हिन्दी पत्रकारिता का सफर; बदलती भाषा, बदलते तेवर
शांतिनिकेतन के विश्व भारती विश्वविद्यालय के हिंदी भवन का खुला प्रांगण. केंद्रीय हिन्दी निदेशालय और विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की तरफ से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के सत्र में मेरा अध्यक्षीय भाषण :
1900 में ‘सरस्वती’ का प्रकाशन और महावीर प्रसाद द्विवेदी का संपादन हिन्दी गद्य के विकास का निर्णायक पड़ाव था।
द्विवेदी ने भाषा में अनुशासन लाया। वर्तनी, वाक्य-विन्यास, तत्सम शब्दावली और विषय की गंभीरता को महत्व दिया गया। आधुनिक मानक हिन्दी का बड़ा हिस्सा केवल व्याकरण की पुस्तकों से नहीं, बल्कि अखबार और पत्रिकाओं की रोजमर्रा की जरूरतों से बना। तेवर भी बदला।
भारतेन्दु युग के व्यंग्य और जागरण की जगह शिक्षा, सुधार और राष्ट्र-निर्माण का आग्रह मजबूत हुआ। साहित्य के साथ विज्ञान, इतिहास, अर्थनीति और सामाजिक प्रश्न भी हिन्दी में आने लगे। आलोचक यह भी कहते हैं कि द्विवेदी युग ने हिन्दी को गरिमा दी, लेकिन कभी-कभी उस पर पांडित्य का बोझ भी लाद दिया। आम आदमी की बोली और पत्र की भाषा के बीच दूरी बढ़ी।
फिर भी इस अनुशासन का अपना महत्व था। आगे चलकर स्वराज, संविधान, अर्थनीति और समाजवाद जैसे जटिल विचारों को हिन्दी में व्यक्त करने के लिए एक स्थिर गद्य जरूरी था।
जब कलम तलवार बनी
बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में हिन्दी पत्रकारिता का तेवर फिर बदला। अब पत्रकारिता सिर्फ जागरण नहीं, आंदोलन का हिस्सा बन गई। गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’, काशी का ‘आज’, मालवीय का ‘अभ्युदय’ और गांधी का ‘नवजीवन’ खबर के साथ जनचेतना और राजनीतिक mobilization के माध्यम बने। भाषा अपेक्षाकृत सरल हुई क्योंकि लक्ष्य केवल शिक्षित वर्ग नहीं, व्यापक जनता थी। गांधी ऐसी भाषा चाहते थे जो गांव तक पहुंचे। फारसी-उर्दू के प्रचलित शब्द और संस्कृत के आवश्यक शब्द—दोनों का इस्तेमाल हुआ।इस दौर में भाषा का नैतिक केंद्र सत्य, अहिंसा और स्वदेशी था।
तेवर निर्भीक था। सेंसरशिप, जमानत और जेल पत्रकारिता की सामान्य कीमत थे। गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों ने अपने काम की कीमत जान तक देकर चुकाई। पत्रकारिता अभी बाजार नहीं थी; वह आंदोलन का विस्तार थी, लेकिन इसी दौर में एक सवाल भी गहराया—हिन्दी किसकी भाषा है?राष्ट्र की एकता की भाषा या हिन्दी पट्टी की सांस्कृतिक पहचान की? देवनागरी का आग्रह, उर्दू से दूरी और खड़ी बोली का मानकीकरण केवल भाषाई निर्णय नहीं थे; इनके राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव भी थे। पत्रकारिता ने इन बहसों को जनता तक पहुंचाया।
आजादी के बाद : विस्तार हुआ, दबाव भी बढ़ा
1947 के बाद हिन्दी अखबारों की संख्या और पहुंच बढ़ी। लेकिन राष्ट्रीय मीडिया के प्रतिष्ठित हिस्से में अंग्रेजी का वर्चस्व लंबे समय तक बना रहा और हिन्दी को ‘वर्नाक्युलर’ कहकर देखा गया। इसके बावजूद ‘हिंदुस्तान’, ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘जनसत्ता’ जैसी परंपराओं ने हिन्दी पत्रकारिता में गंभीर संपादकीय लेखन और विश्लेषण की जगह बनाए रखी।
ग्रामीण साक्षरता बढ़ी, ऑफसेट छपाई आई, बहु-संस्करणों का दौर शुरू हुआ और दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, अमर उजाला जैसे अखबार सचमुच जन-अखबार बन गए। भाषा सरल हुई। शीर्षक छोटे हुए। स्थानीय रंग बढ़ा। छोटे शहर और कस्बे खबर के केंद्र में आए।
यह लोकतंत्रीकरण था, लेकिन इसके साथ व्यावसायीकरण भी आया। विज्ञापन, मालिकाना हित और सत्ता के दबाव ने पत्रकारिता के सामने नए सवाल खड़े किए। पाठक करोड़ों में पहुंचे तो यह सवाल भी सामने आया कि क्या साहस भी उसी अनुपात में बढ़ा?
यह कहना एकतरफा होगा कि पत्रकारिता पूरी तरह सत्ता या बाजार के आगे झुक गई। अनेक संपादकों और रिपोर्टरों ने जोखिम उठाए और आज भी उठाते हैं। लेकिन संस्थागत ढांचा बदल गया था। मिशन धीरे-धीरे उद्योग में बदल रहा था।टेलीविजन आया तो खबर ने शोर सीखा. 1990 के बाद निजी टेलीविजन चैनलों ने हिन्दी पत्रकारिता की भाषा और प्रस्तुति दोनों बदल दीं।
प्रिंट की धीमी और तर्कपूर्ण भाषा के सामने टीवी की तेज, दृश्य-केंद्रित और भावुक भाषा आई। ‘बड़ी खबर’, ‘देश को बता दें’, ‘तोड़ दिया सन्नाटा’ जैसे मुहावरे आम हो गए। एंकर की आवाज कई बार संपादकीय की जगह लेने लगी। बहस का अर्थ तर्क से ज्यादा शोर होने लगा। अंग्रेजी के शब्द तेजी से हिन्दी में घुसने लगे। नीति, बाजार, क्रिकेट और तकनीक से जुड़े अनेक शब्द बिना अनुवाद के इस्तेमाल होने लगे।
नये यथार्थ के लिए नए शब्द चाहिए थे - यह सही है। लेकिन अनुवाद की मेहनत कम होना दूसरी बात थी। हिंग्लिश शीर्षकों ने जगह बनाई। हिन्दी आसान हुई, लेकिन कई बार आसान भाषा और सतही भाषा के बीच की दूरी भी घट गई।
इंटरनेट : हिन्दी का सबसे बड़ा घर-बदलाव
फिर वह समय आया जिसने हिन्दी पत्रकारिता की पूरी दिशा बदल दी—इंटरनेट। भारत में इंटरनेट के शुरुआती दौर में अंग्रेजी का दबदबा था। अंग्रेजी वेबसाइटें थीं, अंग्रेजी ई-मेल था, अंग्रेजी सर्च था। हिन्दी के लिए स्क्रीन अभी पराई थी।
फॉन्ट की समस्या थी। सॉफ्टवेयर की समस्या थी। तकनीकी बाधाएं थीं। और सबसे बड़ी समस्या थी—विश्वास की कमी।
लोग पूछते थे—इंटरनेट पर हिन्दी कौन पढ़ेगा? इसी संदेह के बीच वेबदुनिया का जन्म हुआ। यह हिन्दी को इंटरनेट पर व्यवस्थित रूप से स्थापित करने वाले शुरुआती बड़े प्रयासों में था। डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी इसके संस्थापक-संपादक के रूप में जुड़े।
प्रिंट पत्रकारिता की लंबी पारी के बाद इंटरनेट पर जाना आसान फैसला नहीं था। नईदुनिया, धर्मयुग, नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर जैसी संस्थाओं में काम करने का अनुभव उनके साथ था। राजेंद्र माथुर, राहुल बारपुते, धर्मवीर भारती और विद्यानिवास मिश्र जैसे संपादकों की परंपरा से मिला पत्रकारिता का अनुशासन भी साथ था। उस समय कुछ लोगों को अखबार छोड़कर कंप्यूटर की दुनिया में जाना विचित्र लगता था। आज वही कंप्यूटर पत्रकारिता का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है। वेबदुनिया का महत्व केवल इस बात में नहीं था कि उसने हिन्दी खबरें इंटरनेट पर पहुंचाईं। उसने यह साबित करने की कोशिश की कि हिन्दी इंटरनेट की नागरिक भाषा हो सकती है।
ई-पत्र जैसी सेवाएं शुरू हुईं। हिन्दी में इंटरनेट उपयोग की संभावनाएं सामने आईं। हिन्दी सर्च के शुरुआती प्रयोग हुए। उस समय संसाधन सीमित थे, तकनीक मुश्किल थी और हर कदम पर प्रयोग करना पड़ता था। आज यह सब सामान्य लगता है। लेकिन उस समय देवनागरी को स्क्रीन पर टिकाना ही एक चुनौती था। वेबदुनिया और ऐसे शुरुआती प्रयोगों ने उस चुनौती का उत्तर दिया—हिन्दी टिकेगी।
और हिन्दी टिक गई।
डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी ने हिन्दी इंटरनेट पत्रकारिता पर शोध भी किया। इस तरह उनका संबंध इस माध्यम से केवल व्यावहारिक नहीं, अकादमिक स्तर पर भी जुड़ा। यह याद रखना इसलिए जरूरी है कि डिजिटल हिन्दी अचानक सोशल मीडिया और रीलों के दौर में पैदा नहीं हुई। उसके पीछे एक ऐसा समय था जब स्मार्टफोन नहीं थे, चौथी पीढ़ी का इंटरनेट नहीं था और क्लिक का कारोबार शुरू नहीं हुआ था। तब सवाल सिर्फ इतना था—देवनागरी स्क्रीन पर दिखाई देगी या नहीं? जवाब था—हां।
डिजिटल युग : रफ्तार बढ़ी, सांस छोटी हुई
स्मार्टफोन, सस्ता डेटा, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने हिन्दी पत्रकारिता को अभूतपूर्व पहुंच दी। छोटे शहरों की आवाज सामने आई। हाशिए के समुदायों को मंच मिला। स्वतंत्र पत्रकारों और फैक्ट-चेक करने वाले प्लेटफॉर्मों के लिए नए अवसर पैदा हुए। यह डिजिटल युग की बड़ी उपलब्धि है।लेकिन इसी के साथ पत्रकारिता का एक नया संकट भी पैदा हुआ। खबर लिखी कम और बेची ज्यादा जाने लगी। शीर्षक सूचना देने के बजाय क्लिक कराने का हथियार बनने लगा। आठ सौ शब्द की रिपोर्ट को कुछ दर्जन शब्दों में समेटने की मजबूरी आई। फिर 15 सेकंड की रील और कुछ सेकंड के वीडियो ने जगह ले ली।
ध्यान छोटा हुआ तो भाषा भी छोटी हो गई। वाक्य अधूरे हुए, विशेषण मोटे हुए और तथ्य कई बार पतले। ‘हिल गया देश’, ‘मचा कोहराम’, ‘लीक हो गया राज’ जैसे शीर्षक सूचना से अधिक उत्तेजना पैदा करते हैं। फेक न्यूज की गति कई बार सच से तेज होती है। एल्गोरिद्म आक्रोश और उत्तेजना को तेजी से फैला सकते हैं। राजनीतिक ध्रुवीकरण, मालिकाना नियंत्रण और विज्ञापन मॉडल ने मीडिया संस्थानों के सामने संपादकीय स्वतंत्रता के नए प्रश्न खड़े किए हैं।
लेकिन तस्वीर केवल नकारात्मक भी नहीं है।
डिजिटल माध्यम ने ऐसी आवाजों को भी जगह दी है जिन्हें पारंपरिक मीडिया में जगह मिलना कठिन था। लंबी वेब-कहानियां, स्वतंत्र पत्रकारिता, क्षेत्रीय यूट्यूब चैनल और फैक्ट-चेकिंग ने पत्रकारिता के नए रास्ते खोले हैं। यानी डिजिटल पत्रकारिता ने दरवाजे बंद नहीं किए; उसने दरवाजे बहुत ज्यादा खोल दिए हैं। अब चुनौती यह है कि किस दरवाजे से कौन-सी खबर अंदर आ रही है।
एआई के दौर में हिन्दी की अगली परीक्षा
अब पत्रकारिता एक और मोड़ पर है—कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के दौर में। एआई शीर्षक लिख सकता है, अनुवाद कर सकता है, सारांश बना सकता है और समाचार की स्क्रिप्ट तैयार कर सकता है। सुविधा बढ़ी है, गति बढ़ी है और उत्पादन की लागत कम हो सकती है। लेकिन इसके साथ एक खतरा भी है। मशीन की हिन्दी व्याकरण की दृष्टि से सही हो सकती है, लेकिन उसमें हमेशा वह स्थानीय गंध नहीं होती जो मनुष्य की भाषा में होती है—मुहावरा, लय, व्यंग्य, ठसक और प्रसंग का सूक्ष्म बोध। पत्रकारिता में भाषा केवल सूचना पहुंचाने का माध्यम नहीं है। भाषा स्वयं अर्थ बनाती है। यही कारण है कि एआई के दौर में पत्रकार की भूमिका समाप्त होने के बजाय और जटिल हो सकती है। मशीन सूचना को व्यवस्थित कर सकती है, लेकिन सूचना की विश्वसनीयता, संदर्भ और सामाजिक प्रभाव का सवाल मनुष्य से जुड़ा रहेगा।
भाषा बदली, तेवर बदले
- हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास को देखें तो भाषा और तेवर कभी अलग-अलग नहीं रहे।
- भारतेन्दु की भाषा—व्यंग्य की भाषा थी।
- द्विवेदी की भाषा—अनुशासन और संस्कार की।
- गणेश शंकर विद्यार्थी की भाषा—प्रतिरोध की।
- गांधी की भाषा—नैतिक आग्रह की।
- आजादी के बाद की भाषा—विस्तार और संस्थागत पत्रकारिता की।
- टेलीविजन की भाषा—गति और प्रदर्शन की।
- डिजिटल भाषा—क्लिक और तात्कालिकता की।
आज की हिन्दी पत्रकारिता में इन सबका कुछ न कुछ अंश मौजूद है। मगर पत्रकारिता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि पुरानी भाषा ज्यादा अच्छी थी और नई भाषा खराब। 1826 की हिन्दी आज वापस नहीं आ सकती और न आनी चाहिए। समाज बदला है, माध्यम बदला है, पाठक बदला है। बचाने लायक चीज केवल शुद्ध तत्सम शब्दावली नहीं है।
बचाने लायक तीन चीजें हैं—
तथ्य के प्रति निष्ठा।
शक्ति के सामने साहस।
और भाषा के प्रति सम्मान।
भाषा के सम्मान का अर्थ पांडित्य नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि शब्द को इतना सस्ता न कर दिया जाये कि उसका अर्थ ही खत्म हो जाए। जब हर घटना ‘सनसनी’ हो जाती है, तो सनसनी शब्द अपनी ताकत खो देता है। जब हर असहमति को किसी राजनीतिक गाली में बदल दिया जाता है, तो सार्वजनिक संवाद की भाषा दिवालिया होने लगती है।
सरलता लोकतंत्र है।
सतहीपन लोकतंत्र का क्षरण है।
आगे की राह
हिन्दी पत्रकारिता ने दो शताब्दियों में लंबी यात्रा की है। उसने खड़ी बोली को सार्वजनिक जीवन की सबसे प्रभावशाली भाषाओं में जगह दिलाई। उसने किसानों, मजदूरों, महिलाओं, दलितों, छोटे शहरों और कस्बों को समाचार के केंद्र में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन उसी पत्रकारिता ने कभी सत्ता का गुणगान भी किया, कभी सांप्रदायिक भावनाओं का व्यापार भी किया और कभी सत्य को मनोरंजन के नीचे दबाया।
इतिहास के दोनों पक्षों को साथ रखना होगा। आगे तकनीक और बदलेगी। एआई और लिखेगा। वीडियो और छोटा होगा। नए प्लेटफॉर्म आएंगे। शायद आने वाली पत्रकारिता की कल्पना आज करना भी कठिन हो।
लेकिन पत्रकारिता का मूल प्रश्न नहीं बदलेगा—
- कौन बोल रहा है?
- किसके हित में बोल रहा है?
- किस भाषा में बोल रहा है?
- और किस कीमत पर?
1826 में ‘उदंत मार्तंड’ के सामने साधनों की कमी थी। पाठक कम थे, डाक महंगी थी और आर्थिक संकट था। फिर भी उसने हिन्दी को नए माध्यम में उतारने की कोशिश की।इंटरनेट के शुरुआती दौर में भी साधन सीमित थे, तकनीक कठिन थी और भविष्य अनिश्चित था। फिर भी हिन्दी को स्क्रीन पर जगह दिलाने की कोशिश हुई। आज हमारे पास साधन हैं। पाठक करोड़ों में हैं। स्क्रीन हर जेब में है। अब कमी साधनों की नहीं है।
कमी उस जिम्मेदारी की हो सकती है, जो साधनों के साथ आनी चाहिए।
भाषा बदलना समय का धर्म है। तेवर बदलना भी समय का धर्म हो सकता है। लेकिन अगर तेवर ही बिक जाए, तो भाषा कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, पत्रकारिता अपना अर्थ खो देती है। हिन्दी पत्रकारिता का अगला अध्याय इसी तनाव के बीच लिखा जाएगा—बाजार और मिशन के बीच, शोर और सत्य के बीच, हिंग्लिश की सुविधा और सोच की जिम्मेदारी के बीच। कागज से स्क्रीन तक हिन्दी पहुंच चुकी है।
अब उसकी अगली चुनौती है - स्क्रीन पर सिर्फ तेज नहीं, विश्वसनीय भी बने रहना।
- डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
( गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी की अध्यक्षता में स्थापित हिन्दी विभाग ने यह संगोष्ठी रखी थी. इसमें प्रोफेसर रामेश्वर मिश्रा और डॉ. बिप्लब सिंह चौधरी- विश्व भारती विश्वविद्यालय; डॉक्टर उत्कर्ष सिन्हा, डॉ मनोज कुमार शुक्ला, (कोलकाता) डॉ मयंक भार्गव (सहरसा) ,डॉ. अर्जुन कुमार, डॉ. श्रुति कुमुद, प्रो. शकुंतला मिश्रा, कवि जयदीप चटर्जी ( कोलकाता), डॉ रंजना शर्मा (कोलकाता), डॉ राहुल सिंह, विश्व भारती), डॉ. श्रीकांत द्विवेदी, डॉ, बृजेन्द्र अग्निहोत्री, डॉ राजीव रंजन प्रसाद (अरुणाचल) डॉ.प्रमोद शर्मा- तेजपुर, डॉ राजू कुमार (दड़बोला) , प्रो. जगदीश भगत -( विश्वभारती), डॉ.भारतीय बसंत कुमार ड. सुभाष चंद्र राय, डॉ अनीता डगोरे (नई दिल्ली ), डॉ मयंक भार्गव - सहरसा और अनेक शोधार्थी, विद्यार्थी और शिक्षक शामिल हुए थे. #followerseveryone #nonfollower #hindi #media #patrakarita #journalism #bhasha #shantiniketan #hindivibhagy
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Translation in English :
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