्में बनानेवाले आमिर खान ने गालियों को अपनी यूएसपी बना लिया! इस फ़िल्म का काफी विरोध हुआ और एक वर्ग ने इसे पसंद भी किया. जो भी हुआ हो आमिर खान को इसका आर्थिक लाभ हुआ और फ़िल्म को अच्छी ओपनिंग मिली.खुद आमिर का कहना है कि यह फ़िल्म एक 'दुर्घटना' है. अपने ब्लॉग में उन्होंने चार मर्तबा सब हेड लिखा है -- शिट हेपंस !
प्रयोगधर्मिता आवश्यक
आमिर खान प्रयोगधर्मी कलाकार हैं. वे न केवल अपने अभिनय में नयापन खोजते रहते हैं, बल्कि अपने बालों और दाढ़ी मूंछों को लेकर भी प्रयोग करते रहते हैं. क़यामत से क़यामत तक वाले चिकने चुपड़े चाकलेटी आमिर ने गुलाम के लिए जबदस्त बॉडी बिल्डिंग की और फिर वापस छरहरे बदन के लिए जिम में वक़्त गुज़ारा. बरसों बाद वे फिर गजनी के लिए शरीर सौष्ठव में जुट गए. इसी तरह अपने बालों को लेकर भी प्रयोग करते रहते हैं. आमिर की भूमिकाओं में भी विविधता रही है. मंगल पांडे में क्रांतिकारी की भूमिका हो या इश्क का प्रेमी, लगान का किसान हो या फ़ना का आतंकवादी. सरफरोश का पुलिस अफसर, रंगीला का टपोरी, राजा हिन्दुस्तानी का गाइड,अकेले हम अकेले तुम का सिंगर, दिल, दिल चाहता है और क़यामत से क़यामत तक का आशिक, तारे ज़मीन पर का टीचर, रंग दे बसंती का विद्रोही, मन का कासानोवा जैसी अनेक भूमिका वे निभा चुके हैं. हर भूमिका में वे अपनी अलग छाप छोड़ते हैं.
व्यावसायिकता पर ध्यान
आमिर खान को इस बात का पूरा एहसास है कि फ़िल्म कलाकार फिल्मों से ज्यादा कमाई विज्ञापनों से करते हैं. उन्होंने परदे पर अपनी छवि से युवाओं को लुभाने पर ज्यादा जोर दिया इसी कारण उन्हें अच्छे विज्ञापन मिले. कोक, टाइटन, टाटा स्काय, अतिथि देवी भव, नमस्कार कोलकाता, टोयोटा इनोवा, मोनेको बिस्किट, सेमसंग मोबाइल, आदि मुख्य हैं. एक टेलीकाम कंपनी के विज्ञापन से उन्हें करीब ३५ करोड़ रुपये की आय हुई जो किसी मेगा बजट फ़िल्म की कमाई के बराबर मानी जा सकती है. आमिर खान अपनी एड फिल्मों की शूटिंग के लिए खासा वक़्त देते हैं, उस पर रिसर्च करते हैं और गंभीरता से उस पर काम करते हैं.
सही प्रमोशन, वक़्त पर
आमिर खान जानते हैं कि फिल्मों के प्रचार का दर्शकों पर असर पड़ता है लेकिन वह असर सबसे अच्छे नतीजे तभी दे सकता है जब वह सही वक़्त पर और अनोखे अंदाज़ में हो. उन्होंने नकारात्मक विज्ञापन शैली के फायदों को समझा और अपनाया. इसीलिये जिस तरह से लगान का प्रचार किया गया उसी तरह जाने तू.. का नहीं किया गया. पीपली लाइव का प्रचार अलग था और थ्री इडियट्स का अलग. पीपली लाइव की क्रेडिट उन्होंने अपनी पत्नी किरण राव को दी और धोबीघाट की भी. उन्होंने इन फिल्मों से बहुत रूपया नहीं बनाया लेकिन नाम कमाने के लिए ऐसी फ़िल्में कारण ज़रूरी था. डेल्ही बेली में उन्होंने एक विवादस्पद गाने के बहाने प्रचार पाया और पहले ही हफ्ते में अच्छी कमाई कर ली.
मीडिया मैनेजमेंट
आमिर का मीडिया मैनेजमेंट का तरीका अलग है. वे जानते हैं कि कब उन्हें मीडिया की ज़रुरत पड़ती है और कब मीडिया को उनकी. नेगेटिव पब्लिसिटी में उन्हें महारथ हासिल है और शाहरुख़ खान के बारे में बयान देकर उन्होंने काफी प्रचार पाया. पहली पत्नी रीना दत्ता से तलाक और किरण राव से ब्याह, भाई फैसल की बीमारी और कस्टडी जैसे मुद्दों पर वे मीडिया में कभी नहीं आये ना ही कुछ बोले. उन्हें यह कला भी आती है कि किन किन राजनेताओं से नजदीकियां मीडिया में सुर्खी बनाती है और किस शब्दावली पर मीडिया बहस पर आमादा हो जाता है.
पुरस्कारों से दूरी
नए कलाकार के लिए के लिए पुरस्कार प्रोत्साहन भी होता है और पब्लिसिटी का माध्यम भी. आमिर उससे ऊपर उठ चुके हैं. लगातार कई साल तक पुरस्कार नहीं मिलने से उनमें इन पुरस्कारों के प्रति उपेक्षा भाव आ गया. खासकर फिल्मफेयर पुरस्कार को लेकर. उन्हें 1989 में राख, 1990 में दिल, 1091 में दिल है कि मानता नहीं, 1992 में जो जीता वही सिकंदर, 1993 में हम हैं रही प्यार के, 1994 में अंदाज़ अपना अपना, 1995 में रंगीला के लिए बेस्ट हीरो के लिए नामिनेट किया गया था लेकिन अवार्ड मिला 1996 में राजा हिन्दुस्तानी के लिए. मंगल पांडे, गजनी और तारे जमीन पर के लिए भी उनका नामिनेशन हुआ, लेकिन तब तक उनका मोह इन पुरस्कारों से खत्म हो चुका था. अब वे अवार्ड के कार्यक्रम में नहीं जाते और इस कारण भी लोग उन्हें याद रखते हैं.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 10 june 2011

Saturday, July 02, 2011

टेक्नॉलॉजी की मदद से छू ली मंजिल

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम




टेक्नॉलॉजी की मदद से छू ली मंजिल


रजनी गोपाल पेशे से चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट हैं. वे इन्फोसिस में सीनियर पद पर कार्य करती है. उन्हें वीणा वादन का भी शौक है और सोशल वर्क में भी उनकी दिलचस्पी है. शतरंज उनका प्रिय खेल है और कुकिंग भी पसंद है. फिट रहने के लिए वे नियमित योग करती है. वे हमेशा ही अच्छे नंबरों से पास होती रही है. आप पूछेंगे कि इसमें खास बात क्या है? जी हाँ, खास बात यह है कि रजनी गोपाल पूरी तरह से दृष्टि बाधित हैं और वे जो कुछ भी देखती हैं वह आँखों से नहीं, बल्कि मन की आँखों से. वे भारत की पहली महिला सी ए हैं जो दृष्टि बाधित हैं. टेक्नॉलॉजी उनकी थोड़ी सी मदद ज़रूर करती है लेकिन वे हौसलों से ही सब कुछ करती-देखती है. सी ए बनना वैसे भी आसान नहीं होता लेकिन दृष्टि बाधिता के बावजूद सी ए बनना और फिर इन्फोसिस जैसी कंपनी में महत्वपूर्ण पद संभालना कोई आसान बात नहीं. आज रजनी गोपाल हजारों लोगों के लिए आदर्श बन चुकी हैं. रजनी की सफलता के कुछ सूत्र :

विलक्षण हौसले की दास्तान


रजनी गोपाल जब नौ साल की थीं, तब स्कूल में उन्हें तेज़ बुखार आया. स्कूल के शिक्षकों ने उन्हें तुरंत घर पहुंचाया. परिवार के लोगों ने उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया. इलाज में कुछ लापरवाही रही और जब विशेषज्ञ डॉक्टर्स पहुंचे तो उन्होंने बताया कि नन्हीं रजनी को स्टीवन जोंसन सिंड्रोम नाम की बीमारी हो गयी है जो शरीर के किसी ना किसी अंग को बर्बाद करके ही जाती है. रजनी के शरीर की आँखों को इस भयावह बीमारी ने अपना निशाना बनाया और रजनी के जीवन में घोर अँधेरा करके ही यह बीमारी वापस लौटी. उनकी एक आंख की रोशनी पूरी तरह से जाती रही और दूसरी आँख से भी बहुत कम दृष्टि बची थी. कोई और होता तो जीवन भर इस बीमारी को कोसता रहता और लाचारी का जीवन जीने को अभिशप्त रहता. लेकिन रजनी को यह मंज़ूर नहीं था. उन्होंने कहा कि वे खुद अपनी कामयाबी की कहानी लिखेंगी और उन्होंने जो कुछ भी सोचा था वह कर डाला.

टेक्नॉलॉजी ने की मदद

जब रजनी अपनी पढाई करने बैठतीं, तब कई बार लोगों ने उनकी मदद की, लेकिन अनेक मर्तबा उनकी सहपाठी छात्राओं ने ही उन पर फब्तियां भी कसीं. उनसे ज़रा भी हतोत्साहित हुए बिना रजनी ने पढाई जारी रखी. बी. कॉम. के बाद उन्होंने सी ए बनने की ठानी. उन्हें पता चला कि चिकित्सा जगत की लापरवाही से उनकी दृष्टि का नुकसान हुआ है विज्ञान की मदद से उन्हें कुछ राहत मिल सकती है. उन्हें एक एनजीओ के कार्यकर्ताओं ने स्क्रीन रीडिंग साफ्टवेयर जे ए डब्ल्यू एस के बारे में बताया और फिर यही साफ्टवेयर उनकी पढाई का सबसे मददगार हिस्सा बन गया. उन्होंने अपना सारा स्टडी मटेरियल इकठ्ठा किया और उसे स्क्रीन रीडिंग साफ्टवेयर की मदद से पढ़ा और समझा. सारी पढाई उन्होंने इसी की मदद से की और अंतत: सी ए का अंतिम इम्तहान भी पास किया.

संगठन ने की मदद

इंस्टीट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इण्डिया (आईसीएआई )ने रजनी के लिए रोजगार उपलब्ध करने में बड़ी मदद की. सी ए की डिग्री लेने के बाद रजनी ने अपना बायो डाटा आईसीएआई के प्लेसमेंट सेल को भेज दिया और संगठन ने उसे गंभीरता से लेते हुए उन्हें पहला रोजगार इंडियन ग्रुप ऑफ़ होटल्स में मुहैया कराया. वे वहां पर कम्युनिटी को ऑर्डिनेटर बन गयीं. लेकिन इस काम में उनकी सी ए की डिग्री का ज्यादा योगदान नहीं था. कुछ ही दिनों में उन्हें नए जॉब का मौका मिला और उन्होंने उसे झपट लिया.

ज्ञान का विस्तार करते रहें

रजनी को अपने ज्ञान के विस्तार के कारण ही आज इन्फोसिस में महत्वपूर्ण जगह मिली है. वे वहां पर कंपनी के भारत और यू एस ए के जनरल अकाउंट्स की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है. वे यह काम अपने सहयोगियों के साथ मिलकर पूरा करती हैं. उन्हें अपने काम में कभी किसी कमी की शिकायत नहीं मिली है. सहयोगियों के बीच भी उनकी अच्छी साख है और वे अपने काम को एन्जॉय करती हैं. उन्हें कभी भी ये एहसास नहीं होता कि उन्हें कोई शारीरिक ब्याधि है. देश में एक और सी ए दिलीप लोयलका भी दृष्टि बाधित हैं, पर वे पुरुष है.

माहौल के अनुसार ढलें

रजनी गोपाल ने अपने जीवन में जो बात सीखी वह यह है कि हमें अपने आप में माहौल के मुताबिक ढलने की आदत भी डाल लेनी होनी चाहिए. हमें हर जगह एक जैसे सहयोगी और सकारात्मक माहौल मिले यह ज़रूरी नहीं. आप खुद कोशिश करके माहौल को थोड़ा तो बदल सकते हैं और थोड़ा खुद को बदलकर माहौल के अनुसार ढल सकते हैं. शुरू में जब वे बंगलुरु में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करती थीं, तब उन्हें थोड़ा असहज लगता था लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने आप को हालात के मुताबिक ढाल लिया.

समस्याओं का निदान खुद करें

रजनी के लिए शुरू में यह बात स्वीकार करनेलायक ही नहीं थी कि वे दृष्टि बाधित हैं. उन्हें इस दशा में बहुत असहज और बाध्यता लगती,लेकिन जल्दी ही वे इस से बाहर आ गयीं. उनके भाई ने जब उन्हें कहा कि खुद को दिमागी रूप से मज़बूत बनने के लिए योग का सहारा लेना उचित होगा तो उन्हें यह बात इन्सल्ट लगी. जल्दी ही उन्होंने अपने आप को संभाला और मानसिक रूप से मज़बूत बनाया. वे कहती हैं कि शुरू में तो मुझे यह लगाने लगा था कि मैं दृष्टि बाधित नहीं, बल्कि मानसिक रोगी हो गयी हूँ. आज मैं अपने परिजनों के सहयोग से मंजिल पाने में कामयाब हूँ.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान july 03,2011

Sunday, June 26, 2011

संघर्ष ही बनाता है सिकंदर

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम


आईएएस चुने गए सुखसोहित सिंह हजारों थैलेसीमिया पीड़ितों के संघर्ष और सफलता के प्रतीक बन गए है. पंचकुला के इस नौजवान ने अपनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट और प्रधानमंत्री कार्यालय तक लड़ी.

संघर्ष ही बनाता है सिकंदर

सुखसोहित सिंह आईएएस के लिए चुने गए, इसमें कोई नयी बात नहीं है. उनकी पोज़ीशन दूसरी सूची में 42 वीं ( पहली सूची जोड़ने पर 833 वीं) थी. वे हमेशा अव्वल आते रहे, इसमें भी कोई खास बात नहीं, लेकिन उन्होंने वह काम कर दिखाया है जो आजाद भारत में किसी ने नहीं किया. सुखसोहित सिंह ने अपने अधिकार के लिए हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और स्वास्थ्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक अपने हक़ की लड़ाई लड़ी और जीते. दरअसल वे थेलेसिमिया नामक आनुवंशिक रोग से पीड़ित हैं और उन्हें इस आधार पर नियुक्ति नहीं दी जा रही थी कि वे भी सरकार के लिए बोझ साबित हो सकते हैं. सुखसोहित सिंह ने साबित किया कि जिस बीमारी के आधार पर पर उन्हें उनकी योग्यता के मुताबिक रोजगार के अधिकार से वंचित किया जा रहा है, वह बीमारी मैनेज करने योग्य है और इसका उनकी कार्यक्षमता कम नहीं होगी और वे किसी पर भी बोझ तो हर्गिज़ नहीं ही होंगे. जल्द ही सुखसोहित सिंह की नियुक्ति उचित पद पर होगी और वे अपनी योग्यता के मुताबिक काम कर सकेंगे. 2008 में हुई यूपीएससी की चयन परीक्षा की मेरिट में जगह पाने वाले सुखसोहित सिंह की सफलता के कुछ मन्त्र :

थेलेसिमिया बाधक नहीं

सुखसोहित को बचपन में ही इस बीमारी का पता चल गया था लेकिन उन्होंने किसी को भी अपने लक्ष्य में बाधा नहीं बनने दिया. यहाँ तक कि थेलेसिमिया को भी. उन्हें पता था कि इस बीमारी में कई बच्चे जवानी की दहलीज तक ही नहीं पहुँच पाते. बेशक इसमें उनके परिवार का रोल महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन सारा संघर्ष तो सुखसोहित सिंह का ही है. सुखसोहित का मानना है कि बीमारी अदृश्य है लेकिन वह मेरे हौसले को तोड़ नहीं सकी. बीमार कोई भी, कभी भी हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आप पराजय को स्वीकार कर लें.

मंजिल का पीछा मत छोड़ो
जब तक मंजिल मिल ना जाए, उसका पीछा करते रहे. सुखसोहित को यूपीएससी चयनl परीक्षा में पहले दो बार सफलता नहीं मिल सकी, लेकिन उन्होंने निराश होकर भाग्य को कोसने की अपेक्षा मेहनत करने की राह चुनी. उन्होंने कामयाबी पाई लेकिन तीसरी बार. और जब रिज़ल्ट आया तब उनका नाम मेरिट लिस्ट में था. 'फेसबुक' पर अपने परिचय में सुखसोहित ने लिखा है कि अतीत के कैदखाने में वक़्त गंवाने से बेहतर है कि अपने महान भविष्य का शिल्पकार बनना. आप अतीत को नहीं बदल सकते, लेकिन शानदार भविष्य की संरचना कर सकते है.

मेहनत निवेश की तरह है

सुखसोहित पंचकुला के हैं और वहां के एक बुजुर्ग उनसे कहते रहते थे कि जो जवानी सोने में खोएगा, वह बुढ़ापे में रोयेगा. इसका अर्थ यही हुआ कि जवानी को सोने, घूमने -फिरने और बेकार के कामों में जाया ना करो, यही समय है जब आप अपने स्वर्णिम भविष्य बना सकते हैं. फेसबुक पर सुखसोहित ने लिखा है कि खुशी और कड़ी मेहनत एक तरह से भविष्य के लिए किया गया निवेश है. यह मेहनत कभी भी बेकार नहीं जाती. बस, आप आयेज बढ़ने के लिए एक पायदान पर चढ़ते हैं और फिर चढ़ते ही चले जाते हैं. सुखसोहित ने लगातार कई कई बरसों तक सोलह से अठारह घंटों तक पढ़ाई की है, और यह उनकी सफलता का आधार है.

जहाँ तक दिखाई दे, जाओ

एक पंजाबी कहावत है कि जहाँ तक दिखाई दे, वहाँ तक जाओ, वहाँ पहुँचने पर और आगे का रास्ता दिखाई देगा. आईएएस में चयन होने के बाद जब वे दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में अपने मेडिकल परीक्षण के लिए गये तब उन्हें नियमों के अनुसार अनफिट करार दिया गया, जबकि डॉक्टरों ने उनसे कहा था कि थेलेसेमिया कोई ऐसी बीमारी नहीं है जो उन्हें उनके काम में बाधा बनेगी. आई ए एस में ही चयनित एक दूसरे युवक एम. श्रीनिवासु को भी मेडिकल बोर्ड ने अनफिट कर दिया था क्योंकि श्रीनिवासू को डायबीटीज़ का रोग था. सुखसोहित से प्रेरणा लेकर उन्होंने भी अपील की कि उन्हें अनफिट करार देकर काम से वंचित न किया जाए. सबक यह है की अगर मंज़िल नज़र न आ रही हो तो भी रास्ता छोड़कर भागना उचित नहीं.

परीक्षा से मत हिचको

बीते 10 जून को सुखसोहित का पहला मेडिकल परीक्षण हुआ और फिर 17 जून को दूसरा. वे ससम्मान इस परीक्षण के लिए पहुँचे. उन्होंने अपनी बीमारी के बारे में कोई भी बात छुपाने की कोशिश नहीं की. उन्होंने यही कहा कि यह भी एक तरह की परीक्षा है और वे इसमें पास होकर रहेंगे. उन्होंने अपनी बात अधिकारियों को समझने की कोशिश की कि उनकी इस बीमारी से उनके एक आईएएस अधिकारी के रूप में काम करने पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा क्योंकि वे सिविल सेवा के लिए मानसिक और बौद्धिक रूप से पूरी तरह सक्षम हैं. जहाँ तक शारीरिक क्षमता का सवाल है उन्होंने एक एक्सपर्ट चिकित्सक का प्रमाण पत्र पेश किया कि उन्हें इसके लिए अपने शरीर में मौजूद खून में लौह कणों के असंतुलन के कारण नियमित रूप से ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न करना होगा.

बहुकोणीय प्रयास

कामयाबी के लिए बहुकोणीय प्रयास करने चाहिए क्योंकि इसमें कामयाबी की गुंजाइश ज़्यादा होती है और सफलता के पास पहुंचने की गति तेज़ हो जाते है. यूपीएससी क्रेक करनेवाले वे पहले युवा हैं जो थेलेसिमिया रोगी हैं. क़रीब 24 साल पहले उनके परिवार को इस बीमारी का पता चला और उन्होंने सुखसोहित का खास ध्यान रखा. अपने हक के इए उन्होंने न्यायालय का दरवाज़ा भी खटखटाया और मंत्री स्तर पर भी बातचीत की. केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी ने उनका मामला प्रधानमंत्री के पास पहुँचाया और 23 जून को प्रधानमंत्री ने उनकी राह आसान बना दी. सुख़सोहित सिंह आज थेलेसिमिया के हज़ारों रोगियों के लिए बन गये हैं, ऐसे मार्गदर्शक जिन्होंने न केवल अपनी राह खुद बनाई, बल्कि दूसरों को भी रास्ता दिखाया है.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान june 26,2011

Thursday, June 23, 2011

>(उम्मीद भरे) स्टोरी आइडियाज़!


(उम्मीद भरे) स्टोरी आइडियाज़! 
तैयार हो जाइए साल भर ऐसे टीआरपी बटोरू (?) स्पेशल प्रोग्राम के लिए :

हे प्रभु, तूने बड़ी कृपा की. अमिताभ का ट्विट क्या पढ़ा, मानो मन की मुराद मिल गयी. बेचारा मीडिया अफवाहें फैला फैला कर थक गया था.
अब मिर्च मसाले का उपयोग हो सकेगा.
साल भर के कुछ स्टोरी आइडियाज़.. :

टीवी चैनल के संपादकों और रिपोर्टरों से अनुरोध है कि वे डायरी में इन्हें नोट कर लें और समय समय पर ऐसे हालात में इन आइडियाज का तुरंत इस्तेमाल कर लें...

....अभी तक क्या कर रहे थे अभिषेक...

...आखिर कैसे सफल हुए इतना गैप रखने में...

...किस हकीम की दवा से गर्भवती हुईं ऐश...

... क्या मन्नत और मनौतियों का फल है यह चहंचहांहट...

...डॉन क्यों हुआ खुश ?...

...क्या सामान्य होगा?...

...फीगर बचाने के लिए नार्मल की पक्षधर नहीं है ऐश...

...ऐश को क्या खाना चाहिए?...

...किस नर्सिंग होम में?..

...घर पर क्यों नहीं?...

...श्वेता कब नाचेगी?...

...इलाहाबाद से आयेंगे (जापे के) लड्डू?...

..अजिताभ ने बधाई क्यों नहीं दी?...

...और अमर सिंह नाचने लगे...

..सोनिया पिघलीं, दी बधाई...

...गुड्डी बनेगी दादी...

...अभिषेक ने की शूटिंग की छुट्टी...

...लम्बू ने खरीदे छोटू के कपड़े...

...ऐश का वजन (कितना) बढ़ा?...

...तैयार है जच्चा का कमरा...

...पहले भी उम्मीद थी लेकिन...

...क्या कहते हैं आम आदमी?...

...क्या बहुत देर कर दी?....

...देरी से मातृत्व के फायदे या नुकसान?....

...अगर करिश्मा से सगाई ना टूटती तो क्या होता?...

...दादा को चाहिए पोता या पोती?...

...बाबा विश्वनाथ की कृपा...

....ऐश की गोद भराई कहाँ होगी मुंबई में या इलाहाबाद में?

....क्या नाम होगा (गर्भस्थ) जूनियर बच्चन का?

...क्या नाम शुभ होगा शिशु का?

....जच्चा किधर सिर करके सोये तो बच्चे का भाग्य बनेगा?

...सिद्धि विनायक का फल, हनुमानजी का आशीर्वाद..

...साथ ही देखिएगा मालिशवाली बाई का खास इंटरव्यू...

...जच्चा का डाइट चार्ट...

...ड्राइवर करेगा रहस्योदघाटन..

...माली ने खोल दिया भेद

...प्लंबर के रूप में घुसा मीडियाकर्मी

...फलां नीम हकीम का दावा ....

यह भी हो सकता है कि ऐश की बॉडी लैंग्वेज के आधार पर कोई टीवी रिपोर्टर 'सुपर जूनियर बिग बी' का इंटरव्यू ही दिखाकर माने. आखिर हमारे टीवी चैनलों में भी कई रजनीकांत जो हैं.

दरअसल टीआरपी की होड़ में मूल मुद्दों से भटक गए हैं हम !!!

प्रकाश हिन्दुस्तानी
जून 22 , 2011

Saturday, June 18, 2011

कामयाबी इंतज़ार भी कराती है




रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम



2002 में भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल किये जाने के बाद भी अमित मिश्रा को खेलने के उतने अच्छे मौके नहीं मिले और बरसों तक टीम इण्डिया में उनका उपयोग केवल एक स्टेपनी की तरह ही किया गया. इस पूरी प्रक्रिया का उस खिलाड़ी पर क्या असर पड़ सकता है, यह शायद ही हमारे क्रिकेट प्रशासन ने सोचा हो, लेकिन अमित मिश्रा ने मौका आने पर अपनी काबीलियत साबित कर दी.

कामयाबी इंतज़ार भी कराती है


क्रिकेट को टीम का खेल माना जाता है, लेकिन सच्चाई यही है कि मैदान में हर खिलाड़ी एकाकीपन से जूझता रहता है. लेग ब्रेक बॉलर और दाहिने हाथ के लोअर ऑर्डर बेट्समैन अमित मिश्रा से ज्यादा अच्छी तरह इस बात को और कौन समझ सकता है? यह बात भी सच है कि क्रिकेट जेंटलमेंस गेम है और यहाँ की सभ्यता के पैमाने अलग ही हैं. 2002 में भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल किये जाने के बाद भी अमित मिश्रा को खेलने के उतने अच्छे मौके नहीं मिले और बरसों तक टीम इण्डिया में उनका उपयोग केवल एक स्टेपनी की तरह ही किया गया. इस पूरी प्रक्रिया का उस खिलाड़ी पर क्या असर पड़ सकता है, यह शायद ही हमारे क्रिकेट प्रशासन ने सोचा हो, लेकिन अमित मिश्रा ने मौका आने पर अपनी काबीलियत साबित कर दी. हाल ही में वेस्ट इंडीज़ से हुई वन दे सीरिज में भारत की तीन दो से जीत में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है.
24 नवम्बर 1982 को जन्मे अमित मिश्रा दिल्ली के हैं और क्रिकेट में उनका कोई गोडफादर नहीं रहा. उन्होंने जो कुछ भी अर्जित किया अपने खेल से. अनेक झंझावातों को पार करके उन्होंने अपनी मुकाम हासिल कार ही लिया. अमित मिश्रा की सफलता के कुछ सूत्र :

सही वक्त आने दें
अमित मिश्रा ने अंडर -19 में जिस तरह का क्रिकेट खेला था उससे भारतीय टीम में जगह पाने का रास्ता तो मिल गया था. 2000 -2001 में उन्हें फर्स्ट क्लास क्रिकेट में जगह मिली और वे 2002 में वेस्ट इंडीज़ के सामने खेलेनेवाली टीम इण्डिया में शामिल भी कर लिए गए थे लेकिन लेकिन उन्हें टीम इण्डिया में खेलने का मौका ही नहीं मिला. वे टीम में एक स्टेपनी की तरह साल भर तक रहे लेकिन मैदान में जौहर दिखाने के मौके से वंचित रहे. 2003 में उन्हें ढाका में टीवीएस कप में खेलने का मौका मिला और फिर वे मैदान के बाहर कर दिए गए. फिर दुबारा टीम इण्डिया के साथ खेलने का मौका उन्हें 2009 में ही मिल पाया जब दक्षिण अफ्रीका में आईसीसी चैम्पियंस ट्रोफी के लिए मैच हुए. इतने साल तक वे अपने खेल की तैयारियां करते रहे. खेल को और बेहतर बनाने की कोशिशों में लगे रहे.

निराशा से बचना ज़रूरी
अगर लम्बे समय तक किसी योग्य व्यक्ति को अवसर ना मिले तो इस बात का खतरा पैदा हो जाता है कि वह व्यक्ति किसी ना किसी तरह की निराशा या अवसाद का शिकार न हो जाए. अमित मिश्रा के साथ भी ऐसे मौके बहुत सी बार आये जब यह लगने लगा कि उन्हें कहीं बलि का बकरा या क्रिकेट की राजनीति का मोहरा तो नहीं बनाया जा रहा? निराशा के दौर में उनका मन क्रिकेट से संन्यास लेने का भी होने लगा था लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने आप को संभाला और और मैदान में डटे रहने का प्रयास करते रहे. अगर वे बीच के इन छह सालों में कभी भी संन्यास ले लेते तो फिर टीम इण्डिया में लौटने का तो सवाल ही नहीं था. घनघोर निराशा के दौर में भी वे मैदान में डटे रहे.

तकनीकी पक्ष को जानें
टीम इण्डिया से अलग होने के बाद अमित मिश्रा क्रिकेट गुरुओं और विशेषज्ञों से सलाह मशविरा करते रहे और अपने खेल की बारीकियों को उन विशेषज्ञों के नज़रिए से समझ कर सुधार करते रहे. विशेषज्ञ उन्हें बताते रहे कि उनकी आदर्श स्थिति क्या होनी चाहिए. उन्हें स्पिन करने के दौरान विविधता लानी चाहिए, सेकण्ड लाइन पर खेलना और कितना,कब स्पिन करना चाहिए, एक्स्ट्रा ओवर को कैसे कवर करना चाहिए आदि आदि बातों पर ध्यान देते और खेल को सुधारते रहे. उनके खेल का अपना स्टाइल रहा है लेकिन जब उन्हें लगा कि शायद वे कहीं कमज़ोर पद रहे हैं तो उन्होंने तत्काल उसमें सुधार का अभियान छेड़ दिया.

अवसर को मत चूको
टीम इण्डिया से किनारे किये जाने के बाद भी अमित मिश्रा अपने खेल में जुटे रहे. उन्होंने आईपीएल में डेल्ही डेयर डेविल्स और गत आईपीएल सीजन चार में डेक्कन चार्जर्स की तरफ से खेला. डेक्कन चार्जर्स की तरफ से उन्होंने कुल 19 ओवर लिए थे और फायनल में चार ओवर में 17 रन देकर पांच विकेट चटकाए. वे अपने आगाज़ के साथ ही एक झटके में पांच विकेट लेनेवाले छठे क्रिकेटर बन गए. आईपीएल को उन्होंने केवल शौक या मिलनेवाले करीब डेढ़ करोड़ रुपयों के लिए ही नहीं, अपनी प्रतिष्ठा की वापसी के लिए भी खेला था और वे अपने मकसद में कामयाब हो गए. यह शानदार पारी ही उनकी हाल ही की वेस्ट इंडीज सीरिज में जाने का माध्यम बनी.

प्रतीक्षा अपमान नहीं होता
अमित मिश्रा ने साबित कर दिया कि सही मौके के लिए प्रतीक्षा करने को नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए. एक दौर में उन्हें अनिल कुम्बले का विकल्प मानकर मौका दिया जा रहा था और उन्होंने इसका लाभ उठाया. अनिल कुम्बले के पूर्ण स्वस्थ होकर लौटने के बाद वे हरभजन सिंह के विकल्प बने. उन्होंने इस बात को समझा कि कोई भी मौका छोटा नहीं होता और अगर सही भूमिका के लिए इंतज़ार भी करना पड़े तो कर लेना ही ठीक होता है. क्या पता कल को उससे भी बेहतर कोई मौका आनेवाला हो?

राजनीति से दूर रहो
अमित मिश्रा ने कभी भी अपने साथ घटी घटनाओं को लेकर बयानबाजी नहीं की. क्रिकेट के पंडितों का कहना है कि अगर अमित जैसे खिलाड़ियों को आगे लाना हो तो टीम इण्डिया के कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए. अमित ने हर बार केवल अपने खेल के बूते यह विश्वास हासिल किया कि खेल में राजनीति नहीं आनी चाहिए. उन्होंने कभी मीडिया को बयान नहीं दिया और फिर भी कलात्मक स्पिन गेंदबाजी को उसका पुराना सम्मान लौटा दिया. अब वे यही कहते हैं कि मैं चयनकर्ताओं और सीनियर खिलाड़ियों का आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे यह मौका दिया.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान, 19 june 2011

Saturday, June 11, 2011

जूझने के जज्बे ने दिलाई कामयाबी


रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम


ओप्रा विनफ्रे जानी मानी अभिनेत्री, फ़िल्म निर्माता और दानदाता हैं. ओप्रा विनफ्रे दुनिया की सबसे प्रभावशाली अश्वेत महिलाओं में गिनी जाती हैं. वे पहली अश्वेत महिला अरबपति हैं.

जूझने के जज्बे ने दिलाई कामयाबी

विश्वविख्यात ओप्रा विनफ्रे शो का फेयरवेल सीजन ख़त्म हो गया लेकिन कुछ देशों में रिपीट टेलीकास्ट चल रहा है. पच्चीस साल की शानदार पारी में 4561 एपिसोड का यह कार्यक्रम अमेरिकी टीवी के इतिहास का सबसे ऊँची रेटिंगवाला शो रहा है. 120 से ज्यादा देशों में दिखाए गए इस शो में दुनिया के सबसे नामी गिरामी लोगों ने शिरकत की. हर तरह के मसालों से भरपूर इस शो में सकारात्मक नजरिया, सेल्फ इम्प्रूवमेंट, दान, सहयोग, अध्यात्म आदि रहा है. वे जानी मानी अभिनेत्री, फ़िल्म निर्माता और दानदाता हैं. ओप्रा विनफ्रे दुनिया की सबसे प्रभावशाली अश्वेत महिलाओं में गिनी जाती हैं. वे पहली अश्वेत महिला अरबपति हैं. मोंतेसिटो, केलिफोर्निया में 42 एकड़ के एस्टेट में बने भव्य विला में रहती हैं. दुनिया के अनेक देशों में उनके भव्य महलनुमा मकान हैं. वे बेहद गरीबी में पलीं और बड़ी हुईं. अपनी प्रतिभा से उन्होंने अपनी जगह बनाई. ओप्रा विनफ्रे अगर भारत में होतीं तो निश्चित ही उन्हें कोई अवतार, देवी या महाशक्ति के रूप में याद किया जाता. टीवी होस्ट से ग्लोबल कल्चरल आयकोन बननेवाली ओप्रा विनफ्रे की सफलता के कुछ सूत्र :

हालात से मत डरो
ओप्रा विनफ्रे की माँ घरेलू नौकरानी थीं और जब वे केवल 13 साल की थीं, तब उनके साथ बलात्कार किया गया था इसलिए उनके जन्म के बाद परिवार और पिता का साया उन्हें नसीब नहीं हुआ. माँ ने उनकी नानी के पास उन्हें छोड़ दिया जो खुद बेहद मुफलिसी में थीं. कुछ साल फतेहाले में गुजरे और उन्हें गोद दे दिया गया ऐसे परिवार में जो बेहद क्रूर था. उनके साथ मारपीट और अभद्रता तो आम बात थी. जब वे तेरह साल की थीं, तब उनके साथ बलात्कार किया गया, चौदह की उम्र में वे बिनब्याही माँ बनीं, लेकिन बच्चा एक सप्ताह भी जीवित नहीं रह सका. वे नशे की शिकार हो गयीं और फिर इसका इलाज कराने उन्हें नशा मुक्ति केंद्र भेजा गया. ओप्रा विनफ्रे ने विकटतम दिनों का मुकाबला डटकर किया.

बुद्धि हमेशा उपयोग में लाओ
ओप्रा विनफ्रे का फार्मूला यह रहा कि विपरीत से विपरीत हालात में भी बुद्धि पर भरोसा करना मत छोड़ो. दुर्दिनों में दो साल उन्होंने अपनी पढ़ाई भी छोड़ी लेकिन फिर पढाई शुरू की. ब्रोडकास्ट कम्युनिकेशन की पढ़ाई करने के बाद उन्हें लोकल टीवी में पार्ट टाइम रिपोर्टर का काम मिला. इस बीच वे एक स्थानीय ब्यूटी कान्टेस्ट भी जीत चुकी थीं. तीन साल बाद उन्होंने अपना जॉब बदल दिया और एक बड़े प्लेटफार्म को आधार बनाया. उन्होंने अपने हर शो में अपनी बुद्धि का लोहा मनवाया. प्रस्तुति को हमेशा जीवंत बनाये रखा.

कोई पद छोटा नहीं होता
कोई भी काम छोटा नहीं होता. यह बात ओप्रा विनफ्रे ने साबित कर दी. उनका स्टाइल बड़े पद पर बैठे लोगों को रास नहीं आया. नयी कंपनी में साल भर भी नहीं हुआ था कि उन्हें नौकरी से हटाने के बजाय पदावनत करके टीवी ब्रोडकास्टर से टीवी शो प्रजेंटर बना दिया गया और वह भी दोपहर में महिलाओं के शो का. ओप्रा विनफ्रे ने महसूस किया कि यही काम उनके लिए सही काम है जब वे महिला दर्शकों को अपनी हाजिरजवाबी, अपनेपन, साफगोई और दिलचस्प शैली से प्रभावित कर सकती हैं. वे कहती हैं कि विफलता ईश्वर का वह वरदान है जो आपको इशारा करता है कि आप शायद गलत राह पर हैं.

रंग और शक्ल पर मत जाओ
ओप्रा विनफ्रे ने महिलाओं के उस कार्यक्रम को सात साल तक प्रस्तुत किया. इस बीच प्रबंधन में बैठे लोगों को उनकी अनेक बातों से शिकायतें हुईं. कहा गया कि आपके बाल ठीक से जमे नहीं होते, उनकी नाक ज्यादा ही लम्बी है और दो आँखों के बीच दूरी ज्यादा है. उनका वजन ज्यादा है आदि आदि. प्रबंधन ने उन्हें न्यूयोर्क भेजा ताकि उन्हें ठीक से बाल जमाना, सही ढंग से मेकअप करना आदि सिखाया जा सके. यह भी सलाह दी गयी कि वे सिर को मुंडा लें और विग पहनना शुरू कर दें.इस सब का नतीजा यह हुआ कि उन्होंने अपने आप पर ध्यान देना शुरू किया और खुद को ज्यादा प्रभावी टीवी शो के प्रस्तुतकर्ता के रूप में आगे लाने की सकारात्मक कोशिश की.

बेख़ौफ़ होकर सच बोलो
ओप्रा विनफ्रे शो की लोकप्रियता का एक कारण उनकी बेबाकी भी रही है. वे अपने प्रोग्राम के वीआइपी मेहमानों की लल्लो - चप्पो नहीं करतीं. कुछ माह पहले उनके शो में अतिथि के रूप में मशहूर फैशन डिजाइनर टोमी हिलफिगर आये थे. उनका परिचय देने के बाद ओप्रा ने उनसे पूछा -- क्या ये बात सच है कि आपने हाल ही में एक वर्णवादी और रंगभेदी बयान में कहा था कि मेरे बनाये कपड़े अफ्रीकी, एशियाई, अमेरिकी सभी खरीदते हैं लेकिन मैं चाहता हूँ कि मेरे कपड़े अश्वेत और एशियाई नहीं खरीदें. क्या ये बात सही है? टोमी हिलफिगर ने जवाब दिया --हाँ. ओप्रा ने उन्हें कहा तत्काल इस शो से बाहर जाइए. मैं सभी लोगों से गुजारिश करती हूँ कि टोमी हिलफिगर के डिजाइन किये वस्त्र कोई न खरीदे. इनकी आर्थिक हालत ऐसी बना दो कि ये कभी भी कभी भी बहुसंख्यक आबादी के बारे में ऐसा सोचने की जुर्रत न कर सके.

सभी को साथ लो
ओप्रा विनफ्रे फाउंडेशन बनकर करोड़ों डॉलर दान देनेवालीं ओप्रा का मानना है कि आपको जिन्दगी के हर मोड़ पर कुछ न कुछ जिम्मेदारी दी गयी है, उसे पूरा करो. उनकी मदद करो जो हकदार लेकिन मोहताज हैं. अपने काम को ताजी से आगे बढ़ाने के लिए अपने अधीनस्थों को अधिकार सौंपो. रोजमर्रा के जीवन में जो भी आपके साथ हों उनसे दिल से जुड़ो. आपके जीवन में जिसने भी योगदान दिया है, उसका आभार मानना न भूलो. आपको काम के बारे में जो भी प्रतिक्रिया मिले, उसे अवश्य सुनो और अगर सुधर की गुंजाइश हो तो उसे सुधारने में देरी मत करो.

जीवन का सबसे बड़ा रहस्य
ओप्रा का मानना है कि जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि रहस्य नाम की कोई चीज़ है ही नहीं. इसलिए बेखौफ होकर जो भी अच्छा लगे वही करो. आपका जो भी लक्ष्य हो, वह तभी मिल सकता है जब आप पूरा जोर लगाकर उसकी दिशा में काम करें. काम वही चुनें जो आपको पसंद हो. किसी भी सीमा में खुद को ना बांटे. और जो भी करें दिल लगाकर करें, पूरी शक्ति उस लक्ष्य को पाने में झौंक दें. अगर लक्ष्य को पाने में कोई भी शक हो रहा हो तो किसी और से नहीं, खुद अपने से ही पूछो -- जवाब भी वहीँ से मिलेगा. हर सुबह के पांच मिनिट केवल इस बात के लिए रखो कि आप अपने आप से बात कर सको. अगर आपके पास अपने लिए पांच मिनिट भी नहीं हैं तो आप को कामयाबी की आशा नहीं करनी चाहिए.

प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान june 12, 2011

Saturday, June 04, 2011

सलमान की विनम्रता और शरीरशौष्ठव

रविवासरीय हिन्दुस्तान के एडिट पेज पर मेरा कॉलम



सलमान खान आज भी करोड़ों युवक-युवतियों के चहेते हैं. लाखों लोग यह मानते
हैं कि किसी भी फ़िल्म में सलमान खान का होना ही उस फ़िल्म के मनोरंजक होने की गारंटी है. इस स्तम्भ में सलमान की अभिनय की समीक्षा नहीं की जा रही है, बल्कि एक कलाकार के व्यावसायिक रूप से कामयाब होने के फार्मूले पर चर्चा की जा रही है.

सलमान की विनम्रता और शरीर शौष्ठव
इंदौर में जन्मे अब्दुल रशीद सलीम सलमान खान उर्फ़ सल्लू महान नहीं, कामयाब हीरो हैं. हीरो के रूप में पहली ही फ़िल्म 'मैंने प्यार किया' (१९८९) ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी, और २२ साल बाद गत शुक्रवार को रिलीज़ 'रेडी' को भी अच्छी शुरूआत मिली. बीते साल उनकी 'दबंग' भी ब्लॉकबस्टर रही. २००९ में उनकी 'वांटेड' भी सुपर हिट थी. मैंने प्यार किया ने ६७ करोड़ का कारोबार किया था और दबंग ने १८७ करोड़ का. उम्र के ४६वे साल में भी वे अपने बूते फ़िल्म को सुपरहिट करने का माद्दा रखते हैं और उनकी अपनी निजी फैन फॉलोइंग तगड़ी है. अभी भी वे अपने दर्शकों को बॉडी दिखाते हैं और कई हीरो शरीर शौष्ठव से जलते है. वे १९८८ (बीवी हो तो ऐसी) से आज तक ८४ फिल्मों में छोटे बड़े रोल कर चुके है. इनमें दो तीन को छोड़कर सभी ने अच्छा कारोबार किया और कई तो सुपरहिट रही. सलमान खान ने टीवी पर दस का दम ( सीजन एक और दो) और बिग बॉस (सीजन चार) होस्ट किये, जिनके लिए उन्हें बड़ी धनराशि मिली और उए प्रोग्राम भी सुपर हिट रहे. सलमान खान आज भी करोड़ों युवक-युवतियों के चहेते हैं. लाखों लोग यह मानते हैं कि किसी भी फ़िल्म में सलमान खान का होना ही उस फ़िल्म के मनोरंजक होने की गारंटी है. इस स्तम्भ में सलमान की अभिनय की समीक्षा नहीं की जा रही है, बल्कि एक कलाकार के व्यावसायिक रूप से कामयाब होने के फार्मूले पर चर्चा की जा रही है. सलमान में भी कई कमजोरियां हैं, लेकिन उनकी खूबियाँ भी बहुतेरी हैं. उनकी व्यावसायिक कामयाबी के कुछ सूत्र :

विनम्रता
सलमान खान के नज़दीकी लोग जानते हैं कि सलमान खान निजी जिन्दगी में बेहद विनम्र और दरियादिल प्रवृत्ति के हैं. वे अपने घर पर आनेवाले सभी परिजनों से बेहद अपनेपन और विनम्रता से मिलते हैं. उनकी यह विनम्रता कई लोगों को अचम्भे में दाल देती है और कई लोग समझते हैं कि वे घर पर भी अभिनय करते हैं. आम बोलचाल में वे कभी किसी पर कटाक्ष नहीं करते और यही विनम्रता 'दस का दम' शो में उनकी कामयाबी का आधार भी बनी जहाँ वे सभी से प्यार से बतियाते नज़र आते थे. इसके अलावा वे आमतौर पर विवादों से बचाते हैं और ज़रा भी गलती होने पर उसे तत्काल सुधारने की कोशिश में जुट जाते हैं.

निश्चित दर्शक वर्ग पर लक्ष्य
'अजब प्रेम की गज़ब कहानी', 'इसी लाइफ में', 'ओम शांति ओम' और 'तीसमार खां' फिल्मों में उन्होंने अपना यानी सलमान खान का ही रोल किया. सलमान खान आम जनता के हीरो हैं और उन्ही के बीच उन जैसा लगाना चाहते हैं. उनकी खूबियों में उनका स्वाभाविक अभिनय महत्वपूर्ण कहा जाता है. अगर वे किसी लड़ाकू पात्र के रोल में हो तो सचमुच के लड़ाके लगते हैं और अगर किसी कमज़र्फ के रोल में हों तो वहां भी फिट लगते हैं. उन्होंने अपने आप को आम जनता से जोड़ रखा है और अपने एक खास दर्शक वर्ग के लिए मनोरंजन की कोशिश करते हैं.उन्होंने उसे अपनी यूएसपी बना लिया. कला फिल्मों में अभिनय करना उन्हें जमता नहीं और बहुत नए प्रयोग वे नहीं करते.

शरीर शौष्ठव पर ध्यान
हिंदी फिल्मों में दिलीप कुमार, देव आनंद,राज कपूर, शम्मी कपूर, संजीव कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन जैसे अनेक हीरो हुए हैं जिन्होंने अपने शरीर शौष्ठव पर कभी ध्यान नहीं दिया. सलमान का मानना है कि अगर हीरोइन के लिए शरीर का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है तो हीरो के लिए क्यों नहीं? अगर शरीर भी एक सम्पदा है, प्रॉपर्टी है तो फिर उसकी उपेक्षा कतई नहीं होनी चाहिए. आज देश के जिम्नेश्यम्स में सलमान की आदमकद तस्वीरें देखने को मिल जायेंगी. देश भर के हजारों नौजवान सलमान के जैसा बदन पाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. भले ही उन पर शरीर के प्रदर्शन का आरोप लगे, वे स्वास्थ्य चेतना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं. इसे 'अजब प्रेम की गजब कहानी' फ़िल्म में भी फ़िल्म का हीरो रणवीर कपूर सलमान की बॉडी की तस्वीर पर अपना चेहरा चस्पा करके हीरोइन कैटरीना कैफ को प्रभावित करना चाहता है. 'दस का दम' शो में आई एक महिला ने कहा था कि जब वह गर्भवती थी तब उसने अपने कमरे में सलमान का फोटो लगा रखा था क्योंकि वह चाहती थीं कि उसकी होनेवाली संतान सलमान खान जैसी आकर्षक हो.

प्रोफेशनल अप्रोच
सलमान अपने बूते पर फ़िल्म को सफलता तक ले आने की कूवत रखते हैं और इसके लिए कड़ी मेहनत करते हैं उनकी फिल्मों का सफलता का प्रतिशत दूसरे कलाकारों की अपेक्षा बेहतर है. फ़िल्म के सेट्स पर वे अनुशासित रहने की कोशिश करते हैं. निर्देशक को सहयोग करते हैं और नए कलाकारों को प्रोत्साहन देते हैं. 'लन्दन ड्रीम्स', 'युवराज' और 'वीर' जैसी वीरगति प्राप्त फ्लाप फिल्मों के बाद भी वे झट से उठ खड़े हुए और अपने निन्मता की मदद को आगे आये. फ़िल्मी असफलता से वे चित नहीं होते और अगले अभियान में कूद पड़ते हैं. फिल हिट हो या फ्लॉप, वे उसे खेल भवन से लेते हैं.

सामाजिक सरोकार
सलमान के करीबी मनाते हैं कि सलमान हमेशा सहयोगी व्यवहार करते है. वे चैरिटी के लिए भी काफी काम करते हैं. 'बीइंग ह्युमन' नामक एनजीओ के माध्यम से तो वे ज़रूरतमंदों की मदद करते ही हैं, निजी तौर पर भी सभी की मदद करते हैं. यह संस्था स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है. कैंसर, थेलेसीमिया, ल्यूकेमिया जैसे भीषण रोगों से लड़ रहे लोगों की मदद के लिए उनका संगठन जरूरतमंदों की मदद करता है. उनका संगठन एक लाख लोगों का नाम रजिस्टर करने में जुटा है जो वक़्त आने पर देश भर में कहीं भी रक्तदान कर सके.सलमान ने 'फिर मिलेंगे'(2004) फ़िल्म में उन्होंने एड्स पीड़ित युवक का रोल किया था जिसकी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी सराहना की थी.

सच्चे धर्मनिरपेक्ष
सलमान खान कभी भी कट्टरवादी नहीं रहे और इसीलिये वे खुद कट्टरवादियों के निशाने पर रहे. उनके पिता मुस्लिम हैं और माँ महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण. उनके घर में पूजा भी होती है, नमाज़ भी. एक बहन अलविरा की शादी अभिनेता अतुल अग्निहोत्री से हुई है. गणेशोत्सव में गणेश प्रतिमा स्थापना को लेकर उनके खिलाफ फतवा भी जारी हुआ था. उन्होंने हमेश ही अपने आप को खान कहने के बजाय भारतीय बताना पसंद किया. शिव सेना भी कई बार उनके खिलाफ मैदान में आई, लेकिन उन्होंने ऐसे मौकों पर विवाद से दूर रहन पसंद किया.

रचनात्मकता को महत्त्व
सलमान खान अपने निजी तनावों को दूर करने के लिए रचनात्मक तरीके अपनाते हैं. उन्हें बच्चों के साथ खेलने के अलावा पेंटिंग करने का भी शौक है. वे अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी भी लगा चुके हैं और पेंटिंग्स से होनेवाली आय को सेवा के कार्य में दान दे चुके हैं. उनके मित्र मनाते हैं कि वे ठीक ठाक पेंटिंग बना लेते हैं. कैटरीना कैफ ने पिछले दिनों बयान दिया था कि उन्हें अभी तक सलमान ने पेंटिंग का विषय नहीं बनाया और वे चाहती हैं कि सलमान उन की पेंटिंग्स बनायें.
प्रकाश हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तान 5 june 2011