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Monday, March 24, 2014

ताकि सनद रहे (5)

गधे हम हैं, हमें बनानेवाले नेता नहीं !


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आप इस बात पर खुश हो सकते हैं कि आपको उल्लू बनानेवाले खुद उल्लू नहीं हैं!
एक नज़र नेताओं की डिग्री पर; धारणा ग़लत है कि हमारे नेता पढ़े लिखे नहीं है. 
सभी पार्टियों के नेता बहुत पढ़े लिखे हैं.  योग्यतम लोग राजनीति में हैं .
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    नेता गधे नहीं, अच्छे पढ़े लिखे हैं :आप इस बात पर खुश हो सकते हैं कि आपको उल्लू बनानेवाले खुद उल्लू नहीं हैं!

एक नज़र नेताओं की डिग्री पर; धारणा ग़लत है कि हमारे नेता पढ़े लिखे नहीं है. योग्यतम लोग राजनीति में हैं,  इसके बावजूद हम सौ फीसदी साक्षरता के लक्ष्य को नहीं पा सके.


--मनमोहन सिंह के आगे सभी की शिक्षा फीकी है, जिनके पास विश्व के प्रमुख शिक्षा संस्थानों  के साथ ही ऑक्सफोर्ड और केम्ब्रिज की उपाधियां भी हैं। वे दुनिया के सबसे ज्यादा पढ़े लिखे प्रधानमंत्री हैं और रिजर्व बैंक के प्रमुख भी रह चुके हैं। 


--आप पार्टी में शामिल होनेवाली फ़्रांस में पढ़ीं  मीरा सान्याल की बहुत चर्चा है जो ए बी एन एम्रो की सी ई ओ रह चुकी हैं.


 --सचिन पायलेट के पास दोहरे एम् बी ए  की डिग्री है , एक भारतीय और दूसरी वार्टसन, यूएस ए  की। 


--वरुण गांधी के पास लन्दन स्कूल ऑफ़ इकॉनोमिक्स की डिग्री है।


--सुनील दत्त की बेटी, कांग्रेस की सांसद प्रिया दत्त  के पास न्यू यॉर्क के मीडिया संस्थान से टीवी प्रोडक्शन की उपाधि है। 


--राहुल गांधी के पास अमेरिका के फ्लोरिडा विश्वविद्यालय की डिग्री है, लेकिन वह उनके नाम से नहीं है क्योंकि श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्हें सुरक्षा कारणों से किसी अन्य नाम से भर्ती किया गया था, और उसी नाम से उन्होंने परीक्षा पास की थी।


--नवीन जिंदल टेक्सॉस से एम् बी ए हैं। 


--सलमान खुर्शीद भी ऑक्सफ़ोर्ड की डिग्री रखते हैं.


--कट्टरपंथी मुस्लिम नेता असदुद्दीन -ओवैसी लन्दन से बैरिस्टर एट  लॉ की डिग्री पा चुके हैं। 


--अगाथा संगमा के पास पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री के साथ ही ब्रिटेन से अनेक डिप्लोमा की मालकिन हैं जिनमे साइबर लॉ, कॉर्पोरेट लॉ, मानवाधिकार और निवेश सम्बन्धी डिप्लोमा शामिल हैं।


--कपिल सिब्बल हार्वर्ड लॉ स्कूल से एलएल एम हैं।


--शशि थरूर ने उच्च शिक्षा यूके से पायी और पीएच डी भी वहीँ से की।


--सुरेश कलमाड़ी आठ साल तक भारतीय वायु सेना में अधिकारी रहे थे


--ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास हार्वर्ड से ग्रेजुएशन और स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी से एम बी ए की 

डिग्री है।  

--अरविंद केजरीवाल कोई पहले नेता नहीं हैं जो भारतीय राजस्व सेवा की नौकरी छोड़कर राजनीति कर रहे हैं।  पहले भी बहुत से नेता आईएएस, आईपीएस नौकरियां छोड़कर राजनीति  में आ चुके है और अपना नाम चमका चुके हैं। भारतीय राजनीति में उच्च अध्ययन और प्रशासकीय पद का अनुभव रखनेवाले कई लोग हैं।


--कांग्रेस  के नेता अजीत जोगी आईएएस थे, और राजनीति  में आकर मुख्यमंत्री बने।  ------मनोहर पार्रीकर भी आईआईटी में पढ़ चुके हैं और  गोवा के मुख्यमंत्री हैं।


--लोकसभा की स्पीकर श्रीमती मीरा कुमार भारतीय विदेश सेवा में रह चुकी हैं और अब सफल राजनीतिज्ञ हैं। 


--शशि थरूर भी मंत्री बनने  के पहले भारतीय विदेश सेवा में रह चुके हैं।


--मणिशंकर अय्यर भी भारतीय विदेश सेवा से काँग्रेस की राजनीति में आये और मंत्री बने.  --यशवंत सिन्हा भी आईएएस थे और राजनीती में आकर मंत्री बने। 


--रोमेश भंडारी भी भारतीय विदेश सेवा में थे और दिल्ली के उप राज्यपाल और त्रिपुरा, गोवा और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे। 


--मध्य प्रदेश के  रुस्तम सिंह भाजपा में आने पहले आईपीएस के रूप में अपनी सेवाएं देते थे। 


--आंध्र प्रदेश से राज्य सभा सदस्य जेसुदासु सलीम भी आईएएस हैं। 


--आंध्र प्रदेश के ही एक आईएएस नागभैरव जयप्रकाश नारायण भी आईएएस हैं और विधायक होने के साथ ही लोक सत्ता पार्टी के अध्यक्ष भी हैं। 


--कर्नाटक में ही काँग्रेस के नेता अशोक कुमार मनोली और एस पुत्तास्वामी भी आईएएस हैं। 


--बंगलुरु के पूर्व निगम आयुक्त  एस. सुब्रमण्यम और बाबूराव मुदाबी भी आईएएस थे और अब जनता दल (एस) के सदस्य हैं।


--पूर्व आईपीएस अधिकारीद्वय  जी.  शंकरनारायण और सुभाष भराणी ने भी जनता दल की सदस्यता ली थी, लेकिन भराणी जी ने भाजपा में जाना  उचित समझा। 


इतने पढ़े लिखे और प्रशासकीय सेवा के अनुभव वाले नेताओं के बावजूद देश की दशा किसी से छुपी नहीं है।  अब नए नए नेता राजनीति में आ रहे हैं, उनसे कुछ आशा करना कितना उचित है, अह तो वक़्त ही बताएगा।


आप इस बात पर खुश हो सकते हैं कि आपको उल्लू बनानेवाले खुद उल्लू नहीं हैं!



© प्रकाश हिन्दुस्तानी 

Thursday, February 20, 2014


"तीसरा मोर्चा  भानुमति का कुनबा है, विघ्नसंतोषियों का घोटुल और  भगोरिया पर्व ! वह खुद अपने बूते पर कुछ कर नहीं। तीसरे मोर्चे के कई नेताओं को सपने में प्रधानमंत्री का पद नज़र आता है.… बिना कांग्रेस या भाजपा के तीसरा मोर्चा न कुछ कर पाया है और न कर पाएगा…"


2014 के खट्टे अंगूर (3)

बड़े नेताओं वाले तीसरे मोर्चे के मुगालते

                                                                                                                                               सौ : कीर्तीश

 2014 के चुनाव में तीसरे मोर्चे की आहट  है. इस  तीसरे मोर्चे में बड़े बड़े नेताओं की पार्टियां हैं।  कई राज्यों में इन पार्टियों का क़ब्ज़ा है और लोकसभा की ख़ासी सीटें इनके पास है. इनमें से अनेक नेताओं को  प्रधानमंत्री बनने के सपने आते हैं और कुछ तो यह भी दावा करते नहीं थकते कि उनके बिना इस बार सरकार बन ही नही पाएगी.

मुख्य दावेदार 

इस तीसरे मोर्चे में मुलायमसिंह यादव हैं जिनका बेटा अखिलेश उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री है. इस पार्टी ने गत लोकसभा में 23  सीटें जीतीं थीं और 403  की विधानसभा में 224 सीटें हैं. इस मोर्चे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं और उनकी पार्टी जेडीयू  लोकसभा में 20  सीटें रखते हैं।  बिहार  विधान सभा में अभी 243  में से 119 सीटें उनके पास हैं।  तीसरे मोर्चे की तीसरी प्रमुख शक्ति हैं तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और एआईएडीएमके की नेता जय ललिता, जिनके पास लोकसभा में  9  सीटें हैं और 234 सीटों की विधानसभा में  158 सीटें हैं। तीसरे मोर्चे में ओडिसा  में नवीन पटनायक हैं जिनकी पार्टी ने गत लोकसभा में 14 सीटें जीती थीं। 147  में से 103 विधायक बीजू जनता दल के हैं।  तीसरे मोर्चे के प्रमुख घटको में वामपंथी पार्टियां हैं जिन्होंने दक्षिण भारत में अपनी अलग पहचान और सत्ता बनाई थी।  गत लोकसभा में सीपीएम ने 16  और सीपीआई ने 4  सीटें जीती थीं। कुछ छोटी पार्टियों  बाद गत चुनाव में तथाकथित तीसरे मोर्चे को कुल 79 और कुछ छोटी पार्टियों सहित समाजवादी पार्टी के चौथे मोर्चे को 27 सीटें मिलीं थीं. 9 निर्दलीय जीते थे और 7 पार्टियों को एक एक सीट मिली  थी।
चौथे  मोर्चे वाली समाजवादी पार्टी अब तीसरे मोर्चे में है। 

तीसरे मोर्चे की ताकत 

आज के हालत में देखें तो उत्तरप्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, ओडिसा के चार राज्यों में ही 180 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से 66 पर तीसरे मोर्चे का अधिकार है। यह इन राज्यों की  एक तिहाई से ज्यादा  है। कई राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का बोलबाला है।  हिन्दी ह्रदय स्थल वाले कई  राज्यों में भाजपा की एकतरफा बढ़त है और कांग्रेस सभी जगह थोड़ी बहुत है। कांग्रेस को लेकर कहीं भी बहुत अच्छा माहौल है नहीं और खुद कांग्रेस  इस बार आम चुनाव को लेकर बहुत आशान्वित नहीं नज़र आती लेकिन तीसरे मोर्चे को लेकर जो पार्टियां उछलकूद कर रही हैं वह दिलचस्प है। लगता है कि उनके मुगालते भी जल्दी दूर हो जाएंगे।

धर्मनिरपेक्षता का वायरस 

तीसरे मोर्चे में एक से बढ़कर एक नेता हैं, जिन्हें राजनीति की खासी समझ है. लेकिन अपने घोषित उसूलों से हटे हुए ये नेता बार बार के राजनैतिक हनीमून में ही लगे रहते हैं। नीतीश कुमार इसके प्रमुख नमूने हैं। नीतीश कुमार के लिए 2005 तक भाजपा मज़बूरी थी.  भाजपा के बिना उनका मुख्यमंत्री बनाने का सपना पूरा नहीं हो सकता था। 2010  तक मोदी भी बुरे नहीं लगते थे, लेकिन 242 में से 115 पर सीधी जीत हासिल करते ही सेक्युलरिज्म का वायरस आ धमका। भाजपा के साथ मिलकर उन्होंने पिछला चुनाव लड़ा था, अब तलाक़ हो चुका है।  तिकड़म करके वे बिहार के मुख्यमंत्री तो बन सकते हैं लेकिन प्रधानमंत्री कतई नहीं।  हो सकता है कि इस बार उनकी रही सही ताकत  भी जाती रहे. दिल्ली विधानसभा में उन्होंने बहुत ज़ोर मारा था लेकिन केवल एक विधानसभा सीट पर ही संतोष करना पड़ा उन्हें। बीजू जनता दल के नेता ओडिसा के मुख्यमंत्री  नवीन पटनायक को भी उनके स्वर्गीय पिता पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक की तरह प्रधानमंत्री बनाने के सपने आते हैं।  मुलायमसिंह यादव को सपने की पुरानी  बीमारी है, जिसके चलते उन्होंने अपने बेटे को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री पद सौंप दिया ताकि वे अपने  सपने को  पूरे करने  का वक़्त निकाल सकें। एच डी  देवे गौड़ा किसके साथ थे? धर्मनिरपेक्षता का वायरस नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, मुलायम सिंह यादव, जय ललिता, आदि में समय समय पर आ जाते हैं।  याद कीजिए पहले  शरद पवार की एनसीपी, अब्दुल्लाओं की कस्मीर की एनसी, नीतीश की जेडीयू, ममता की तृणमूल किसके साथ कब कब रही  और किन हालत में वे सेक्युलर हो गई। 

बार बार कुट्टी, बार बार चुम्मी 

तीसरे मोर्चे के नेताओं की खूबी यह है कि वे कभी भी कुट्टी कर बैठते हैं और कभी भी चुम्मा लेने लगते हैं। एक विचित्र बात यह है कि तीसरे मोर्चे के नेता आपस में ही तू-तू मैं-मैं करते रहते हैं।  ममता कहती हैं कि जहाँ लेफ्टवाले होंगे, मैं नहीं जाऊंगी। लालू कहते हैं कि जहाँ नीतीश होंगे, मेरा क्या काम? मायावती कहती हैं कि जहाँ लालू वहाँ मैं  क्यों जाऊं ?  सेक्युलरिज्म के बहाने वे आसानी से एनडीए से कन्नी कट सकते हैं और मुस्लिम वोटों को प्रभावित कर सकते हैं। लालू बिहार में कांग्रेस से समझौता कर चुके हैं और शरद पवार की एनसीपी तो महाराष्ट्र में सीटों का बंटवारा भी कर चुकी है। असम, नागालैंड, सिक्किम, हरियाणा, केरल की छोटी पार्टियां तेल की धार  देख कर फैसला करती हैं। हिंदूवादी शिव सेना और अकाली खुद को भाजपा से जुड़ा पाते हैं और तमाम मुस्लिम समर्थक और वामपंथी विचारधारा की पार्टियां यूपीए के करीब खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं।  यह हनीमून हर पांच  साल में अलग अलग पार्टनर के साथ चलता रहता है। 

तीसरे मोर्चे का उदय 

गैर कांग्रेसी  मोर्चे को  पहली कामयाबी इमरजेंसी के बाद 1977 में मिली थी, जब मोरारजी भाई देसाई जनता पार्टी के नेतृत्व वाले जन मोर्चा के प्रधानमंत्री बने थे। अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री और लाल कृष्ण आडवाणी सूचना  प्रसारण मंत्री बने।  (भारतीय जनता पार्टी 1980 में गठित हुई थी). आर एस एस के मुद्दे पर, दोहरी सदस्यता के बहाने संजय गांधी और इंदिरा गांधी ने खेल खेल और मोरारजी की सरकार गिरवा दी। 1979 में   संजय गांधी ने चौधरी चरण सिंह को कहा कि अगर वे आगे बढ़ें तो कांग्रेस  उन्हें प्रधानमंत्री  पद के लिए समर्थन दे सकती हैं।  चौधरी चरणसिंह झांसे में आ गए और फिर एक बार गैर कांग्रेसी सरकार, कांग्रेस के समर्थन से बन गई. छह महीने के भीतर ही कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और 1980 में फिर चुनाव घोषित हो गए। 1980 में कांग्रेस मोर्चे को 374 सीटें मिलीं, जिसमें से 351 कांग्रेस की अपनी सीटें थीं। 

दूसरी बार तीसरा मोर्चा 

दूसरी बार तीसरा मोर्चा नेशनल फ्रंट के नाम से 1989 में आया। त्रिशंकु (हंग) लोकसभा थी।  किसी मोर्चे को साफ बहुमत नहीं था. कांग्रेस 197 सीट, वीपी सिंह का जनता दल 143 और भाजपा 85 सीट।   सीपीएम 33 और सीपीआई 12, एआईडीएमके 11. 19 छोटी पार्टियों को 33 सीटें मिली थीं और 12 निर्दलीय थे।  बोफोर्स को कोस कोस कर भाजपा और  कम्युनिस्टों के समर्थन से विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बन गए थे (143+85 +33 +12+अन्य =बहुमत). 11 महीने बाद भाजपा ने टेका हटा लिया और विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार  ढह गई.  गैर कांग्रेसी सरकार  का प्रयोग चालू रहा और वह भी कांग्रेस के सहयोग-समर्थन से। भाजपा हटी तो कांग्रेस ने  शेखर को समर्थन देकर प्रधानमंत्री बनवा दिया। भाजपा अलग- थलग पड़  गई।  मज़ेदार बात यह हुई कि चन्द्र शेखर ने मौके का तत्काल फायदा उठाया और 64 सांसदों के साथ जनता दल छोड़कर समाजवादी जनता दल बना डाला जिसे कांग्रेस ने समर्थन दे दिया। चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने. मौके का लाभ लेनेवाले नेताओं में देवी लाल, जनेश्वर मिश्र, देवे गौड़ा, मेनका गांधी, सुबोधकांत सहाय, ओमप्रकाश चौटाला,चिमनभाई पटेल, मुलायम सिंह यादव, अशोक कुमार सेन, हुकम सिंह, संजय सिंह, यशवंत सिन्हा,विद्याचरण शुक्ल आदि शामिल थे. इनमें से ज्यादातर मंत्री बन गए। 

तीसरी बार तीसरा मोर्चा 

1996 में भी किसी को साफ़ बहुमत नहीं मिला  था। जनता दल वाले यूनाइटेड फ्रंट ने 192 सीटें जीती और भाजपा के मोर्चे ने 187. कांग्रेस के नेतृत्व वाला मोर्चा 140 पर सिमट गया। कोई भी  सरकार बना ही नहीं सकता था। कांग्रेस ने पहले देवे गौड़ा को प्रधानमंत्री बनवाया और फिर इंद्रकुमार गुजराल को। तीसरा मोर्चा हमेशा ही भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए बनता है या कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए। यह भानुमति का कुनबा है, विघ्नसंतोषियों का घोटुल और  भगोरिया पर्व ! वह खुद अपने बूते पर कुछ कर नहीं।   हर बार उसे कांग्रेस या भाजपा की बैसाखियों की ज़रूरत  पड़ती है। 

2014 में क्या हो सकता है 

2014 में भी तीसरा मोर्चा ज़ोर मारेगा। उसके भाग से छींका टूटा तो वह भाजपा या कांग्रेस की बैसाखियों से  सर्वोच्च पद पर बैठेगा, भारी  जूतमपैजार करेगा।  या फिर भाजपा अथवा कांग्रेस के लिए सिंहासन सजाएगा। ब्लैकमैल करना उसकी मजबूरी भी रहेगी और आवश्यकता भी।  सिद्धांतों  और सेक्युलरिज्म की बातें तो उसे करनी ही है। सत्ता में आने के लिए कांग्रेस और भाजपा को पानी पी पी कर कोसना उसका धर्म है। 

बेशक, इस मोर्चे में बड़े बड़े नेता हैं और उनकी साख दांव पर लगी है। देखें, चुनाव किस तरह के रंग दिखता है। 

© प्रकाश हिन्दुस्तानी 
19. 02. 2014

Friday, February 07, 2014


ताकि सनद रहे


http://epaper.newstodaypost.com/c/2592790

2014 के खट्टे अंगूर (2)


 2 डिज़िट की कांग्रेस और मोदी के 'मत'वाले 

मोदी  के 'मत'वाले दावा कर रहे हैं कि इस  बार कांग्रेस की सीटें दो अंकों  सिमट जाएगी।  सम्भव है।  कितने पर सिमटेगी कांग्रेस? दो का आंकड़ा यानी  99 से ज्य़ादा नहीं। कुछ का  दावा है कि कांग्रेस शायद 50 के भीतर सिमट जाए। यह भी असम्भव नहीं।  जिस भाजपा की 1984 में केवल 2 सीटें थीं,  12  साल बाद 1996 में वही  भाजपा 161  सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी. दसवें प्रधानमंत्री के रूप में 13 दिन के प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने किया फिर बहुमत साबित न कर पाने पर चुनाव हुए और फिर भाजपा ने 183 सीटें जीत कर सरकार बनाई।  यह सरकार  13 महीने चली और फिर जयललिता मैडम ने टंगड़ी मार दी। सरकार गिर गई। 1999 में फिर चुनाव हुए और भाजपा की सीटें फिर बढ़कर 183 हो गई। इस तरह अटलजी 3 मर्तबा लगातार प्रधानमंत्री रहे, लेकिन फील गुड फैक्टर के तहत वक़्त के कुछ पहले चुनाव कराये गए और भाजपा 2004 में 183 से 138 पर आ गई।  यूपीए की सरकार बनी और उमा भारती तथा सुषमा स्वराज  के स्यापे के बाद सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने की पहल की. 

मोदी के 'मत'वालों के मुगालते

राजेन्द्र माथुर साहब ने लिखा है कि कांग्रेस को केवल एक चीज़ जोड़कर रख सकती है। वह है सत्ता।  अगर कांग्रेसियों को लगे कि सत्ता जा सकती है तो वे एक हो जाते हैं और अगर फिर भी सत्ता खो जाए तो वे किसी न किसी बहाने एक होकर, जोड़-तोड़ से सत्ता पर काबिज होने में जुट जाते हैं।  मोदी अकसर कांग्रेसविहीन भारत की बात करते हैं, जो लगभग नामुमकिन है। कांग्रेस या तो राज करने में यकीन रखती है या राज पाने के लिए संघर्ष करने में। अगर आप अतीत पर नज़र डालें तो इमर्जेंसी (1975-1977) के बाद हुए चुनाव कांग्रेस के लिए सबसे बुरे थे। इमर्जेंसी में लाखों लोग जेल में डेढ़ साल तक बंद रहे थे, जबरन  नसबंदी का ख़ौफ़ गाँव गाँव में था।  अनुशासन के डंडे से कर्मचारी नाराज़ थे। लोकशाही के सारे नागरिक अधिकार रद्द रहे थे और चुनाव की घोषणा होते ही वोटरों ने फैसला कर लिया था कि उन्हें क्या करना है। तब लोग प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से नाखुश नहीं, बेहद नाराज़ थे। तब भारतीय जनता पार्टी नहीं बनी थी और आरएसएस के आनुषंगिक संगठन के रूप में भारतीय जन संघ जनता मोर्चे का हिस्सा थी। उस चुनाव में इंदिरा गांधी और उनका बेटा संजय गांधी दोनों हार गए थे (बाद में इंदिरा गांधी चिक मंगलूर से उपचुनाव  लड़ीं और विजयी  रहीं ) लेकिन फिर भी कांग्रेस को 153 सीटें मिलीं थीं। (चुनाव के पहले  उसके पास 350 सीटें थीं). ज़रा गौर करिए प्रीवि पर्स ख़त्म करनेवाली, बैंकों का सरकारीकरण करनेवाली, 1971 में पकिस्तान का बंटवारा करने और भारत को सम्मान दिलानेवाली इंदिरा गांधी को लोगों ने धूल चटा  दी थी, लेकिन  कांग्रेस को 153 सीटें मिल गई थीं.  

चुनावी इतिहास में यू टर्न 

1977 का चुनाव एकलौता चुनाव था, जब किसी एक पार्टी को साफ़ साफ़ बहुमत मिला था। जनता मोर्चे को साफ़ साफ़ 345 सीटें मिल गयी थी, जिसमें से 295 सीटें चुनाव के लिए बनी जनता पार्टी को मिली थी, जिसमें मुख्य रूप से जनसंघ था। जनता मोर्चे की दूसरी 8 पार्टियों ने 47 सीटें जीती जिनमें से 22 वामपंथी थे। उसके बाद किसी भी गैर कांग्रेसी सरकार में एक ही पार्टी को साफ़ साफ़ बहुमत नहीं मिला। 

अगर आप इतिहास में देखें तो पाएंगे कि इमर्जेंसी के जुल्मों के बाद बने जनता मोर्चे को जितनी सीटें (345) मिलीं थीं उससे भी कहीं अधिक सीटें कांग्रेस ने 1984 में पाई।  जिन  इंदिरा गांधी ने इमर्जेंसी लादी थी और लोकतंत्र की सरेआम हत्या कर दी थी, उन्हीं इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस ने 1984 के आम चुनाव में कांग्रेस  को 404  और भाजपा को 2 सीटों पर लाकर पटक दिया था।  यह चुनाव का सीधा और बहुत बड़ा यू  टर्न  था। 

बिना मनोबल की कांग्रेस 

इस चुनाव में कांग्रेस को शिकस्त देना आसान इसलिए है कि कांग्रेस कभी भी मनोबल के स्तर  पर इतने  नीचे नहीं रही। 1977 में भी नहीं। राहुल गांधी ने उन मठाधीशों को हाशिये पर लाकर पटक दिया है, जिनकी तिकड़मों  के बल पर वे कई सीटें जीत जाया करते थे। हाल ही प्रमुख  चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में हार से भी कांग्रेसियों का मनोबल गिरा हुआ है। महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम वोटर बेहद नाराज़ है और यही मौका है विपक्ष के लिए। कांग्रेस इस चुनाव में वॉक ओवर दे चुकी लगाती है लेकिन कांग्रेस की कमज़ोरी ही भाजपा की ताकत है और भाजपा की कमज़ोरी क्षेत्रीय पार्टियों का अमृत। 

इन हालात में क्षेत्रीय छत्रपों को लग रहा है कि यह सही मौका है महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कोशिश करने का। उन्हें लगता है कि भाजपा में मोदी और राजनाथ के अलावा कोई प्रमुख नेता ऐसा नहीं है जो भीड़ को खींच सके। आडवाणीजी 86 वर्ष के बूढ़े हो चुके हैं और एक बार पीएम इन वेटिंग रह चुके हैं, उनके नाम से लोग वोट देनेवाले नहीं। वे चार बार राज्य सभा  और 5 बार लोक सभा सदस्य चुने जा चुके हैं।  पिछली बार वे मोदी की ही कृपा से गांधीनगर से लोकसभा में गए थे .   उनकी अपनी खुद की कोई ऐसी सीट नहीं, जहां वे कभी भी बेख़ौफ़ खड़े हों और जीत जाएँ। सुषमा स्वराज का भी कोई जनाधार नहीं है, वे पिछली बार शिवराज सिंह चौहान की कृपा से विदिशा से खड़ी  हुई और जीतीं, इस बार वे यहाँ से भी डर  रही हैं क्योंकि राघवजी भाई के होते उन्हें शक  है। नितिन गडकरी, मुरली मनोहर जोशी, बंगारू लक्ष्मण, शाहनवाज़ हुसैन, अरुण जेटली, वैंकेया नायडू, अनंत कुमार, थावरचंद  गेहलोत, यशवंत  सिन्हा, राजीव प्रताप रूढी, उमा भारती, राम लाल, मुख्तार अब्बास नक़वी ऐसे कई बड़े नेता भाजपा में हैं ज़रूर, पर वे प्रधान मंत्री के रूप में वोट नहीं ला सकते। शिवराज सिंह, रमन सिंह, महारानी वसुंधरा, मनोहर पर्रिकर अपने सूबों में ही व्यस्त हैं और कोई राष्ट्रीय नेता की छवि नहीं रखते। 

लीडर वर्सेस कॉडर 

दिलचस्प बात है कि जो कांग्रेस लीडर बेस्ड पार्टी कही जाती है वह अब कॉडर बेस्ड पार्टी होना चाहती है और जो भाजपा कॉडर बेस्ड पार्टी होने का भ्रम देती है वह एक नेता (मोदी) के पीछे भाग रही है।  कांग्रेस को नया खून देने की कोशिश में राहुल गांधी ने उसे आई सी यूं में डाल  रखा है और राजनैतिक सर्जरी जारी है। इस बार गणित राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस के पक्ष में नज़र नहीं आ रहे हैं और अब उनके सामने केवल यही लक्ष्य है कि डैमेज कम से कम हो। 

© प्रकाश हिन्दुस्तानी 
07. 02. 2014
http://epaper.newstodaypost.com/c/2592790

Wednesday, February 05, 2014

ताकि सनद रहे (1)


सांध्य दैनिक न्यूज़ टुडे में 20 मार्च 2014 को प्रकाशित
http://epaper.newstodaypost.com/245495/Newstoday-Indore/20-03-2014#page/6/1

2014 के खट्टे अंगूर (1 )



भाजपा कहाँ से जुटाएगी 272 सीटें?

मैं किसी पार्टी का नहीं हूँ।  कई बातें समझ नहीं आ रही,  आप समझा दीजिए। भाजपा लोकसभा चुनाव में क्या कर  लेगी?  कहाँ से जुटाएगी 272 सीटें? (अभी हम यहाँ गठजोड़ों यानी अलायंस की बात नहीं कर रहे हैं।)  बच्चों का खेल है क्या ? कई राज्यों  में तो उसका  खाता ही नहीं खुला है।  42 सीटों वाले आंध्रप्रदेश, 20 सीटोंवाले केरल, 21 सीटोंवाले ओड़ीसा, 39 सीटोंवाले तमिलनाडु, 7 सीटोंवाली दिल्ली, 6 सीटोंवाले जम्मू-कश्मीर में उसके हाथ में अंडा यानि शून्य (0) है।  इसी  के साथ ही कई  छोटे राज्य या  केन्द्र शासित सीटों  मणिपुर (2), मेघालय (2),मिजोरम (1), त्रिपुरा (2), लक्ष्यद्वीप(1),अरुणांचल (2),पॉण्डिचेरी(1), सिक्किम (1), चण्डीगढ़ (1 )में खाता उसका 
 नहीं  है अभी. 

इसका अर्थ यह है कि 35 राज्यों (या केन्द्रशासित प्रदेशों) में से 15  पर भाजपा का तो खाता ही नहीं  खुला है. इन 15  प्रदेश में 148  सीटें हैं। कुल 543 सीटों में से 148  कम कर दें तो बचीं  20  राज्यों की 395  सीटें।

 इन्हीं 20  बचे  राज्यों में  भी भाजपा  की हालत बहुत शानदार नहीं थी।  42 सीटों वाले बंगाल में भाजपा के पास 1 सीट है। 13 सीटवाले पंजाब में भी भाजपा के पास एक सीट और 5 सीटवाले उत्तराखंड में भी 1 सीट भाजपा के पास है। इसका अर्थ हुआ तीन राज्यों  बंगाल, पंजाब और उत्तराखंड की 60 सीटों में से उके पास केवल 3 सीटें हैं। 
   
इसे यों समझ सकते हैं : देश में 35 राज्य - केन्द्र शासित क्षेत्र हैं जिनमें से 15 में भाजपा की कोई भी सीट नहीं है और तीन राज्यों में भाजपा की केवल एक एक सीट है।  इन 18 राज्यों में लोकसभा की कुल 208 सीटें हैं जिनमें से भाजपा के पास 3 सीटें हैं। बाकी बची 335 सीटों में से ही भाजपा के करीब एक तिहाई यानी 112 सांसद हैं। ये तो है अभी का हाल।

सरकार  बनाने के लिए चाहिए  कम से कम कुल 272 सीटें। जब भाजपा 35 में से 17 राज्यों में ही यानी आधे राज्यों में ही मैदान में है तो कितना मैदान मार लेगी?

 अभी भाजपा शासित राज्यों में मध्यप्रदेश की 29 सीटों में से  13 पर, छतीसगढ़ की 11 में से 9 पर, राजस्थान की 25 में से 4 सीटों पर काबिज है।  यानी इन 65 सीटों में से भाजपा के पास 26 सीटें ही तो हैं। उत्तरप्रदेश में 80 सीटें हैं जिनमें से भाजपा कि पास हैं केवल 11, गुजरात की 26 सीटों में से भाजपा का कब्ज़ा है 17 सीटों पर और  महाराष्ट्र की 48 सीटों में से भाजपा के पास हैं कुल 9 सीटें।  यानी यूपी, गुजरात  और महाराष्ट्र की 154   सीटों में से भाजपा के पास हैं कुल 36  सीटें। 

संक्षेप में :

--भाजपा का 35 राज्यों-क्षेत्रों में से 15  पर खाता  ही नहीं खुला है और यहाँ हैं कुल 148  सीटें। इसके अलावा ;
--3 प्रमुख राज्यों की 60 सीटों में से भाजपा के पास है केवल 3 सीटें। 
--भाजपा शासित  4  प्रमुख राज्यों में  भाजपा के पास हैं  91  में से 43  सीटें। 
--उत्तरप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों की 154 सीटों में से भाजपा के पास है 36 सीटें। 

सवाल है कि अरविंद केजरीवाल और  आप के साथ ही तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट के बीच क्या कोई चमत्कार होनेवाला है ? क्या मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरातऔर  छत्तीसगढ़  में उसे सौ फ़ीसदी --सभी की सभी सीटें मिल जाएंगी यानी 91  की 91  ?

क्या भाजपा को महाराष्ट्र - उत्तरप्रदेश में 128 में से आधी भी मिल पाएंगी यानी 64 ?

क्या  केरल, ओडीसा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में वह खाता  खोल पायेगी ?

भारत में 35 राज्य व् केन्द्र शासित प्रदेश हैं जिनमें 37 पार्टियां और 8  निर्दलीय सांसद पिछले मर्तबा जीते थे। भारत बहुत बड़ा देश है और यह बात समझ लेना ज़रूरी है कि केवल हिन्दी हार्टलैंड ही भारत नहीं है। 


© प्रकाश हिन्दुस्तानी 
05. 02. 2014


Wednesday, July 17, 2013

हिंदी के क्षेत्रीय समाचार चैनलों की प्रेत बाधा

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 नवंबर में चार हिंदीभाषी राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे. 2014 में लोकसभा और फिर कुछ राज्यों में नगर पालिका-नगर निगम के वोट डलना हैं. इसीलिये तमाम बिल्डर, 'चीटफंडी', खनन माफिया चैनल लेकर आ रहे हैं.  मध्यप्रदेश में हिंदी के रीजनल चैनल दर्जन भर से ज्यादा हो गए हैं और और भी आते ही जा रहे हैं. अच्छा होता अगर इससे पत्रकारिता और पत्रकारों का कुछ भला होता लेकिन ऐसा नज़र नहीं आ रहा है.   
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हिंदी के क्षेत्रीय समाचार चैनलों की प्रेत बाधा 

क्या हिंदी में क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल का सञ्चालन हो सकता है?  मेरा मानना है नहीं . केवल नहीं .  आप कहेंगे कि अभी हो ही  रहा है तो मैं   नहीं क्यों कह रहा ? मेरा जवाब है कि जो भी न्यूज़ चैनल संचालित हो रहे हैं वे वास्तव में संचालित नहीं हो रहे हैं, बल्कि घिसट - घिसट कर जैसे तैसे चल रहे हैं .  अभी हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी के अपने न्यूज़ चैनल हैं ज़रूर , लेकिन उनकी दशा क्या है ? उन पर क्या दिखाया जा रहा है ? कितनी खबरें हैं वहां ? कितने न्यूज़ बेस्ड प्रोग्राम हैं ? इन तथाकथित क्षेत्रीय हिंदी न्यूज़ चैनल ने वहां के लोगों के जीवन को कितना  प्रभावित किया ? क्या इन चैनल पर खबरें देखकर लोग जागरूक हुए? क्या इन्होंने पत्रकारिता की धार को बदला? क्या इन चैनल ने नया टीवी पत्रकारिता का  दौर शुरू किया या फिर नए नए सोच को बढ़ावा देने वाले टीवी पत्रकारों की फ़ौज खड़ी  की? कितने पत्रकार इन चैनलों से देश को दिए? समाज में बदलाव की कोई कोशिश भी इन्होंने  की क्या?


हिंदी वाले क्षेत्रीय हो ही नहीं सकते 

आप कहेंगे कि अभी भी उत्तरप्रदेश,उत्तराँचल, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीस गढ़, एन सी आर, मुंबई , राजस्थान, हिमाचल प्रदेश आदि में क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल खूब धडल्ले से चल रहे हैं और एक दो को छोड़कर  लगभग सभी डटे  हैं मैदान में . जी हाँ , 'डटे ' तो हैं लेकिन किस तरह ? ताश के पत्तों की तरह इन चैनलों (जी हाँ, चैनलों क्योंकि यह भी हिंदी का ही शब्द बन गया है स्कूल या स्कूलों की तरह) के हेड या एडिटर्स फैंटे जा रहे हैं, कुकुरमुत्तों की तरह उग आये इन चैनलों में टीवी  पत्रकारों के नाम पर कमीशन एजेंटों और दलालों की भर्तियाँ हो रही हैं .ऐसे एजेंटों और दलालों को पत्रकारिता के ठेके पर पत्रकार बनाने की धारा बह रही है कि  यह यकीन कर सकना  मुश्किल हो रहा है . दुखद बात यह है कि यह सब कोई चुपचाप नहीं हो रहा है . यह हो रहा है दिनदहाड़े , राजी मर्जी से . सबकी आँखों के सामने .

हिंदी अच्छी भाषा है या बुरी;  समर्थ है या असमर्थ;  इस मुद्दे पर यहाँ बात करने के बजाय मैं यह कहना चाहता हूँ कि हिंदी भाषा में क्षेत्रीय भावनाओं  का ज्वार उठाने का माद्दा कभी नहीं रहा, हिंदी भाषी कितन भी कमतर क्यों न हो, इस बात को मानने को कतई  राजी नहीं हो  सकता कि उसकी सोच क्षेत्रीय  है. मुझे लगता है की हिंदी में क्षेत्रीय अपील है ही नहीं , या है भी तो नाममात्र की . कारण यह है कि हम हिंदीवाले तो वसुधैव कुटुम्बम को माननेवाले है, हमारे लिए तो सम्पूर्ण विश्व ही हमारा परिवार है . विश्व नहीं  तो भारत तो है ही . अगर हम हिन्दीवाले नीचे से नीचे के पायदान पर भी आयें तो भी भारत देश से कम की बात हम सोच नहीं सकते.  हम हिंदी भाषियों में क्षेत्रीयता के वे जीवाणु हैं ही नहीं , जो बांग्ला , मराठी, तमिल, तेलुगु , मलयालम आदि में हैं . इसे आप इस तरह भी मान सकते हैं कि  हाँ, हमारे भीतर हमारी  अपनी प्रिय भाषा के बारे में वह स्वाभिमान या दर्प नहीं हैं , या कि  हम हीनता की ग्रंथि में फंसे हैं , हिंदी भाषा में बात करने में हमें गर्व होता हो या  न होता हो , शर्म आती हो या नहीं आती हो, जो भी हो  पर हमें यह मंज़ूर नहीं कि हम  अपने छोटे से दायरे में जीयें . हम या तो देश की बात करते हैं या फिर अपने मालवा , निमाड़, बुन्देल खंड , बघेलखंड, मेवाड़ , मारवाड़, अवध, या भोजपुर आदि की . हिंदी भाषी व्यक्ति की सोच ही क्षेत्रीय नहीं है , वह एक बंगाली, मराठी, तमिल आदि भाषी की तरह एक छोटे से क्षेत्र के बारे मन सोच ही नहीं  सकता . यही कारण है कि क्षेत्रीय हिंदी न्यूज़ चैनलों  को अलग से दर्शक नहीं मिल पाते हैन. जो दर्शक ग्वालियर की खबर देखना चाहता है वह झांसी और आगरा की खबर में भी दिलचस्पी रखता है और जो रायपुर की खबरें जानने का इच्छुक है वह अकेले रायपुर की खबरों से संतुष्ट नहीं . हिंदी भाषी के साथ ख़ास बात यह है की वह अपने आप को इंदौर या नागपुर या रायपुर या झांसी  या इलाहाबाद से ही नहीं जोड़ता, बल्कि पूरे देश से जोड़कर देखता है. इसीलिये श्रीनगर में हुआ आतंकी हमाल भी उनके लिए महत्वपूर्ण खबर है और झाबुआ के किसी इलाके में होने वाली घटना भी .

सरकारी तंत्र के पिछलग्गू 


हम जिन्हें क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल कहते  हैं वे वास्तव में हैं क्या ? क्या वे अपने  इलाके का सही सही प्रतिनिधत्व करते हैं ? क्या वे सच्ची तस्वीर दिखाते हैं अपने इलाके की ? हिंदी के ही राष्ट्रीय न्यूज़ चैंनलों की तरह  ?  इन चैनलों में भी समाचार के प्रति  उनका नजरिया साफ़ नज़र आता है .--वह यह कि  वहां कोई भी नजरिया है ही नहीं.  ये चैनल  खास तौर पर अपने अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के रहन रखे नज़र आते हैं .  इनका एकमात्र काम है अपने राज्य के मुख्यमंत्री की जय जय कार करना और करते ही रहना . धार में भोजशाला  का विवाद चल रहा था . पुलिस लोगों पर लाठियां भांज  रही थी, लेकिन एक चैनल को छोड़कर सभी क्षेत्रीय हिंदी समाचार चैनल मुख्यमंत्री की स्तुति गान  वाले पेड न्यूज़ के पैकेजेस (जी हाँ, यही कहा जाता है इन्हें) दिखा रहे थे. इसमें भी कुछ  क्षेत्रीय चैनल मस्ती की पाठशाला जैसे कार्यक्रम दिखा रहे थे क्योंकि प्रमुख मनोरन्जन चैनलों से टीपा गया ऐसा प्रोग्राम मुफ्त का पड़ता है .और धर्श्नीय भी होता ही है.

दरअसल इन चैनलों के मालिकों  के अजेंडे में ज़मीनें, खदानें, पावर प्लांट, बड़े उद्योग-धंधे आदि होते हैं  और इनके पत्रकारों को हिदायत कि अगर सरकार के खिलाफ भी कोई खबर दिखानी हो तो कभी भी मुख्यमंत्री को निशाना न बनाने दे. सरकार पर प्रहार कारण ही पड़े तो संबंधित विभाग के मंत्री को निपटाया जाए और मुख्यमंत्री को बताया जाए की हम आपके प्रतिस्पर्धी को निपटा रहे हैं.मुख्यमंत्री का एजेंडा ही इन चैनलों का एजेंडा है. सरकारी कृपा के अमृतपान से ही ये चैनल चल रहे हैं. यही कारण है की इन चैनलों का कोई भी सकारात्मक प्रभाव अभी तक किसी भी राज्य में नहीं देखा गया.

अन्य भाषा के रीजनल चैनलों के दशा अलग है. वहाँ कई चैनल तो सत्तासीन लोगों के अपने ही हैं.  जो उनके नहीं है, वे खुलकर सत्ता के खिलाफ हैं. वहाँ या तो  चैनल सत्ता  के पक्ष में हैं या फिर खुलकर विपक्ष में. हिन्दी में विपक्ष में तो होने का सवाल ही नही.


निम्नस्तरीय कंटेंट 

साल में कुछ मौके ऐसे होते हैं जब हमारे ये चैनल गाँव-कस्बों के केबल टीवी को भी मात  दे देते हैं. ये मौके होते हैं स्वतंत्रता दिवस, दीपावली और गणतंत्र दिवस. इन उत्सवों के दौरान हर स्ट्रींगर चैनल का कमीशन एजेंट बन जाता है. उन्हें टारगेट दे दिए जाते हैं की उन्हें पूरा नहीं किया तो नौकरी' गयी समझो. इन दिनों लगभग सभी स्ट्रिंगरों के एक हाथ में माइक आइडी होता है और दूसरे हाथ में कटोरा. इन त्योहारों के मौके पर ये तथाकथित टीवी पत्रकार जनपद अध्यक्षों, जिला पंचायत के अफ़सरों, पार्षदों, डिप्टी कलक्तरों की चमचागीरी करते नज़र आते हैं. आजकल  इन पत्रकारों को कूपन देने का रिवाज है. चिट फंड कंपनियों के बड़े पद वाले   अपने टीवी पत्रकारों को ये कूपन बेचने  के लिए दे देते हैं. लालच भी दिया जाता है कि  तुम्हें इस पर पंद्रह फीसदी कमीशन मिलेगा. यानी अगर दीपावली के दिनों में दस लाख के कूपन बेच दिए तो तुम्हारे डेढ़ लाख पक्के. यह ऑफिशियल कमाई है. मैं ऐसे कई अफ़सरों को जानता हूँ, जिन्होंने ये कूपन खरीदे हैं, या बिकवाए हैं और कई ऐसे हैं जिन्होंने कहा --'' भाई, हमसे पैसे ले जाओ पर कूपन की हमें कोई ज़रूरत नहीं है.''

आम तौर पर ये चैंनल अपने पत्रकारों को पारिश्रमिक  भी  वक़्त पर  नहीं देते. जो कुछ भी देते हैं वह नाममात्र का होता है.   प्रसारित हो चुकी  खबरों के आधार पर मिलनेवाला यह मेहनताना ज़रूर मामूली होता है , लेकिन आम तौर पर बहुधन्धी  पत्रकार इन खबरों के प्रसारण पर ही जीवित होते हैं.  इसी से उनकी 'ख्याति' या लोकप्रियता होती है. आप किसी भी कस्बे के ऐसे ही पत्रकार को 'फेसबुक' पर तनकर  खड़े होकर माइक आई डी के साथ देख सकते हैं.  मध्यप्रदेश के तो छोटे - छोटे शहरों में इन टीवी पत्रकारों की सख्या 50 -60 होना मामूली बात हो गयी है. इनमें से कई चैनल तो ऐसे हैं जो प्रसारित ही नहीं होते. इनमें से कई पत्रकार तो ऐसे हैं जिनकी महीने में एक खबर भी दिखाई नहीं जाती, लेकिन ये अपने आप को  महान पत्रकार कहने में ज़रा भी गुरेज़ नहीं करते. एक पत्रकार ने तो अपने बैग में रखी चूड़ियाँ बताकर कामयाबी का सूत्र बताया कि  जब भी कहीं आंदोलन होता दिखता है,  मैं वहाँ पहुँच जाता हूँ और प्रदर्शनकारियों से कहता हूँ कि  ज़रा किसी को ये चूड़ियाँ भेंट कर दो, जिससे  विज़ुअल्स अच्छे बन जाएँ. पानी की कमी के आंदोलनों में कई बार विज़ुअल्स के लिए हम ही मटके मंगवाकर फुडवा देते हैं, कई बार दूध महँगा होने पर हमें ही दूध भी बहाकर विरोध कारण पड़ता है. यहाँ तक कि  एक बार तो शिवरात्रि के दिन मैं एक सपेरे को शिव मंदिर ले गया और वहाँ शिव लिंग के सामने  कुछ देर साँप छोड़कर विज़ुअल्स बना कर चैनल पर खबर बना दी --'' शिवरात्रि का चमत्कार!''  नाग देवता पहुँच गये शिव की आराधना में. बाद में तो मंदिर वालों का 'कारोबार' बहुत चमक गया और  वे खुद ऐसे चमत्कार दिख वाने  लग गये.
कुल मिला कर भूत भभूत, लोटा लंगोट , सिनेमा क्राइम, बाबा और बॉबी के सहारे ये चैनल चल रहे है. कोई भी बौद्धिक शो यहाँ नहीं, केवल खानापूरी है. सिनेमा का शो यहाँ फिलर है . जब चैनल का ही कैमरामैन इंटरवल में ही लोगों से पूछकर आ जाता है कि फिल्म कैसी लगी.. राष्ट्रीय मुद्दों पर लाइव प्रोग्राम में रिपोर्टर के साथ खड़े लोग वहीँ के कर्मचारी, ड्राइवर, लिफ्टमैन या स्टाफर होते है. कुल मिलकर ये राष्ट्रीय चैनलों  की झूठन और झूठ के सहारे जीते हैं, जिन्हें देखने  या नहीं देखने से दर्शकों को कोई सूचना नहीं मिलती, कोई ज्ञान नहीं मिलता और यहाँ तक की उनका कोई मनोरंजन नहीं होता . यहीं कारण है कि  तमान चैनल फ्लाप हो रहे हैं  और उन्हें अपने खर्च निकालना ही मुश्किल हो रहा है।


राष्ट्रीय और क्षेत्रीय का फर्क 


जिन क्षेत्रीय न्यूज़ चैनलों के साथ राष्ट्रीय चैनल भी हैं, वहाँ संकट  और भी गहरा है क्योंकि वहाँ तमाम अच्छे पत्रकारों को तो नेशनल चैनल में जगह मिल जाती है और दूसरे  दर्जे के लोगों को रीजनल में रख दिया जाता है . जहाँ वे इनके पीर , बाबर्ची , भिस्ती,  खर -- सभी होते हैं. उनकी ख़ास योग्यता यही होती है कि  अपने वरिष्ठों  ( और उनके रिश्तेदारों ) की सेवा में कोई कसर न रखी जाए. जब साहब लोग दौरा करें तो उनकी सेवा में किसी भी तरह की कोई कसर न रखे. टीआरपी के खेल में भी ये अपने दर्शकों और विज्ञापनदाताओं  को मूर्ख बना रहे हैं . दस लाख से बड़े शहर में टीआरपी में नंबर वन, एक लाख तक के शहरों में टीआरपी में नंबर वन, इतने बड़े शहरों में जीआरपी  में नंबर वन, यहाँ जीआरपी में नंबर वन -- ये इस तरह दर्शकों को भरमाते हैं कि  हर चैनल पर यही दावा नज़र आता. दरअसल इन चैनलों के सामने समस्या यह है की वे किसे अपने दर्शकों को दिखाएँ और किसे न दिखाएँ . उन्हें यह भी नहीं समझ में आ रहा की उनका दर्शक जीआरपी और टीआरपी का चक्कर नहीं समझता . मजेदार बात तो यह है कि इन चैनलों के करता धर्ता भी नहीं जानते कि यह क्या है?

-- प्रकाश हिंदुस्तानी 

(लोहिया अध्ययन केन्द्र, नागपुर से प्रकाश  दुबे द्वारा सम्पादित
 'सामान्यजन संदेश' के  विशेष सौवें अंक में प्रकाशित)

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Bhadas4media.com पर भी यही लेख देखा जा सकता है :
http://bhadas4media.com/print/13132-2013-07-17-20-40-52.html


इसी लेख पर एक वरिष्ठ पत्रकार की  टिप्पणी मेरे लिए अहम् है जो मेरी कई बातों की पुष्टि करती है:
http://www.bhadas4media.com/print/13409-2013-07-30-09-17-17.html 
शिवराज की जनआशीर्वाद यात्रा के आगे नतमस्तक हुआ मप्र का मीडिया, क्या ये पेड न्यूज नहीं?

यशवंत जी पिछले दिनों भड़ास पर एक लेख पढ़ा था, प्रकाश हिंदुस्तानी ने लिखा था, शीर्षक था- हिंदी के रीजनल न्यूज चैनलों का एकमात्र काम अपने राज्य के मुख्यमंत्री की जय जय कार करना पिछले दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज की जनआशीवार्द यात्रा के दौरान इसकी याद आ गई....

मध्यप्रदेश का पूरा मीडिया शिवराज की यात्रा के सामने नमस्तक हो गया..... इस तरह लाइव चला रहा था कि मानों प्रदेश की सबसे बड़ी खबर यहीं हो.... चुनाव आयोग पेड न्यूज की बात करता है, ये जो 5-6 घंटे लगातार लाइव चल रहा था बिना बात के राज्य सरकार की जय जयकार की जा रही थी... क्या ये पेड न्यूज की श्रेणी में नहीं आता....

सहारा...ईटीवी...जी मध्यप्रदेश और इंडिया न्यूज मध्यप्रदेश जैसे बड़े रीजनल चैनलों ने मुख्यमंत्री और 5-6 नेताओं का भाषण लाइव चलाया... बंसल न्यूज और ऐसे ही कुछ छोटे चैनलों ने कुर्सी और टेंट लगने से लेकर यात्रा खत्म होने तक ..शिवराज के रथ का पिछवाड़ा भी लाइव दिखाया.....सवाल यही है कि ये पत्रकारिता का कौन सा रूप है.....मध्यप्रदेश में सारे न्यूज चैनल शिवराज का गुणगान कर रहे हैं....साफ है कि इन्हे जनसंपर्क से पैसा मिल रहा है....खूब विज्ञापन दिए जा रहे है पर क्या इसका मतलब ये हो गया है कि रीजनल चैनल प्रदेश सरकार के गुलाम हो जाए....सिर्फ वही दिखाया जाए जो प्रदेश के मुख्यमंत्री को पसंद हो....

ट्राई कितने ही नियम बना ले कि 30 घंटे में 9 मिनट से ज्यादा विज्ञापन नहीं होना चाहिए पर मध्यप्रदेश के न्यूज चैनल कई बार इस तरह के आयोजन में मुख्यमंत्री के भाषण को घंटों लाइव चलाता है....तो क्या ये ट्राई ने नियमों का उल्लघन है....शिवराज की जन आशीर्वाद रैली को जिस तरह मप्र की मीडिया ने प्रस्तृत किया है वो बहुत शर्मनाक है....ये मजबूरी हो गई है रीजनल चैनल की अगर बीजेपी की जगह कांग्रेस की सरकार होती तो वी यही होता जो आज हुआ.... जिस तरह से रीजनल चैनलों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है उसी तरह से राज्यों में चाटुकारिता बढ़ती जा रही है....

अब चैनल का न्यूज हैड सरकार के प्रवक्ता जैसी बाते करता नजर आता है...सिर्फ राज्य सरकार के मंत्रियों के इंटव्यू लेना.. IAS और IPS से अफसरनामा करना...राज्य सरकार की तारीफ करना ये चैनल के न्यूज हैड का काम रह गया है....बाकी क्या चल रहा है चैनल में...कहां जा रही है पत्रकारिता इससे कोई लेना देना नहीं....

अभी मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में थोड़ा समय बाकी है....पर चुनाव आते आते ये न्यूज चैनल पत्रकारिता को और शर्मसार करेंगे....ऐसे में चुनाव आयोग को चाहिए कि वो देखे किस नेता को कौन सा चैनल कितनी देर तक दिखा रहा है....क्यों कि यही पेड न्यूज है ....पैसे देकर टीवी पर दिखना...पैसे देकर मुख्यमंत्री का भाषण या आयोजन लाइव चलवाना.....राज्यों में पत्रकारिता के गिरते स्तर को अगर रोकना है तो सख्ती से इस चाटुकारिता को बंद करना होगा नहीं तो राज्यों में भूल ही जाओ पत्रकारिता नाम की कोई चीज होती है....सिर्फ चाटुकारिता ही नजर आएगी....

                                                                       मध्यप्रदेश के पत्रकार द्वारा भेजे गये पत्र पर आधारित.

Friday, September 03, 2010


मीडिया में भी 'आइटम'

-- प्रकाश हिन्दुस्तानी --
आजकल मीडिया में भी 'आइटम' का चलन हो गया है ! आप के आस पास भी पत्रकार कम और 'आइटम' ज़्यादा होंगे। ज़रा गौर से देखें और अगर ना पहचान सकें तो ये रही उनकी पहचान :



--फिल्मों में 'आइटम' इसलिए डाले जाते हैं कि जनता फिल्म देखने आए. मीडिया में 'आइटम' इसलिए डाले जाते हैं कि एड. की भरमार हो सके.


--फिल्मों में 'आइटम' आम तौर पर नवागत नई-नई हीरोइनें करती हैं. मीडिया में 'आइटम' नये नये पत्रकार करते हैं, ज़रूरी नहीं की वह स्त्री ही हो, क्योंकि वहाँ सभी तरह के लोग 'आइटम' के लिए मौजूद हैं


--फिल्मों में 'आइटम' में जनता सिक्के उछालती है, मीडिया में 'आइटम' देख एड. देनेवाला गड्डियाँ उछालता है।
--फिल्मों में 'आइटम' से प्रोड्यूसर मालामाल होता है, मीडिया में 'आइटम' मीडिया का मालिक !

--फिल्मों में 'आइटम' एक या दो ही हो सकते हैं. मीडिया में 'आइटम' की ज़रूरत शाश्वत हो चली है. पूरा शो ही 'आइटम' होता है.

--फिल्मों में 'आइटम' करनेवाले 'भी' ठीकठाक कमा लेते हैं, मीडिया में 'आइटम' करनेवाले 'ही' ठीकठाक कमा पाते हैं.

--हरेक फिल्म में 'आइटम' करनेवाले नहीं होते / होतीं, जबकि हर मीडिया में 'आइटम' करनेवाले होने लगे हैं........
और अंत मे : --- फिल्मों के 'आइटम' में हीरोइन को कपड़े उतारने पड़ते हैं, मीडिया में 'आइटम' में कपड़े नहीं, चरित्र उतारना पड़ता है. फिल्मी 'आइटम' में चरित्र उतरने की मज़बूरी नहीं होती.
---प्रकाश हिन्दुस्तानी



3सितम्बर 2010
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