Saturday, November 02, 2013

एक लाइन लिखने की ज़िम्मेदारी

वीकेंड पोस्ट के 02 नवम्बर  2013 के अंक में  मेरा कॉलम

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इस देश में अधिकांश लोगों के सिर पर बड़ी भारी ज़िम्मेदारी है। सिर्फ एक लाइन लिखवाने  की ज़िम्मेदारी। बस, एक लाइन लिखवा  दो, हो गई  ज़िम्मेदारी  ख़त्म !  यही स्टाइल है हमारा।  काम कितना भी बड़ा और महत्वपूर्ण हो, पल्ला झाड़ने का ये तरीका हमारी जीवन शैली बन चुका है। हर जगह आपको इसका नमूना देखने को मिलेगा :

--''यात्री अपने सामान की सुरक्षा के लिए खुद जवाबदार होगा''. लक्ज़री बसों तक में लिखा होता है. सामान को बस का कंडक्टर छत पर या नीचे बनी डिक्की में रखवा  देता है और यात्री बैठता है बस के भीतर।  अब वह कैसे संभालेगा सामान? पर लिख दिया तो लिख दिया और मुक्त हो गए सामान की सुरक्षा की जवाबदारी से. 

--''वाहन  की सुरक्षा चालक खुद करे.'' यह ब्रह्मवाक्य भी तमाम इमारतों के बाहर लिखा दिखता है। आप भले ही किसी काम से उस बिल्डिंग में गए हों, वहां चौकीदार  हो, उसने आपको टोकन दिया हो, पर ज़िम्मेदारी आपकी ही है. बिल्डिंग के मैनेजमेंट की, चौकीदार की कोई ज़िम्मेदारी नहीं। 

--''टूट-फूट की हमारी कोई जवाबदारी नहीं।'' यह अनमोल वचन भी यातायात पुलिस की 'रिकवरी' गाड़ियों पर लिखा होता है. यानी यातायात पुलिस का काम केवल चालान बनाना (और वसूली यानी 'रिकवरी' करना) ही है. पार्किंग की जगह पर अतिक्रमण क्या वाहन चालक हटवाएगा?  सड़कों से आवारा ढोर हटाने की नगर निगम की कोई ज़िम्मेदारी  नहीं?

--''पाठक इस समाचार पत्र में छपे विज्ञापनों की सत्यता की पड़ताल के बाद ही  कोई निर्णय करे, इस पर हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी।'' आजकल अखबारों में यह भी छपने लगा है। पहले तो मुझे लगा कि  शायद प्रिंटिंग की त्रुटि हो गई है और खबरों के बजाय विज्ञापन छप  गया है, होना भी यही चाहिए था क्योंकि आजकल अखबारों में जैसी खबरें छप  रही हैं, उससे तो यही लगता है. पर जब यही सूचना हर पेज पर छपी देखी  तो सवाल उठा कि विज्ञापन तुम छापो, करोड़ों रुपये की कमाई तुम करो और पुष्टि हर करें।  अखबार खरीदें भी और पढ़ने की यातना भी झेलें और विज्ञापनों  की सच्चाई की पड़ताल भी हम ही करें। …तो फिर आप क्या करोगे?

इलाज कराने अस्पताल में जाओ तो वहाँ इलाज के पहले दो काम कराये जाते हैं : 1.  इलाज के पैकेज का एडवान्स जमा और 2.  इलाज का डिक्लेयरेशन , जिस पर लिखा होता है कि अगर मरीज़ खुदा न खास्ता, खुदा  को प्यारा हो जाए जो इस अस्पताल के डॉक्टरों की, स्टाफ की, मालिकों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। जान मरीज़ की जोखिम में, लाखों चुकाएगा वह, तकलीफ भी भोगेगा वही और उसके घरवाले, लेकिन मोटी वसूली के बाद भी ज़िम्मेदारी अस्पतालवालों की नहीं। 

इस देश में सारी की सारी ज़िम्मेदारी हम नागरिकों की है. शुक्र इसी बात का है कि पुलिस थानों में जो भी होता हो, यह लिखने का चलन नहीं आया है  कि आपकी ज़िन्दगी की ज़िम्मेदारी आपकी खुद की है. स्कूलों-कॉलेजों में अभी ये लिखना बाकी है कि यहाँ आकर पढ़ना आप ही को है, हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं। …और  हाँ, नोटों पर अभी यह नहीं लिखा जा रहा है कि रिश्वत लेना और देना अपराध है, अपनी जोखिम से ही आप ये काम करें। 

यानी इस देश का आम  नागरिक अगर आज दुखी, शोषित, पीड़ित, ठगाया हुआ, उपेक्षित, व्यथित और लुटा-पिटा है तो इसके लिए कोई और ज़िम्मेदार नहीं है. हर जगह तो लिखा है कि ज़िम्मेदारी उसी की है. 

--प्रकाश हिन्दुस्तानी 
(वीकेंड पोस्ट के 02 नवम्बर 2013 के अंक में  मेरा कॉलम)

Tuesday, October 29, 2013

पुरुष को क्यों मानते हो दोयम?

एंटी कॉलम


वीकेंड पोस्ट के 26 अक्तूबर २०१३ के अंक में  मेरा कॉलम





( नोट : यह लेख महिलाओं के प्रति पूर्ण सम्मान व्यक्त करते हुए भारतीय समाज में पुरुषों की दशा बताने के लिए है, कृपया इसे नारी के सम्मान-असम्मान से जोड़ने का की कोशिश नहीं करें। )

कई बार लगता है कि पुरुष होकर  कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया है। कोई भी अखबार, रिसाला, वेबसाइट पर जाओ, पुरुषों को हर तरह से गैर-ज़िम्मेदार और स्वार्थी बताने के साथ ही बलात्कारी-व्यभिचारी, शोषक, नीच, दम्भी, कुटिल, धूर्त, परजीवी और न जाने क्या-क्या बताना फैशन हो गया है. जितनी भी घटिया उपमाएं हैं, सब की सब पुरुष प्रजाति के नाम ! क्यों? क्या स्त्रियां अपनी मर्जी से स्त्रियां और पुरुष अपनी मर्जी से पुरुष बने हैं? दोनों को प्रकृति ने बनाया है, दोनों ही सम्माननीय हैं। पुरुष भी, स्त्रियाँ भी।  फिर बीच में यह जेंडर की लड़ाई क्यों? किसकी दुकान सजाने के लिए? इससे क्या वाकई किसी का भला होगा?

पुरुषों को गाली देना फ़िज़ूल है। स्त्रियाँ घर बनाने में योगदान देती हैं तो  क्या पुरुष घर को चलाने  में योगदान नहीं देते?(अपवाद छोड़कर) अगर कोई कहे कि  स्त्रियाँ अपने मर्दों (पति, पिता, भाई, प्रेमी आदि) की कमाई पर ऐश करती हैं तो क्या गलत बात नहीं होगी? नारी पूजनीय थी, है और रहेगी लेकिन पुरुष को भी वह सम्मान अवश्य मिले, जिसका वह हक़दार है. पुरुष द्वारा  उत्पीड़न की बातें करनेवाले   नेशनल  क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की यह रिपोर्ट ज़रूर देखें कि रोजाना 168 विवाहित पुरुष 'विभिन्न कारणों से' आत्महत्या करते हैं, और यह संख्या विवाहित स्त्रियों की तुलना में करीब दो गुनी है।  दसियों साल से आत्म हत्या में पुरुषों  की संख्या बढ़ती ही जा रही है। पुरुषों की आत्महत्या हर साल 5. 6 की दर से बढ़ रही है जबकि स्त्रियों में यह प्रतिशत 1.  4 है. यानी पुरुषों से एक चौथाई। (देखिये ग्राफ) आत्महत्या के ये दोनों ही आंकड़े दुखद हैं।

भारतीय दंड संहिता की धारा '498 -ए' के तहत हर साल दहेज़ के 58  हजार से भी ज्यादा  मामले दर्ज किए जाते हैं। इन लोगों में केवल नौकरीपेशा, व्यवसायी, मज़दूर, एन आर आई  ही नहीं; फ़ौज और पुलिस  के अफसर और यहाँ तक कि न्यायाधीश तक शामिल हैं।  आंकड़े देखें तो औसतन जहां हर 19 मिनट में देश में किसी व्यक्ति की हत्या होती है, वहीं हर 10 मिनट में एक विवाहित व्यक्ति आत्महत्या करता है।   हर साल  एक लाख से भी ज्यादा लोग झूठे मामलों में गिरफ्तार होते हैं। हर 4  मिनट में एक पुरुष को  दहेज मांगने के झूठे मामले में फंसा दिया जाता है।  हर ढाई  घंटे में एक बुजुर्ग  को दहेज की मांग के झूठे आरोप में पकड़ लिया जाता है। यहाँ तक कि रोजाना  एक निर्दोष बच्चा इसी धारा में गिरफ्तार होता है, हर २३ मिनट में कोई न कोई बेक़सूर महिला भी 'धारा 498 ए' के तहत गिरफ्तार होती है।  हर पांच मिनट में एक निर्दोष सलाखों के पीछे पहुंचता है। ऐसा लगता है कि पुरुष विरोधी कानूनों के पीछे परिवार की सत्ता को ख़त्म करके व्यक्तिवादी सत्ता की स्थापना करना बाज़ार का लक्ष्य है. पुरुषों को गाली देकर वाहवाही लूटना सोशल वेबसाईट्स पर शगल बनता जा रहा है।

 इस मामले में ऐसे अनेक प्रकरण सामने आ चुके हैं कि   अपनी दुश्मनी निकालने के लिए कुछ लोग दहेज माँगने  के गलत आरोप लगा कर बेक़सूर  लोगों को फंसा देते हैं.  हालात इतने खराब हो गए कि एक मामले में न्यायमूर्ति  अशोक भान और और न्यायमूर्ति  डी.के. जैन ने को यहाँ तक कहना पड़ा कि   सेक्शन '498  ए' को दहेज के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए लागू किया गया था न कि मासूम व निर्दोष लोगों को फांसने के लिए। आईपीसी की धारा '498 -ए' के दुरुपयोग के मामले भी सामने आने लगे हैं ।इस कानून के तहत दर्ज मामला गैर जमानती और दंडनीय होने के कारण और भी उलझ जाता है। आत्मसम्मान वाले व्यक्ति के लिए यह काफ़ी घातक हो गया है, जब तक अपराध का फ़ैसला होता है जेल में रहते-रहते वह इस तरह खुद को बेइज्जत महसूस करता है कि मर जाना पसंद करता है, इंदौर में भी ऐसे प्रकरण सामने आ चुके हैं जब झूठे मामानों में फंसे बेक़सूर पुरुष ने आत्महत्या कर ली.  आत्मसम्मान वाले आदमी के लिए एक बार गिरफ्तार हो जाना काफी घातक होता है। इस क़ानून में एक गुनाहगार को सजा दिलाने के लिए हजारों बेक़सूर लोगों को फंसाना आम हो गया है.
इसी कारण दहेज़ विरोधी कानून को 'लीगल टेररिज्म' तक कहा जाने लगा है. दहेज़ लेना और देना दोनों ही गैरकानूनी है तो फिर केवल दहेज़ माँगनेवाले ही क्यों जेल में बंद किये जाते हैं?

अगर हम सचमुच अच्छा समाज बनाना चाहते हैं तो हमें स्त्रियों और पुरुषों, दोनों को ही इज़्ज़त देनी होगि. जेंडर के नाम पर अगर स्त्रियों से नाइंसाफी होती है तो वह गलत है ही, लेकिन पुरुषों से नाइंसाफी करके भी अच्छा समाज नहीं बनाया जा सकता। फैशन और अपने फायदे के लिए ऐसी लड़ाइयाँ लड़ी जा रही हैं, जो बंद होना ज़रूरी है.

--प्रकाश हिन्दुस्तानी
(वीकेंड पोस्ट के 26 अक्तूबर 2013 के अंक में  मेरा कॉलम)


Saturday, October 19, 2013

मुहूर्त का काम !

('वीकेंड पोस्ट' के 19 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित)



मुहूर्त का काम  !



भारत में सब काम मुहूर्त देखकर शुरू होते हैं। लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों, ज़्यादातर  काम बिगड़ ही जाते हैं।  हर फिल्म का मुहूर्त होता है पर ऐसी  फ़िल्में दस प्रतिशत ही बनती हैं जो हिट  होती हैं।   हर मकान का निर्माण मुहूर्त देखकर शुरू होता है,  और अधिकांश  मकान,   मकान ही रह जाते हैं घर नहीं बन पाते। वाहन खरीदनेवाले भी मुहूर्त देखकर जाते हैं। पर क्या ऐसे वाहनों से कभी कोई दुर्घटना नहीं होती? दुकानें , कारखाने, फैक्टरियां आदि भी मुहूर्त देखकर शुरू होती हैं , 80 फ़ीसदी ठप हो जाती हैं. लगभग सभी  नेता चुनाव अभियान शुरू करते हैं  तो मुहूर्त देखकर। लेकिन कामयाब तो  कुछ ही हो पाते हैं। …. और रही बात शादियों की, तो अधिकाँश मुहूर्त देखकर ही होती हैं और उनका हश्र सभी जानते हैं।  खासकर पति लोग। 
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जो काम मुहूर्त देखकर नहीं होते, उनकी कामयाबी का प्रतिशत कुछ ज्यादा ही होगा।  चोर मुहूर्त नहीं देखते, ज़्यादातर सफल होते हैं। रिश्वत मांगने वाले और देनेवाले दोनों ही कहाँ मुहूर्त के चक्कर में पड़ते हैं? मौक़ा आया तो मांग ली, मज़बूरी अड़ी तो दे दी। मोहर सिंह-माधो सिंह कौन सा मुहूर्त देखकर डाकू बने थे और कौन सा मुहूर्त देखकर सरेंडर करने गए थे? अवैध निर्माण करनेवाले भी कहाँ मुहूर्त देखते हैं, जी में आया और कर डाला।  फिर उन्हें तोड़नेवाले कौन सा मुहूर्त देखकर तोड़ते हैं? दबाव आया तो तोड़ डाला।  नहीं भी तोडा तो क्या? बाबा लोग जो पूरे गाँव को मुहूर्त की पुड़ियाएं बाँटते रहते हैं, कहाँ मुहूर्त देखते होंगे? देखते होंगे और फिर भी फंस जाते हैं तो इसे क्या कहेंगे? बड़े बड़े घोटाले करनेवाले भी कहाँ मुहूर्त के गेर में पड़ते हैं?   मुहूर्त की ऐसी तेसी करनेवालों में मोहब्बत करनेवाले अव्वल हैं।  मोहब्बत करनेवाले  कहाँ मुहूर्त देखने जाते हैं , लोग कहते हैं कि यह अपने आप होनेवाली दुर्घटना है , ऐसी  चीज़ है, जिसका मुहूर्त हमेशा सही ही रहता है.  ऐसा नहीं कि मुहूर्त देखा और लग गए अभियान में। 


इंदौर में हर काम मुहूर्त देखकर किया जाता है। क्यों ? क्यों का क्या? मुहूर्त देखा जाता है, तो बस देखा जाता है।  परम्परा है।  सब देखते हैं तो यहाँ भी देखा जाता है। सड़क का मुहूर्त, फिर भूमिपूजन। नाली बनाने का मुहूर्त, फिर भूमिपूजन। खम्बे लगाना हो , फुटपाथ बनाना हो , बस चलाना हो , बगीचा लगाना हो,  भाषण-प्रवचन-पूजन-रैली-आयोजन करना हो , पहले मुहूर्त देखो और फिर शुरू करो। इसका एक खास मकसद होता है लोगों को मूर्ख बनाने का।  फलां काम का ऐलान हो चुका था , काम शुरू हो गया क्या ? नहीं , मुहूर्त हो चुका  है, पूजा भी हो गयी है, काम जल्द शुरू होगा…। हाल यह है कि हर काम का मुहूर्त निकल चुका , पूजा हो चुकी और काम ? वह भी हो ही जायेगा. 

मुहूर्त बतानेवाले कहते हैं कि मुहूर्त का मतलब होता है किसी भी  काम को शुरू करने की सबसे शुभ घड़ी।  यह सबसे शुभ घड़ी ब्रह्म मुहूर्त मानी  गयी है। यह ब्रह्म मुहूर्त दो घड़ियों के बराबर होता है यानी करीब 48 मिनट के बराबर। सूर्योदय से करीब दो घंटे पहले यह घड़ी सुबह सुबह 4  बजकर 24 मिनट से 5 बजकर 12 मिनट पर होती है. दूसरा सबसे अच्छा मुहूर्त माना  गया है  जीव या अमृत मुहूर्त को और यह होता है रात 2 बजे से 2 बजकर 48 मिनट तक। यानि ये दोनों ही घड़ियाँ रात में गुज़र जाती हैं और लोग सोते रह जाते हैं।   फिर जो भी बचता है, उसी में कुछ न कुछ बहाना बनाकर काम शुरू कर देते हैं। 

मेरा निवेदन है कि हर घड़ी शुभ है।  काम शुरू करना ही हो तो।  वरना मुहूर्त तो बहाना होता है। बस। 

--प्रकाश हिन्दुस्तानी 
('वीकेंड पोस्ट' के 19 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित)

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ये रहे मेरे फेसबुक कमेंट्स

('वीकेंड पोस्ट' के 5 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित)


ये रहे मेरे फेसबुक कमेंट्स 

फेसबुकी दोस्तों का सन्देश था कि बहुत दिनों से फेसबुक पर दिखाई नहीं दे रहे हो, क्या सब ठीक तो है? बिलकुल ठीक है भय्या। पर क्या करूँ , दोस्त लोग जैसे फोटो चिपकाते हैं, जैसे कमेन्ट लिखते हैं, अगर मैं उसके जवाब में  मन की बातें लिखने लग जाऊं तो  एक भी मित्र फेसबुक पर बचेगा नहीं।  मैं ये रिस्क लेने से डरता रहा और    गैरहाज़िर रहा।  अब कुछ हिम्मत जुटाकर फिर  आया हूँ। कम लिखे को ज़्यादा समझना .
दो अकाउंट हैं जिनमें मेरे करीब दस हज़ार मित्र हैं फेसबुक पर. हरेक की पोस्ट पर कमेन्ट लिखना संभव नहीं है.  कहीं सच्ची बात न निकल जाए इसलिए भी डरता हूँ।  अपनी सुविधा और सम्मान के लिए मैं यहाँ कुछ कमेन्ट लिख रहा हूँ, कृपया अपनी पसंद और सुविधा के अनुसार यह कमेन्ट कॉपी पेस्ट कर लीजिएगा। फिर मेरी टाइमलाइन में या मैसेज बॉक्स में मत लिखना कि मैं आपसे मुखातिब नहीं।  ये रहे मेरे ईमानदार कमेंट्स, मेरे इन कमेंट्स में से जिसे भी चाहो अपनी पोस्ट के नीचे चिपका लो :

--ये सब टीपा-टीपी का धंधा बन्द  करो यार। 

--तुम घूमने  विदेश गए हो तो मैं क्या करूं बे?

--क्या चीज़ मारी है।  कहाँ से चोरी की?

--हरामी, फर्जी कॉमरेड ! मुझे तेरी औकात मालूम नहीं क्या?

--तू क्या रजनीकांत का बाप है?

--वाह, क्या फोटो है यार! क्या साथ में खड़ी वो सुन्दर सी औरत आपकी बीवी है? नहीं, भाभी जी 
तो नहीं है ये।  कोई चक्कर है क्या?

--फोटो देख लिया।  पता चल गया कि तुमने नयी गाड़ी खरीद ली है। 

--ये गाड़ी क्या तुमने अपनी कमाई से खरीदी है? बाप की कमाई पर कब तक इतरायेगा बच्चू?

--तू तो स्साले, है ही बड़ा कम्यूनल !

--घुस जा पप्पू के पेंट में। 

--मोहतरमा, आपने कविता किसी और की मारी है और फोटो हीरोइन का चिपका दिया है. कोशिश अच्छी है, किसी बहाने तो लोगों ने लाइक किया। 

--फेसबुक पर आकर प्रवचन लिख रहा है हरामखोर ! क्या मुझे पता नहीं कि तेरी औकात क्या है?

--कितने  रुपये में नेताजी के लिए रोज रोज कमेन्ट लिख है?

--मुझे पता है नेताजी, कि कंप्यूटर और  इंटरनेट  के मामले में आप निहायत गधे हैं, लेकिन दुकान  सजाने की कोशिश में आपने गधों की ही सेवा लेना शुरू कर दी है। 

--मुझे पता है ये फोटो कैटरीना है और तुम जो भी हो कैटरीना कैफ तो नहीं ही हो। अपना असली फोटो लगाने में तेरे को शर्म आती है क्या? या तू सूर्पनखा है?

--मैडम जी, आप ये जो रोजाना फेसबुक पर आकर मर्दों को गरियाती रहती हैं, इसीलिये तो कोई फंसता नहीं तुमसे। तुम तो आजीवन प्यासी आत्मा ही रहोगी। 

--तुम कैसा लेखन करती हो  देवी? मुझे लगता है कि विभूतिनारायण राय ने जो कमेन्ट किया था वो आपके और आप जैसों के लिए ही था. 

--अच्छी नौकरी है, मोटी तनख्वाह है, माल कमा रहे हो, ऐश कर रहे हो और यहाँ आकर ज्ञान बाँट रहे हो?

--मुझे पता है कि तुम एक नंबर के नीच, कमीने, घटिया, तुच्छ, हेय, गिद्द हो. यहाँ फेसबुक पर मुंह मारने  की कोशिश कर रहे हो. तेरे को तो सुअरिया  भी घास न डाले।

--पाखंडी, तेरा सच्चाई और धर्म से क्या लेना देना है?

(फेसबुक के सभी  सच्चे मित्रों से क्षमायाचना सहित )

--प्रकाश हिन्दुस्तानी 
('वीकेंड पोस्ट' के 12 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित)

http://www.prakashhindustani.com/

Wednesday, October 09, 2013

जो कष्ट उठा उठा कर मरे, वो कस्टमर !!!

मेरा  'एंटी कॉलम' फिर से शुरू  हो  गया 





('वीकेंड पोस्ट' के पहले अंक से मेरे बहुचर्चित रहे स्तंभ 'एंटी कॉलम' की शुरुआत फिर हो गयी . यह कॉलम दैनिक भास्कर में पहले हिन्दी में लिखा करता था बाद में इसे टाइम्स ऑफ इंडिया के इंदौर संस्करण ने लंबे समय तक प्रकाशित किया. दैनिक हिन्दुस्तान के सभी संस्करणों में हर रविवार को 'जीने की राह' शीर्षक से कॉलम लिखने और अन्य कारणों से यह लेखन नहीं हो पा रहा था, लेकिन श्री रमण रावल के संपादन में शुरू हुए 'वीकेंड पोस्ट' में संपादक के आग्रह पर इसे फिर से लिखना शुरू कर दिया है.

 अब आप इसे हर हफ्ते मेरे इस ब्लॉग पर भी देख सकेंगे.)


दीपावली के पहले घर की पुताई शुरू हुई ही थी कि श्रीमतीजी ने कहा  --दीवार पर लगा टीवी सेट उतरवा दो, वर्कर लोग गन्दा न कर दें ; पुताई के बाद फिर लगा देना। आज्ञाकारी पति के रूप में मैंने  तत्काल हाँ भरी और लगा टीवी सेट को उतारने. पर यह क्या, वो तो दीवार में नट - बोल्ट से पक्का फिट किया हुआ था. मैं समझ गया कि अपने बूते की बात नहीं है. मौका मुआयना करने के बाद मैंने जवाब दिया -- बहुत भारी  है, कुछ टूट फूट  गया तो फालतू नुक्सान हो जाएगा,  इलेक्ट्रिकवाले को ही बुलाना पड़ेगा।

--तो बुला लो।  फिर आदेश। 

मैंने स्कूटर उठाया और निकल गया इलेक्ट्रिकवाले के यहाँ।  पहली दुकान पर ही जवाब मिला -- हम ये काम नहीं करते, लोगबाग बाद में गले पड़  जाते हैं। कोई और जगह ढूंढो। तीन-चार दुकान पर पूछताछ की, पर मुआ कोई भी राजी नहीं हुआ इस छोटे से काम के लिए. इसी बीच घर से मोबाइल  पर पूछताछ हुई कि कहाँ घूम रहे हो, घर में पुताई चल रही है और उस एक कमरे का काम रुका  पड़ा है।  एक ही काम तो कहा था, वह भी   नहीं हो पा रहा है तुमसे.     मैंने सफाई दी कि इलेक्ट्रिकवाले राजी नहीं हो रहे.… झल्लाई हुई आवाज़ आई कि टीवी शोरूम से ही किसी को बुला लो , सौ-दो सौ लेगा,  पर टीवी तो उतारकर लगा देगा।  मैंने हामी भरी और घुमाया स्कूटर  टीवी शो रूम की तरफ़. पर यह क्या! यहाँ तो ताला पड़ा था. पूछताछ की तो पता चला कि आज गणेश विसर्जन हो रहा है, शोरूम बंद है. मैंने कहा --भैया, झांकी तो रात को निकलेगी, अभी  काहे  की छुट्टी? जाहिर है मैं गलत व्यक्ति से गलत बहस कर रहा था. खैर, तीन चार शोरूम के चक्कर लगाने के बाद मुझे टीवी का एक शो रूम खुला मिल ही गया। उसे देख मुझे वैसा ही खुश  हुआ जिसे मुहावरों में 'बांछें खिलना' कहते हैं। 

शो रूम में झटके से घुसते हुए मैंने कहा -- दीवार से टीवी उतारना और लगाना है, क्या कोई  टेक्निकल बन्दा है?

--ओह, टीवी शिफ्ट करना है? कहाँ से कहाँ ले जाना है? किस लोकेशन में?

--कोई लोकेशन वोकेशन नहीं, पुताई हो रही है, पुताई के बाद फिर लगा देना है। 

--मतलब दो विजिट लगाना  पड़ेगी।  एक विजिट के 500, दो के 1000  लगेंगे। 

--1000 रुपये …मेरी आँखें फटी की फटी रह गई -- मैं कोई पुराना टीवी खरीदने नहीं, उसी टीवी को, उसी सामान के साथ, उसी जगह फिट करना है, बस। दीवार पर पुताई होते ही। 

शो रूम मैंनेजर  सज्जन लगा रहा था, मेरे अचरज पर उसे कोई अचरज नहीं हुआ। सामान्य से अंदाज़ में पूछने लगा --कौन सा टीवी है ?

--सोनी कंपनी का ब्राविया।  

--पर ये तो सैमसंग का शो रूम है सर.  सोनी कंपनी के शो रूम में जाइये. 

--आप ये काम नहीं करवा सकते?

--बिलकुल नहीं।  जिस कंपनी का माल खरीदा, सर्विस भी तो उसी की लगेगी ना। 

मैं खिसिया गया. अपनी समझ पर बगैर झेंपे पूछ ही लिया कि  सोनी का शो रूम कहाँ है?

 ये एयर कंडीशंड   शो रूम वाले बड़े ही सज्जन प्रोफेशनल लोग होते हैं बेचारे।  काम करें या न करें , बोलते बहुत अच्छा है,  उन्होंने विनम्रता से पता बताया , यह भी कहा कि हमारे लायक कोई सेवा हो तो बताएं।  हमारे ग्राहक होते तो तत्काल सेवा देने की 'सोचते', वगैरह वगैरह।  मैंने भी शरीफ ग्राहक की तरह धन्यवाद दिया और  ढूँढते-ढूँढते  सोनी टीवी शो रूम पहुंचा।  जान में जान आई। अपनी मूर्खता पर तरस भी आया कि जिस कंपनी का टीवी खरीदा उसी कंपनी के पास जाना था ना। इतना सा कॉमन सेन्स तो होना ही चाहिए। सोनी के शो रूम में  जाकर मैंने  फिर अपना टेप बजाया। टीवी दीवार से उतारना और फिर फिट करना है आदि आदि। 

मैंने पहले  ही लिखा है न कि  ये एयर कंडीशंड  शो रूम वाले बड़े ही सज्जन प्रोफेशनल लोग होते हैं बेचारे।  काम करें या न करें , बोलते बहुत अच्छा है, मैनेजर ने  विनम्रता से कहा -- हो जाएगा, पर आप शो रूम आ गए हैं , आपको हमारे सर्विस सेंटर पर जाना पड़ेगा जो ए बी रोड पर है, इंडस्ट्री हाउस के पास. उन्होंने मेरा ज्ञान यह कहकर भी बढ़ाया कि सोनी बहुत ही बढ़िया और बड़ी कंपनी है और आफ्टर सेल्स सर्विस भी लाजवाब देती है. क्वालिटी मेंटेन करने के लिए और मुझ जैसे दुखियारों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती है।  


थोड़ा  दुखी, थोड़ा क्षुब्ध और थोड़ा विचलित मैं सोनी सर्विस सेंटर की तरफ रवाना  हुआ। वहां पहुंचकर देखा कि हाट  बाजार जैसा नज़ारा था. कोई किसी को नहीं पूछ रहा था. कुछ लोग थे, जो बहुत बिजी थे. कुछ लडके-लड़कियाँ टाइप कर्मचारी भी थे, जो हंसी- ठठ्टा कर रहे थे, एसएमएस, फेसबुक, वाट्सअप में संघर्ष कर रहे थे और दिखावा कर रहे थे कि वे भी बिज़ी हैं। खैर किसी तरह मुझे एक कर्मचारी ने समय दिया।  मैंने फिर अपनी पूरी बात उससे कही। वह मुस्कराया और फिर बोला -- सर, आप यहाँ क्यों आये? आपका काम तो एक फोन से ही हो जाता।  आपको यहाँ आने की  ज़रुरत ही नहीं थी।  मेरा मनोबल टूट सा गया, बहुत स्मार्ट समझते हो अपने आप को, मैंने मन ही मन खुद को कोसा. इतना सा भी नहीं पता कि अंतर्राष्ट्रीय  स्तर की सेवा कैसी होती है !

फिर उस कर्मचारी में मुझे एक विजिटिंग कार्ड दिया और ज्ञान बढ़ाया  कि इस पर एक टोल फ्री नंबर है -- 1800 103 7799 .मैंने पूछा  कि क्या मोबाइल  से यहाँ कॉल हो सकता है? मेरी नासमझी पर वह मुस्कराया और बोला -- हाँ, हो सकता है.  उसने यह भी दोहराया कि  इस नंबर  पर फोन कर देने मात्र से ही काम हो जाता है. पैसे भी नहीं लगते फोन के. मैंने उससे पूछा कि मेरा टीवी दीवार से कब तक उतार दिया जाएगा ? उसने कहा --इस टोल फ्री नंबर पर कॉल कर दीजिए। मैंने कहा -- सर्विस सेंटर पर आ ही गया हूँ तो कॉल की क्या ज़रुरत?

उसने कहा--ज़रुरत है। आप यहाँ कॉल करके केस दर्ज कराएँगे फिर हमें यहाँ से ईमेल आएगा फिर ही हम काम कर सकते हैं। हम यहाँ अपनी मर्ज़ी से कोई सर्विस नहीं दे सकते. हर काम का हिसाब रखना पड़ता है. हर काम का शुल्क तय है। 

मेरी नैतिकता जवाब दे गयी थी।  मैंने कहा --यार, तुम टीवी दीवार से उतरवा दो, जो भी शुल्क है, ले लेना।  बिल वगैरह की हमें ज़रुरत नहीं।  

 -- ऐसा कैसे हो सकता है? उसने भी यह कहकर मुंह फेर लिया कि सोनी बहुत ही बढ़िया और बड़ी कंपनी है और आफ्टर सेल्स सर्विस भी लाजवाब देती है. क्वालिटी मेंटेन करने के लिए और मुझ जैसे ग्राहकों  की सेवा के लिए हमेशा तैयार रहती है।  

झल्लाया सा मैं सर्विस सेंटर से बाहर आया. सोचा था कि फोन ही करना है तो बाहर से फोन करके शिकायत दर्ज करा देनी चाहिए। इसी बीच श्रीमती जी का फोन बार बार आ यहाँ था, जिसने झल्लाहट और बढ़ा  दी थी। इतने से काम के लिए इतने घंटे लगा दिये. खरी खोटी सुनाने के मूड में आकर मैंने  टोल फ्री नंबर  -- 1800 103 7799 पर फोन लगाया।  सोचा था सर्विस मैनेजर से बात करके सारी दिक्कतें बताकर ही दम लूँगा।  मैंने कॉल किया उधर से काफी देर बाद जवाब आया --वेल्कम टु सोनी कस्टमर सर्विस सेंटर। थैंक यू फॉर कालिंग। योर कॉल में बी रेकार्डेड फॉर बेटर  सर्विसेस।   इफ यू आर कस्टमर, डॉयल वन, इफ यू आर डीलर, डॉयल टू. 

मैंने 1 प्रेस किया। फिर आवाज़ आई --फॉर इंग्लिश, प्रेस 1, फॉर हिन्दी प्रेस 2, फॉर बांग्ला प्रेस 3 …… मैंने  2  नंबर दबाया. सोचा --अब हड़का कर ही दम लॊङ्ग. हिंदी में मुंहजोरी की आदत भी है ही। इधर से फिर टेप बजा --डीलर का पता जानने के लिए 1 , तकनीकी सेवा के लिए 2 ,  डेमो रजिस्ट्रेशन के लिए 3 , उत्पादों की जानकारी के लिए 4 , दुबारा  विकल्प जानने  के लिए 5  और मेन  मैन्यु में जाने के लिए 6  डायल करे. मैं भी बहुत स्मार्ट हूँ, मैंने  तकनीकी सेवा के लिए  फट से 2  नंबर डायल कर दिया। फिर टेप चालू ---वायवो नोट के लिए फलाना, हैंडीकैम के लिए फलाना, होम थियेटर के लिए फलाना, प्ले स्टेशन के लिए फलाना, एल सी डी के लिए फलाना, कोई भी उत्पाद के लिए  फलाना , दुबारा विकल्प सुनाने के लिए फलाना और मेन मैन्यु में आने के लिए ढिकाना नंबर प्रेस करें। 

आठ-दस मिनिट संघर्ष के बाद मैं किसी तरह सम्बंधित विभाग में बात कर पाया। उस ऑपरेटर ने कहा कि  आप गलत जगह पर जुड़ गए हैं लेकिन चिंता की बात नहीं, मैं आपकी  सही विभाग में सही व्यक्ति से बात करा रहा हूँ. वह भी यह बताना नहीं भूला कि  सोनी बहुत ही बढ़िया और बड़ी कंपनी है और आफ्टर सेल्स सर्विस भी लाजवाब देती है. क्वालिटी मेंटेन करने के लिए और मुझ जैसे दुखियारों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती है। 

उसने कृपा की।  मैं सही व्यक्ति से जुड़ गया था. मैंने खीजते हुए पूछा --मुझे मेरा वाल माउंटेड  टीवी दीवार से उतारना है, उतरवा दोगे ?

--बिल्कुल सर। कौन सा टीवी है?
--सोनी का ही है. 
--वो तो सही है, एल सी डी है या डी  वी दी ?
--एल सी डी है. 
--कितने साइज़ का है? कौन सा मॉडल  है?
--३२ इंच का है, मॉडल पता नहीं 
--कहाँ से खरीदा था ?
--यहीं, इंदौर से ही.
--डीलर कौन था?
--सोनी का टीवी है है तो  सोनी के ही डीलर से लिया होगा। 
--वो तो ठीक है कब खरीदा था?
मेरा पारा चढ़ गया ---कब खरीदा, पता नहीं, किससे खरीदा पता नहीं, बिल कहाँ है पता नहीं। …. --क्या मेरा काम हो सकता है?
उसने फिर पुलिसिया अंदाज़ में पूछताछ शुरू की -- आपका नाम , कहाँ रहते हैं, वगैरह वगैरह। 
खीजकर मैंने कहा की मेरा नाम ये है, पता ये, पिता का नाम, डेट ऑफ़ बिर्थ ये, पेन कार्ड-ड्राइविंग लाइसेंस आदि का नंबर पता नहीं।  …और भी कुछ पूछना  है --मेरी हाईट, मेरे बच्चों के बर्थ डे ? मज़ाक बना दिया आपने यार ?

--नाराज़ न हों, अगर वारंटी या गारंटी पीरियड में हो तो बेहतर होता।  कोई बात नहीं, हमारा सर्विस इंजीनियर आपका काम कर देगा. उसकी फीस होगी 400  रुपये प्लस सर्विस टैक्स। करीब 500 रुपये का खर्च आयेगा. 
--कितना भी आये, काम तो कर ही दो।  दे देंगे 500  रुपये और। 
उसने मुझे एक नंबर बताया जो 15728278 था।  उसने यह भी कहा कि यह मेरा 'कस्टमर सर्विस रिक्वेस्ट नंबर' है. उसी के विजिटिंग कार्ड पर मैंने उधार के पेन से नंबर नोट किया फिर शराफत से पूछा --- काम कब होगा?
--जैसे ही हमारा सर्विस  इंजीनियर फ्री होगा, लेकिन आप श्योर रहें 48 घंटे के भीतर हो जाएगा। 
--48 घंटे और वह भी 500  खर्च के बाद?
--कोशिश करेंगे की कल रात तक आपका काम हो जाए; उसने एहसान करने के अंदाज़ में कहा. 
--प्लीज़ जल्दी करा दीजिए।  मैंने कहा। मेरे सामने बेबसी थी।  इंटरनेशनल ब्रांड का माल वापरनेवाले की.  इसी  दौरान श्रीमती जी के कॉल बार-बार आते रहे. मैंने रिसीव नहीं किये. सोचा --घर जाकर ही अपनी कामयाबी की दास्तान बताऊंगा।   

…तेज़ गति से गाड़ी दौड़ाता हुआ मैं घर पहुंचा। श्रीमती जी बोलीं -- कहाँ उलझ गए थे? तुमसे तो एक  छोटा सा काम भी नहीं होता…. कब से छुट्टे के लिए परेशान हो रही हूँ।  50 रुपये मनीष को देना है। 
-कौन मनीष?
-- इलेक्ट्रिशियन।  इसी को बुलावा लिया और इसी ने  टीवी दीवार से उतारा है और फिर लगा भी देगा. आप तो पता नहीं कहाँ गायब थे। 

मैं अवाक खड़ा रह गया।  इंटर नॅशनल ब्राण्ड के सर्विस इंजीनियर का काम इस मनीष ने कर दिया।  50 रुपये में।  मेरी चिंता यह थी कि सोनी कंपनी के इंजीनियर को मैं क्या जवाब दूंगा ? उनके टोल फ्री नंबर पर दुबारा  कॉल करने की   हिम्मत अब मुझमें नहीं बची थी। 
---प्रकाश हिन्दुस्तानी 
('वीकेंड पोस्ट' के 5 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित)

http://www.prakashhindustani.com/

Wednesday, July 17, 2013

हिंदी के क्षेत्रीय समाचार चैनलों की प्रेत बाधा

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 नवंबर में चार हिंदीभाषी राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे. 2014 में लोकसभा और फिर कुछ राज्यों में नगर पालिका-नगर निगम के वोट डलना हैं. इसीलिये तमाम बिल्डर, 'चीटफंडी', खनन माफिया चैनल लेकर आ रहे हैं.  मध्यप्रदेश में हिंदी के रीजनल चैनल दर्जन भर से ज्यादा हो गए हैं और और भी आते ही जा रहे हैं. अच्छा होता अगर इससे पत्रकारिता और पत्रकारों का कुछ भला होता लेकिन ऐसा नज़र नहीं आ रहा है  
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हिंदी के क्षेत्रीय समाचार चैनलों की प्रेत बाधा 

क्या हिंदी में क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल का सञ्चालन हो सकता है?  मेरा मानना है नहीं . केवल नहीं .  आप कहेंगे कि अभी हो ही  रहा है तो मैं   नहीं क्यों कह रहा ? मेरा जवाब है कि जो भी न्यूज़ चैनल संचालित हो रहे हैं वे वास्तव में संचालित नहीं हो रहे हैं, बल्कि घिसट - घिसट कर जैसे तैसे चल रहे हैं .  अभी हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी के अपने न्यूज़ चैनल हैं ज़रूर , लेकिन उनकी दशा क्या है ? उन पर क्या दिखाया जा रहा है ? कितनी खबरें हैं वहां ? कितने न्यूज़ बेस्ड प्रोग्राम हैं ? इन तथाकथित क्षेत्रीय हिंदी न्यूज़ चैनल ने वहां के लोगों के जीवन को कितना  प्रभावित किया ? क्या इन चैनल पर खबरें देखकर लोग जागरूक हुए? क्या इन्होंने पत्रकारिता की धार को बदला? क्या इन चैनल ने नया टीवी पत्रकारिता का  दौर शुरू किया या फिर नए नए सोच को बढ़ावा देने वाले टीवी पत्रकारों की फ़ौज खड़ी  की? कितने पत्रकार इन चैनलों से देश को दिए? समाज में बदलाव की कोई कोशिश भी इन्होंने  की क्या?


हिंदी वाले क्षेत्रीय हो ही नहीं सकते 

आप कहेंगे कि अभी भी उत्तरप्रदेश,उत्तराँचल, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीस गढ़, एन सी आर, मुंबई , राजस्थान, हिमाचल प्रदेश आदि में क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल खूब धडल्ले से चल रहे हैं और एक दो को छोड़कर  लगभग सभी डटे  हैं मैदान में . जी हाँ , 'डटे ' तो हैं लेकिन किस तरह ? ताश के पत्तों की तरह इन चैनलों (जी हाँ, चैनलों क्योंकि यह भी हिंदी का ही शब्द बन गया है स्कूल या स्कूलों की तरह) के हेड या एडिटर्स फैंटे जा रहे हैं, कुकुरमुत्तों की तरह उग आये इन चैनलों में टीवी  पत्रकारों के नाम पर कमीशन एजेंटों और दलालों की भर्तियाँ हो रही हैं .ऐसे एजेंटों और दलालों को पत्रकारिता के ठेके पर पत्रकार बनाने की धारा बह रही है कि  यह यकीन कर सकना  मुश्किल हो रहा है . दुखद बात यह है कि यह सब कोई चुपचाप नहीं हो रहा है . यह हो रहा है दिनदहाड़े , राजी मर्जी से . सबकी आँखों के सामने .

हिंदी अच्छी भाषा है या बुरी;  समर्थ है या असमर्थ;  इस मुद्दे पर यहाँ बात करने के बजाय मैं यह कहना चाहता हूँ कि हिंदी भाषा में क्षेत्रीय भावनाओं  का ज्वार उठाने का माद्दा कभी नहीं रहा, हिंदी भाषी कितन भी कमतर क्यों न हो, इस बात को मानने को कतई  राजी नहीं हो  सकता कि उसकी सोच क्षेत्रीय  है. मुझे लगता है की हिंदी में क्षेत्रीय अपील है ही नहीं , या है भी तो नाममात्र की . कारण यह है कि हम हिंदीवाले तो वसुधैव कुटुम्बम को माननेवाले है, हमारे लिए तो सम्पूर्ण विश्व ही हमारा परिवार है . विश्व नहीं  तो भारत तो है ही . अगर हम हिन्दीवाले नीचे से नीचे के पायदान पर भी आयें तो भी भारत देश से कम की बात हम सोच नहीं सकते.  हम हिंदी भाषियों में क्षेत्रीयता के वे जीवाणु हैं ही नहीं , जो बांग्ला , मराठी, तमिल, तेलुगु , मलयालम आदि में हैं . इसे आप इस तरह भी मान सकते हैं कि  हाँ, हमारे भीतर हमारी  अपनी प्रिय भाषा के बारे में वह स्वाभिमान या दर्प नहीं हैं , या कि  हम हीनता की ग्रंथि में फंसे हैं , हिंदी भाषा में बात करने में हमें गर्व होता हो या  न होता हो , शर्म आती हो या नहीं आती हो, जो भी हो  पर हमें यह मंज़ूर नहीं कि हम  अपने छोटे से दायरे में जीयें . हम या तो देश की बात करते हैं या फिर अपने मालवा , निमाड़, बुन्देल खंड , बघेलखंड, मेवाड़ , मारवाड़, अवध, या भोजपुर आदि की . हिंदी भाषी व्यक्ति की सोच ही क्षेत्रीय नहीं है , वह एक बंगाली, मराठी, तमिल आदि भाषी की तरह एक छोटे से क्षेत्र के बारे मन सोच ही नहीं  सकता . यही कारण है कि क्षेत्रीय हिंदी न्यूज़ चैनलों  को अलग से दर्शक नहीं मिल पाते हैन. जो दर्शक ग्वालियर की खबर देखना चाहता है वह झांसी और आगरा की खबर में भी दिलचस्पी रखता है और जो रायपुर की खबरें जानने का इच्छुक है वह अकेले रायपुर की खबरों से संतुष्ट नहीं . हिंदी भाषी के साथ ख़ास बात यह है की वह अपने आप को इंदौर या नागपुर या रायपुर या झांसी  या इलाहाबाद से ही नहीं जोड़ता, बल्कि पूरे देश से जोड़कर देखता है. इसीलिये श्रीनगर में हुआ आतंकी हमाल भी उनके लिए महत्वपूर्ण खबर है और झाबुआ के किसी इलाके में होने वाली घटना भी .

सरकारी तंत्र के पिछलग्गू 


हम जिन्हें क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल कहते  हैं वे वास्तव में हैं क्या ? क्या वे अपने  इलाके का सही सही प्रतिनिधत्व करते हैं ? क्या वे सच्ची तस्वीर दिखाते हैं अपने इलाके की ? हिंदी के ही राष्ट्रीय न्यूज़ चैंनलों की तरह  ?  इन चैनलों में भी समाचार के प्रति  उनका नजरिया साफ़ नज़र आता है .--वह यह कि  वहां कोई भी नजरिया है ही नहीं.  ये चैनल  खास तौर पर अपने अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के रहन रखे नज़र आते हैं .  इनका एकमात्र काम है अपने राज्य के मुख्यमंत्री की जय जय कार करना और करते ही रहना . धार में भोजशाला  का विवाद चल रहा था . पुलिस लोगों पर लाठियां भांज  रही थी, लेकिन एक चैनल को छोड़कर सभी क्षेत्रीय हिंदी समाचार चैनल मुख्यमंत्री की स्तुति गान  वाले पेड न्यूज़ के पैकेजेस (जी हाँ, यही कहा जाता है इन्हें) दिखा रहे थे. इसमें भी कुछ  क्षेत्रीय चैनल मस्ती की पाठशाला जैसे कार्यक्रम दिखा रहे थे क्योंकि प्रमुख मनोरन्जन चैनलों से टीपा गया ऐसा प्रोग्राम मुफ्त का पड़ता है .और धर्श्नीय भी होता ही है.

दरअसल इन चैनलों के मालिकों  के अजेंडे में ज़मीनें, खदानें, पावर प्लांट, बड़े उद्योग-धंधे आदि होते हैं  और इनके पत्रकारों को हिदायत कि अगर सरकार के खिलाफ भी कोई खबर दिखानी हो तो कभी भी मुख्यमंत्री को निशाना न बनाने दे. सरकार पर प्रहार कारण ही पड़े तो संबंधित विभाग के मंत्री को निपटाया जाए और मुख्यमंत्री को बताया जाए की हम आपके प्रतिस्पर्धी को निपटा रहे हैं.मुख्यमंत्री का एजेंडा ही इन चैनलों का एजेंडा है. सरकारी कृपा के अमृतपान से ही ये चैनल चल रहे हैं. यही कारण है की इन चैनलों का कोई भी सकारात्मक प्रभाव अभी तक किसी भी राज्य में नहीं देखा गया.

अन्य भाषा के रीजनल चैनलों के दशा अलग है. वहाँ कई चैनल तो सत्तासीन लोगों के अपने ही हैं.  जो उनके नहीं है, वे खुलकर सत्ता के खिलाफ हैं. वहाँ या तो  चैनल सत्ता  के पक्ष में हैं या फिर खुलकर विपक्ष में. हिन्दी में विपक्ष में तो होने का सवाल ही नही.


निम्नस्तरीय कंटेंट 

साल में कुछ मौके ऐसे होते हैं जब हमारे ये चैनल गाँव-कस्बों के केबल टीवी को भी मात  दे देते हैं. ये मौके होते हैं स्वतंत्रता दिवस, दीपावली और गणतंत्र दिवस. इन उत्सवों के दौरान हर स्ट्रींगर चैनल का कमीशन एजेंट बन जाता है. उन्हें टारगेट दे दिए जाते हैं की उन्हें पूरा नहीं किया तो नौकरी' गयी समझो. इन दिनों लगभग सभी स्ट्रिंगरों के एक हाथ में माइक आइडी होता है और दूसरे हाथ में कटोरा. इन त्योहारों के मौके पर ये तथाकथित टीवी पत्रकार जनपद अध्यक्षों, जिला पंचायत के अफ़सरों, पार्षदों, डिप्टी कलक्तरों की चमचागीरी करते नज़र आते हैं. आजकल  इन पत्रकारों को कूपन देने का रिवाज है. चिट फंड कंपनियों के बड़े पद वाले   अपने टीवी पत्रकारों को ये कूपन बेचने  के लिए दे देते हैं. लालच भी दिया जाता है कि  तुम्हें इस पर पंद्रह फीसदी कमीशन मिलेगा. यानी अगर दीपावली के दिनों में दस लाख के कूपन बेच दिए तो तुम्हारे डेढ़ लाख पक्के. यह ऑफिशियल कमाई है. मैं ऐसे कई अफ़सरों को जानता हूँ, जिन्होंने ये कूपन खरीदे हैं, या बिकवाए हैं और कई ऐसे हैं जिन्होंने कहा --'' भाई, हमसे पैसे ले जाओ पर कूपन की हमें कोई ज़रूरत नहीं है.''

आम तौर पर ये चैंनल अपने पत्रकारों को पारिश्रमिक  भी  वक़्त पर  नहीं देते. जो कुछ भी देते हैं वह नाममात्र का होता है.   प्रसारित हो चुकी  खबरों के आधार पर मिलनेवाला यह मेहनताना ज़रूर मामूली होता है , लेकिन आम तौर पर बहुधन्धी  पत्रकार इन खबरों के प्रसारण पर ही जीवित होते हैं.  इसी से उनकी 'ख्याति' या लोकप्रियता होती है. आप किसी भी कस्बे के ऐसे ही पत्रकार को 'फेसबुक' पर तनकर  खड़े होकर माइक आई डी के साथ देख सकते हैं.  मध्यप्रदेश के तो छोटे - छोटे शहरों में इन टीवी पत्रकारों की सख्या 50 -60 होना मामूली बात हो गयी है. इनमें से कई चैनल तो ऐसे हैं जो प्रसारित ही नहीं होते. इनमें से कई पत्रकार तो ऐसे हैं जिनकी महीने में एक खबर भी दिखाई नहीं जाती, लेकिन ये अपने आप को  महान पत्रकार कहने में ज़रा भी गुरेज़ नहीं करते. एक पत्रकार ने तो अपने बैग में रखी चूड़ियाँ बताकर कामयाबी का सूत्र बताया कि  जब भी कहीं आंदोलन होता दिखता है,  मैं वहाँ पहुँच जाता हूँ और प्रदर्शनकारियों से कहता हूँ कि  ज़रा किसी को ये चूड़ियाँ भेंट कर दो, जिससे  विज़ुअल्स अच्छे बन जाएँ. पानी की कमी के आंदोलनों में कई बार विज़ुअल्स के लिए हम ही मटके मंगवाकर फुडवा देते हैं, कई बार दूध महँगा होने पर हमें ही दूध भी बहाकर विरोध कारण पड़ता है. यहाँ तक कि  एक बार तो शिवरात्रि के दिन मैं एक सपेरे को शिव मंदिर ले गया और वहाँ शिव लिंग के सामने  कुछ देर साँप छोड़कर विज़ुअल्स बना कर चैनल पर खबर बना दी --'' शिवरात्रि का चमत्कार!''  नाग देवता पहुँच गये शिव की आराधना में. बाद में तो मंदिर वालों का 'कारोबार' बहुत चमक गया और  वे खुद ऐसे चमत्कार दिख वाने  लग गये.
कुल मिला कर भूत भभूत, लोटा लंगोट , सिनेमा क्राइम, बाबा और बॉबी के सहारे ये चैनल चल रहे है. कोई भी बौद्धिक शो यहाँ नहीं, केवल खानापूरी है. सिनेमा का शो यहाँ फिलर है . जब चैनल का ही कैमरामैन इंटरवल में ही लोगों से पूछकर आ जाता है कि फिल्म कैसी लगी.. राष्ट्रीय मुद्दों पर लाइव प्रोग्राम में रिपोर्टर के साथ खड़े लोग वहीँ के कर्मचारी, ड्राइवर, लिफ्टमैन या स्टाफर होते है. कुल मिलकर ये राष्ट्रीय चैनलों  की झूठन और झूठ के सहारे जीते हैं, जिन्हें देखने  या नहीं देखने से दर्शकों को कोई सूचना नहीं मिलती, कोई ज्ञान नहीं मिलता और यहाँ तक की उनका कोई मनोरंजन नहीं होता . यहीं कारण है कि  तमान चैनल फ्लाप हो रहे हैं  और उन्हें अपने खर्च निकालना ही मुश्किल हो रहा है।


राष्ट्रीय और क्षेत्रीय का फर्क 


जिन क्षेत्रीय न्यूज़ चैनलों के साथ राष्ट्रीय चैनल भी हैं, वहाँ संकट  और भी गहरा है क्योंकि वहाँ तमाम अच्छे पत्रकारों को तो नेशनल चैनल में जगह मिल जाती है और दूसरे  दर्जे के लोगों को रीजनल में रख दिया जाता है . जहाँ वे इनके पीर , बाबर्ची , भिस्ती,  खर -- सभी होते हैं. उनकी ख़ास योग्यता यही होती है कि  अपने वरिष्ठों  ( और उनके रिश्तेदारों ) की सेवा में कोई कसर न रखी जाए. जब साहब लोग दौरा करें तो उनकी सेवा में किसी भी तरह की कोई कसर न रखे. टीआरपी के खेल में भी ये अपने दर्शकों और विज्ञापनदाताओं  को मूर्ख बना रहे हैं . दस लाख से बड़े शहर में टीआरपी में नंबर वन, एक लाख तक के शहरों में टीआरपी में नंबर वन, इतने बड़े शहरों में जीआरपी  में नंबर वन, यहाँ जीआरपी में नंबर वन -- ये इस तरह दर्शकों को भरमाते हैं कि  हर चैनल पर यही दावा नज़र आता. दरअसल इन चैनलों के सामने समस्या यह है की वे किसे अपने दर्शकों को दिखाएँ और किसे न दिखाएँ . उन्हें यह भी नहीं समझ में आ रहा की उनका दर्शक जीआरपी और टीआरपी का चक्कर नहीं समझता . मजेदार बात तो यह है कि इन चैनलों के करता धर्ता भी नहीं जानते कि यह क्या है?

-- प्रकाश हिंदुस्तानी 

(लोहिया अध्ययन केन्द्र, नागपुर से प्रकाश  दुबे द्वारा सम्पादित
 'सामान्यजन संदेश' के  विशेष सौवें अंक में प्रकाशित)

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Bhadas4media.com पर भी यही लेख देखा जा सकता है :
http://bhadas4media.com/print/13132-2013-07-17-20-40-52.html


इसी लेख पर एक वरिष्ठ पत्रकार की  टिप्पणी मेरे लिए अहम् है जो मेरी कई बातों की पुष्टि करती है:
http://www.bhadas4media.com/print/13409-2013-07-30-09-17-17.html 
शिवराज की जनआशीर्वाद यात्रा के आगे नतमस्तक हुआ मप्र का मीडिया, क्या ये पेड न्यूज नहीं?

यशवंत जी पिछले दिनों भड़ास पर एक लेख पढ़ा था, प्रकाश हिंदुस्तानी ने लिखा था, शीर्षक था- हिंदी के रीजनल न्यूज चैनलों का एकमात्र काम अपने राज्य के मुख्यमंत्री की जय जय कार करना पिछले दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज की जनआशीवार्द यात्रा के दौरान इसकी याद आ गई....

मध्यप्रदेश का पूरा मीडिया शिवराज की यात्रा के सामने नमस्तक हो गया..... इस तरह लाइव चला रहा था कि मानों प्रदेश की सबसे बड़ी खबर यहीं हो.... चुनाव आयोग पेड न्यूज की बात करता है, ये जो 5-6 घंटे लगातार लाइव चल रहा था बिना बात के राज्य सरकार की जय जयकार की जा रही थी... क्या ये पेड न्यूज की श्रेणी में नहीं आता....

सहारा...ईटीवी...जी मध्यप्रदेश और इंडिया न्यूज मध्यप्रदेश जैसे बड़े रीजनल चैनलों ने मुख्यमंत्री और 5-6 नेताओं का भाषण लाइव चलाया... बंसल न्यूज और ऐसे ही कुछ छोटे चैनलों ने कुर्सी और टेंट लगने से लेकर यात्रा खत्म होने तक ..शिवराज के रथ का पिछवाड़ा भी लाइव दिखाया.....सवाल यही है कि ये पत्रकारिता का कौन सा रूप है.....मध्यप्रदेश में सारे न्यूज चैनल शिवराज का गुणगान कर रहे हैं....साफ है कि इन्हे जनसंपर्क से पैसा मिल रहा है....खूब विज्ञापन दिए जा रहे है पर क्या इसका मतलब ये हो गया है कि रीजनल चैनल प्रदेश सरकार के गुलाम हो जाए....सिर्फ वही दिखाया जाए जो प्रदेश के मुख्यमंत्री को पसंद हो....

ट्राई कितने ही नियम बना ले कि 30 घंटे में 9 मिनट से ज्यादा विज्ञापन नहीं होना चाहिए पर मध्यप्रदेश के न्यूज चैनल कई बार इस तरह के आयोजन में मुख्यमंत्री के भाषण को घंटों लाइव चलाता है....तो क्या ये ट्राई ने नियमों का उल्लघन है....शिवराज की जन आशीर्वाद रैली को जिस तरह मप्र की मीडिया ने प्रस्तृत किया है वो बहुत शर्मनाक है....ये मजबूरी हो गई है रीजनल चैनल की अगर बीजेपी की जगह कांग्रेस की सरकार होती तो वी यही होता जो आज हुआ.... जिस तरह से रीजनल चैनलों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है उसी तरह से राज्यों में चाटुकारिता बढ़ती जा रही है....

अब चैनल का न्यूज हैड सरकार के प्रवक्ता जैसी बाते करता नजर आता है...सिर्फ राज्य सरकार के मंत्रियों के इंटव्यू लेना.. IAS और IPS से अफसरनामा करना...राज्य सरकार की तारीफ करना ये चैनल के न्यूज हैड का काम रह गया है....बाकी क्या चल रहा है चैनल में...कहां जा रही है पत्रकारिता इससे कोई लेना देना नहीं....

अभी मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में थोड़ा समय बाकी है....पर चुनाव आते आते ये न्यूज चैनल पत्रकारिता को और शर्मसार करेंगे....ऐसे में चुनाव आयोग को चाहिए कि वो देखे किस नेता को कौन सा चैनल कितनी देर तक दिखा रहा है....क्यों कि यही पेड न्यूज है ....पैसे देकर टीवी पर दिखना...पैसे देकर मुख्यमंत्री का भाषण या आयोजन लाइव चलवाना.....राज्यों में पत्रकारिता के गिरते स्तर को अगर रोकना है तो सख्ती से इस चाटुकारिता को बंद करना होगा नहीं तो राज्यों में भूल ही जाओ पत्रकारिता नाम की कोई चीज होती है....सिर्फ चाटुकारिता ही नजर आएगी....

                                                                       मध्यप्रदेश के पत्रकार द्वारा भेजे गये पत्र पर आधारित.

Monday, June 03, 2013

ऋतु दा या ऋतु दी....? 
 
ऋतुपर्णो घोष या ऋतु दा(?) बहुत महान फिल्मकार थे.   इसमें दो मत नहीं. लेकिन वे जो 'व्यक्ति' थे, जैसे 'शख्स' थे, उसके लिए हिन्दी में शब्द ही नहीं है. जेंडरनिरपेक्ष शायद! {जातिनिरपेक्ष यानी जाति से निरपेक्ष, धर्मनिरपेक्ष यानी धर्म से निरपेक्ष} शायद इसलिए कि वे जेंडर से निरपेक्ष, उससे ऊपर पहुँच चुके थे. लिपस्टिक,काजल,फाउन्डेशन,रूज़,खिज़ाब का उपयोग समझ में आता है, स्त्रीयोचित ज़ेवर, सलवार-कुर्ता-दुपट्टा के शौकीन होना भी उनकी अपनी पसंद थी. ठीक है. ...पर राखी सावंत बनने की ज़िद में ब्रेस्ट इम्प्लान्ट और हार्मोंस लेना जेंडरनिरपेक्षता नहीं, कुछ और ही है. उन्हें कई बीमारियों ने घेर लिया था, लेकिन हार्मोन्स का शौक जारी था. चाहते क्या थे, शायद उन्हें खुद पता नहीं था.

बेचारे बच्चे कंफ्यूज़ा जाते थे कि उन्हें अंकल कहें या आंटी;   सह कलाकार चाहकर भी ऋतु दा को ऋतु दी नहीं बोल पाते थे कि बरसों से ऋतु दा बोल रहे हैं तो अब 'दी' कैसे कहें? वह भी तब, जब वे दी हैं भी या नहीं, पता नहीं हो.

प्रकृति ने जैसा बनाया, जो भी बनाया; ठीक है.   उससे क्यों पंगेबाज़ी? मर्द बनाया हो या स्त्री; खुद को बेहतर इंसान बनाना प्राथमिकता होनी चाहिए. वैसे हर मर्द में एक औरत छुपी है और हर स्त्री में एक पुरुष रह रह कर कुलाँचे मारता है. इसीलिए पिता में ममत्व और माता में पिता का सख़्त अनुशासन प्रकट होता है. वैचारिक स्तर पर तसलीमा नसरीन हैं और भौतिक स्तर पर बिग बॉस फेम इमाम.

ऋतुपर्णो घोष LGBT अथवा GDS community अथवा थर्ड जेंडर के लिए समर्पित व्यक्ति भी नहीं थे.
उनके माता पिता नहीं रहे, भाई ने नाता तोड़ लिया, यार कुछ और चाहते थे और वे खुद कुछ और ! उन डॉक्टरों के खिलाफ जाँच क्यों नहीं हो जिन्होंने उनके ओपरेशन किए और ख़तरनाक दवाइयाँ दीं?



ऋतुपर्णो महान फिल्मकार थे, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन ये महान लोग भी कैसे कैसे काम कर लेते थे ! जैसे गाँधीजी महान राष्ट्रनायक थे, लेकिन लोगों के विरोध के बावजूद उन्होंने 'सत्य के प्रयोग' कर डाले. तब टीवी चैनल्स नहीं थे. पर अब तो है....किसी ने खुलकर चर्चा नहीं किया.

  ...सचमुच साधारण इंसान होना कितना अच्छा है! कितना सार्थक और कितना आसान भी!!!
--प्रकाश हिन्दुस्तानी 

Monday, July 02, 2012







उसके दुश्मन हैं बहुत, आदमी अच्छा होगा  !!!







यशवंत सिंह ने क्या किया, यह तो पता नहीं, लेकिन उनके खिलाफ मामला बनाकर जिस तरह पेश किया गया, उसे ध्यान से देखने -समझाने के बाद ये कुछ बातें  तो साफ़ हुई .
मुलाहिजा फरमाएं :

यशवंत सिंह ने किसी के साथ कोई मारपीट नहीं की, किसी को एक चांटा तक नहीं मारा, न ही किसी को भी जान से मारा या मारने की कोशिश की. उनके किसी भी कृत्य से किसी को भी खरोंच तक नहीं आई. वरना उन पर दफा 302 , 307 , 323 या 326 लगतीं या लगवाई जातीं.. ये धाराएँ नहीं लगी या लगाईं  नहीं जा सकीं. यानी बन्दे ने किसी के साथ कोई ऐसी हरकत नहीं की है.

यशवंत  सिंह ने किसी की मानहानि भी  नहीं की, जो वे अपने मीडिया पोर्टल के जरिये कर सकते थे, यानी उन्होंने अपने मीडिया पोर्टल भड़ास पर जो कुछ भी प्रकाशित किया, उससे किसी कि मानहानि नहीं हुई, यानी मीडिया पोर्टल पर सारी बातें सही ही प्रकाशित होती रहीं होंगी. अगर उन्होंने किसी की इज्ज़त उतारी होती तो वह शख्स यशवंत के खिलाफ दफा 499 , 500 या 501 का मामला दर्ज कराता. यह नहीं हुआ, यानी उन्होंने जिसजिस के भी खिलाफ जो जो लिखा, सही लिखा.

यशवंत सिंह क्या  रूपर्ट मर्डोक बनना चाह रहे होंगे और इसके लिए रंगदारी यानी एक्स्टार्शन पर उअतर आये होंगे और वह भी किसी और से नहीं, इसी मीडिया के किसी शख्स से? कौन यकीन करेगा?

आजकल अगर आप थोड़े रिसोर्सफुल हैं और थोड़ा खर्चा करने की कूवत रखते हों तो किसी के भी खिलाफ थाने में पव्वा लगाकर केस दर्ज करा दीजिये कि इन्होंने मेरा रास्ता रोका, धमकाया, गाली गलौज किया, दुष्प्रचार किया, बस आपका काम हो गया. कोई सरकारी कर्मचारी तो कुछ कर ही नहीं पायेगा, अगर कोई आजादखयाल इंसान हो तो ऐसी हरकतों से उस व्यक्ति को परेशान किया जा सकता है.

ऐसे लोग क्यों भूल जाते हैं कि वे किसी थाने में सेटिंग कर सकते हैं, किसी अफसर को पता सकते हैं, न्यायपालिका को नहीं बरगला सकते. न्यायालय के सामने सारे तथ्य पहुँचाने दीजिये, यशवंत सिंह की ज़मानत तत्काल हो जायेगी. उनके निंदकों का आभार मानना चाहिए कि इससे बन्दे के दम ख़म का पता बाकी लोगों को भी चल जाएगा. यह पता चल जाएगा कि मीडिया के समंदर में ही कितने बड़े बड़े शार्क हैं जो रोजाना छोटी मछलियों को निगल रहे हैं.  ये लोग चाहते हैं कि शोषित - पीड़ित, दूरस्थ मीडियावालों की बात कहने वाला कोई सामने न आ सके और अगर वह आये तो उसे इतना परेशान कर दो कि दूसरों के लिए नजीर बन जाए. ऐसे व्यक्ति को बदनाम कर दो, शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर दो ताकि वह फिर किसी और की तो क्या अपनी बात भी कहने का साहस न कर सके.

.....पर ऐसा नहीं होगा, और जो होगा  ऐसा लगता है कि मीडिया जगत में कुछ अच्छा, बहुत ही अच्छा होगा. यह उसका पूर्व पाठ है. पुलिस ने जिस वहशियाना तरीके से यशवंत सिंह के खिलाफ कार्रवाई की , उसकी जितनी  निंदा की जाये, कम है.  पुलिस को इतनी जल्दी क्या थी एफ आई आर की? सुना है कि यूपी में तो एफ आई आर करने में ही जान निकल जाती है और फिर यशवंत सिंह के खिलाफ शिकायत हुई तो उन्हें भी क्रास कंप्लेन का मौका दिया जाना था. जिस तरह की धाराएं  उनके खिलाफ लगाईं गयी हैं, वैसे केस तो नॉएडा - दिल्ली में रोजाना हजारों लिखे जा सकते हैं, मगर जिस तेजी से यशवंत सिंह के खिलाफ कार्रवाई की गयी, वह चौंकानेवाली बात है.

निदा फ़ाज़ली की एक ग़ज़ल की पंक्तियाँ हैं :

उसके दुश्मन हैं बहुत, आदमी अच्छा होगा
वो भी 'तेरी'  तरह इस शहर में तन्हा होगा

इतना सच बोल कि होंठों का तबस्सुम न बुझे
रोशनी   ख़त्म   न   कर   आगे   अंधेरा   होगा





---प्रकाश हिन्दुस्तानी
2  / 7 / 2012














Sunday, May 20, 2012

हीरोइन बहुत परेशान है बेचारी

हीरोइन बहुत परेशान है बेचारी



http://www.youtube.com/watch?v=BOvytd3xbK0&feature=related

फिल्मेरिया का पुराना रोगी हूँ. लगभग सभी हिन्दी फ़िल्में देखता हूँ. ताज़ा फिल्म 'इशकज़ादे' में प्रेम को नये ही रूप में दिखाया गया है. एकदम हिंसक और उत्तेजना वाला रूप. नयी पीढ़ी के निर्देशक को शायद यही पसंद हो, पर मैं यहाँ इस फिल्म के एक गाने के बारे में बात कर रहा हूँ. बरसों बाद किसी फिल्म का कोई रोमांटिक गाना पसंद आया.

    इस फिल्म की हीरोइन बहुत परेशान है बेचारी.
   परेशानी में भी खुश होती है और गाना गाती है.

 बरसों बाद कोई इतना रोमांटिक गाना आया है. जिसकी हीरोइन का दिल फूलों से झड़ता है और काँटों में मन लगता है. गलियाँ  गश खाकर मुड जाती हैं, मीलों के मारे चौबारे पता पूछते हैं, हीरोइन (बेचारी) बे बात खुद पे मरती है और बेबाक आहें भरने लगती हैं. उसका दिल फितरत से बदलता है और किस्मत बदलने लगता है. बेचारी बहुत परेशान है..


ये-नये नैना मेरे ढूँढे हैं
दर-बदर क्यूँ तुझे
नये-नये मंज़र यह तकते  हैं
इस कदर क्यूँ मुझे
ज़रा-ज़रा फूलों पे झड़ने लगा दिल मेरा
ज़रा-ज़रा काँटों से लगने लगा दिल मेरा


Why do my like-new eyes
look for you everywhere..
why do these new sceneries look at me so much..
my heart started falling on flowers little by little..
my heart started to feel love for thorns a little..

मैं परेशान परेशान  परेशान परेशान
आतिशें वो कहाँ
रंजिशें हैं धुआँ


I'm disturbed, confused,
where are those fireworks..
I'm disturbed, confused,
The animosity is (gone in) smoke..

गश खा के गलियाँ मुड़ने लगी हैं,
राहों से तेरी जुड़ने लगी हैं.
चौबारे सारे ये मीलों के मारे से पूछे ये तेरा   पता
ज़रा ज़रा  उड़ने  को करने लगा ये मन  मेरा


The streets, fainting, have started to turn,
they've begun getting connected to your paths,
all these squares (crossroads), as if tired of distances,
ask for your address..
My heart has begun getting tired of walking a little..
my heart wants to fly now, little by little..

मैं परेशान परेशान  परेशान परेशान
आतिशें वो कहाँ
मैं परेशान परेशान  परेशान परेशान
रंजिशें हैं धुआँ ..


I'm disturbed, confused,
where are those fireworks..
I'm disturbed, confused,
The animosity is (gone in) smoke..

बे-बात खुद पे मरने लगी हूँ
मरने लगी हूँ
बेबाक आहें भरने लगी हूँ
भरने लगी हूँ
चाहत के छीटें  है, खारे भी, मीठे है
मैं क्या से क्या हो गयी


ज़रा-ज़रा फ़ितरत बदलने लगा दिल मेरा
ज़रा-ज़रा किस्मत से लड़ने लगा दिल मेरा
मैं परेशान परेशान  परेशन परेशान

कैसी मदहोशियाँ
मस्तियाँ
मस्तियाँ


For now reason, I have started loving myself,
falling for myself..
I've begun to sigh openly, freely..
These are splatters/drops of love,
even though salty, they feel as if sweet,
What has become of me..
My heart has begun to change intentions little by little..
My heart has begun to fight against fate, little by little..

What intoxications..
Joys, joys...


मैं परेशान परेशान परेशान
आतिशें वो कहाँ
मैं परेशान परेशान परेशान परेशान
रंजिशें हैं धुआँ...


I'm disturbed, confused,
where are those fireworks..
I'm disturbed, confused,
The animosity is (gone in) smoke..
(गायिका :   शाल्मली खोल्गाड़े / गीत : कौसर मुनीर / संगीत : अमित त्रिवेदी / फ़िल्म : इशकजादे)

प्रकाश हिन्दुस्तानी
20 मई, 2012